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विस्मृति के गर्भ में
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‘विस्मृति के गर्भ’ में राहुल सांकृत्यायन द्वारा अंग्रेजी से अनुदित रचना है। इसका प्रकाशन वर्ष सन्1923 ई0 है। इसमें जासूसी, तिलस्मी, रोमांचकारी, रहस्यमयी बातों का समावेश अधिक है। उपन्यास की कथा को 26 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। कहानी के मुख्य बिन्दु में हजार वर्ष पूर्व मृत्यु को प्राप्त हुए थेबिस(मिस्र)राजकुमार सेराफिस का खजाना है।
कथा का प्रारंभ इतिहास के प्रोफेसर और क्यूरेटर के पद पर नालंदा में रहने वाले विद्याव्रत से होता है। विद्याव्रत मुख्य कथा नायक है। एक दिन उन्हें अपने अनुसंधान कार्य के दौरान नालंदा संग्रहालय में चित्रलिपियों की तुलना करते समय एक बंद दराज में हरा चकमक पत्थर मिला। पत्थर पर एक अत्यंत दुर्लभ गौबरैला की मूर्ति अंकित थी। उस मूर्ति में मिस्त्र भाषा की चित्रलिपि टंकित थी जिसे विद्याव्रत पढ़ व समझ सकते थे। वे मिस्र भाषा के विद्वान व तत्ववेता थे। उन्होंने जब गौबरैला की चित्रलिपि का अध्ययन किया तो ज्ञात हुआ कि यह गुप्त संकेतों से निर्मित गोबरैला-मूर्ति वाला यंत्र मिस्र के थेबिस राजकुमार सेराफिस का है। इससे पूर्व मिस्र यात्रा अन्वेषण कार्य के दौरान वे सेराफिस की शमशान यात्रा का चित्राकंन कार्नक-मंदिर कीशिलाओं पर देख चुके थे तभी उन्होंने एक शिला पर गोबरैला-मूर्ति भी देखी थी। उनके अनुसार सेराफिस थेबिस(मिस्र) का राजकुमार बहुत धनी व राजकीय उच्च कर्मचारी था। परंतु आश्चर्य की बात यह थी कि राजकुमार होते हुए भी उसे सम्राटों की भांति दफनाया गया था। उसकी समाधि मितनी-हर्पी शहर के रेगिस्तान के पास नील-नदी के उद्गम स्थान पर जहां रा(सूर्य देवता)का भव्य मंदिर बना हुआ था उसी मंदिर के तहखाने में सेराफिस की ममी को रखा गया। साथ ही उसके राज्य का समस्त धनकोष जिसमें बहुमूल्य रत्न,आभूषण,मुद्रा आदि वस्तुओं को भी सुरक्षित रखा गया था। इन सभी वस्तुओं पर केवल शव का अधिकार था। अगर कोई अन्य व्यक्ति समाधि की वस्तुओं पर अधिकार करना चाहेगा तो खोपरी देवता के शाप में पड़ेगा। विपत्ति और सर्वनाश उसे कदम कदम पर मिलेंगे,वह कभी भी सुख, शांति,विश्राम नहीं पायेगा। उसके पास गोबरैला-मूर्ति के होने से वह संसार के किसी भी कोने से ढूंढ कर मारा जायेगा। “सेराफिस की समाधि के रक्षक बने रहेंगे और जागरूक रहेंगे। जब रक्षक मार डाले जायेंगे तो देवता स्वर्ग के चारों कोनों से उतरेंगे।“32 ऐसा उस यंत्र मूर्ति में उल्लिखित था।
