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पथेर पांचाली (1955 फ़िल्म)
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पथेर पाँचाली सत्यजित राय पथेर पाँचाली पोस्टर.jpg सत्यजित राय पथेर पाँचाली विभूतिभूषण बंधोपाध्याय सुवीर बनर्जीकानू बनर्जीकरुणा बनर्जीउमा दासगुप्तचुन्नीबाला देवीतुलसी चक्रवर्ती रवि शंकर सुव्रत मित्र दुलाल दत्त पश्चिम बंगाल सरकार एड्वर्ड हैरिसन (१९५८)मर्चंट आइव़्री प्रडक्शंज़सोनी पिक्चर्ज़ क्लैसिक्स (१९९५) 1955 8 26 भारत 115 मिनट122 मिनट (पश्चिम बंगाल)http://www.lib.unc.edu/house/mrc/films/full.php?film_id=3768 Pather Panchali 2008-06-19 Media Resource Center FilmFinder University of North Carolina at Chapel Hill https://web.archive.org/web/20090322061352/http://www.lib.unc.edu/house/mrc/films/full.php?film_id=3768 22 मार्च 2009 live भारत बांग्ला 150,000 (US$3000)http://books.google.co.in/books?id=fQYs4X5d9WAC&printsec=frontcover&dq=Satyajit+Ray:+interviews&hl=en&sa=X&ei=HvY0T8vGF4_SrQf4mLS6Dw&ved=0CD0Q6AEwAA#v=onepage&q=150000&f=false Satyajit Ray: interviews University Press of Mississippi 978-1-57806-936-1 10 फ़रवरी 2012
पथेर पाँचाली (পথের পাঁচালী, उच्चारण: पॉथेर पाँचाली, अर्थ: लघु पथगीत) 1955 का एक भारतीय बांग्ला-भाषी ड्रामा फ़िल्म है, जिसे सत्यजित राय द्वारा लिखित एवं निर्देशित और पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा निर्मित किया गया है। यह विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के 1929 के इसी नाम के बांग्ला उपन्यास का ही रूपांतरण है और सत्यजित राय के निर्देशन में यह पहली फ़िल्म है। सुवीर बनर्जी, कानू बनर्जी, करुणा बनर्जी, उमा दासगुप्त, पिनाकी सेनगुप्त और चुनीबाला देवी की विशेषता वाली और अपु त्रयी में पहली फ़िल्म होने के नाते, पथेर पाँचाली में नायक अपू और उनकी बड़ी बहन दुर्गा के ग़रीब परिवार के बचपन की कठिनाइयों को उनके गाँव के कठोर जीवन के मध्य में दर्शाया गया है।
आर्थिक समस्या के कारण से इसका निर्माण बाधित हुआ और फ़िल्म को पूरा होने में लगभग तीन वर्ष लग गये थे। फ़िल्म को मुख्य रूप से एक ही स्थान पर शूट किया गया था, क्योंकि इसका बजट सीमित था और इसमें अधिकतर शौकिया कलाकार थे। साथ में इसे एक अनुभवहीन क्रू द्वारा बनाया गया था। सितार वादक रवि शंकर ने शास्त्रीय भारतीय रागों का उपयोग करके फ़िल्म का साउंडट्रैक और गीत तैयार किया। सिनिमिटॉग्रफ़ी के प्रभारी सुव्रत मित्र थे, जबकि संपादन का कार्यभार दुलाल दत्त ने संभाला था। 