Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

नैषधीयचरित

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

जनवरी 2021 नैषधीयचरित, श्रीहर्ष द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। यह वृहत्त्रयी नाम से प्रसिद्ध तीन महाकव्यों में से एक है। महाभारत का नलोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है। इसमें कुल २२ सर्ग हैं संरचना इस ग्रन्थ के दो भाग हैं- पूर्व और उत्तर। दोनों में ११-११ सर्ग हैं (कुल २२ सर्ग) इस ग्रन्थ के अन्त में यह निर्दिष्ट नहीं है कि 'ग्रन्थ समाप्त हुआ' - इस कारण संशय होता है कि यह ग्रन्थ अपूर्ण है। यह काव्य कठिन है क्योंकि कहा गया है- नैषधं विद्वदौषधम् (नैषध विद्वानों के लिये औषध है।) परिचय अलंकृत काव्यरचना शैली की प्रधानतावाले माघोत्तरयुगी कवियों द्वारा निर्मित काव्यों में अलंकरण प्रधानता, प्रौढ़ोक्ति कल्पना से प्रेरित वर्णन प्रंसगों की स्फीतता तथा पांडित्यलब्ध ज्ञानगरिष्ठाता अतिसंयोजन आदि की प्रवृत्ति बढ़ी। उस रुचि का पूर्ण उत्कर्ष श्रीहर्ष के नैषधीय चरित (या जिसे केवल "नैषध" भी कहते हैं) में देखा जा सकता है। बृहत्त्रयी के इस बृहत्तम महाकाव्य का महाकवि, न्याय, मीमांसा, योगशास्त्र आदि का उद्भट विद्वान् था और था तार्किक पद्धति का महान अद्वैत वेदांती। नैषध में शास्त्रीय वैदुष्य और कल्पना की अत्युच्च उड़ान, आद्यंत देखने को मिलती हैं। इस महाकाव्य का मूल आधार है "महाभारत" का "नलोपाख्यान"। मूल कथा के मूल रूप में यथावश्यक परिवर्तन भी यत्र-तत्र किया गया है। ऐसा मालूम पड़ता है कि इस पुराणकथा की लोकप्रियता ने बड़े प्राचीन काल से ही इसे लोककथा बना दिया है। इस कारण कवि ने वहाँ से भी कुछ तत्व लिए। यह महाकाव्य आद्यंत शृंगारी है। पूर्वराग, विरह, हंस का दूतकर्म, स्वयंबर, नल-दमयंती-विवाह, दंपति का प्रथम समागम और अष्टयामचर्या तथा संयोगविलास की खंडकाव्यीय कथावस्तु को कवि के वर्णनचरित्रों और कल्पनाजन्य वैदुष्यविलास ने अत्यत वृहदाकार बना दिया है। शृंगारपरिकर के वर्ण्यचित्रों ने भी उस विस्तारण में योग दिया है। अपनी कल्पना की उड़ान के बल से पंडित कवि द्वारा एक ही चित्र को नई नई अप्रस्तुत योजनाओं द्वारा अनेक रूपों में विस्तार के साथ रखा गया है। लगता है, एक प्रस्तुत को एक के बाद एक इतर अप्रस्तुतों द्वारा आंकलित करने में कवि की प्रज्ञा थकती ही नहीं। प्रकृतिजगत् के स्वभावेक्तिपथ रूपचित्रांकन, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा अतिशयोक्ति, व्यतिरेक, श्लेष आदि अर्थालंकारों की समर्थयोजना, अनुप्रासयमक, शब्दश्लेष, शब्दचित्रादि चमत्कारों का साधिकार प्रयोग और शब्दकोश के विनियोग प्रयोग की अद्भुत क्षमता, शास्त्रीय पक्षों का मार्मिक, प्रौढ़ और समीचीन नियोजन, कल्पनाओं और भावचित्रों का समुचित निवेशन, प्रथम-समागम-कालीन मुग्धनववधू की मन:स्थिति, लज्जा और उत्कंठा का सजीव अंकन, अलंकरण और चमत्कार की अलंकृत काव्यशैली का अनायास उद्भावन और अपने पदलालित्य आदि के कारण इस काव्य का संस्कृत की पंडितमंडली में आज तक निरंतर अभूतपूर्व समादर होता चला आ रहा है। माघ कवि से भी अधिक श्रीहर्ष ने इसे काव्यबाधक पांडित्यप्रदर्शन के योग से बहुत बढ़ा दिया है जिससे लघुकथानकवाला काव्य अति वृहत् हो गया है। शृंगारी विलासों और मुख्यत: संयोग केलियों के कुशलशिल्पी और रसिक नागरों की विलासवृत्तियों के अंकन में आसंजनशील होकर भी कवि के दार्शनिक वैदुष्य के कारण काव्य में स्थान स्थान पर रुक्षता बढ़ गई। पुनरुक्ति, च्युतसंस्कृति आदि अनेक दोष भी यत्र तत्र ढूँढ़े जा सकते हैं। परंतु इनके रहने पर भी अपनी भव्यता और उदात्तता, कल्पनाशीलता और वैदुष्यमत्ता, पदलालित्य और अर्थप्रौढ़ता के कारण महाकाव्य में कलाकार की अद्भुत प्रतिभा चमक उठी है, अलंकारमंडित होने पर भी उसकी क्रीड़ा में सहज विलास है। उसमें प्रौढ़ शास्त्रीयता और कल्पनामनोहर भव्यता है। बृहत्त्रयी के तीनों महाकाव्यों का अध्ययन पंडितों के लिए आज भी परमावश्यक माना जाता है। ९वें सर्ग में वाग्मिता के बारे में श्रीहर्ष की सूक्ति देखिये- अये ! ममोदासितमेव जिह्वया द्वयेऽपि तस्मिन्ननतिप्रयोजने। गरौ गिरः पल्लवनार्थलाघवे मितं च सारं च वचो हि वाग्मिता ॥8॥ (यहाँ राजा नल दमयन्ती से कह रहे हैं कि हे दमयन्ती! जिसका कोई प्रयोजन नहीं था, उन दोनों में ही मेरी जिह्वा उदासीन रही (कम बोल पाया)। (इसका कारण यह है कि) वाणी का विस्तार एवं अर्थलाघव दोनों ही विषतुल्य होते हैं (क्योंकि) संयमित (माप-तौलकर बोलना) एवं सारयुक्त वाणी ही वाग्मिता है।) इन्हें भी देखें नल-दमयन्ती बृहतत्रयी (संस्कृत महाकाव्य) किरातार्जुनीयम् शिशुपालवधम् बाहरी कड़ियाँ नैषधीयचरितम् सम्पूर्णम् (संस्कृत विकिस्रोत) श्रेणी:संस्कृत साहित्य