खजाने की सुरक्षा के लिए गुप्त चाबी के तौर पर गोबरैला यंत्र का निर्माण किया गया था। गोबरैला-बीजक व समाधि के मुख्य द्वार में गुप्त संकेतो की चित्र लिपि उत्कीर्ण की गयी, जिनको आपस में मिलाने से समाधि का द्वार रहस्यमयी तौर से खुल जाता था। यह शायद अलिफ लैला के खुलो शीशम की भांति था। परंतु ऐसी बातों पर विश्वास करना विद्याव्रत के लिए अंधविश्वास जैसा था। चित्रलिपि की जानकारी के बाद विद्याव्रत उसे नालंदा संग्रहालय की वस्तु समझकर देना चाहते थे। परंतु अकस्मात् उनसे मिलने धनदास जौहरी वकील आये। वे अपने चाचा शिवनाथ जौहरी की मिस्र भाषा की चित्रलिपियाँ, नोटबुक नक्शें की भाषा की जानकारी प्राप्त करना चाहते थे। उनके चाचा शिवनाथ जौहरी व्यापारी थे। वे जब मिस्र व्यापार में गए तब शायद उन्हें सेराफिस की समाधि में समाधिस्थ खजाने का पता चल गया था। वे मंदिर के पुजारियों के विश्वासपात्र बनकर और खजाना पाने के लालच में गोबरैला-बीजक को चुरा लाये। जिस कारण उनका मिस्र जासूसों द्वारा पीछा किया गया था फिर उनकी रहस्यमयी तरीके से हत्या कर दी। विद्याव्रत को जब इस घटना का पता चला तोवे भौचक्के से हो गए क्योंकि थोड़ी देर पहले ही उन्होंने गोबरैला-बीजक में टंकित लिपि का अध्ययन किया था जिन बातों पर वह विश्वास नहीं करना चाहते थे। विश्वनाथ जौहरी की हत्या से यही बातें स्पष्ट हो रही थी, कि जो इस मूर्ति को लालच के उद्देश्य से चुरायेगा वह खोपरी देवता के शाप में पड़ेगा या मार दिया जाएगा। यहीं से विद्याव्रत के जीवन में विशेष मोड़ आया। धनदास जौहरी को भी समाधि के खजाने का लालच था इसलिए वह मिस्र देश की यात्रा करना चाहते था,परंतु समस्या यह थी कि समाधि के खजाने की कुंजी नहीं थी।वह विद्याव्रत से जानना चाहते थे कि क्या वे गौबरैला बीजक के बारे में कुछ जानकारी रखते हैं? परंतु जब उन्हें यह पता चला कि वह बीजक तो स्वयं उनके पास पड़ा है तो वे विस्मित हो गये। उन्होंने विद्याव्रत को मूर्ति-यंत्र का ऐतिहासिक महत्व और उसकी उपयोगिता बतायी तथा उन्हें अपने साथ मिस्र यात्रा में चलने का प्रस्ताव दिया क्योंकि उस समय वे यंत्र के मालिक थे। विद्याव्रत अनुसंधान कार्य की उत्सुकता तथा खजाने का अन्वेषण करने हेतु धनदास के साथ यात्रा में चले गए,किन्तु दोनों की यात्रा के उद्देश्य अलग-अलग थे।
दोनों की यात्रा मुंबई से स्वेज तक कमल जहाज से हुई,किंतु स्वेज पहुंचने से पहले ही विद्याव्रत का गोबरैला बीजक जहाज में बैठे अनजान यात्रियों द्वारा चोरी हो गया। जिस कारण वे इस समस्या के समाधान के लिए कमल जहाज के कप्तान धीरेंद्रनाथ को खजाने का रहस्य बताते हुए उनसे सहायता मांगते है। धीरेंद्रनाथ ने इस कार्य के लिए एक चीनी जासूस महाशय चांङ से निवेदन किया। चांङ चीनी जासूस,कलाकार व जादूगर व्यक्ति थे। वे अनजान यात्रियों से वह बीजक एक चोर की वेशभूषा बनाकर चुरा ले आये। किन्तु उन्होंने देखा कि ये अनजान यात्री अपनी जान की परवाह छोड़ पुनः गोबरैला बीजक को पाने के लिए विद्याव्रत का पीछा कर रहे थे,तो चांङ बिना बताये उनकी यात्रा में शामिल हो गये। इस प्रकार अब