3 मई 1955 को न्यू यॉर्क में म्यूज़ियम ऑव़ मॉडर्न आर्ट्स वा आधुनिक कला संग्रहालय के एक प्रदर्शनी के दौरान फ़िल्म के एक प्रायमियर के बाद, इसे बाद में कोलकाता (पूर्व में कलकत्ता) में एक उत्साही स्वागत के साथ रिलीस किया गया। यह बॉक्स ऑफिस के यहाँ भी सफल रही, किंतु फिर भी 1980 के शुरूआत तक इसने केवल ₹24 लाख का मुनाफ़ा कमाया था। एक विशेष स्क्रीनिंग में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री ने भी भाग लिया। आलोचकों ने इसके यथार्थवाद, मानवता और आत्मा को झकझोर करने वाले गुणों की प्रशंसा की है, जबकि अन्य ने इसकी धीमी गति को एक खामी बताया है और कुछ ने गरीबी को रूमानी रूप देने के लिए इसकी निंदा की है। विद्वानों ने अन्य विषयों के अलावा फ़िल्म की गीतात्मक गुणवत्ता और यथार्थवाद (इतालवी नवयथार्थवाद से प्रभावित), ग़रीबी और दैनिक जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का चित्रण और जिसे आश्चर्य की अनुभूति" कहा है, उसके उपयोग पर टिप्पणी की है।
अपू के जीवन की कहानी उनकी त्रयी के दो अगली किस्तों में भी जारी रही: अपराजित (1956) और अपुर संसार (अपु का संसार, 1959)। पथेर पाँचाली को भारतीय सिनिमा में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि यह उन फ़िल्मों में से एक थी, जिसने समानान्तर सिनिमा आंदोलन की शुरूआत की और जिसने प्रामाणिकता और सामाजिक यथार्थवाद का समर्थन किया। स्वतंत्र भारत की यह पहली फ़िल्म थी, जिसने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया। इसने 1955 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रायष्ठ फ़िल्म, 1956 के कैन फ़िल्म महोत्सव के यहाँ सर्वश्रायष्ठ मानव दस्तावेज़ पुरस्कार और कई अन्य पुरस्कार जीते, जिसने राय के चलचित्र को देश की सर्वश्रायष्ठ मूव़ियों में से एक के रूप में स्थापित किया। इसे अभी तक की बनी महानतम मूव़ियों की सूची में अकसर शामिल किया जाता है।
कहानी
फ़िल्म की कहानी ग्रामीण बांग्ला के निश्चिंदीपुर गाँव में सन 1910 से शुरू होती है। वहाँ हरिहर रॉय (कानू बनर्जी) नामक एक आदमी पुजारी के रूप में कार्यरत हैं, लेकिन वह अपना भविष्य एक कवि और नाटककार के रूप में देखते हैं। घर पर उनकी पत्नी सर्वजया (करुणा बनर्जी), बेटी दुर्गा और बेटा अपु हैं। घर पर उनके अलावा हरिहर की बड़ी चचेरी बहन इंदिर ठकुराइन भी रहती है। कमाई कम होने के कारण सर्वजया नहीं चाहती कि इंदिर वहाँ रहे, जो अकसर रसोई से खाना चुराती है। दुर्गा इंदिर को पसंद है और अकसर उसे एक अमीर पड़ोसी के बाग़ीचे से चुराये हुए फल देती हैं। एक दिन पड़ोसी की पत्नी ने दुर्गा पर मोतियों का हार चुराने का आरोप लगाया (जिससे दुर्गा इन्कार करती है) और सर्वजया पर अपनी चोरी की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने का आरोप लगाती है।
बड़ी बहन के रूप में दुर्गा अपू की मातृ स्नेह से देखभाल करती हैं, लेकिन उसे चिढ़ाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती हैं। साथ में, वे जीवन की सरल ख़ुशियाँ साझा करते हैं: एक पेड़ के नीचे चुपचाप बैठना, एक यात्रापाला वाले के बाइअस्कोप पर तस्वीरें देखना, पास से गुज़रने वाले हलवाई-वाले के पीछे दौड़ना और यात्रापाला देखना, जिसे एक अभिनय मंडली द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। हर शाम में वे दूर से आती रेलगाड़ी की सीटी की आवाज़ का आनंद लेते हैं।
