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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मदनमोहन मालवीय

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महामना मदनमोहन मालवीय Madan_Mohan_Malaviya.png पिता का नाम - बृजनाथ मालवीय संसद में लगे महामना मदनमोहन मालवीय का तैलचित्र, जिसका विमोचन 19 दिसम्बर 1957 को राजेन्द्र प्रसाद ने किया था हिन्दू 25 दिसम्बर 1861 प्रयाग, ब्रिटिश भारत 12 नवम्बर 1946 (आयु: 85 वर्ष) बनारस, ब्रिटिश भारत भारतीय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष 1909–10; 1918–19; 1930-1931; 1932-1933 हिन्दू महासभा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रयाग विश्वविद्यालयकलकत्ता विश्वविद्यालय महामना मदन मोहन मालवीय (25 दिसम्बर 1861 - 12 नवंबर 1946) भारत के एक विद्वान, शिक्षाविद, पत्रकार, वकील तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उन्होंने अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना की। वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता तो थे ही और इस युग के आदर्श पुरुष भी थे। वे भारत के पहले और अन्तिम व्यक्ति थे जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। पत्रकारिता, वकालत, समाज सुधार, मातृ भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिये तैयार करने की थी जो देश का मस्तक गौरव से ऊँचा कर सकें। मालवीयजी सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति तथा आत्मत्याग में अद्वितीय थे। इन समस्त आचरणों पर वे केवल उपदेश ही नहीं दिया करते थे अपितु स्वयं उनका पालन भी किया करते थे। वे अपने व्यवहार में सदैव मृदुभाषी रहे। कर्म ही उनका जीवन था। भारत सरकार ने २४ दिसम्बर २०१४ को उन्हें भारत रत्न से अलंकृत किया।https://scroll.in/article/697640/madan-mohan-malviya-how-a-four-time-congress-president-became-a-bjp-icon Madan Mohan Malviya: how a four-time Congress president became a BJP icon 25 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20181218010757/https://scroll.in/article/697640/madan-mohan-malviya-how-a-four-time-congress-president-became-a-bjp-icon 18 दिसंबर 2018 dead जीवनी मालवीयजी का जन्म प्रयागराज में 25 दिसम्बर 1861 को पं० ब्रजनाथ व मूनादेवी के यहाँ हुआ था। वे अपने माता-पिता से उत्पन्न कुल सात भाई बहनों में पाँचवें पुत्र थे। श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर अपनी आजीविका अर्जित करते थे।The Great Indian patriots, Volume 1 Rao P. Rajeswar 1991 Mittal Publications 81-7099-280-X 10–13 http://books.google.co.in/books?id=eTrs9MF9374C&pg=PA10&dq=Madan+Mohan+Malaviya&lr=&cd=5#v=onepage&q=Madan%20Mohan%20Malaviya&f=false 24 दिसंबर 2012 https://web.archive.org/web/20121103150958/http://books.google.co.in/books?id=eTrs9MF9374C&pg=PA10&dq=Madan+Mohan+Malaviya&lr=&cd=5#v=onepage&q=Madan%20Mohan%20Malaviya&f=false 3 नवंबर 2012 live Our Leaders (Volume 9 of Remembering Our Leaders): Madan Mohan Malaviya 1989 Children's Book Trust 81-7011-842-5 53–73 http://books.google.co.in/books?id=2NoVNSyopVcC&pg=PA61&lpg=PA61&dq=Madan+Mohan+Malaviya+Scouting&source=bl&ots=4oVY8PFiXf&sig=bzIWnjpIp9KGyErYK9A3C6A_x4I&hl=en&ei=AntIS9WNIYqTkAWe6oD4Ag&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CAcQ6AEwADgo#v=onepage&q=&f=false 24 दिसंबर 2012 https://web.archive.org/web/20121103150927/http://books.google.co.in/books?id=2NoVNSyopVcC&pg=PA61&lpg=PA61&dq=Madan+Mohan+Malaviya+Scouting&source=bl&ots=4oVY8PFiXf&sig=bzIWnjpIp9KGyErYK9A3C6A_x4I&hl=en&ei=AntIS9WNIYqTkAWe6oD4Ag&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CAcQ6AEwADgo#v=onepage&q=&f=false 