Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

अष्टांग योग

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

महर्षि पतंजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने 'योगसूत्र' नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग (आठ अंगों वाले योग) का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं: 01. यम, 02. नियम, 03. आसन, 04. प्राणायाम, 05.प्रत्याहार, 06. [ धारणा ] 07. ध्यान 08. समाधि परिचय महर्षि पतञ्जलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है (योगश्चितवृत्तिनिरोधः)। इसकी स्थिति और सिद्धि के निमित्त कतिपय उपाय आवश्यक होते हैं जिन्हें 'अंग' कहते हैं और जो संख्या में आठ माने जाते हैं। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) 'बहिरंग' और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) 'अंतरंग' नाम से प्रसिद्ध हैं। बहिरंग साधना यथार्थ रूप से अनुष्ठित होने पर ही साधक को अंतरंग साधना का अधिकार प्राप्त होता है। 'यम' और 'नियम' वस्तुतः शील और तपस्या के द्योतक हैं। यम का अर्थ है संयम जो पांच प्रकार का माना जाता है : (क) अहिंसा, (ख) सत्य, (ग) अस्तेय (चोरी न करना अर्थात्‌ दूसरे के द्रव्य के लिए स्पृहा न रखना), (घ) ब्रह्मचर्य, तथा अपरिगृह। इसी भांति नियम के भी पांच प्रकार होते हैं : शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय (मोक्षशास्त्र का अनुशलीन या प्रणव का जप) तथा ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण करना)। आसन से तात्पर्य है स्थिर और सुख देनेवाले बैठने के प्रकार (स्थिर सुखमासनम्‌) जो देहस्थिरता की साधना है। आसन जप होने पर श्वास प्रश्वास की गति के विच्छेद का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का लेना श्वास और भीतरी वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। प्राणायाम प्राणस्थैर्य की साधना है। इसके अभ्यास से प्राण में स्थिरता आती है और साधक अपने मन की स्थिरता के लिए अग्रसर होता है। अंतिम तीनों अंग मन:स्थैर्य का साधना है। प्राणस्थैर्य और मन:स्थैर्य की मध्यवर्ती साधना का नाम 'प्रत्याहार' है। प्राणायाम द्वारा प्राण के अपेक्षाकृत शांत होने पर मन का बहिर्मुख भाव स्वभावत: कम हो जाता है। फल यह होता है कि इंद्रियाँ अपने बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाती है। इसी का नाम प्रत्याहार है (प्रति=प्रतिकूल, आहार=वृत्ति)। अब मन की बहिर्मुखी गति निरुद्ध हो जाती है और अंतर्मुख होकर स्थिर होने की चेष्टा करता है। इसी चेष्टा की आरंभिक दशा का नाम धारणा है। देह के किसी अंग पर (जैसे हृदय में, नासिका के अग्रभाग पर) अथवा बाह्यपदार्थ पर (जैसे इष्टदेवता की मूर्ति आदि पर) चित्त को लगाना 'धारणा' कहलाता है (देशबन्धश्चितस्य धारणा; योगसूत्र 3.1)। ध्यान इसके आगे की दशा है। जब उस देशविशेष में ध्येय वस्तु का ज्ञान एकाकार रूप से प्रवाहित होता है, तब उसे 'ध्यान' कहते हैं। धारणा और ध्यान दोनों दशाओं में वृत्तिप्रवाह विद्यमान रहता है, परंतु अंतर यह है कि धारणा में एक वृत्ति से विरुद्ध वृत्ति का भी उदय होता है, परन्तु ध्यान में सदृशवृत्ति का ही प्रवाह रहता है, विसदृश का नहीं। ध्यान की परिपक्वावस्था का नाम ही समाधि है। चित्त आलंबन के आकार में प्रतिभासित होता है, अपना स्वरूप शून्यवत्‌ हो जाता है और एकमात्र आलंबन ही प्रकाशित होता है। यही समाधि की दशा कहलाती है। अंतिम तीनों अंगों का सामूहिक नाम 'संयम' है जिसके जिसके जीतने का फल है विवेक ख्याति का आलोक या प्रकाश। समाधि के बाद प्रज्ञा का उदय होता है और यही योग का अंतिम लक्ष्य है। योग के अष्टाङ्गों का परिचय यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोsष्टाव ङ्गानि ॥ यम अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरग्रहाः यमा ॥ पांच सामाजिक नैतिकता (क) अहिंसा - अहिंसाप्रतिष्ठायांतत्सन्निधौ वैरत्याग: ॥ पातंजलयोगदर्शन 2/35॥ अर्थात् अहिंसा से प्रतिष्ठित हो जाने पर उस योगी पास वैरभाव छूट जाता है । शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना (ख) सत्य -सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफ़लाश्रययत्वम् ॥ पातंजलयोगदर्शन 2/36 ॥ अर्थात् सत्य से प्रतिष्ठित (वितर्क शून्यता स्थिर) हो जाने पर उस साधक में क्रियाओं और उनके फलों की आश्रयता आ जाती है । अर्थात् जब साधक सत्य की साधना में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके किए गए कर्म उत्तम फल देने वाले होते हैं और इस सत्य आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर कल्याणकारी होता है । विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना (ग) अस्तेय - अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।।  पातंजलयोगदर्शन 2/37 ।। अर्थात् अस्तेय के प्रतिष्ठित हो जाने पर सभी रत्नों की उपस्थति हो जाती है । अस्तेय अर्थात् चोर-प्रवृति का न होना (घ) ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभ: ।। पातंजलयोगदर्शन 2/ 38 ।। अर्थात् ब्रह्मचर्य के प्रतिष्ठित हो जाने पर वीर्य(सामर्थ्य) का लाभ होता है । ब्रह्मचर्य दो अर्थ हैं- चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना सभी इन्द्रिय जनित सुखों में संयम बरतना (च) अपरिग्रह - अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध :।। पातंजलयोगदर्शन 2/ 39।। अर्थात् अपरिग्रह स्थिर होने पर (भूत, वर्तमान और भविष्य के ) जन्मों तथा उनके प्रकार का संज्ञान होता है । अपरिग्रह का अर्थ आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना नियम शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा: ।। पातंजलयोगदर्शन 2/32 ।। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान - नियम कहे जाते हैं । पाँच व्यक्तिगत नैतिकता (क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि (ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना (ग) तप - स्वयं से अनुशाषित रहना (घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना (ड़) ईश्वर-प्रणिधान - ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए आसन योगासनों द्वारा शरीरिक नियंत्रण आसन शरीर को साधने का तरीका है। पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है (स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥)।The Yoga Philosophy https://web.archive.org/web/20160324170352/https://archive.org/stream/yogaphilosophyb00tatygoog#page/n6/mode/2up 24 मार्च 2016 TR Tatya (Translator), with Bhojaraja commentary; Harvard University Archives; The Yoga-darsana: The sutras of Patanjali with the Bhasya of Vyasa https://web.archive.org/web/20160316054457/https://archive.org/stream/yogadaranasutra00patagoog#page/n4/mode/2up 16 मार्च 2016 GN Jha (Translator), with notes; Harvard University Archives; The Yogasutras of Patanjali Charles Johnston (Translator) पतंजलि के योगसूत्र में आसनों के नाम नहीं गिनाए हैं। लेकिन परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे सम्बंधित ‘हठयोगप्रदीपिका’ ‘घेरण्ड संहिता’ तथा ‘योगाशिखोपनिषद’ में विस्तार से वर्णन मिलता है। प्राणायाम प्राणायाम तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: ।। पातंजलयोगदर्शन 2/49 ।। उस ( आसन) के सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम है । योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है। योग-भक्ति पथ के सिद्ध संत भादुड़ी महाशय यानी महर्षि नागेन्द्रनाथ ने प्राणायाम की विभिन्न विधियों में अद्भुत सिद्धि प्राप्त की थी। वह भस्त्रिका प्राणायाम इतनी ताकत से करते थे कि ऐसा लगता था जैसे तूफान आने वाला है। परमहंस योगानंद द्वारा लिखित 'Autobiography of a Yogi' में इस बात का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया गया है।AUTOBIOGRAPHY OF A YOGI Yogananda Paramhansa THE PHILOSOPHICAL LIBRARY 2018 New York, N.Y 59 प्रत्याहार इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैं, उन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। अतः चित्त के निरुद्ध हो जाने पर इन्द्रियां भी उसी प्रकार निरुद्ध हो जाती हैं, जिस प्रकार रानी मधुमक्खी के एक स्थान पर रुक जाने पर अन्य मधुमक्खियां भी उसी स्थान पर रुक जाती हैं। धारणा मन को एकाग्रचित्त करके ध्येय विषय पर लगाना पड़ता है। किसी एक विषय को ध्यान में बनाए रखना।चित्त को किसी एक विचार में बांध लेने की क्रिया को धारणा कहा जाता है। पतंजलि के अष्टांग योग का यह छठा अंग है। इससे पूर्व के पांच अंग यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार कहे गए हैं जो योग में बाहरी साधन माने गए हैं । प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग के भीतरी अंग या साधन कहे गये हैं | धारणा शब्द ‘धृ’ धातु से बना है। इसका अर्थ होता है धारण करना, संभालना, थामना या सहारा देना । योग दर्शन के अनुसार- “देशबन्धश्चित्तस्य धारणा” (योगसूत्र 3/1) अर्थात्- किसी स्थान (मन के भीतर या बाहर) विशेष पर चित्त को स्थिर करने का नाम धारणा है, अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार द्वारा इंद्रियों को उनके विषयों (रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श) से हटाकर चित्त में स्थिर किया जाता है, स्थिर एवं एकाग्र किये गए चित्त को एक ‘स्थान विशेष ’ पर रोक लेना ही धारणा है। ध्यान ध्यान किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है। जब ध्येय वस्तु का चिन्तन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती। समाधि समाधि यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है। समाधि की भी दो श्रेणियाँ हैं : सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है। षडंग योग षडङ्ग योग- अर्थात् "छः अंगों वाला योग"। इसका वर्णन मैत्रायणी उपनिषद् में आता है। ये छः अंग हैं - प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि। प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोsथ धारणा । ''तर्कश्चैत्र समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ॥ ध्यातव्य है कि इसमें अष्टाङ्ग योग के यम, नियम और आसन को स्थान नहीं दिया गया है। बल्कि 'तर्क' नाम से एक अंग को इसमें समाहित किया गया है। इन्हें भी देखें योगसूत्र योगदर्शन हठयोग योग की सात भूमियाँ या सप्तभूमिका संदर्भ ग्रंथ स्वामी ओमानंद : पातंजल यागरहस्य; बलदेव उपाध्याय : भारतीय दर्शन (शारदामंदिर, काशी, 1957) बाहरी कड़ियाँ पतंजलि Ashtanga Yoga System - background and practice Ashtanga Yoga Primary Series Ashtanga Yoga - Understanding the Method, Interview with Manju Pattabhi Jois, in English and German (2009) Official website of Shri K. Pattabhi Jois's Ashtanga Yoga Institute योग, अष्टांग श्रेणी:हठयोग