सर्वजया की नाराज़गी इंदिर के प्रति बढ़ती जा रही थी और वह सरेआम शत्रुतापूर्ण हो गयी थीं, जिसके कारण इंदिर को किसी अन्य रिश्तेदार के घर पर अस्थायी शरण को लेना पड़ा। एक दिन जब दुर्गा और अपू ट्रेऽन की एक झलक पाने के लिए दौड़ते हैं, तभी घर लौटने पर उनको पता चलता है कि इंदिर की मृत्यु हो गयी है।
गाँव में संभावनाएँ ख़त्म होने पर हरिहर बेहतर नौकरी की तालाश में शहर जाते हैं। वह वादा करते हैं कि वह उनके घर की मरम्मत के लिए जैसे-तैसे करके पैसे लेकर लौटेंगे, मगर उम्मीद से अधिक समय बीत जाता है। उनकी अनुपस्थिति में परिवार ग़रीबी की गहराई तक में डूब जाता है और सर्वजया जल्दी से हताश और चिंतित हो जाती हैं। मॉनसूनी मौसम के दौरान, एक दिन दुर्गा भारी बारिश में खेलती हैं, उसे सर्दी लग जाती हैं और तेज़ बुखार हो जाता है। आँधी-बारिश के साथ ढहते घर पर आँधी-तूफ़ान की मार पड़ने से उनकी हालत ख़राब हो जाती है और अगली सुबह तक उनकी मृत्यु होती है।
हरिहर घर लौटते हैं और वह सर्वजया को सामान दिखाने शुरू करते हैं, जो कि वह शहर से लाये हैं। मौन सर्वजया अपने पति के चरणों में गिर जाती हैं और हरिहर दुख में रोता हैं, जब उन्हें पता चलता है कि दुर्गा की मृत्यु हो गयी थी। परिवार ने वाराणसी (पूर्व में बनारस) के लिए अपना पैतृक घर छोड़ने का फ़ैसला किया। जैसे ही वे सामान समेटते हैं, वैसे ही अपू को वह ज़ेवर मिलता है, जिसे दुर्गा ने चोरी करने से इन्कार किया था। वह उसे एक तालाब में फेंक देते हैं। अपू और उनके माता-पिता बैलगाड़ी पर गाँव से रुख़सत होते हैं, तभी एक साँप उनके अब खंडहर में परिवर्तित हुए घर पर रेंगता हुआ दिखायी देता है।
कलाकार
कानू बनर्जी - हरिहर रॉय, अपू और दुर्गा के पिता
करुणा बनर्जी - सर्वजया रॉय, अपू और दुर्गा की माता
सुवीर बनर्जी - अपूर्व रॉय (शिशु अपू)
पिनाकी सेनगुप्त - अपूर्व रॉय (किशोर अपू)
रुंकी बनर्जी - दुर्गा रॉय (शिशु दुर्गा)
उमा दासगुप्त - दुर्गा रॉय (किशोरी दुर्गा)
चुन्नीबाला देवी - इंदिर ठकुराइन
तुलसी चक्रवर्ती - प्रसन्न, स्कूली शिक्षक
हरेन बनर्जी - हलवाईवाला
निर्माण
उपन्यास और शीर्षक
विभूतिभूषण बंधोपाध्याय कृत पथेर पाँचाली बांग्ला साहित्य का एक क्लैसिक जीवांत उपन्यास है। यह पहली बार 1929 में एक धारावाहिक के रूप में और अगले वर्ष एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ।Banglapedia: National Encyclopedia of Bangladesh Sekhar Saumitra Asiatic Society of Bangladesh 2012 Islam Sirajul Sirajul Islam Second Pather Panchali 8 May 2016 Jamal Ahmed A. http://en.banglapedia.org/index.php?title=Pather_Panchali https://web.archive.org/web/20160401123952/http://en.banglapedia.org/index.php?title=Pather_Panchali 1 April 2016 live उपन्यास में एक ग़रीब परिवार के अपने ग्रामीण पैतृक घर में जीवित रहने के संघर्ष और परिवार के बेटे अपू के बड़े होने को दर्शाया गया है। उपन्यास के बाद के भाग ने, जहाँ अपू और उसके माता-पिता अपना गाँव छोड़कर बनारस में बस जाते हैं, सत्यजित राय के अपु त्रयी की दूसरी फ़िल्म अपराजित (1956) का आधार बनाया।
