411 REFERENCE · Wikipedia
लक्ष्मण नायक
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
लक्ष्मण नायक ଲକ୍ଷ୍ମଣ ନାୟକ or 22 नवंबर 1899 तेंतुलिगुमा, कोरापुट ज़िला, मद्रास प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत 1943 3 29 1899 11 22 y बरहामपुर जेल, ओड़िशा, ब्रिटिश भारत फाँसी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, आदिवासी नेता भारत छोड़ो आंदोलन में नेतृत्व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन मंगुली भूमिया Laxman Nayak 1989 stamp of India.jpg डाक टिकट
लक्ष्मण नायक (22 नवंबर 1899 – 29 मार्च 1943) ओड़िशा के प्रमुख आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता थे। उनका नाम लक्ष्मण नाइक भी लिखा जाता है। वे दक्षिण ओड़िशा के आदिवासी बहुल कोरापुट क्षेत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठन तथा महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और असहयोग के विचारों के प्रसार के लिए जाने जाते हैं।Laxman Nayak https://cmsadmin.amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?4554= Azadi Ka Amrit Mahotsav Ministry of Culture, Government of India 1 September 2026
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने माथिलि क्षेत्र में आदिवासी जनता को संगठित किया। 21 अगस्त 1942 को उनके नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग माथिलि पुलिस थाने के सामने प्रदर्शन करने पहुँचे। पुलिस की गोलीबारी में अनेक प्रदर्शनकारी मारे गए और घायल हुए। इसी घटना के बाद एक वनरक्षक जी. रामैया की मृत्यु के मामले में लक्ष्मण नायक को आरोपी बनाया गया।Saheed Laxman Naik: A Tribute Orissa Review Government of Odisha February–March 2008 https://magazines.odisha.gov.in/Orissareview/2008/feb-march-2008/engpdf/feb-mar-2008.pdf 1 September 2026
औपनिवेशिक न्यायालय ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत दोषी ठहराकर मृत्युदंड दिया।Laxman Naik – The Leader of the Leaders Orissa Review Government of Odisha August 2006 https://magazines.odisha.gov.in/orissareview/Aug2006/engpdf/aug-06.pdf 1 September 2026 अपील असफल होने के बाद 29 मार्च 1943 को बरहामपुर जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई।Reflections on the National Movement in Odisha Government of Odisha https://ova.gov.in/EpubViewer/Cache/02032021191203_Reflections_On_The_National_Movement_In_Odisha/02032021191203_Reflections_On_The_National_Movement_In_Odisha.html 1 September 2026 स्वतंत्रता के बाद उन्हें ओड़िशा के प्रमुख आदिवासी शहीदों में स्मरण किया गया और उनके जीवन को आदिवासी समाज तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा गया।
प्रारंभिक जीवन
लक्ष्मण नायक का जन्म 22 नवंबर 1899 को तेंतुलिगुमा गाँव में हुआ था। यह क्षेत्र तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के कोरापुट ज़िले में स्थित था और वर्तमान में ओड़िशा के दक्षिणी भाग का हिस्सा है।
उनके पिता पदलम नायक स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली व्यक्ति थे और जयपुर रियासत के प्रशासन से संबद्ध मुस्तादार के रूप में कार्य करते थे। लक्ष्मण नायक का संबंध भूमिया आदिवासी समुदाय से था।
उनकी औपचारिक शिक्षा सीमित रही। भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानी संबंधी विवरण के अनुसार, उन्होंने बहुत कम औपचारिक शिक्षा प्राप्त की, लेकिन वे पढ़ने-लिखने तथा कविता रचने में रुचि रखते थे।
उनका प्रारंभिक जीवन दक्षिण ओड़िशा के आदिवासी समाज की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के बीच बीता। इस क्षेत्र में आदिवासी समुदायों का जीवन जंगल, कृषि और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर था। औपनिवेशिक वन नीतियों तथा राजस्व व्यवस्था ने उनके पारंपरिक जीवन पर प्रभाव डाला।
सामाजिक जीवन और नेतृत्व का उदय
लक्ष्मण नायक ने युवावस्था से ही अपने क्षेत्र की सामाजिक समस्याओं को निकट से देखा। आदिवासी लोगों को विभिन्न प्रकार के करों, जबरन श्रम और प्रशासनिक दबावों का सामना करना पड़ता था। साहूकारों तथा स्थानीय प्रशासन की गतिविधियों का भी ग्रामीण समाज पर प्रभाव था।
