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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

त्रिपुर सुंदरी मंदिर, हथियागढ़

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जून 2014हथियागढ़ का त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर जबलपुर शहर से करीब १४ कि॰मी॰ कि दूरी पर भेड़ाघाट मार्ग पर "हथियागढ़" नाम के स्थान में स्थित है।जून 2014 मन्दिर के अन्दर माता महाकाली, माता महालक्ष्मी और माता सरस्वती की विशाल मुर्ति स्थापित है।जून 2014 कहा जाता रहा है कि राजा "करन", जो हथियागढ़ के राजा थे, वे देवी के सामने खौलते हुये तेल के कडाहे में स्वयं को समर्पित कर देते थे और देवी प्रसन्न होकर उन्हें (राजा को) उनके वजन के बराबर सोना आशीर्वाद के रूप में देती थीं।जून 2014 मां त्रिपुर सुंदरी जो सदियों तक तेवर सहित आसपास इलाके में बड़ी खेरमाई या हथियागढ़ वाली खेरदाई के नाम से जानी जाती रही हैं और अब भी यहां के उम्रदराज लोग इसी नाम से संबोधित करते हैं। मां की अलौकिक शक्ति एवं चमत्कारों की यहां अनेक कहानियां एवं किवदंतियां आज भी सुनी जा सकती हैं। यहां पर आज भी मनोतियाँ मांगी जाती हैं और ऐसा देखा जा सकता है कि यहां मनोतियाँ पूर्ण होने के उपरांत भंडारे, विशेष पूजन-अर्चन तथा चढ़ावा का सिलसिला चलता ही रहता है। आस्था और श्रद्धा के इस स्थल में सदैव चहल पहल रहती है। लोग दूर-दूर से माँ के दर्शनार्थ दौड़े चले आते हैं। मां की चमत्कारी शक्तियों की अनेक कथाएं हैं। वे इस पहाड़ी स्थान को छोड़कर आबादी वाले क्षेत्र में आना ही नहीं चाहती थीं। सुना गया है कि एक बार ग्रामीण लोग माता जी को बैलगाड़ी में रखकर तेवर गांव में छोटी खेरमाई मंदिर ले कर आ गए और वहां रात भर भजन कीर्तन करते रहे। लोग जब दूसरे दिन सुबह स्नान-ध्यान करने और मां के पूजन की तैयारी करने अपने घर गए। इसके बाद जब वापस मंदिर आए तो माँ वहां से अंतर्ध्यान हो चुकी थीं। लोग घबरा गए। बाद में पता चला कि मां अपने पुराने स्थान पर स्वयं पहुंच गई हैं, ऐसी हैं तेवर की माँ त्रिपुरसुंदरी। एक कथा और सुनने को मिलती है कि अंग्रेजों के जमाने में कुछ बाहरी अनजान लोग मां को ट्रक में रख कर ले जा रहे थे परंतु कुछ ही दूरी पर ट्रक के सभी लोगों को नींद सताने लगी तब सभी लोग ट्रक को खड़ा कर सो गए और जब नींद खुली तो ट्रक में देवी मां नहीं थी। फिर ज्ञात हुआ कि वे अपने स्थान पर विराजमान हैं। जैसा मैं स्वयं जानता हूँ कि पूर्व में मां केवल एक शिलाखंड के सहारे पश्चिम दिशा की ओर मुंह किए अधलेटी अवस्था में थी। इसी तारतम्य में एक अन्य बात आज भी बताई जाती है कि त्रिपुरी क्षेत्र के ऐतिहासिक-उत्खनन के समय किसी उत्खनन अधिकारी ने मां को जंजीरों के सहारे खड़ा करने की कोशिश की थी तो उस अधिकारी को स्वप्न आया कि मुझे खड़ा मत करो परंतु वह नहीं माना। उसने जब मां को जंजीरों के सहारे खड़ा किया तभी अधिकारी के घर से उसके अच्छे-भले और स्वस्थ पुत्र की अचानक तबियत बिगड़ गई। बाद में उसने देवी मां को पूर्व स्थिति में रख कर उनसे क्षमा याचना और पूजन अर्चन किया तब जाकर उसके पुत्र को स्वास्थ्य लाभ हुआ। इनके अतिरिक्त इस सम्बन्ध में और भी कहानियां प्रचलित हैं, जिनमें बताया जाता है कि दानी राजा कर्ण ने पूजा के बाद सवा पहर तक सोना बरसाया था और यह भी कहा जाता है कि एक बार खौलते तेल की कढ़ाई में राजा ने अपना मस्तक काटकर जब देवी माँ को चढ़ाया तब माँ ने स्वयं प्रकट होकर भक्त को पुनर्जीवित किया तथा दर्शन दिए। पुनर्निर्माण का आधुनिक इतिहास वर्ष 1980 में यह मंदिर अत्यंत जीर्ण अवस्था में था। वर्ष 1980 से लेकर 2006 तक, पंडित राजेंद्र प्रसाद बाजपेयी, जो पान उमरिया ग्राम, जबलपुर के निवासी थे और उस समय एक सरकारी लिपिक के पद पर कार्यरत थे, ने इस मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पंडित राजेंद्र प्रसाद बाजपेयी को देवी त्रिपुर सुंदरी ने स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्देश दिया था। उस समय पंडित राजेंद्र प्रसाद बाजपेयी एक सरकारी लिपिक (क्लर्क) के पद पर कार्यरत थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने देवी की प्रेरणा से इस कार्य को अपना जीवन-उद्देश्य बनाया। पंडित राजेंद्र प्रसाद बाजपेयी द्वारा स्वयं के संसाधनों और प्रयासों से एकत्र कर मंदिर निर्माण में समर्पित की गई। जो उनके समर्पण और आस्था को दर्शाती है। पुनर्निर्माण के बाद, वर्ष 2007 से यह मंदिर सरकार के अधीन आ गया। धार्मिक एवं सामाजिक महत्व पुनर्निर्माण के पश्चात त्रिपुर सुंदरी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में आध्यात्मिक चेतना का भी प्रमुख स्थल बन गया। आज भी यह मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए आस्था, विश्वास और देवी कृपा का प्रतीक माना जाता है। इन्हें भी देखें त्रिपुर सुंदरी मंदिर, त्रिपुरा त्रिपुर सुंदरी मंदिर, बांसवाड़ा बाहरी कड़ियाँ त्रिपुर सुंदरी मंदिर, जबलपुर श्रेणी:भारत के मंदिर