सिग्निट प्रेस के यहाँ ग्रैफ़िक डिज़ाइनर के रूप में कार्यरत सत्यजित राय ने 1944 में इस पुस्तक के संक्षिप्त संस्करण के लिए चित्र बनाये। उस समय राय ने इसका संक्षिप्त उपन्यास पढ़ा। सिग्निट के मालिक डी. के. गुप्त ने राय को बताया कि इसका संक्षिप्त संस्करण एक बेहतरीन मूव़ी बना सकता था। यह विचार राय को पसंद आया और 1946-47 के आसपास जब उन्होंने एक मूव़ी को बनाने पर विचार किया, तब उन्होंने कुछ गुणों के कारण से पथेर पाँचाली की ओर रुख किया। उन्होंने इसे एक महान पुस्तक बना दिया: जिसके मानवतावाद, गीतात्मकता और सच्चाई के सिद्धांत थे। लेखक की विधवा ने राय को उपन्यास पर आधारित फ़िल्म बनाने की अनुमति दी, किंतु यह समझौता केवल सैद्धांतिक था और इसमें वित्तीय सहायता नहीं दी गयी थी।
बांग्ला शब्द पथ (পথ, उच्चारण: पॉथ) का शाब्दिक अर्थ रास्ता होता है, जबकि पथेर (পথের, उच्चारण: पॉथेर) का अर्थ पथ का वा पथ-संबंधी होता है। पथेर पाँचाली एक प्रकार का कथात्मक लोकगीत है, जो कि बांग्ला में प्रस्तुत किया जाता था और यह एक अन्य प्रकार के लोक प्रदर्शन, यात्रापाला (যাত্রাপালা, उच्चारण: जात्रापाला) का अग्रदूत था।Banglapedia: National Encyclopedia of Bangladesh Mohanta Sambaru Chandra Asiatic Society of Bangladesh 2012 Islam Sirajul Sirajul Islam Second Panchali 8 May 2016 Jamal Ahmed A. http://en.banglapedia.org/index.php?title=Panchali https://web.archive.org/web/20160401132447/http://en.banglapedia.org/index.php?title=Panchali 1 April 2016 live बांग्ला शीर्षक के अंग्रेज़ी अनुवादों में सॉन्ग ऑव़ द लिटिल रोड, द लैमट ऑव़ द पैथ,https://www.nytimes.com/movies/movie/37409/Pather-Panchali/overview Pather Panchali (1955) Hal Erickson Rovi 2013 The New York Times 2 December 2013 https://web.archive.org/web/20131208171855/http://www.nytimes.com/movies/movie/37409/Pather-Panchali/overview 8 December 2013 Movies & TV Dept. deadhttp://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,863985-1,00.html Cinema: New Picture 20 October 1958 18 May 2008 Harrison Edward Time https://web.archive.org/web/20131207140257/http://content.time.com/time/magazine/article/0%2C9171%2C863985-1%2C00.html 7 December 2013 dead सॉन्ग ऑव़ द रोड,https://www.nytimes.com/movie/review?res=9806E5D6163DE73ABC4B51DFBF668383649EDE Screen: Exotic Import; Pather Panchali' From India Opens Here Crowther Bosley 23 September 1958 The New York Times 18 May 2008 https://web.archive.org/web/20131208172257/http://www.nytimes.com/movie/review?res=9806E5D6163DE73ABC4B51DFBF668383649EDE 8 December 2013 और सॉन्ग ऑव़ दि ओपन रोड सम्मिलित हैं।