चारों मित्र उस खजाने की खोज में स्वेज से रेगिस्तान की मरुभूमि में पहुंचे। उस रेगिस्तान की बालू में सूर्य भट्टी की तरह गर्मी देता था। वहां पानी, हवा, छाया का नाम नहीं, सिर्फ भीषण आग तथा निराशा व मृत्यु का स्थान था जहां से जीवित लौटना स्वप्न की तरह था। मरुभूमि की यात्रा में उन्हें बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा। तब उनके लिए सबसे अधिक सहायक कप्तान धीरेंद्र थे। पानी की व्यवस्था के लिए उन्होंने हिरणों की खाल से मस्कें बनाकर उनमें नदी का पानी भरा। परंतु यात्रा बहुत लंबी थी जिस कारण वह पानी भी खत्म हो गया और उन सबकी दशा भूख और निर्बलता के कारण दयनीय हो गयी। किंतु इन सभी कष्टों को सहते हुए वे मरुभूमि की यात्रा के अंतिम छोर पर पहुंचे। वहां एक बड़ी पहाड़ी में खुदी हुई प्राचीन देवताओं की दो प्रकांड मूर्तियां बनी थी जो कि थात् व अनुबिस देवता की थी। पहाड़ी के ऊपर स्वर्गीय देवताओं का अमृत भरा पानी का स्रोत था जिसे पीकर उन सब ने अपनी प्यास बुझाई। एक रात की विश्रांति के बाद उन्होंने मितनी-हर्पी शहर में प्रवेश की योजना बनायी। प्रवेश करने से पहले उन्होंने शहर की आबादी देखी जिससे उन्हें अपने प्राणों के लिए संकट महसूस होने लगा। विद्याव्रत मिस्र के प्राचीन देवताओं की देवतावली जानते थे और उस समय वहां थात् और अनुबिस की मूर्तियां भी देखी थी तथा उन देवताओं के कार्य भी उन्हें पता थे।
अतः उन्होंने मिस्र के देवताओं की बनावटी वेशभूषा बनायी। उस समय मिस्र के प्रमुख देवता थात् (जादू और कलाओं, अनुबिस(यमराज) होरस(आकाश देवता) थे। विद्याव्रत के साथी देव बने और विद्याव्रत बने वृद्ध पुजारी। वेशभूषा का निरीक्षण उन्होंने शहर के सड़क में चलकर किया। जहां पर उन्हें इस तरह चलते हुए देख कुछ व्यक्ति आश्चर्यचकित हुए तो कुछ स्तुति करने लगते, कुछ भयभीत होकर भागने लगते थे। एक व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा- “प्राचीन देवता स्वर्ग से पृथ्वी पृथ्वी पर उतरे हैं, अब संसार का सर्वनाश निकट है”।33 इस वाक्य से पुष्टि हो गई उनके द्वारा बनायी गयी बनावटी वेशभूषा असली देवताओं की सी थी। अब देवता व पुजारी बने लोगों को अपने प्राणों की चिंता न थी। पुजारी बने विद्याव्रत ने सभी व्यक्तियों को आश्वासन दिया कि तुम्हारे पूर्वजों के महान देवता थात्, अनुबिस,होरस कई शताब्दियों के बाद आज पृथ्वी पर अपने प्रिय बच्चों के देश में मंगल-कल्याण हेतु पधारे हैं उनका स्वागत करो भयभीत मत होओ! सभी जगह देवताओं के आने की खबर फैल गयी। देवता बने मनुष्य भ्रमण करते हुए वहां स्थित इसिस् देवी के मंदिर पहुंचे जहां उनकी मुलाकात उस देश की महारानी के प्रधान पुरोहित अहासो से हो गयी। देवता के पुजारी अहासो से एक नये नाम‘थोथ्मस’ के साथ परिचित हुए। देवता लोग साधारण मरणधर्मा मनुष्यों से बात नहीं