3 नवंबर 2012 live पाँच वर्ष की आयु में उन्हें उनके माँ-बाप ने संस्कृत भाषा में प्रारम्भिक शिक्षा लेने हेतु पण्डित हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में भर्ती करा दिया जहाँ से उन्होंने प्राइमरी परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके पश्चात वे एक अन्य विद्यालय में भेज दिये गये जिसे प्रयाग की विद्यावर्धिनी सभा संचालित करती थी। यहाँ से शिक्षा पूर्ण कर वे इलाहाबाद के जिला स्कूल पढने गये। यहीं उन्होंने मकरन्द के उपनाम से कवितायें लिखनी प्रारम्भ की। उनकी कवितायें पत्र-पत्रिकाओं में खूब छपती थीं। लोगबाग उन्हें चाव से पढते थे। 1879 में उन्होंने म्योर सेण्ट्रल कॉलेज से, जो आजकल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, मैट्रीकुलेशन (दसवीं की परीक्षा) उत्तीर्ण की। हैरिसन स्कूल के प्रिंसपल ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर कलकत्ता विश्वविद्यालय भेजा जहाँ से उन्होंने 1884 ई० में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। मालवीय जी ने प्रयाग की धर्म ज्ञानोपदेश तथा विद्याधर्म प्रवर्द्धिनी पाठशालाओं में संस्कृत का अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् म्योर सेन्ट्रल कॉलेज से 1884 ई० में कलकत्ता विश्वविद्यालय की बी० ए० की उपाधि ली। इस बीच अखाड़े में व्यायाम और सितार पर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा वे बराबर देते रहे। उनका व्यायाम करने का नियम इतना अद्भुत था कि साठ वर्ष की अवस्था तक वे नियमित व्यायाम करते ही रहे। सात वर्ष के मदनमोहन को धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला के देवकीनन्दन मालवीय माघ मेले में ले जाकर मूढ़े पर खड़ा करके व्याख्यान दिलवाते थे। शायद इसका ही परिणाम था कि कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में अंग्रेजी के प्रथम भाषण से ही प्रतिनिधियों को मन्त्रमुग्ध कर देने वाले मृदुभाषी मालवीयजी उस समय विद्यमान भारत देश के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी के व्याख्यान वाचस्पतियों में इतने अधिक प्रसिद्ध हुए। हिन्दू धर्मोपदेश, मन्त्रदीक्षा और सनातन धर्म प्रदीप ग्रथों में उनके धार्मिक विचार आज भी उपलब्ध हैं जो परतन्त्र भारत देश की विभिन्न समस्याओं पर बड़ी कौंसिल से लेकर असंख्य सभा सम्मेलनों में दिये गये हजारों व्याख्यानों के रूप में भावी पीढ़ियों के उपयोगार्थ प्रेरणा और ज्ञान के अमित भण्डार हैं। उनके बड़ी कौंसिल में रौलट बिल के विरोध में निरन्तर साढ़े चार घण्टे और अपराध निर्मोचन (अंग्रेजी: Indemnity) बिल पर पाँच घण्टे के भाषण निर्भयता और गम्भीरतापूर्ण दीर्घवक्तृता के लिये आज भी स्मरणीय हैं। उनके उद्घरणों में हृदय को स्पर्श करके रुला देने की क्षमता थी, परन्तु वे अविवेकपूर्ण कार्य के लिये श्रोताओं को कभी उकसाते नहीं थे। म्योर कालेज के मानसगुरु महामहोपाध्याय पं० आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ 1880 ई० में स्थापित हिन्दू समाज में मालवीयजी भाग ले ही रहे थे कि उन्हीं दिनों प्रयाग में वाइसराय लार्ड रिपन का आगमन हुआ। रिपन जो स्थानीय स्वायत्त शासन स्थापित करने के कारण भारतवासियों में जितने लोकप्रिय थे उतने ही अंग्रेजों के कोपभाजन भी। इसी कारण प्रिसिपल हैरिसन के कहने पर उनका स्वागत संगठित करके मालवीयजी ने प्रयाग वासियों के हृदय में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। अपने हृदय की महानता के कारण सम्पूर्ण भारतवर्ष में 'महामना' के नाम से पूज्य मालवीयजी को संसार में सत्य, दया और न्याय पर आधारित सनातन धर्म सर्वाधिक