https://pqasb.pqarchiver.com/latimes/access/29774292.html?dids=29774292:29774292&FMT=ABS&FMTS=ABS:FT&date=May+28%2C+1998&author=JAN+HERMAN%3B+KEVIN+THOMAS&pub=Los+Angeles+Times&desc=THE+ORANGE+SCREEN%3B+A+Peek+at+the+Best%3B+'Pather+Panchali'+and+'October'+represent+pinnacles+of+film+achievement.&pqatl=google The Orange Screen; A Peek at the Best; Pather Panchali and October represent pinnacles of film achievement Herman Jan 28 May 1998 लॉस एंजिल्स टाइम्स 26 May 2008 https://web.archive.org/web/20131208172512/https://pqasb.pqarchiver.com/latimes/doc/421269823.html?FMT=ABS&FMTS=ABS%3AFT&type=current&date=May%2028%2C%201998&author=JAN%20HERMAN%3B%20KEVIN%20THOMAS&pub=Los%20Angeles%20Times&edition=&startpage=&desc=THE%20ORANGE%20SCREEN%3B%20A%20Peek%20at%20the%20Best%3B%20%27Pather%20Panchali%27%20and%20%27October%27%20represent%20pinnacles%20of%20film%20achievement. 8 December 2013 Thomas, Kevin dead
लिखी हुई कहानी
पथेर पाँचाली की अपनी कोई स्क्रिप्ट नहीं थी, वरन् इसे राय के चित्र और नोट्स से बनाया गया था। राय ने नोट्स का पहला मसौदा 1950 में लंदन से अपनी समुद्री यात्रा के दौरान पूरा किया। मुख्य फ़टॉग्रफ़ी वा छायांकन के शुरू होने से पहले उन्होंने विवरण और निरंतरता-संबंधी एक स्टोरीबॉर्ड बनाया। उन्होंने वर्ष-भर बाद अपने चित्र और नोट्स सिनिमैटिक फ़्रैंचाइज़ को दान कर दिये।
अपुर पाँचाली (माय यिअर्ज़ विथ अपु: अ मिमॉयर, 1994 का बांग्ला अनुवाद) में राय ने लिखा कि उन्होंने उपन्यास के कई पात्रों को छोड़ दिया था और उन्होंने कथा को सिनिमा के रूप में बेहतर बनाने के लिए इसके कुछ अनुक्रमों को पुनर्व्यवस्थित किया था। परिवर्तनों में इंदिर की मृत्यु शामिल है, जो उपन्यास की शुरूआत में वयस्कों की उपस्थिति में एक गाँव के मंदिर में होती है, जबकि फ़िल्म में अपू और दुर्गा को उनकी लाश खुले में मिलती है। अपू और दुर्गा का ट्रेऽन की एक झलक पाने के लिए दौड़ने का दृश्य उपन्यास में नहीं है, जिसमें कोई भी बच्चा ट्रेऽन नहीं देखता, हालाँकि वे कोशिश करते हैं। फ़िल्म में दुर्गा के घातक बुखार के लिए मॉनसूनी बारिश को दायी बताया गया है, मगर उपन्यास में इसकी व्याख्या नहीं की गयी है। फ़िल्म का अंत-परिवार का गाँव से प्रस्थान-उपन्यास का अंत नहीं है।
राय ने पथेर पाँचाली उपन्यास के महत्वपूर्ण और तुच्छ एपिसोड के यादृच्छिक अनुक्रमों से एक सरल विषय निकालने की कोशिश की, जबकि ऐंड्रू रॉबिंसन ने इसे "आवारापंती की छाप" के रूप में वर्णित किया है। राय के अनुसार, "स्क्रिप्ट को उपन्यास की कुछ हद तक उलझी हुई गुणवत्ता को बनाए रखना था, क्योंकि इसमें स्वयं में प्रामाणिकता की भावना का संकेत होता था: एक ग़रीब बंगाली देहात में जीवन अस्त-व्यस्त होता है"। रॉबिंसन के लिए राय का रूपांतरण मुख्य रूप से अपू और उसके परिवार पर केंद्रित है, जबकि बंदोपाध्याय के मूल में सामान्य रूप से ग्रामीण जीवन के बारे में अधिक विवरण दिखाया गया है।
कास्टिंग
