Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

इलावृतवर्ष

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

इस पृष्ठ की विषय वस्तु हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित हैं। इलावृतवर्ष जम्बूद्वीप के केन्द्र में स्थित उसके नौ वर्षों में से एक है। इस वर्ष के केन्द्र में मर्यादापर्वत मेरु है। thumb|300px|मेरु पर्वत तथा इलावृतवर्ष की भूटानी बौद्ध धार्मिक चित्रकारी श्रीमद् भागवत महापुराण तथा विष्णुपुराण आदि पुराणों में पृथ्वी को सात द्वीपों (जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप) में बाँटा गया है, जिनके अलग अलग वर्ष, वर्ण, उपद्वीप, समुद्र तथा पूज्यदेव आदि होते हैं। पृथ्वी के केन्द्र में स्थित द्वीप को जम्बूद्वीप कहते हैं। जम्बूद्वीप जम्बूद्वीप जम्बूद्वीप पृथ्वी के केन्द्र में स्थित है तथा खारे जल के समुद्र से घिरा है। इसका आकार एक लाख योजन है। यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। यहीं पर्वतराज मेरु स्थित है। यहाँ के उपद्वीप यहाँ सात द्वीप हैं--- स्वर्णप्रस्थ चन्द्रशुक्ल आवर्तन रमणक मनदहरिण पाञ्चजन्य सिंहल लंका यहाँ के वर्ष यहाँ नौं वर्ष हैं--- इलावृतवर्ष के मध्य में ही मर्यादापर्वत सुमेरु स्थित है। भारतवर्ष के अतिरिक्त अन्य वर्षों का वर्णन इस प्रकार हैः भद्राश्चवर्ष में धर्मराज के पुत्र भद्रश्रवा का राज्य है। वहाँ पर भगवान हयग्रीव की पूजा होती है। हरिवर्ष में दैत्यकुलभूषण भक्तवर प्रह्लाद जी रहते हैं। वहाँ पर भगवान नृसिंह की पूजा होती है। केतुमालवर्ष वर्ष में लक्ष्मी जी संवत्सर नाम के प्रजापति के पुत्र तथा कन्याओं के साथ भगवान कामदेव की आराधना करती हैं। रम्यकवर्ष के अधिपति मनु जी हैं। वहाँ पर भगवान मत्स्य की पूजा होती है। हिरण्यमयवर्ष के अधिपति अर्यमा हैं। वहाँ पर भगवान कच्छप की पूजा होती है। उत्तरकुरुवर्ष में भगवान वाराह की पूजा होती है। किम्पुरुषवर्ष के स्वामी श्री हनुमान जी हैं। वहाँ पर भगवान श्रीरामचन्द्र जी की पूजा होती है। इलावृतवर्ष का वर्णन यह मेरु पर्वत के चहुओर नौ-नौ हजार योजन में विस्तारित है तथा इसके चारों दिशाओं में चार विशाल पर्वत हैं। मेरु मूल से संकुचित तथा ऊपर से विस्तृत है अत: ऐसा प्रतीत होता है मानों यह चार पर्वत उसकी कीलियाँ हों। इन पर्वतों के नाम तथा दिशाएँ निम्नांकित हैंविष्णुपुराण से।-- मंदर पर्वत पूर्व में मेरुमंदर दक्षिण में कुमुद पश्चिम में सुपार्श्व उत्तर मेंभागवत पुराण के पंचम स्कंध सोलवाँ अध्याय। thumb|300px|मेरु पर्वत की आधुनिक चित्रकारी। यह चारों पर्वत दस-दस हजार योजन ऊँचे हैं। इन चारों पर्वतों के ऊपर इनके ध्वजों के समान ग्यारह-ग्यारह सौ योजन ऊँचे तथा सौ-सौ योजन मोटे आम, जम्बु, वट तथा कदंब के वृक्ष हैं। इसी जम्बू (जामुन) के वृक्ष से ही जम्बूद्वीप का नामकरण हुआ है। मंदराचल पर्वत के ध्वजरूपी आम के वृक्ष के फल जब गिरते हैं तब उनके दिव्य रस से अरुणोदा नामक नदी का निर्माण होता है, इसका पान माता पार्वती की दासियाँ यक्षपत्नियाँ करतीं है जिससे उनके शरीर से अद्वितीय सुगंध का उत्सर्जन होता रहता है। मेरुमंदर की गोद में उगे जम्बुवृक्ष के विशाल गज (हाथी) के आकार के जामुन के फल उन पर्वतराज मेरुमंदर से टकराते हैं तब उनका रस उस फल से द्रवित होता है, जिस लाल रस से जम्बू नामक नदी का सृजन होता है। उस नदी के जल को वहाँ के जन, जीवजंतु पीते हैं जिससे वहाँ के लोगों को बुढ़ापा, शारीरिक दुर्गंध तथा पसीना और इन्द्रियक्षय जैसे राक्षस नहीं सताते। उस नदी के तट की मृत्तिका (मिट्टी) उस नदी के रस से मिलकर तथा सूर्यताप से तपकर जाम्बुनद नामक सोने में परिवर्तित हो जाती है जो देव आभूषणों के निर्माण का स्रोत है। कुमुद पर्वत में जो शतवल्श नामक वटवृक्ष है, उसकी जटाओं से नीचे की ओर बहने वाले अनेक नद निकलते हैं, वे सब यत्किंचित् भोगों के दाता हैं। वहाँ से दुग्ध, दधि, छाछ, गुड़, अन्न, वस्त्र, गौ, आभूषण, मधु, घृत, शव्या, आसन आदि भोग प्राप्त हो सकते