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411 समाचार
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पंचकर्म

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right|thumb|300px|शिरोधारा में सिर के ऊपर तेल की एक पतली धारा निरन्तर बहायी जाती है। पंचकर्म (अर्थात पाँच कर्म) आयुर्वेद की उत्‍कृष्‍ट चिकित्‍सा विधि है। पंचकर्म को आयुर्वेद की विशिष्‍ट चिकित्‍सा पद्धति कहते है। इस विधि से शरीर में होंनें वाले रोगों और रोग के कारणों को दूर करनें के लिये और तीनों दोषों (अर्थात त्रिदोष) वात, पित्‍त, कफ के असम रूप को समरूप में पुनः स्‍थापित करनें के लिये विभिन्‍न प्रकार की प्रक्रियायें प्रयोग मे लाई जाती हैं। लेकिन इन कई प्रक्रियायों में पांच कर्म मुख्‍य हैं, इसीलिये ‘’पंचकर्म’’ कहते हैं। ये पांच कर्मों की प्रक्रियायें इस प्रकार हैं- वमन विरेचन बस्ति – अनुवासन बस्ति – आस्‍थापन नस्‍य उपरोक्‍त पांच को मुख्‍य अथवा प्रधान कर्म कहते हैं। परिचय आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान की पंचकर्म चिकित्सा पद्धति भारत की प्राचीनतम और चमत्कारिक चिकित्सा पद्धति है। भारत के विभिन्न आयुर्वेद चिकित्सा महाविद्यालयों और चिकित्सालयों में रोगियों की चिकित्सा सुलभ और प्रभावी तरीके से किए जाने के कारण यह बहुत लोकप्रिय है और सामान्यतौर पर लोक जीवन में स्वीकार्य है। उत्तर भारत में यह पद्धति विशेष रूप से हाल ही में उपयोग में लाई जा रही है। इस पद्धति में शरीर के रोग उत्पादक कारणों को जो विष के समान होते हैं को बाहर निकालकर शरीर को शुद्ध किया जाता है। इसी से रोग निवारण भी हो जाता है। पंचकर्म, आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित एक विशेष चमत्कारिक चिकित्सा पद्धति है, जो दोषों को शरीर से बाहर निकाल कर रोगों को जड़ से समाप्त कर पुन: उस रोग के होने को रोकती है यह शरीर के उचित शोधन की प्रक्रिया है, जो रोगी के साथ- साथ में स्वस्थ मनुष्य के लिए भी फायदेमंद है। इसमें पाँच कर्म होते हैं तथा इनके कर्मों के पहले पूर्व कर्म पंचकर्म क्या है चिकित्सा के प्रकार और आयुर्वेदिक समझ Archived 3 मई 2021 at the Wayback Machine। आयुर्मीडिया। तथा बाद में पश्चात कर्म किया जाता है । प्रधान कर्म (काय चिकित्सानुसार) 1. वमन, 2. विरेचन, 3. आस्थापन वस्ति, 4. अनुवासन बस्ति, 5. नस्य शल्य चिकित्सानुसार आस्थापन तथा अनुवासन वस्ति को वस्ति शीर्षक के अंतर्गत लेकर तीसरा प्रधान कर्म माना गया है तथा पाँचवाँ प्रधान कर्म 'रक्त मोक्षण' को माना गया है। पूर्व कर्म 1. स्नेहन- स्नेह शब्द का तात्पर्य शरीर को स्निग्ध करने से है। यह स्नेह क्रिया शरीर पर बाह्य रूप से तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का अभ्यंग (मालिश) करके भी की जाती है तथा इन पदार्थों का मुख द्वारा प्रयोग करके भी की जाती है। कुछ रोगों की चिकित्सा में स्नेहन को प्रधान कर्म के रूप में भी किया जाता है। चार प्रमुख स्नेह (1) घृत, (2) मज्जा, (3) वसा, (4) तेल इनमें घृत (गोघृत) को उत्तम स्नेह माना गया है। ये चारों स्नेह मुख्य रूप से पित्तशामक होते हैं। 2. स्वेदन- स्वेदन का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिससे स्वेद अर्थात पसीना उत्पन्न हो। कृत्रिम उपायों द्वारा शरीर में स्वेद उत्पन्न करने की क्रिया स्वेदन कहलाती है। स्वेदन के भेद- (१) एकांग स्वेद- अंग विशेष का स्वेदन (२) सर्वांग स्वेद- संपूर्ण शरीर का स्वेदन (अ) अग्नि स्वेद- अग्नि के सीधे संपर्क द्वारा स्वेदन (ब) निरग्नि स्वेद- बिना अग्नि के संपर्क द्वारा स्वेदन। वमन उर्ध्व मार्ग से दोषों का निर्हरण वमन कहलाता है। अर्थात उल्टी करा कर मुख द्वारा दोषों का निकालना वमन कहलाता है। वमन को कफ दोष की प्रधान चिकित्सा कहा गया है। वमन योग्य रोग- श्वास, कास, प्रमेह, पांडु रोग (एनीमिया), मुख रोग अर्बुद आदि। वमन के