कानु बनर्जी (हरिहर की भूमिका में) एक स्थापित बंगाली अभिनेता थे। करुणा बनर्जी (सर्वजया) भारतीय जन नाट्य संघ की एक शौकिया अभिनेत्री और राय के दोस्त की पत्नी थीं। उमा दासगुप्त, जिन्होंने दुर्गा की भूमिका के लिए सफलतापूर्वक ऑडिशन दिया था, को भी थियेटर का पूर्व अनुभव था।
अपू की भूमिका के लिए, राय ने पाँच से सात वर्ष की उम्र के लड़कों के लिए समाचार-पत्रों में विज्ञापन दिया। ऑडिशन देने वाले किसी भी प्रत्याशी ने राय की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया, लेकिन उनकी पत्नी ने अपने पड़ोस में एक लड़के को देखा और सुवीर बनर्जी को अपू के रूप में चुना गया। तीन मुख्य अभिनेताओं और दो सहायक अभिनेताओं का उपनाम बनर्जी था, लेकिन वे एक-दूसरे से संबंधित नहीं थे। सबसे कठिन भूमिका वृद्ध इन्दिर के रूप में निभानी थी। राय को अंततः कलकत्ता के रेड-लाइट जनपदों में से एक में रहने वाली सेवानिवृत्त मंच अभिनेत्री चुनीबाला देवी एक आदर्श प्रत्याशी के रूप में मिलीं। बोराल के ग्रामीणों द्वारा कई छोटी भूमिकाएँ निभायी गयीं जहाँ पथेर पाँचाली को फ़िल्माया गया था।
फ़िल्मांकन
शूटिंग 27 अक्टूबर 1952 को शुरू हुई। कलकत्ता के पास एक गाँव बोराल को 1953 की शुरूआत में छायांकन के लिए मुख्य स्थान के रूप में चयित किया गया और रात के दृश्यों को स्ट्यूडियो में शूट किया गया था। तकनीकी टीम में पहली बार कई सारे लोग कार्यरत थे। इनमें स्वयं राय और छायाकार सुव्रत मित्र भी शामिल थे, जिन्होंने कभी फ़िल्म कैमरा तक नहीं चलाया था। कला निर्देशक बंसी चंद्रगुप्त के पास द रिवर (1951) में झ़ेन रेनॉयर के साथ काम करने का पेशेवर अनुभव था। दोनों मित्र और चंद्रगुप्त ने ख़ुद को सम्मानित पेशेवर के रूप में स्थापित किया।
मित्र की मुलाक़ात राय से द रिवर के सेट पर हुई थी, जहाँ पर मित्र को निर्माण का निरीक्षण करने, तस्वीरें लेने और व्यक्तिगत संदर्भ के लिए लाइटिंग के बारे में नोट्स बनाने की अनुमति दी गयी थी। दोस्त बनने के बाद मित्र ने राय को प्रडक्शन के बारे में जानकारी दी और उन्हें तस्वीरें दिखायी थी। राय उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें पथेर पाँचाली में सहायक का पद देने का वादा किया और जब निर्माण का समय क़रीब आया, तब उन्होंने फ़िल्म के शूटिंग के लिए आमंत्रित किया। चूँकि 21 वर्षीय मित्र को फ़िल्म निर्माण का कोई पूर्व अनुभव नहीं था, इसलिए निर्माण विशेषज्ञओं ने उनकी पसंद पर संदेह जताया। बाद में मित्र ने स्वयं अनुमान लगाया कि राय एक स्थापित दल के साथ काम करने को लेकर घबराये हुए थे।
फ़ंडिंग शुरू से ही एक बड़ी समस्या थी। कोई भी निर्माता फिल्म के लिए धन देने को तैयार नहीं था, क्योंकि इसमें सितारों, गानों और ऐक्शन दृश्यों का अभाव था। राय की योजना के बारे में जानने पर कल्पना मूवीज़ के निर्माता श्री भट्टाचार्य ने लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की विधवा पत्नी से फ़िल्मांकन अधिकारों का अनुरोध करने और एक सुस्थापित निर्देशक देवकी बोस द्वारा फ़िल्म बनाने के लिए संपर्क किया। उन्होंने मना कर दिया, क्योंकि उन्होंने पहले ही राय को फ़िल्म बनाने की अनुमति दे दी थी। निर्माण का अनुमानित बजट ₹ 70,000 था। एक निर्माता राणा दत्त ने शूटिंग जारी रखने के लिए पैसे तो दिए, लेकिन उनकी कुछ फ़िल्मों के फ़्लॉप होने पर उन्हें शूटिंग रोकनी पड़ी।