1930 में अपने पिता की मृत्यु के बाद लक्ष्मण नायक ने मुस्तादारी की जिम्मेदारी संभाली। किंतु प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा होने के बावजूद वे धीरे-धीरे अपने क्षेत्र के आदिवासी लोगों के हितों के प्रति अधिक सक्रिय हुए।
जयपुर रियासत के प्रशासन और औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों से संसाधन तथा श्रम लिए जाने की घटनाओं ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया। वे इन समस्याओं को लेकर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के संपर्क में आए।
कांग्रेस से जुड़ाव
लक्ष्मण नायक बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और कोरापुट के आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस के कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हो गए।
उन पर महात्मा गांधी के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण असहयोग को अपने राजनीतिक कार्य का आधार बनाया।
उन्होंने आदिवासी गाँवों में चरखा और खादी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही वे वयस्क शिक्षा, मद्यनिषेध और सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे।
नायक का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन का विरोध करना नहीं था, बल्कि आदिवासी समाज में आत्मविश्वास और राजनीतिक चेतना उत्पन्न करना भी था। उन्होंने ग्रामीणों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
आदिवासी समाज में राजनीतिक चेतना
1930 के दशक में लक्ष्मण नायक दक्षिण ओड़िशा के आदिवासी समाज में एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरने लगे। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को स्थानीय आदिवासी समस्याओं से जोड़ने का प्रयास किया।
उन्होंने ग्रामीणों को सड़क और पुल निर्माण तथा विद्यालयों की स्थापना जैसे सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
उनका राजनीतिक संदेश मुख्यतः स्थानीय भाषा और आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना के अनुरूप था। इस कारण वे सामान्य ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए।
व्यक्तिगत सत्याग्रह
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध चलाए गए राजनीतिक अभियानों में लक्ष्मण नायक ने भाग लिया। वे व्यक्तिगत सत्याग्रह से भी जुड़े और इसके कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया।
इस अवधि में वे ब्रिटिश प्रशासन की निगरानी में आ गए थे। उनकी गतिविधियाँ मुख्यतः अहिंसक राजनीतिक प्रतिरोध, राष्ट्रीय चेतना और आदिवासी संगठन से संबंधित थीं।
भारत छोड़ो आंदोलन
अगस्त 1942 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया। गांधी के करो या मरो संदेश का प्रभाव ओड़िशा के आदिवासी क्षेत्रों में भी पड़ा।Laxman Naik – The Immortal Martyr of Quit India Movement Orissa Review Government of Odisha February–March 2007 https://magazines.odisha.gov.in/Orissareview/feb-mar-2007/engpdf/feb-mar.pdf 1 September 2026
लक्ष्मण नायक ने कोरापुट क्षेत्र में आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें माथिलि की कांग्रेस प्राथमिक समिति के अध्यक्ष के रूप में भी उल्लेखित किया गया है।
उन्होंने आदिवासी लोगों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। अगस्त 1942 में माथिलि क्षेत्र में आंदोलन ने तीव्र रूप ले लिया।
माथिलि कांड
21 अगस्त 1942 को लक्ष्मण नायक के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग माथिलि पुलिस थाने की ओर बढ़े। प्रदर्शनकारियों के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज था और उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विरोध प्रकट करना था।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने का प्रयास किया। स्थिति तनावपूर्ण होने के बाद पुलिस ने गोलीबारी की। सरकारी स्रोतों में इस गोलीबारी में कई लोगों के मारे जाने और बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने का उल्लेख मिलता है।
माथिलि घटना में मृतकों की संख्या के संबंध में विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में अंतर मिलता है। ओड़िशा सरकार के प्रकाशित एक विवरण में छह लोगों की घटनास्थल पर मृत्यु और लगभग 100 लोगों के घायल होने का उल्लेख है।
घटना के दौरान वनरक्षक जी. रामैया की भी मृत्यु हुई। ब्रिटिश प्रशासन ने बाद में इस मृत्यु के लिए लक्ष्मण नायक को प्रमुख आरोपी बनाया।