करते इसलिए थोथ्मस को बोलने की आज्ञा दी, ऐसा उन्होंने पुरोहित से कहा। अहासो पुरोहित महारानी सेरिसिस् के शुभचिंतक व अभिभावक की तरह थे इसलिए आये हुए देवताओं को वे महारानी के राजमहल में ले गये। देवताओं के आने से महारानी भी डर गयी,वह देवताओं के चरणों में गिर कर विनम्र भाव से स्तुति करते हुए अपने द्वारा हुए अपराधों के लिए क्षमा मांगने लगी। महारानी सेरिसिस् अद्वितीय सुंदरी व मृदु-स्वभाव की स्त्री थीं। देवता बने मनुष्यों को उनके धर्म के नाम पर इस तरह विश्वासघात करने पर मन ही मन आत्मग्लानि महसूस हुई। थोथ्मस ने महारानी को सांत्वना दी कि देवता तुम्हारे मंगल कल्याण के लिए आए हैं। देवताओं को उनके पूर्वजों के रा(सूर्य मंदिर)में जाना है इसलिए उनके रहने की व्यवस्था वही करो। जिस पर महारानी ने उस रा(सूर्य मंदिर)के अध्यक्ष प्रधान पुजारी अहासो को उनकी सेवा का कार्य भार सौंप दिया।
परंतु एक समस्या फिर सामने आयी। वहां खड़ा महारानी का सैनिक नोहरी बीच में ही बोल पड़ा। वह एक दबंग किस्म का निर्भीक,साहसी,हठी,उदंड गर्म मिजाज,निर्दयी सेनापति था। उसने आये हुए देवताओं को शंका की दृष्टि से देखा और उसने रानी से कहा कि कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि‘देवता लोग पृथ्वी पर चलते फिरते हैं’ अच्छा होगा इन्हें वही भेज दिया जाये जहां से आये। महारानी ने व्यंग्य भाव से कहा- “शांत-शांत नोहरी तुम्हारा दिमाग हमेंशा गर्म रहता है,तुम एक उजड्ड़ सैनिक के सिवाय और क्या हो?”34 यह पुजारी दो देवताओं के साथ महल में आया है,तुमसे कहीं अधिक होशियार है। नोहरी बोला अगर कोई मुसीबत आये तो सेनापति को दोष न देना। सेनापति के अभद्र व्यवहार के लिए महारानी ने देवताओं से माफी मांगी। इसके उपरांत प्रधान पुरोहित ने देवताओं व पुजारी को रा-मंदिर दिखाया और बताया कि सेराफिस की समाधि की कुंजी गोबरैला बीजक के खोने से अन्दर नहीं जा सकते। उस शहर में रा(सूर्य देवता)का बहुत भव्य मंदिर बनाया गया था जिसकी सुंदरता रानी के महलों से भी बढ़कर थी उसी मन्दिर के तहखाने में समाधि थी। मंदिर में देवता विश्राम करना चाहते थे। परंतु नोहरी ने पुजारी को अपने महल में सैनिक द्वारा बुलवाया। नोहरी ने अपने एक जासूस प्सारो को विदेश में गोबरैला बीजक की खोज ने भेजा था। उसे वह बीजक मिलने के बाद भी पुनः चोरी हो गया। प्सारो ने नोहरी के पास लौटकर सारी घटना बतायी,कि उसने उस व्यक्ति को देखा है जिसके पास वह गोबरैला बीजक मौजूद था।