इस प्रकार से, राय को संभावित निर्माताओं को अपनी पूरी फ़िल्म के वित्तपोषण के लिए राज़ी करने और पर्याप्त फ़ुटिज शूट करने के लिए पैसे उधार लेने पड़े। धन जुटाने के लिए उन्होंने एक ग्रैफ़िक डिज़ाइनर के रूप में काम जारी रखा, अपने जीवन बीमा को रेंट पर दे दिया और अपने ग्रैमिफ़ोन रेकॉर्ड का संग्रह बेच दिया। प्रडक्शन मैनिजर अनिल चौधरी ने राय की पत्नी विजया को अपने गहने गिरवी रखने के लिए मना लिया। फ़िल्मांकन के दौरान भी राय के पास पैसे ख़त्म हो गये, जिसे लगभग एक साल के लिए निलंबित करना पड़ा। इसके बाद शूटिंग केवल रुक-रुककर की गयी। राय ने बाद में स्वीकार किया कि देरी ने उन्हें तनावग्रस्त कर दिया था और केवल तीन अभूतपूर्व विषयों ने ही फ़िल्म को बचा लिया: एक, अपू की आवाज़ नहीं टूटी। दो, दुर्गा बड़ी नहीं हुई। तीन, इंदिर ठकुराइन की मृत्यु नहीं हुई।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री विधानचंद्र राय से राय की माँ के एक प्रभावशाली मित्र ने निर्माण में मदद करने का अनुरोध किया था। मुख्यमंत्री ने बाध्य किया और सरकारी अधिकारियों ने फ़ुटिज देखा। पश्चिम बंगाल सरकार के जनसंपर्क विभाग ने फ़िल्म के समर्थन की लागत का आकलन किया और किस्तों में ऋण देने की भी मंज़ूरी दे दी, जिससे राय को उत्पादन पूरा करने की अनुमति मिल गयी। सरकार ने फ़िल्म की प्रकृति को गलत समझा, ऐसा माना जाता है। ग्रामीण उत्थान के लिए वृत्तचित्र और ऋण को सड़क सुधार के रूप में दर्ज किया गया, जो फिल्म के शीर्षक का संदर्भ था।http://www.telegraphindia.com/1050420/asp/calcutta/story_4634530.asp Filmi Funda Pather Panchali (1955) 20 April 2005 The Telegraph 8 December 2013 https://web.archive.org/web/20131203012826/http://www.telegraphindia.com/1050420/asp/calcutta/story_4634530.asp 3 December 2013 India
आधुनिक कला संग्रहालय, न्यू यॉर्क के यहाँ प्रदर्शनी और प्रकाशन विभाग के प्रमुख मॉन्रो वीलर ने,https://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=940DE2DC143DF935A2575BC0A96E948260 Monroe Wheeler, Board Member of Modern Museum, Is Dead at 89 McGill Douglas c. 16 August 1988 The New York Times 13 June 2008 https://web.archive.org/web/20131208051113/http://www.nytimes.com/1988/08/16/obituaries/monroe-wheeler-board-member-of-modern-museum-is-dead-at-89.html 8 December 2013 जो 1954 में कलकत्ता में थे, इस परियोजना के बारे में सुना और राय से मुलाकात की। उन्होंने अधूरे फ़ुटिज को उच्चतम गुणवत्ता वाला माना और राय को फ़िल्म ख़त्म करने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि इसे अगले वर्ष आधुनिक कला संग्रहालय के एक प्रदर्शनी में दिखाया जा