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सतनामी पंथ
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दिसम्बर 2024
सतनामी सम्प्रदाय भारत का एक हिन्दू सम्प्रदाय है।
सतनामी समाज की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी, और इसके संस्थापक गुरु बाबा घासीदास माने जाते हैं, जो छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में पैदा हुए थे. उन्होंने जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
मुगल दरबारी इतिहासकार खफी खान (1664-1732) के अनुसार, “सतनामी नारनौल एवं मेवात के परगना में लगभग चार या पांच हजार गृहस्थ थे... उनकी आजीविका और पेशा आमतौर पर कृषि और छोटी पूंजी के साथ बनिया (या कारीगर) की तरह व्यापार करना है”।
क्या होता है जैतखाम?
सतनामी समाज के भीतर जैतखाम की मान्यता बहुत होती है। जैतखाम दो शब्दों से मिलकर बना है जिसमें जैत और खाम शब्द हैं। इसका अर्थ जैत यानी जय और खाम यानी खंभा होता है। जैतखाम शब्द ज्यादातर छत्तीसगढ़ की बोली में बोला जाने वाला शब्द है। मान्यता है कि जैतखाम मूलरूप से सतनामी पंथ के ध्वज का नाम है। यही ध्वज सतनामी संप्रदाय का प्रतीक माना जाता है। सतनाम समाज के लोग इस ध्वज को पूजते हैं, वहीं इसे किसी चबूतरे या प्रमुख स्थल पर खंभे में सफेद झंडा लगाकर पूजा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस समाज का सबसे बड़ा जैतखाम छत्तीसगढ़ के गिरौधपुरी में है।
औरंगजेब के विरुद्ध सतनामियों का विद्रोह
सतनामी विद्रोह
सन् 1672 में वर्तमान पंजाब एवं हरियाणा में रहने वाले सतनामियों ने औरंगज़ेब की लगातार बढ़ती कर मांगों (जैसे जजिया को पुनर्जीवित करना) के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह ग्रामीण दंगे के रूप में शुरू हुआ। वस्तुतः यह एक किसान एवं सैनिक के बीच मामूली झड़प से शुरू हुआ। अंततः मुगलों ने विद्रोह को कुचल दिया और हजारों सतनामियों को मार दिया गया। औरंगजेब ने इस समुदाय को पूरी तरह से नष्ट कर दिया, जिसका पुनरुत्थान केवल 18वीं सदी के मध्य में ‘जगजीवनदास' के तहत वर्तमान उत्तर प्रदेश में और घासीदास के तहत वर्तमान छत्तीसगढ़ में हुआ।
गुरु घासीदास के अधीन सतनमियों का पुनरुद्धार
सबसे महत्वपूर्ण सतनामी संप्रदाय की स्थापना मध्य भारत के छत्तीसगढ़ क्षेत्र में संत गुरु घासीदास ने की थी। उनका सतनाम पंथ बड़ी संख्या में सतनामी सदस्यों को धार्मिक व सामाजिक पहचान प्रदान करने में सफल रहा।
गुरु घासीदास ने गुरुओं की एक वंशावली निर्धारित की जो उनके बाद संप्रदाय का नेतृत्व करेंगे। इसकी शुरुआत उनके बेटे बालकदास से हुई। सन् 1800 के दशक के अंत तक दो-स्तरीय संगठनात्मक संरचना विकसित हुआ जिसमें गुरु सबसे ऊपर थे और उनके नीचे कई ग्राम-स्तर के पुजारी थे। मोटे तौर पर यह अब भी कायम है। ये पुजारी विवाह संपन्न कराते थे, विवादों में मध्यस्थता करते थे, तपस्या करते थे और संगठन में मध्यस्थ के रूप में भी कार्य करते थे।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
गुरु घासीदास