प्रिय था। करुणामय हृदय, भूतानुकम्पा, मनुष्यमात्र में अद्वेष, शरीर, मन और वाणी के संयम, धर्म और देश के लिये सर्वस्व त्याग, उत्साह और धैर्य, नैराश्यपूर्ण परिस्थितियों में भी आत्मविश्वासपूर्वक दूसरों को असम्भव प्रतीत होने वाले कर्मों का संपादन, वेशभूषा और आचार विचार में मालवीयजी भारतीय संस्कृति के प्रतीक तथा ऋषियों के प्राणवान स्मारक थे। "सिर जाय तो जाय प्रभु! मेरो धर्म न जाय" मालवीयजी का जीवन व्रत था जिससे उनका वैयक्तिक और सार्वजनिक जीवन समान रूप से प्रभावित था। यह आदर्श उन्हें बचपन में ही अपन पितामह प्रेमधर, जिन्होंने 108 दिन निरन्तर 108 बार श्रीमद्भागवत का पारायण किया था, से राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति, पिता ब्रजनाथजी की भागवत-कथा से धर्म-प्रचार एवं माता मूनादेवी से दुखियों की सेवा करने का स्वभाव प्राप्त हुआ था। धनहीन किन्तु निर्लोभी परिवार में पलते हुए भी देश की दरिद्रता तथा अर्थार्थी छात्रों के कष्ट निवारण के स्वभाव से उनका जीवन ओतप्रोत था। बचपन में जिन आचार विचारों का निर्माण हुआ उससे रेल में, जेल में तथा जलयान में कहीं पर भी प्रात:सायं सन्ध्योपासना तथा श्रीमद्भागवत और महाभारत का स्वाध्याय उनके जीवन का अभिन्न अंग बना रहा। कार्य स्वातन्त्र्य संग्राम में भूमिका thumb|right|200px|काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक विभाग असहयोग आंदोलन के चतुर्सूत्री कार्यक्रम में शिक्षा संस्थाओं के बहिष्कार का मालवीयजी ने खुलकर विरोध किया जिसके कारण उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से हिन्दू विश्वविद्यालय पर उसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। 1921 ई0 में कांग्रेस के नेताओं ने जेल भर जाने पर किंकर्तव्यविमूढ़ वाइसराय लॉर्ड रीडिंग को प्रान्तों में स्वशासन देकर गान्धीजी से सन्धि कर लेने को मालवीयजी ने भी सहमत कर लिया था परन्तु 4 फ़रवरी 1922 के चौरीचौरा काण्ड ने इतिहास को पलट दिया। गान्धीजी ने बारदौली की कार्यकारिणी में बिना किसी से परामर्श किये सत्याग्रह को अचानक रोक दिया। इससे कांग्रेस जनों में असन्तोष फैल गया और यह खुसुरपुसुर होने लगी कि बड़ा भाई के कहने में आकर गान्धीजी ने यह भयंकर भूल की है। गान्धीजी स्वयं भी पाँच साल के लिये जेल भेज दिये गये। इसके परिणामस्वरूप चिलचिलाती धूप में इकसठ वर्ष के बूढ़े मालवीय ने पेशावर से डिब्रूगढ़ तक तूफानी दौरा करके राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा। इस भ्रमण में उन्होंने बहुत बार कुख्यात धारा 144 का उल्लंघन भी किया जिसे सरकार खून का घूँट समझकर पी गयी। परन्तु 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उसी ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बम्बई में गिरफ्तार कर लिया जिस पर श्रीयुत् भगवान दास (भारतरत्न) ने कहा था कि मालवीयजी का पकड़ा जाना राष्ट्रीय यज्ञ की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिये। उसी साल दिल्ली में अवैध घोषित कार्यसमिति की बैठक में मालवीयजी को पुन: बन्दी बनाकर नैनी जेल भेज दिया गया। यह उनकी जीवनचर्या तथा वृद्धावस्था के कारण यथार्थ में एक प्रकार की तपस्या थी। परन्तु सैद्धान्तिक मतभेद के कारण हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रिंस ऑव वेल्स का स्वागत और कांग्रेस स्वराज पार्टी के समकक्ष कांग्रेस स्वतंत्र दल व रैमजे मैकडॉनल्ड के साम्प्रदायिक निर्णय पर, जिसकी स्वीकृति को मालवीयजी ने राष्ट्रीय आत्महत्या माना। इस प्रकार कांग्रेस की अस्वीकार नीति के कारण निर्णय विरोधी सम्मेलन और राष्ट्रीय कांग्रेस दल का पुन: संगठन करने जैसे उनके कांग्रेस विरोध के उदाहरण भी इतिहास उल्लेखनीय हैं। धर्म संस्कृति रक्षा right|thumb|250px|मालवीय जी, महात्मा