सके। छ महीने बाद अमेरिकी निर्देशक जॉन ह्यूस्टन ने द मैन, हू वुड बी द किंग (अंततः 1975 में बनी) के लिए कुछ प्रारंभिक स्थान तालाशने के लिए भारत में दौरा किया। मॉन्रो वीलर ने ह्यूस्टन को राय की परियोजना की प्रगति की जाँच करने के लिए कहा था। ह्यूस्टन ने अधूरी फिल्म के अंश देखे थे और एक "महान फ़िल्म निर्माता के काम" को पहचाना। ह्यूस्टन की सकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण से आधुनिक कला संग्रहालय ने राय को अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान की थी।
फ़िल्म के निर्माण में देरी और अंतराल को मिलाकर, इसकी शूटिंग पूरी करने में तीन साल लग गये।
ध्वनि-संगीत
फिल्म का संगीत सितार वादक रवि शंकर द्वारा तैयार किया गया था, जिन्होंने अपने करियर के शुरूआती चरण में 1939 में डेब्यू किया था। बैकग्राउंड स्कोर में भारतीय शास्त्रीय संगीत के कई रागों पर आधारित टुकड़े शामिल हैं, जो अधिकतर सितार पर बजाये जाते हैं। साउंडट्रैक, जिसका वर्णन द व़िलिज व़ॉइस के 1995 अंक में "एक साथ शोकपूर्ण और उत्साहवर्धक" के रूप में किया गया है,http://reocities.com/paris/metro/9384/films/pather_panchali/hoberman.htm The Hunger Artist Hoberman J 11 April 1995 The Village Voice 51 https://web.archive.org/web/20131208173320/http://reocities.com/paris/metro/9384/films/pather_panchali/hoberman.htm 8 December 2013 7 December 2013 को गार्डियन समाचार-पत्र के 2007 में 50 महानतम फ़िल्म साउंडट्रैकों की सूची में शामिल किया गया था।http://music.guardian.co.uk/omm/story/0,,2033050,00.html The 50 greatest film soundtracks 18 March 2007 The Observer https://web.archive.org/web/20131208173444/http://www.theguardian.com/music/2007/mar/18/features.musicmonthly14 8 December 2013 12 May 2008 इसे द बीटल्ज़ के जॉर्ज हैरिसन पर विशेष प्रभाव के रूप में भी उद्धृत किया गया है।
पार्षद गीत बनाने से पहले शंकर ने लगभग आधी फ़िल्म को मोटे तौर पर संपादित संस्करण में देखा, लेकिन वह पहले से ही कहानी से परिचित थे। रॉबिंसन के अनुसार, जब राय की मुलाकात शंकर से हुई, तब उन्होंने एक धुन गुनगुनायी, जो कि एक लोक-आधारित वरन् "निश्चित परिष्कृत" वाली थी। साधारण-से बाँसुरी पर बजायी गयी यह धुन इस फ़िल्म का मुख्य विषय बन गयी। अधिकांश स्कोर को एक ही रात को लगभग ग्यारह घंटे वाले सत्र में तैयार किया गया था। शंकर ने दो सितार टुकड़ों की भी रचना की - एक राग देश (परंपरागत रूप से बारिश से जुड़ा हुआ) पर आधारित और दूसरा उदासीन राग पर आधारित। उन्होंने उस दृश्य के साथ दक्षिणमोहन ठाकुर द्वारा शहनाई पर बजाये गये राग पर आधारित एक रचना बनायी, जिसमें हरिहर को दुर्गा की मृत्यु के बारे में पता चलता है। फ़िल्म के छायाकार सुव्रत मित्र ने साउंडट्रैक के कुछ हिस्सों के लिए सितार पर प्रदर्शन किया।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
0048473
37409
pather_panchali
श्रेणी:बांग्ला फ़िल्म