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411 समाचार
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नन्दा देवी राजजात

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धार्मिक यात्रा नन्दा देवी (बहुविकल्पी) नन्दा देवी राज जात भारत के उत्तराखंड राज्य में होने वाली एक नन्दा देवी की एक धार्मिक यात्रा है। यह उत्तराखंड के कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। यह लगभग 12 वर्षों के बाद आयोजित होती है।1 अन्तिम जात 2014 में हुई थी। वर्तमान नन्दा देवी राजजात अथवा बड़ी जात 05 सितंबर 2026 से शुरू हुई थी जो 23 सितंबर 2026 को जिसका समापन हो गया है । अगली राजजात 2038 में होगी।http://www.newkerala.com/news/fullnews-11649.html GMVN preparing for Nanda devi Raj Jat yatra in 2012 26 जनवरी 2010 https://web.archive.org/web/20170902224306/http://www.newkerala.com/news/fullnews-11649.html 2 सितंबर 2017 live अंगूठाकार|नंदा देवी राजजात यात्रा पथ नंदा देवी राजजात या नन्दा देवी बड़ी जात उत्तराखंड की एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पदयात्रा है, जिसे “हिमालय का महाकुंभ” भी कहा जाता है। यह यात्रा देवी नंदा देवी को मायके से ससुराल (कैलाश पर्वत) विदा करने की लोकपरंपरा का प्रतीक है। यह यात्रा चमोली जनपद में स्थित कुरुड़ के नंदा देवी सिद्धपीठ से प्रारंभ होकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों से होते हुए होमकुंड तक जाती है।1 https://web.archive.org/web/20260124080054/https://hindi.news18.com/amp/news/uttarakhand/chamoli-nanda-badi-jaat-siddhapeeth-kurud-historic-journey-of-faith-begin-5-september-local18-10100901.html 24 जनवरी 2026 परिचय नंदा देवी उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्रों की इष्टदेवी मानी जाती हैं। उन्हें राजराजेश्वरी, नंदिनी, सुनन्दा और शुभानन्दा आदि नामों से भी पूजा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार नंदा देवी हिमालय की पुत्री और पार्वती का ही रूप हैं। इस कारण यह यात्रा एक बेटी की विदाई के रूप में आयोजित की जाती है।2 ऐतिहासिक एवं पारंपरिक महत्व नंदा देवी राजजात का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। गढ़वाल और कुमाऊँ के विभिन्न राजवंशों की यह इष्टदेवी रही है। स्थानीय परंपराओं, लोकगाथाओं तथा नंदा जागर परंपरा के अनुसार कुरुड़ स्थित नंदा देवी सिद्धपीठ को इस यात्रा की डोली परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहाँ से देवी की मूर्ति को विधिवत डोली में स्थापित कर यात्रा प्रारंभ की जाती है।3 https://web.archive.org/web/20260426022551/https://www.thedivineindia.com/hi/nanda-devi-sidhpeeth-kurud.html 26 अप्रैल 2026 रूपकुंड क्षेत्र में पाए गए मानव कंकाल तथा अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्य इस यात्रा की प्राचीनता को दर्शाते हैं।4 यात्रा के प्रकार वार्षिक जात (छोटी जात) – प्रतिवर्ष आयोजित राजजात (बड़ी जात) – लगभग 12 वर्षों या विशेष परिस्थितियों में आयोजित 5जून 2026 InternetArchiveBot यात्रा संरचना नंदा देवी राजजात की विशेषता यह है कि यह यात्रा प्रारंभिक चरण में विभिन्न धाराओं में संचालित होती है, जो आगे चलकर एक स्थान पर मिलती हैं।6 कांसुवा धारा (राजपरंपरा): कांसुवा नौटी सेम कोटी भगौती कुलसारी नन्दकेसरी फल्दियागांव मुन्दोली लोहाजंग **वाण (मिलन स्थल)** इस धारा में परंपरागत रूप से राजपरिवार के प्रतिनिधि छंतोली लेकर सम्मिलित होते हैं। कुरुड़ धारा (देवी डोली परंपरा): इस धारा में नंदा देवी की मूर्ति को डोली में स्थापित कर ले जाया जाता है, जो यात्रा का मुख्य धार्मिक केंद्र मानी जाती है। दशोली परगना धारा:7 * कुरुड़ * कुमजुग * लुणतरा * कांडई * सेमा * मटई ग्वाड़ * पगना * ल्वाणी * रामणी * आला * कनोल * **वाण (मिलन स्थल)** बधाण परगना धारा: * कुरुड़ * चरबंग * मथकोट * उस्तोली * भेंटी * डूंगरी * सूना * चेपड़ो * नंदकेशरी * फल्दियागांव * मुन्दोली * **वाण (मिलन स्थल)** कांसुवा से आई राजछंतोली नन्दकेसरी में कुरुड़ की नंदा देवी डोली को अपनी मनौती व भेंट चढ़ाते हैं। यहां पर कुमाऊं की छंतोली यात्रा का मिलन होता है।‌ 2000 में कुमाऊं की यात्रा 100 साल बाद आई। 