गांधी के साथ सनातन धर्म व हिन्दू संस्कृति की रक्षा और संवर्धन में मालवीयजी का योगदान अनन्य है। जनबल तथा मनोबल में नित्यश: क्षयशील हिन्दू जाति को विनाश से बचाने के लिये उन्होंने हिन्दू संगठन का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया और स्वयं अनुदार सहधर्मियों के तीव्र प्रतिवाद झेलते हुए भी कलकत्ता, काशी, प्रयाग और नासिक में भंगियों को धर्मोपदेश और मन्त्रदीक्षा दी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रनेता मालवीयजी ने, जैसा स्वयं पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, अपने नेतृत्वकाल में हिन्दू महासभा को राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रखा और अनेक बार धर्मों के सहअस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया। प्रयाग के भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिन्दू छात्रालय और मिण्टो पार्क के जन्मदाता, बाढ़, भूकम्प, सांप्रदायिक दंगों व मार्शल ला से त्रस्त दुःखियों के आँसू पोंछने वाले मालवीयजी को ऋषिकुल हरिद्वार, गोरक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति, ब्वॉय स्काउट तथा अन्य कई संस्थाओं को स्थापित अथवा प्रोत्साहित करने का श्रेय प्राप्त हुआ, किन्तु उनका अक्षय-र्कीति-स्तम्भ तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ही है जिसमें उनकी विशाल बुद्धि, संकल्प, देशप्रेम, क्रियाशक्ति तथा तप और त्याग साक्षात् मूर्तिमान हैं। विश्वविद्यालय के उद्देश्यों में हिन्दू समाज और संसार के हित के लिये भारत की प्राचीन सभ्यता और महत्ता की रक्षा, संस्कृत विद्या के विकास एवं पाश्चात्य विज्ञान के साथ भारत की विविध विद्याओं और कलाओं की शिक्षा को प्राथमिकता दी गयी। उसके विशाल तथा भव्य भवनों एवं विश्वनाथ मन्दिर में भारतीय स्थापत्य कला के अलंकरण भी मालवीय जी के आदर्श के ही प्रतिफल हैं। अन्य उल्लेखनीय कार्य कालाकाँकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर मालवीयजी ने उनके हिन्दी अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का 1887 से सम्पादन करके दो ढाई साल तक जनता को जगाया। उन्होंने कांग्रेस के ही एक अन्य नेता पं0 अयोध्यानाथ का उनके इण्डियन ओपीनियन के सम्पादन में भी हाथ बँटाया और 1907 ई0 में साप्ताहिक अभ्युदय को निकालकर कुछ समय तक उसे भी सम्पादित किया। यही नहीं सरकार समर्थक समाचार पत्र पायोनियर के समकक्ष 1909 में दैनिक 'लीडर' अखबार निकालकर लोकमत निर्माण का महान कार्य सम्पन्न किया तथा दूसरे वर्ष मर्यादा पत्रिका भी प्रकाशित की। इसके बाद उन्होंने 1924 ई0 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया तथा सनातन धर्म को गति प्रदान करने हेतु लाहौर से विश्वबन्द्य जैसे अग्रणी पत्र को प्रकाशित करवाया। हिन्दी के उत्थान में मालवीय जी की भूमिका ऐतिहासिक है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के नेतृत्व में हिन्दी गद्य के निर्माण में संलग्न मनीषियों में 'मकरंद' तथा 'झक्कड़सिंह' के उपनाम से विद्यार्थी जीवन में रसात्मक काव्य रचना के लिये ख्यातिलब्ध मालवीयजी ने देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा को पश्चिमोत्तर प्रदेश व अवध के गवर्नर सर एंटोनी मैकडोनेल के सम्मुख 1898 ई0 में विविध प्रमाण प्रस्तुत करके कचहरियों में प्रवेश दिलाया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी-1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिन्दी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि "उसे फारसी-अरबी के बड़े बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूँथना भी अच्छा नहीं और भविष्यवाणी की कि एक दिन यही भाषा राष्ट्रभाषा होगी।" सम्मेलन के एक अन्य वार्षिक अधिवेशन (बम्बई-1919) के सभापति