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षट्खण्डागम
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Dhavala.jpg धवला टीका की पाण्डुलिपि आचार्य पुष्पदंत एवं आचार्य भूतबलि प्राकृत भारत जैन दर्शन, कर्म सिद्धांत
षट्खण्डागम (प्राकृत: छक्खंडागम) दिगम्बर जैन परंपरा का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण धर्मग्रंथ है। दिगम्बर परंपरा के अनुसार मूल जैन आगम कालक्रम में लुप्त हो गए थे, अतः षट्खण्डागम को आगमिक परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है। यह ग्रंथ मुख्यतः जीव और कर्म के संबंध, बंधन तथा मोक्षमार्ग से संबंधित सिद्धांतों का व्यवस्थित निरूपण करता है।
उत्पत्ति
दिगम्बर परंपरा के अनुसार षट्खण्डागम आचार्य धरसेन द्वारा प्रदत्त मौखिक शिक्षाओं पर आधारित है। कहा जाता है कि आचार्य धरसेन ने गिरनार पर्वत (वर्तमान गुजरात) की चन्द्रगुफा में आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि को आगमिक ज्ञान का उपदेश दिया।
उसी के आधार पर दोनों आचार्यों ने इस ज्ञान को सूत्रबद्ध रूप में लिपिबद्ध किया। परंपरा के अनुसार आचार्य पुष्पदंत ने प्रारंभिक १७७ सूत्र लिखे तथा शेष सूत्र आचार्य भूतबलि द्वारा लिखे गए। कुल मिलाकर लगभग ६००० सूत्रों का संकलन माना जाता है।
संरचना
नामानुसार यह ग्रंथ छह खण्डों में विभाजित है:
जीवस्थान
क्षुद्रकबन्ध
बन्धस्वामित्व
वेदना
वर्गणा
महाबन्ध
प्रथम तीन खण्ड मुख्यतः आत्मा के दृष्टिकोण से कर्मबंध का विवेचन करते हैं, जबकि अंतिम तीन खण्ड कर्म की प्रकृति, वर्गीकरण और उसकी सीमाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
विषयवस्तु
षट्खण्डागम का प्रमुख विषय जीव और कर्म का पारस्परिक संबंध है। इसमें कर्म के बंध, उदय, स्थिति, प्रकार तथा उनके परिणामों का विश्लेषण मिलता है। ग्रंथ में कर्मसिद्धांत का वर्गीकरणात्मक और विश्लेषणात्मक स्वरूप दृष्टिगोचर होता है।
जैन दर्शन की तार्किक परंपरा के अनुरूप इसमें अनेक दार्शनिक अवधारणाओं का क्रमबद्ध विवेचन किया गया है।
धवला टीका
षट्खण्डागम पर रचित प्रमुख टीकाओं में धवला टीका का विशेष महत्व है। यह टीका 9वीं शताब्दी के लगभग आचार्य वीरसेन द्वारा रचित मानी जाती है। धवला मुख्यतः षट्खण्डागम के प्रथम पाँच खण्डों पर आधारित है और विस्तृत शैली में इसकी व्याख्या प्रस्तुत करती है।
षष्ठ खण्ड ‘महाबन्ध’ पर परंपरा में ‘महाधवला’ नामक व्याख्यात्मक ग्रंथ प्रचलित है। इन टीकाओं की भाषा प्राकृत एवं संस्कृत के मिश्रित रूप में है, जिसे मणिप्रवाल शैली कहा जाता है।
धवला टीका में कर्म सिद्धांत, जीव-मीमांसा तथा दार्शनिक विश्लेषण का विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है।
पाण्डुलिपि संरक्षण
षट्खण्डागम की प्राचीन ताड़पत्र पाण्डुलिपियाँ दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के मूडबिद्री क्षेत्र में संरक्षित रहीं। कालांतर में ये पाण्डुलिपियाँ जर्जर अवस्था में पहुँच गई थीं।
बीसवीं शताब्दी में विद्वानों द्वारा इनका लिप्यंतरण, संपादन और प्रकाशन कार्य किया गया, जिससे यह ग्रंथ आधुनिक अध्ययन के लिए उपलब्ध हुआ। विभिन्न भाषाओं में अनुवादों के माध्यम से इसका व्यापक प्रसार हुआ।
षट्खण्डागम में गणित
कुछ विद्वानों के अनुसार इस ग्रंथ तथा इसकी टीकाओं में संख्यात्मक वर्गीकरण, अनंत की अवधारणा तथा तार्किक विश्लेषण की पद्धति का उल्लेख मिलता है। जैन गणितीय परंपरा के संदर्भ में समुच्चयात्मक एवं संख्यात्मक संरचनाओं की चर्चा की जाती है।
इन्हें भी देखें
धवला टीका
महाधवला
जैन दर्शन
कर्म सिद्धांत
बाहरी कड़ियाँ
षट्खण्डागम-परिशीलन
धवला का गणितशास्त्र
श्रेणी:जैन ग्रंथ
श्रेणी:दिगम्बर जैन ग्रंथ
श्रेणी:प्राकृत साहित्य