नोहरी ने इसी शंका-दृष्टि के कारण पुजारी की परीक्षा लेने के लिए उसको प्सारो के सम्मुख उपस्थित किया। प्सारो इस नामधारी पुजारी को अच्छी तरह देखो क्या ये वही व्यक्ति है जिसे तुमने गोबरैला बीजक के साथ जहाज में देखा था। पुजारी की वेशभूषा बदलते वक्त उनके शरीर को चांङ महोदय ने रंगों से रंग दिया था। जिस कारण प्सारो उसे पहचान नहीं पाया। नोहरी और भी अधिक क्रोधित हो गया। पुजारी ऐसे दुष्ट आदमी से अपनी सुरक्षा के लिए महारानी के पास गये। थोथ्मस की परेशानी जानकर रानी ने उन्हें अपनी समस्या भी बतायी। इस देश में पर्वतों से मरूभूमि तक मेंरा शब्द ही कानून है यहां कोई नहीं जो मेंरी आज्ञा का उल्लंघन कर सके तथापि सेनापति नोहरी मेंरी बात नहीं मानता। वह बहुत बलवान है। वह राज्य सिंहासन पर अधिकार करना चाहता है और हमारे पूर्वज सेराफिस की कब्र का धन लूटना चाहता है। परंतु अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है क्योंकि समाधि की कुंजी बहुत समय पहले एक विदेशी व्यक्ति के मंदिर में प्रवेशव पुजारियों के साथ विश्वासपात्र बनने के कारण चुरा ली गयी थी। तथापि नोहरी ने एक जासूस प्सारो को गोबरैला बीजक की खोज में विदेश भेजा जो नहीं लौटा। तभी पुजारी ने प्सारो के लौट आने की खबर महारानी को दी। इस खबर से रानी और अधिक चिंतित व भयभीत हो गयी। जिस पर उसने थोथ्मस के साथ आए देवताओं से अपने सिंहासन की सुरक्षा के लिए सहायता मांगी। रानी ने बताया कि प्सारो सेराफिस के खजाने को पाने की इच्छा से नोहरी को उकसाने वाला व्यक्ति है। उसने आधुनिक युग के आविष्कारों को भली-भांति देखा है। रानी की ऐसी विषम परिस्थिति देखकर थोथ्मस को दया आ गयी। देवता तुम्हारी सहायता जरुर करेंगे,तुम्हारे राज्य के लिए लड़ेंगे,का आश्वासन देकर स्वयं रा-मंदिर लौट आये। उन्होंने चांङ महोदय से महारानी की समस्या व उसकी सहायता के लिए परामर्श किया। रानी को ऐसी संकट की स्थिति में जानकर चांङ,कप्तान,विद्याव्रत उनकी सहायता करने के लिए तैयार हुए।
देवताओं के आने से और उन्हें रानी के संरक्षण में रहते हुए देख सेनापति नोहरी क्रुद्ध होकर महारानी से सेराफिस के कब्र को लूटने का अधिकार मांगने लगा। जब रानी ने मना किया तो उसने उसे युद्ध के लिए ललकारा। तदुपरांत महारानी ने भी अपने शुभचिंतक अहासो और देवताओ से परामर्श करके युद्ध के लिए अंगरक्षक सैनिक बक्नी को रा-मंदिर की सुरक्षा में आक्रमण करने का आदेश दिया। मंदिर में नोहरी और बक्नी के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में बक्नी हार गया। नोहरी कब्र में पहुंचा परंतु गोबरैला बीजक न होने की वजह से असफल होकर लौट गया। नोहरी के जाते ही देवता बने मनुष्य धनदास,विद्याव्रत, चांङ,कप्तान समाधि में पहुंचे। गोबरैला बीजक की सहायता से उन्होंने समाधि को खोला तथा उसमें समाधिस्थ खजाने को पास से देखा। समाधि वाले कमरे में उन्होंने देखा कि राजकुमार सेराफिस की एक बड़ी मूर्ति थी जिस पर वह सिहांसन पर बैठा हुआ दिखाया था तथा उसके पास उसके आत्मा की मूर्ति थी। उसी कमरे में उसका समस्त खजाना रखा गया था। उस बहुमूल्य खजाने को देखकर धनदास मूर्छित व पागल सा हो गया वह सब धन उसी समय अपने साथ ले जाना चाहता था। परंतु संकट की स्थिति का भान होने से उनके मित्र उन्हें यह कहकर बाहर लाते हैं कि “संसार का सभी खजाना भी कुछ नहीं अगर प्राण ही ना बचे।