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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

एकात्मवाद

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सितंबर 2026सितंबर 2026एकात्मवाद (अंग्रेज़ी: Monophysitism) ईसाई धर्मशास्त्र का एक सिद्धांत है जो पाँचवीं शताब्दी में ईसा मसीह की प्रकृति (नेचर) से संबंधित विवाद के परिणामस्वरूप उभरा। यह शब्द यूनानी भाषा के दो शब्दों — "मोनोस" (अर्थात "एक") तथा "फ़ुसिस" (अर्थात "प्रकृति") — से मिलकर बना है। एकात्मवाद के अनुयायियों का मानना था कि ईसा मसीह में अवतरण (इंकार्नेशन) के पश्चात केवल एक ही प्रकृति शेष रह गई, जिसमें उनकी दिव्य एवं मानवीय दोनों प्रकृतियाँ एक साथ मिलकर एकीकृत हो गईं, न कि पृथक-पृथक रूप में विद्यमान रहीं। पृष्ठभूमि एवं उत्पत्ति इस विवाद की जड़ें अलेक्ज़ेंड्रिया के धर्माधिकारी संत सिरिल की "लोगोस-सार्क्स" (शब्द-देह) धर्मशास्त्रीय परंपरा में खोजी जा सकती हैं। सिरिल के उत्तराधिकारी डायोस्कोरस ने इस एक-प्रकृति सिद्धांत को अपने धर्मशास्त्र का आधार बनाया तथा वर्ष 449 ई. में आयोजित इफ़ेसुस की दूसरी परिषद (जिसे बाद में "डाकुओं की परिषद" कहा गया) में भिक्षु यूटिकीज़ के इसी दृष्टिकोण का समर्थन किया। कैल्सेडन की परिषद और विभाजन वर्ष 451 ई. में सम्राट मार्सियन के आदेश पर कैल्सेडन की परिषद बुलाई गई, जिसमें यह घोषित किया गया कि ईसा मसीह एक ही व्यक्ति में दो पृथक प्रकृतियों — पूर्णतः दिव्य तथा पूर्णतः मानवीय — के साथ विद्यमान हैं, तथा ये दोनों प्रकृतियाँ "बिना मिश्रित, बिना परिवर्तित, बिना विभाजित तथा बिना पृथक हुए" एक साथ रहती हैं। इस परिभाषा को "हाइपोस्टैटिक यूनियन" (एकाश्रित संयोग) कहा गया और यह रोमन कैथोलिक, पूर्वी रूढ़िवादी तथा प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र की आधारभूत मान्यता बन गई। परिषद ने डायोस्कोरस को अनुशासनहीनता के आरोप में पदच्युत कर निर्वासित कर दिया। कैल्सेडन की इस परिभाषा को मिस्र, सीरिया तथा आर्मीनिया के अनेक ईसाई समुदायों ने अस्वीकार कर दिया, जिसके फलस्वरूप पूर्वी ईसाई जगत में एक स्थायी विभाजन उत्पन्न हो गया। इन असहमत समुदायों को ऐतिहासिक रूप से "एकात्मवादी" कहा गया, हालाँकि इनमें से अधिकांश आधुनिक चर्च स्वयं को "मियाफ़िसाइट" (अर्थात एक संयुक्त प्रकृति के समर्थक) कहलाना पसंद करते हैं, ताकि उन्हें यूटिकीज़ के अधिक चरम एकात्मवाद से अलग पहचाना जा सके। ये चर्च आज "प्राच्य रूढ़िवादी गिरजाघर" (Oriental Orthodox Churches) समूह के अंतर्गत आते हैं, जिनमें कॉप्टिक रूढ़िवादी चर्च, सिरियाई रूढ़िवादी चर्च तथा आर्मेनियाई अपोस्टोलिक चर्च प्रमुख हैं। परवर्ती प्रभाव कैल्सेडन के पश्चात एकात्मवादियों पर उत्पीड़न तथा प्रतिबंध लगाए गए, फिर भी मिस्र में इस मत को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त रहा। सम्राटों द्वारा दोनों पक्षों में सामंजस्य स्थापित करने के अनेक प्रयास किए गए — जैसे 482 ई. में सम्राट ज़ेनो द्वारा जारी "हेनोटिकॉन" — किंतु विभाजन को पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सका। यह धर्मशास्त्रीय विवाद आज भी पूर्वी ईसाई परंपराओं के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण विषय माना जाता है। सन्दर्भ