पद से उन्होंने हिन्दी उर्दू के प्रश्न को, धर्म का नहीं अपितु राष्ट्रीयता का प्रश्न बतलाते हुए उद्घोष किया कि साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा द्वारा ही हो सकती है। समस्त देश की प्रान्तीय भाषाओं के विकास के साथ-साथ हिन्दी को अपनाने के आग्रह के साथ यह भविष्यवाणी भी की कि कोई दिन ऐसा भी आयेगा कि जिस भाँति अंग्रेजी विश्वभाषा हो रही है उसी भाँति हिन्दी का भी सर्वत्र प्रचार होगा। इस प्रकार उन्होंने हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय रूप का लक्ष्य भी दिया। कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीयजी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता-1886) से लेकर अपनी अन्तिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया। उसके प्रथम उत्थान में नरम और गरम दलों के बीच की कड़ी मालवीयजी ही थे जो गान्धी-युग की कांग्रेस में हिन्दू मुसलमानों एवं उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। एनी बेसेंट ने ठीक कहा था कि "मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीयजी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।" असहयोग आन्दोलन के आरम्भ तक नरम दल के नेताओं के कांग्रेस को छोड़ देने पर मालवीयजी उसमें डटे रहे और कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित करके सम्मानित किया- लाहौर (1909 में), दिल्ली (1918 और 1931 में) तथा कलकत्ता (1933 में)। यद्यपि अन्तिम दोनों बार वे सत्याग्रह के कारण पहले ही गिरफ्तार कर लिये गये। स्वतन्त्रता के लिये उनकी तड़प और प्रयासों के परिचायक फैजपुर कांग्रेस (1936) में राष्ट्रीय सरकार और चुनाव प्रस्ताव के समर्थन में मालवीयजी के ये शब्द स्मरणीय हैं कि मैं पचास वर्ष से कांग्रेस के साथ हूँ। सम्भव है मैं बहुत दिन न जियूँ और अपने जी में यह कसक लेकर मरूँ कि भारत अब भी पराधीन है। किन्तु फिर भी मैं यह आशा करता हूँ कि मैं इस भारत को स्वतन्त्र देख सकूँगा। महामना के शिक्षा-सम्बन्धी विचार पंडित मदन मोहन मालवीय के दृष्टिकोण में शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इसे मानव जीवन के सर्वांगीण विकास और राष्ट्र निर्माण का सबसे शक्तिशाली अस्त्र मानते थे । उनके शैक्षिक एवं शैक्षणिक विचारों का मुख्य केंद्र बिंदु विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक उत्थान था । मालवीय जी के विस्तृत शैक्षणिक विचार निम्नलिखित बिंदुओं में समाहित हैं:मदनमोहन मालवीय का शैक्षिक दृष्टिकोण शिक्षा के उद्देश्य मालवीय जी के द्वारा निश्चित शिक्षा के इन उद्देश्यों काे आज की भाषा में निम्नलिखित रूप में क्रमबद्ध किया जा सकता है - शारीरिक विकास मालवीय जी के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का पहला साधन स्वस्थ शरीर है। अतः शिक्षा द्वारा मनुष्य को स्वास्थ्य रक्षा की शिक्षा देना आवश्यक है। मानसिक एवं बौद्धिक विकास मनुष्य के मानसिक एवं बौद्धिक विकास से मालवीय का तात्पर्य विभिन्न भाषाओं और विभिन्न विषयों के ज्ञान से था। इन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा और विविध विषयों का ज्ञान ही मनुष्य काे विवेकशील बनाना है और विवेक से मनुष्य अच्छे-बुरे में भेद करता है, करणीय और अकरणीय कर्मों को समझता है और सच्चे मार्ग का अनुसरण करता है। यूं मालवीय जी भारतीय ज्ञान को सर्वश्रेष्ठ मानते थे परन्तु साथ ही यह भी स्वीकार करते थे कि भौतिक विकास के लिए पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान अपेक्षाकृत अधिक उपयाेगी है। नैतिक एवं चारित्रिक विकास मालवीय जी नैतिक नियमों के पालन को आवश्यक मानते थे और चरित्र बल की श्रेष्ठता स्वीकार करते थे। इन्होंने शिक्षा द्वारा मनुष्य के नैतिक एवं चारित्रिक विकास पर विशेष बल