“35 दूसरे दिन नोहरी फिर रा-मंदिर को लूटने व युद्ध करने के उद्देश्य से आया। किन्तु प्सारो की सहायता से वह उन नकली देवताओं का रहस्य जान गया। उसने धनदास को कब्र का आधा खजाना देने का लालच दिया। खजाने के लालच में धनदास ने अपने मित्रों की सारी योजना बता दी। प्रधान पुरोहित अहासो को भी नकली देवताओं का रहस्य मालूम हो गया किंतु वे जानते थे कि ये सब महारानी के शुभचिंतक व युद्ध में सहायक है इसलिए उन्होंने महारानी को प्रेमपूर्वक बताया कि यह सब देवता नहीं,विदेशी व्यक्ति है जो मितनी-हर्पी शहर में घूमने के उद्देश्य से आये थे। किंतु इन्होंने अपने प्राणों की रक्षा के लिए बनावटी देवताओं की वेशभूषा में प्रवेश किया। देवता बनें सभी व्यक्तियों ने महारानी से क्षमा मांगी। महारानी ने उन्हें अपना शुभचिंतक समझकर क्षमा कर दिया। नोहरी मंदिर को लूटने मेंफिर से असफल हुआ इसलिए वह महारानी के महल में आक्रमण करने प्सारो और धनदास के साथ पहुँचा। उसी समय कप्तान धीरेंद्रनाथ और बक्नी के सैनिकों ने अचानक नोहरी पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया। धनदास और प्सारो इस युद्ध में मारे गये। धनदास जैसे देशद्रोही भी उन्हीं लोगों के द्वारा मारे गये जिनके लिए अपने मित्रों का साथ छोड़ा था। इस प्रकार युद्ध समाप्त हुआ महारानी विजयी हुई।वह अपने राज्य-सिंहासन को सुरक्षित पाकर बहुत खुश थी। उसने उन सभी वीर योद्धाओं का धन्यवाद किया। वास्तव में महारानी का नसीब बहुत अच्छा था जो इतनी दूर से उनके सिंहासन की रक्षा में विदेशी वीर योद्धा पहुंचे थे।
अंत में विद्याव्रत ने महारानी से अपने देश वापस लौटने की अनुमति मांगी। महारानी उनसे रुकने का आग्रह करती रही। सबने महारानी की कृपा व दयाभाव के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि हमारा यहां रुकना ठीक नहीं,क्योंकि देवता बनकर हमने देशवासियों के धर्म के प्रति अन्याय किया। इसके अतिरिक्त हमारा उद्देश्य सेराफिस के समाधि की कुंजी गोबरैला बीजक सुरक्षित लौटाना था इसलिए हमारा कार्य पूर्ण हो गया। विद्याव्रत ने गोबरैला बीजक प्रधान पुरोहित अहासो को दे दिया तथा उसे खोलने का रहस्य भी बताया। अहासो ने भी विद्याव्रत को उपहार स्वरूप मिस्त्री गोबरैला की बनी मूर्ति दी। महारानी ने सभी को करुणापूर्ण नेत्रों से विदा किया। इस बार उन सभी की यात्रा महारानी और अहासो की कृपा से विशाल मरुभूमि से न होकर जंगल के रास्ते से हुई। कप्तान धीरेंद्रनाथ, विद्याव्रत,चांङ बिना धन प्रलोभन के महारानी सेरिसिस् की सहायता कर अपने देश लौट आये।
विस्मृति के गर्भ- राहुल सांकृत्यायन, पृ0 12
32- वहीं, पृ0 92
33- वहीं, पृ0 109
34- वहीं, पृ0 140