अयोग्य रोगी- गर्भवती स्त्री, कोमल प्रकृति वाले व्यक्ति, अतिकृश भूख से पीड़ित आदि। विरेचन विरेचन गुदामार्ग मलमार्ग से दोषों का निकालना विरेचन कहलाता है। विरेचन को पित्त दोष की प्रधान चिकित्सा कहा जाता है। विरेचन के लिए सुबह रेचक पदार्थो का उपयोग किया जाता है जैसे अरंडी का तेल (3 से 4 चम्मच ), त्रिफला चूर्ण या अन्य कोई रेचक पदार्थ। इससे बार बार दस्त लगते है , जिससे शरीर में एकत्रित सारा पित्त मल मार्ग से बाहर निकल जाता है। पहले शरीर से मल बाहर आता है फिर पीला पदार्थ जो पित्त होता है तथा अंतिम रूप में जब सिर्फ पानी आने लगे तब समझ जाना चाहिए की सारा पित्त बाहर आ गया है।https://devinehealthtips.com/ Devine Health Tips - Physical And Mental Health Tips 2025-08-03 en-US 2025-08-11 https://web.archive.org/web/20250813214322/https://devinehealthtips.com/ 13 अगस्त 2025 dead विरेचन योग्य रोग- शिरः शूल, अग्निदग्ध, अर्श, भगंदर, गुल्म, रक्त पित्त आदि। विरेचन के अयोग्य रोगी- नव ज्वर, रात्रि जागरित, राजयक्ष्मा आदि। वस्ति आस्थापन वस्ति, अनुवासन वस्ति वस्ति वह क्रिया है, जिसमें गुदमार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्ना द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है। मूत्र मार्ग तथा अपत्य मार्ग से दी जाने वाली वस्ति उत्तर वस्ति कहलाती है तथा व्रण मुख (घाव के मुख) से दी जाने वाली वस्ति व्रण वस्ति कहलाती है। वस्ति को वात रोगों की प्रधान चिकित्सा कहा गया है। आस्थापन वस्ति में विभिन्न औषधि द्रव्यों के क्वाथ (काढ़े) का प्रयोग किया जाता है। अनुवासन वस्ति में विभिन्न औषधि द्रव्यों से सिद्ध स्नेह का प्रयोग किया जाता है। वस्ति के योग्य रोग- अंग सुप्ति, जोड़ों के रोग, शुक्र क्षय, योनि शूल आदि। वस्ति के अयोग्य रोगी- भोजन किए बिना अनुवासन वस्ति तथा भोजन के उपरांत आस्थापन वस्ति के प्रयोग का निषेध है। साथ ही अतिकृश, कास, श्वास, जिन्हें उल्टियाँ (वमन) हो रही हों, उन्हें वस्ति नहीं देना चाहिए। नस्य नासिका द्वारा जो औषधि प्रयुक्त होती है, उसे नस्य कहते हैं। नस्य को गले तथा सिर के समस्त रोगों की उत्तम चिकित्सा कहा गया है। मात्रा के अनुसार नस्य के दो प्रकार हैं- 1. मर्श नस्य- 6, 8 या 10 बूँद नस्य द्रव्य को नासापुट में डाला जाता है। 2. प्रतिमर्श नस्य- 1 बूँद या 2 बूँद औषध द्रव्य को नासापुट में डाला जाता है। इस नस्य की मात्रा कम होती है। अतः इसे प्रतिदिन भी लिया जा सकता है। नस्य योग्य रोग- प्रतिश्याय, मुख की विरसता, स्वर भेद, सिर का भारीपन, दंत शूल, कर्ण शूल, कर्ण नाद आदि। नस्य के अयोग्य रोगी- अत्यंत कृश व्यक्ति, सुकुमार रोगी, मनोविकार, अति निद्रा, सर्पदंश आदि। शल्य चिकित्सानुसार पाँचवाँ कर्म 'रक्त मोक्षण' माना गया है। रक्त मोक्षण का अर्थ है शरीर से दूषित रक्त को बाहर निकालना। रक्त मोक्षण की क्रिया शस्त्र द्वारा सिरा का वेधन करके भी की जाती है तथा बिना शस्त्र प्रयोग के भी की जाती है। बिना शस्त्र प्रयोग के रक्त मोक्षण के लिए सबसे अधिक प्रचलित विधि 'जलौका' अर्थात लीच द्वारा रक्त मोक्षण है। लीच को स्थान विशेष पर लगा दिया जाता है तथा दूषित रक्त के चूषण के बाद उसे हटा लिया जाता है। विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न शिराओं से रक्त मोक्षण का निर्देश आयुर्वेद में दिया गया है। आजकल मनुष्य का जीवन अधिकाधिक यांत्रिक होते जा रहा हैं। अत्यधिक गतिमान जीवन में मानव के आहार-विहार में अनियमितता आ गयी हैं। जिस तरह समय-समय पर कार या साइकिल जैसे यंत्रों के ठीक से चलने के लिए सर्विसिंग की जरुरत होती है उसी तरह हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शरीर की पंचकर्मों द्वारा शुद्धि भी जरुरी हैं। इन्हें भी देखें आयुर्वेद षट्कर्म (योग में) सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:आयुर्वेद श्रेणी:स्वास्थ्य