👉 वाण वह प्रमुख स्थान है जहाँ सभी धाराएँ एक साथ मिलती हैं। इसके बाद यात्रा एक संयुक्त धारा के रूप में आगे बढ़ती है। रामणी में बहुत देवी देवताओं का निशान, कटार, छंतोलियों का मिलन दशोली परगना धारा की कुरुड़ नन्दा देवी डोली के साथ होता है। संयुक्त मार्ग: वाण गैरौली पातल वेदनी बुग्याल पातर नचौणिया रूपकुंड शिला समुद्र होमकुंड कुरुड़ सिद्धपीठ चमोली जिले के देवसारी (कुंडबगड़) क्षेत्र में स्थित नन्दा देवी सिद्धपीठ, कुरुड़ उत्तराखंड में नन्दा देवी उपासना परंपरा से संबंधित प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। यह मंदिर नंदाकिनी नदी के निकट स्थित है तथा स्थानीय परंपराओं में इसे नन्दा देवी का मायका माना जाता है।Nanda Devi Raj Jat https://en.wikipedia.org/wiki/Nanda_Devi_Raj_Jat मंदिर का संबंध नन्दा देवी राजजात परंपरा से जोड़ा जाता है। राजजात तथा वार्षिक जात यात्राओं के दौरान यहाँ से नन्दा देवी की डोली प्रस्थान करती है। स्थानीय मान्यताओं में इस यात्रा को देवी के मायके से कैलाश की ओर प्रस्थान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।Nanda Devi Raj Jat Yatra History https://himalayandreamtreks.in/blog/nanda-devi-raj-jat-yatra-2026/ कुरुड़ मंदिर दशोली एवं बधाण क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं से भी संबंधित माना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार दशोली क्षेत्र की नन्दा डोली वर्षभर कुरुड़ मंदिर में विराजमान रहती है, जबकि बधाण क्षेत्र से संबंधित डोली भाद्रपद मास में आयोजित जात यात्रा के पश्चात थराली क्षेत्र के देवराड़ा मंदिर में स्थापित की जाती है तथा मकर संक्रांति के अवसर पर पुनः कुरुड़ लायी जाती है।मां नंदा देवी छह माह बाद कुरुड़ मंदिर पहुंचीं Dainik Jagran 2026 स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार मंदिर की स्थापना प्राचीन काल में मानी जाती है। क्षेत्रीय लोककथाओं में कन्नौज से हिमालय क्षेत्र में देवी के पुनः आगमन तथा एक पुजारी को देवी द्वारा स्वप्न में निर्देश दिए जाने की कथा प्रचलित है। इन कथाओं को क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं का हिस्सा माना जाता है।Atkinson E. T. The Himalayan Gazetteer 1882 मध्यकालीन गढ़वाल शासकों द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख भी स्थानीय परंपराओं में मिलता है। कुछ विवरणों में गढ़वाल नरेश सोनपाल तथा अजय पाल द्वारा मंदिर से संबंधित कार्य कराए जाने का उल्लेख किया गया है।Nanda Devi: The Goddess of Uttarakhand Ramakant Benjwal 2013 Winsar मंदिर के गर्भगृह में नन्दा देवी की शिला स्वरूप में स्थापित मूर्ति विराजमान है, जिसे स्थानीय मान्यताओं में स्वयंभू माना जाता है। पूजा के उपरांत देवी को पारंपरिक प्रसाद “पूवे” अर्पित किए जाते हैं। मंदिर के पुजारी परंपरागत रूप से कान्यकुब्जीय गौड़ ब्राह्मण समुदाय से संबंधित माने जाते हैं।Chamoli District Official Website https://chamoli.nic.in क्षेत्रीय मान्यताओं में कुरुड़ सिद्धपीठ का संबंध अल्मोड़ा तथा बधाणगढ़ी की नन्दा परंपराओं से भी जोड़ा जाता है। कुछ स्थानीय विवरणों के अनुसार ऐतिहासिक काल में नन्दा देवी की उपासना परंपरा का प्रसार कुमाऊँ क्षेत्र तक हुआ।Nanda Devi: The Goddess of Uttarakhand Ramakant Benjwal 2013 Winsar चौसिंग्या खाडू राजजात की एक प्रमुख विशेषता चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला मेढ़ा) है। इसे देवी का दूत माना जाता है। 12 वर्षीय जात के समय यह भेड़ कुरुड़ के आसपास के गांव में जन्म लेता है । इसकी पीठ पर भेंट सामग्री रखी जाती है और होमकुंड में पूजा के बाद इसे हिमालय की ओर छोड़ दिया जाता है। 2026 में सुंग गांव में इसका जन्म हो चुका है। 8 धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व यह यात्रा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इसमें सैकड़ों गाँवों के लोग भाग लेते हैं और विभिन्न क्षेत्रों की निशाण एवं छंतोलियां इसमें सम्मिलित होती हैं। नंदा देवी राजजात 2026 वर्ष 2026 में आयोजित यात्रा का प्रारंभ 5 सितंबर को कुरुड़ से निर्धारित हुई। यह यात्रा विभिन्न पारंपरिक मार्गों से होकर वाण में मिली और उसके बाद संयुक्त रूप से होमकुंड तक पहुँची । सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ गढ़वाल पर्यटन की वेबसाइट पर राजजात बारे जानकारी घुघूती.कॉम पर जात बारे जानकारी नन्दा देवी जात बारे यात्रा जानकारी मेरा पहाड़ डॉट कॉम में श्री नन्दा राजजात की कहानी। श्रेणी:उत्तराखंड की संस्कृति श्रेणी:हिन्दू तीर्थयात्रा श्रेणी:चमोली जिला श्रेणी:उत्तराखण्ड के तीर्थ