माथिलि की घटना के बाद प्रशासन ने अनेक लोगों को गिरफ्तार किया और उनके विरुद्ध विभिन्न आपराधिक धाराओं में मुकदमे चलाए।
गिरफ्तारी और मुकदमा
माथिलि कांड के बाद लक्ष्मण नायक को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत हत्या का आरोप लगाया गया।
कोरापुट की अदालत में मामले की सुनवाई हुई। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी. रामनाथन ने लक्ष्मण नायक को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई।
नायक ने अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों से इनकार किया। उनके पक्ष में अपील की गई और मामला उच्च न्यायालय तक पहुँचा, लेकिन मृत्युदंड को बरकरार रखा गया।
बाद के ओड़िशाई ऐतिहासिक लेखन में उनके मुकदमे और दोषसिद्धि को औपनिवेशिक शासन द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के व्यापक संदर्भ में देखा गया है।
फाँसी
मृत्युदंड की पुष्टि के बाद लक्ष्मण नायक को बरहामपुर जेल में रखा गया।
29 मार्च 1943 को उन्हें बरहामपुर जेल में फाँसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु 43 वर्ष थी।
उनकी मृत्यु के बाद वे ओड़िशा के स्वतंत्रता संग्राम में एक शहीद के रूप में स्मरण किए जाने लगे। विशेष रूप से दक्षिण ओड़िशा के आदिवासी समाज में उनकी स्मृति राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक न्याय के संघर्ष से जुड़ गई।
विचार और कार्यशैली
लक्ष्मण नायक के राजनीतिक विचारों पर गांधीवादी दर्शन का प्रभाव था। वे अहिंसा, सत्याग्रह और स्वदेशी के समर्थक थे।
उनकी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक सुधार था। वे आदिवासी लोगों को शिक्षा, स्वावलंबन और सामुदायिक संगठन के लिए प्रेरित करते थे।
उन्होंने खादी और चरखे को केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आत्मनिर्भरता और राजनीतिक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया।
उनका नेतृत्व इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को दक्षिण ओड़िशा के आदिवासी समाज की स्थानीय समस्याओं से जोड़ा।
विरासत
स्वतंत्रता के बाद लक्ष्मण नायक को ओड़िशा के प्रमुख आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों में स्थान मिला। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आजादी का अमृत महोत्सव सामग्री में उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख Unsung Heroes में शामिल किया गया है।
ओड़िशा सरकार के प्रकाशनों में भी उनके जीवन और बलिदान को राज्य के स्वतंत्रता आंदोलन तथा आदिवासी प्रतिरोध के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उनकी स्मृति में ओड़िशा के विभिन्न भागों में स्मारक और प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। उनके जन्मदिन तथा शहादत दिवस पर सरकारी और सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
उनका जीवन विशेष रूप से इस बात का उदाहरण माना जाता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन किस प्रकार दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँचा और स्थानीय सामाजिक-आर्थिक संघर्षों के साथ जुड़ा।
स्मृति और सम्मान
भारत सरकार तथा ओड़िशा सरकार के विभिन्न प्रकाशनों में लक्ष्मण नायक को आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और शहीद के रूप में सम्मानित किया गया है।
ओड़िशा के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर प्रकाशित Orissa Review के लेखों में उनके जीवन, माथिलि आंदोलन और बलिदान का विस्तृत वर्णन मिलता है।
उनकी स्मृति आज भी विशेष रूप से कोरापुट, मलकानगिरी और दक्षिण ओड़िशा के आदिवासी क्षेत्रों में जीवित है। उनके नाम पर विभिन्न सार्वजनिक संस्थानों और स्मारकों का नामकरण किया गया है।
यह भी देखें
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन
महात्मा गांधी
कोरापुट ज़िला
सन्दर्भ
30em
बाहरी कड़ियाँ
भारत सरकार — लक्ष्मण नायक
Orissa Review — Saheed Laxman Naik: A Tribute
Orissa Review — Laxman Naik: The Leader of the Leaders
Reflections on the National Movement in Odisha
श्रेणी:1899 में जन्में लोग
श्रेणी:ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:भारत छोड़ो आंदोलन
श्रेणी:ओड़िशा के आदिवासी नेता
श्रेणी:कोरापुट ज़िले के लोग
श्रेणी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य
श्रेणी:ब्रिटिश भारत में मृत्युदंड दिए गए लोग
श्रेणी:फाँसी दिए गए भारतीय
श्रेणी:१९४३ में निधन