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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

त्रिशतिका

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त्रिशतिका या पाटीगणितसार श्रीधराचार्य द्वारा रचित प्राचीन भारतीय गणित का एक ग्रन्थ है। यह उनके ही 'पाटीगणित' का साररूप है, अर्थात श्रीधराचार्य ने पाटीगणित की विषय-वस्तु का संक्षेप करते हुए 'पाटीगणित-सार' अथवा 'त्रिशतिका' का प्रणयन किया। यह तथ्य त्रिशतिका के प्रथम श्लोक से स्पष्ट है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वे स्वविरचित पाटीगणित से विषय-वस्तु को लेकर इसके 'सार' की रचना कर रहे हैं। त्रिशतिका का हस्तलेख अत्यन्त जर्जर, सर्वथा दुरूह तथा भ्रष्ट पाठ की दशा में महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी को प्राप्त हुआ था। उन्होंने अत्यन्त परिश्रम से इस ग्रन्थ का पुनर्लेखन तथा अपनी टिप्पणी आदि से सुसज्जित करते हुए वर्ष 1899 ई. में इसे प्रकाशित किया। उन्हें बृहत् ग्रन्थ पाटीगणित का हस्तलेख प्राप्त नहीं हुआ था। सौभाग्य से आगे चलकर जम्मू के रघुनाथ मन्दिर पुस्तकालय से इस बृहत् ग्रन्थ का हस्तलेख भी प्राप्त कर लिया गया। इसे डा० कृपाशंकर शुक्ल ने वर्ष 1959 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अज्ञातकर्तृक संस्कृत व्याख्या तथा स्वविरचित अंग्रेजी अनुवाद के साथ सुसज्जित करते हुए प्रकाशित किया। उन्होंने अपनी विस्तृत इंग्लिश भूमिका में ग्रन्थ के विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। == त्रिशतिका का महत्त्व == इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारत में ये दोनों ग्रन्थ (पाटीगणित तथा पाटिगणितसार) सहस्रों वर्षों से पढ़े जाते रहे हैं। फिर भी त्रिशतिका के संक्षिप्त तथा अधिक सारगर्भित होने से इसका प्रचार कुछ अधिक ही था । इसीलिये इसके हस्तलेख भारत के अनेक पुस्तकालयों में उपलब्ध होते हैं। जबकि 'पाटीगणित' कम प्रचलित होने से उपरिलिखित एक ही पुस्तकालय में उपलब्ध हुआ है। त्रिशतिका पर व्याख्याएँ भी अधिक संख्या में लिखी गईं थीं। इनमें दो व्याख्याएँ संस्कृत में तथा अन्य तेलगु, कन्नड एवं गुजराती भाषा में परिज्ञात हुई हैं। इसकी गुजराती व्याख्या में श्रीधराचार्य के महत्त्व को प्रकट करने वाला एक सुन्दर श्लोक इस प्रकार है- उत्तरतो सुरनिलयं दक्षिणतो मलयपर्वतं यावत् । प्रागपरोदधिमध्ये नो गणकः श्रीधरादन्यः ॥ (अर्थात् उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में मलय पर्वत तक तथा पूर्व तथा पश्चिम समुद्र के बीच श्रीधर से बड़ा कोई दूसरा गणितज्ञ नहीं है।) यह अकेला श्लोक श्रीधराचार्य के प्रचार तथा प्रभाव को आमलय, आहिमालय सम्पूर्ण भारत में प्रकट करने के लिए पर्याप्त है। पाटीगणित के बृहत्काय होने से उसमें स्वभावतः त्रिशतिका के श्लोकों के अलावा अन्य अनेक सूत्रों तथा अतिरिक्त उदाहरणों का भी वर्णन है। फिर भी इससे 'त्रिशतिका' का अपना महत्त्व कम नहीं होता। क्योंकि इसमें कुछ ऐसे विषयों का निरूपण है, जो पाटीगणित में उपलब्ध नहीं होते । उदाहरणतः, वृत्तखण्ड का क्षेत्रफल, गोले का आयतन, शंकु का आयतन आदि। रेखागणित के अनेक सूत्र इसमें ही उपलब्ध हैं, पाटीगणित में नहीं। साथ ही त्रिशतिका उदा. 26, 27, 28 जैसे बहुत से उदाहरण भी केवल इसमें ही प्राप्त होते हैं। ये उदाहरण बहुत लोकप्रिय हुए हैं। आगे चलकर अनेक गणितज्ञों ने इन्हें उद्धृत किया है। त्रिशतिका में ऐसे सूत्र भी उपलब्ध हैं, जो पाटीगणित से अन्य शब्दों में प्रस्तुत किये गए हैं। == ग्रन्थ का नाम == 'त्रिशतिका' का शाब्दिक अर्थ 'तीन सौ श्लोकों का समाहार' । परन्तु उपलब्ध त्रिशतिका में इतने श्लोक नहीं है। अतः एक सम्भावना यह बनती है कि इसके कतिपय श्लोक विलुप्त हो गए हैं। इस ग्रन्थ के अन्त में 'त्रिशतिकापाटी' का समाप्त होना कहा गया है। बहुत समय से अंकगणित को 'पाटीगणित' कहा जाता रहा है । पाटी अर्थात् तख्ती पर धूल या अबीर बिछा कर गणित करने की परम्परा रही है। इसीलिये इसे 'धूलि-कर्म' भी कहा जाता रहा है। इन दोनों शब्दों का सर्वप्रथम प्रयोग ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में तथा पश्चात् लीलावती, सिद्धान्तशिरोमणि, वासनाभाष्य में भी प्राप्त है । गणित करने की यही पद्धति अरब तथा अन्य देशों में प्रसारित हुई । अतः वहाँ धूलिकर्म के लिये 'हिसाब-अल्-गुबार ' तथा अंकों के लिये 'हरूफ-अल्-गुबार ' शब्द प्रचलित हुए। यूरोप में भी किसी समय गिनती के लिये छोटे छोटे लट्टू वाली पाटी का प्रचलन था । इसे इंग्लिश में abacus कहा जाता था । यह शब्द हिब्रू के अर्थ वाले abak से तथा पाटी अर्थ वाले ग्रीक शब्द abakos से विकसित हुए थे। == सन्दर्भ ==