दिया है। ये धार्मिक नियमों को नैतिकता और चरित्र का आधार मानते थे। यही कारण है कि वे मनुष्य के नैतिक एवं चारित्रिक विकास के लिए धर्म शिक्षा को आवश्यक मानते थे। व्यावसायिक एवं आर्थिक विकास मालवीय जी देश की गरीबी और बेराेजगारी की समस्या से भी चिन्तित थे। इस सबके लिए इन्होंने शिक्षा में व्यावसायिक शिक्षा (कृषि, कला-कौशल एवं अन्य उद्योगों की शिक्षा) की व्यवस्था करने पर बल दिया था। इन्हाेंने स्पष्ट किया कि भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए यहाँ कृषि शिक्षा की विशेष व्यवस्था हाेनी चाहिए। राष्ट्रीयता का विकास मालवीय जी के अनुसार भारतीय राष्ट्रीयता का मूल आधार हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व से मालवीय जी का बड़ा विस्तृत अर्थ था। इनके अनुसार हिन्दुत्व भारत के धर्म-दर्शन का नाम है, एक ऐसे धर्म-दर्शन का नाम जो प्राणी मात्र के कल्याण में विश्वास करता है, एक ऐसे धर्म-दर्शन का नाम जाे शाश्वत है। मालवीय जी संकुचित राष्ट्रीयता (राष्ट्रवाद) के पक्षधर नहीं थे, ये तो वसुधैव कुटुम्बकम् के पोषक थे। ये शिक्षा द्वारा इसी राष्ट्रीयता की सुरक्षा पर बल देते थे। शिक्षा की पाठ्यचर्या मालवीय जी ने शिक्षा की पाठ्यचर्या की कोई क्रमबद्ध रूपरेखा तो प्रस्तुत नहीं की परन्तु उसके निर्माण के सम्बन्ध में कुछ सुझाव अवश्य दिए हैं। इनका पहला सुझाव तो यह है कि हमारा पाठ्यक्रम हमारे धर्म और संस्कृति पर आधारित होना चाहिए। इन्होंने स्पष्ट किया कि हमें हमारे धर्म और संस्कृति का सही ज्ञान संस्कृत साहित्य से हाेता है इसलिए भारतीयाें को संस्कृत भाषा का ज्ञान अवश्य और अनिवार्य रूप से कराना चाहिए। अनुशासन मालवीय जी शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासन का होना आवश्यक मानते थे परन्तु ये अनुशासन से अर्थ आत्मानुशासन से लेते थे। दण्ड के भय से स्थापित व्यवस्था काे ये अनुशासन नहीं मानते थे। ये इस बात पर बल देते थे कि शिक्षक और शिक्षार्थी दोनाें को अपने ऊपर स्वयं नियन्त्रण रखना चाहिए और मन, वचन व कर्म से शुद्ध होना चाहिए। इनका स्पष्ट मत था कि छात्र तो तभी अनुशासन में रहेंगे जब शिक्षक अनुशासन में रहेंगे। अतः आवश्यक है कि शिक्षकों में का आचरण अपने में आदर्श एवं अनुकरणीय होना चाहिए। शिक्षक मालवीय जी ने अपना जीवन शिक्षक के रूप में प्रारम्भ किया था। ये प्राचीन परम्परा के अनुयायी थे और शिक्षकाें को समाज में सर्वोच्च स्थान देते थे। इनके अनुसार शिक्षक काे धर्म परायण, विद्वान और सत्यानुवेषी हाेना चाहिए और शिक्षार्थियों के प्रति समर्पित होना चाहिए। इसके साथ-साथ प्रत्येक शिक्षक का आचरण आदर्श और अनुकरणीय हाेना चाहिए। ये शिक्षकाें से यह भी अपेक्षा करते थे कि वे समाज सेवक और राष्ट्र भक्त हों। इनका विश्वास था कि ऐसे शिक्षकों से ही शिक्षार्थी सच्चे ज्ञान और उच्च आचरण की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षार्थी मालवीय जी शिक्षार्थियों से ब्रह्मचर्य पालन की अपेक्षा करते थे। ये अपने शिष्यों को प्रातः काल उठने, नित्य संध्यावन्दन करने, बड़ों का आदर करने, शिक्षकों में श्रद्धा रखने और उनकी आज्ञा का पालन करने और प्राणीमात्र की सेवा करने का उपदेश देते थे। इनके अनुसार विद्यार्थियों को अपने मन, वचन और कर्म पर संयम रखना चाहिए, विनम्र होना चाहिए, सादा जीवन जीना चाहिए और विद्या से प्रेम करना चाहिए। ये भारत में प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा को पुनः स्थापित करना चाहते थे। समान अवसर और नारी शिक्षा वे शिक्षा को हर मानव का अधिकार मानते थे और निर्धनों के लिए निःशुल्क शिक्षा के पक्षधर थे । उन्होंने समाज में स्त्री शक्ति को 'आराध्या' के रूप में प्रतिष्ठित करने और राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु नारी