हैं। इस नदी के प्रभाव से समीपस्थ जनों के कई रोग, त्वचा की झुर्रियाँ, सर्दी तथा गर्मी की पीड़ा आदि समाप्त हो जाते हैं। सुपार्श्व पर्वत के कदंब वृक्ष की कोटरों से मधु की पाँच धाराएँ प्रवाहित होती हैं, जो जन इस मधुरस का पान करते हैं उनके मुख से निकली वायु सौ-सौ योजन तक सुगंध सुवासित कर देती हैं। इलावृतवर्ष के उत्तर दिशा में क्रमश: नील, श्वेत तथा श्रृंगवान नामक तीन पर्वत हैं, जो रम्यक, हिरण्मय तथा उत्तरकुरु नामक वर्षों की सीमा बाँधते हैं। इसके दक्षिण दिशा की ओर निषध, हेमकूट तथा हिमालय नामक तीन पर्वत हैं, जो दस-दस हजार योजन ऊँचे हैं तथा यह क्रमश: हरिवर्ष, किंपुरुषवर्ष तथा भारत वर्ष की सीमा हैं। उत्तर के नील तथा दक्षिण के निषध तक फैले हुए गंधमादन और माल्यवान नामक दो पर्वत हैं, इनकी चौड़ाई दो-दो हजार योजन हैं तथा यह भद्राश्व और केतुमाल नामक वर्षों की सीमा निश्चित करते हैं। मंदर, मेरुमंदर, कुमुद तथा सुपार्श्व इन पर्वतों पर चार सरोवर है जो दुग्ध, मधु, ईख तथा मीठे जल से भरे हुए हैं, इनके सेवन से उपदेवों को सिद्धियाँ प्राप्त हैं। इन पर्वतों पर क्रमश: नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राजक तथा सर्वतोभद्र नामक दिव्य उपवन हैं। मेरुपर्वत के अष्टदिशाओं में कुरंग, कुरर, कुसुम्भ, वैकंक, त्रिकूट, नारद आदि अन्य बीस पर्वत हैं। मानवीय समयानुसार वहाँ के जीवों की आयु दस हजार वर्ष होती है।भागवत पुराण के पंचम स्कंध सत्रहवाँ अध्याय। इलावृतवर्ष में सेवनीय जल से ओतप्रोत अरुणोद, महाभद्र, आशितोद तथा मानस, यह चार सुन्दर सरोवर हैं। पुर्व और पश्चिम की ओर विस्तृत अस्सी हजार योजन तक फैले गंधमादन तथा कैलाश पर्वत समुद्र के भीतर स्थित हैं। यहाँ लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि, सूर्य आदि देवताओं के सुन्दर मंदिर स्थापित हैं जो देवताओं, यक्षों, किन्नरों तथा गंधर्वों से पूजित होते हैं। इसकी सुन्दरता के कारण इसे भौम स्वर्ग भी कहा जाता है। इलावृत खण्ड एक समय वैवश्वत मनु तथा उनकी पत्नी श्रद्धा ने संतानसुख की लालसा से मित्रावरुण नामक यज्ञ करवाया। देवी श्रद्धा ने होता ब्राह्मण को कहा कि मेरी इच्छा है कि मुझे कन्या हो, परंतु मनु तो पुत्र चाहते थे। समय में उन्हें पुत्रीरत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम इला रखा गया। मनु जी के आग्रह पर महर्षि वसिष्ठ जी ने बताया कि यज्ञ में गलती के कारण यह हुई है। वसिष्ठ जी ने योग से श्रीहरि को प्रसन्न किया जिससे वह इला नामक कन्या सुद्युम्न नामक बालक बन गई। कालांतर में एक समय यह राजकुमार सिंधुदेश के घोड़े पर सवार होकर कुछ मंत्रियों के साथ शिकार खेलने वन में गए। वे सब उत्तर में कुछ दूर मेरु पर्वत की तलहटी में चले गए। वहाँ भगवान शिव तथा पार्वती जी नग्नावस्था मे समागम कर रहे थे, वहाँ जब सुद्युम्न पहुँचा तो वह देख पार्वती जी ने सभी को स्त्री होनेका श्राप दिया । उसके बाद अपने मंत्रियों सहित स्त्री में बदल गया। चंद्रकुमार बुध से उसके पुत्र पुरुरवा का जन्म हुआ। बाद में वसिष्ठ जी ने भगवान शिव को प्रसन्न कर इला को पुन: सुद्युम्न में परिवर्तित कर दिया। भगवान शिव ने कहा कि हे वसिष्ठ! तुम्हारा यह यजमान एक माह के लिये स्त्री रहेगा तथा एक माह के लिये पुरुष होकर अपना राजकाज किया करेगा।भागवत पुराण के नवम स्कंध प्रथम अध्याय। श्रीशुकदेवजी राजा परीक्षित को कहते हैं, कि इलावृतवर्ष का वह भूखण्ड श्रापित था। एक समय की बात है जब भगवान शिव तथा पार्वती उस इलावृतखण्ड में एकांतवास कर रहे थे, तभी वहाँ अकस्मात् ही कुछ मुनियों ने प्रवेश कर एकांतवास में विघ्न उत्पन्न किया। माता पार्वती ने कहा कि जो भी पुरुष इस भूभाग में प्रवेश करेगा वह स्त्री में परिवर्तित हो जाएगा। और तब से भगवान शिव तथा पार्वती वहाँ स्वतंत्र इच्छा अनुसार एकांतवास करते हैं। उसी भूखण्ड में सुद्युम्न का प्रवेश हुआ अत: वह स्त्री बन गया था। देखें सन्दर्भ 30em बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:जम्बूद्वीप