शिक्षा की पुरजोर वकालत की । विरासत right|thumb|250px|सन २०१४ में मालवीय जी के जन्म शताब्दी के अवसर पर भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी मालवीय जी की प्रतिमा के सामने नतमस्तक होकर अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हुए मालवीय जी ने ही कांग्रेस के सभापति के रूप में सुझाया था कि "सत्यमेव जयते" को भारत का राष्ट्रीय उद्घोष वाक्य स्वीकार किया जाय। उन्होंने हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा आरती का आयोजन किया जो आज तक चल रहा है। हरिद्वार में घाट के निकट ही स्थित एक छोटे से द्वीप का नाम "मालवीय द्वीप" रखा गया है। प्रयागराज, लखनऊ, दिल्ली, देहरादून, भोपाल, दुर्ग और जयपुर में उनके सम्मान में "मालवीय नगर" बसे हैं। जबलपुर में एक चौराहे का नाम "मालवीय चौक" रखा गया है। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर तथा मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जयपुर का नामकरण भी उनके नाम पर किया गया है। उनके नाम पर अनेक छात्रावासों के नाम "मालवीय भवन" रखे गये हैं जिनमें से आईआईटी खड़गपुर, आई. आई. टी. रूडकी का सहारनपुर परिसर, बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान के पिलानी तथा तथा हैदराबाद परिसर सम्मिलित हैं। २०११ में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया। २४ दिसम्बर २०१४ को भारत सरकार ने उन्हें भारतरत्न से सम्मानित किया। २२ जनवरी २०१६ को महामना एक्सप्रेस चलायी गयी जो वाराणसी से दिल्ली के बीच चलती है। २५ दिसम्बर २०२३ को प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 'पण्डित मदनमोहन मालवीय सम्पूर्ण वाङ्मय (द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ पण्डित मदन मोहन मालवीय)', 11 खण्डों का विज्ञान भवन, दिल्ली में लोकार्पण किया। सन्दर्भ सन्दर्भ ग्रन्थ सूची महामना पं0 मदनमोहन मालवीय : जीवनचरित (75 वीं वर्षगाँठ का अभिनन्दन ग्रन्थ 1936) प्रकाशक: मालवीय जीवन चरित समिति, काशी, जवाहरलाल नेहरू : ऐन आटोबायोग्रैफी (रिबॉडले हेड लन्दन) महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (संस्मरण) 1957, सम्पादन: चन्द्रबली त्रिपाठी, प्रकाशक: दुर्गावती त्रिपाठी, मदन मोहन मालवीय मार्ग, बस्ती, इंडिया विंस फ्रीडम : मौलाना अबुल कलाम आजाद, 1959, ओरिएंट लॉगमैंस लिमिटेड कलकत्ता, नेहरू जी अपनी ही भाषा में, 1962, रामनारायण चौधरी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर अहमदाबाद-14 पण्डित मदनमोहन मालवीय सम्पूर्ण वाङ्मय (द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ पण्डित मदन मोहन मालवीय), 11 खण्ड, प्रधान सम्पादक रामबहादुर राय, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार इन्हें भी देखें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिन्दू महासभा अभ्युदय (पत्र) अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन बाहरी कड़ियाँ मदन मोहन मालवीय स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास मालवीय जी और हि‍न्‍दी (पत्र सूचना कार्यालय) महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय (महामना के १५०वें जन्मदिवस पर निर्मित सम्पूर्ण जालघर) अदालत में हिंदी को दिलाया मान (नई दुनिया) प्रथम हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति महामना पंडित मदनमोहन मालवीय का भाषण (महामना जी का यह भाषण नागरी प्रचारिणी सभा के तत्त्वावधान में 10, 11, 12 अक्टूबर 1910 ई0 को हुआ था।) श्रेणी:1861 में जन्मे लोग श्रेणी:१९४६ में निधन श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी श्रेणी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ श्रेणी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष