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धर्म
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मार्च 2022
मार्च 2022
पन्थ/सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म के लिए धर्म (पंथ) देखें। राजधर्म के लिए राजधर्म देखें।
धर्म (धर्म), यह केवल क्रिया या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन और वाणी से भी सम्बन्धित है।Klaus Klostermaier, A survey of Hinduism,, SUNY Press, ISBN 0-88706-807-3, Chapter 3: Hindu dharmahttps://archive.org/details/Tattvarthsutra आचार्य उमास्वामी तत्तवार्थसूत्र जैन विजय कुमार २०११ विकल्प प्रिण्टर्स हिन्दी 978-81-903639-2-1 https://web.archive.org/web/20160811005959/https://archive.org/details/Tattvarthsutra 11 अगस्त 2016 9 दिसम्बर 2015 धर्म का सामान्य अर्थ धारण करने वाला है। धर्म के पालन से धार्मिक होते हैं।
उल्लेख
मनुस्मृति
मनुस्मृति
महर्षि मनु के अनुसार मानव धर्म के १० लक्षण हैं -
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥
(धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को क्षमा कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरंग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना); ये दस मानव धर्म के लक्षण हैं।)
महाभारत
महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है -
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हम को न मार डाले।
इसी तरह भगवद्गीता में कहा है -
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
(कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि) जब जब धर्म की ग्लानि (पतन) होता है और अधर्म का उत्थान होता है, तब तब मैं अपना सृजन करता हूँ (अवतार लेता हूँ)।
पूर्वमीमांसा
मीमांसा दर्शन का प्रधान विषय 'धर्म' है। धर्म की व्याख्या करना ही इस दर्शन का मुख्य प्रयोजन है। इसलिए धर्म जिज्ञासा वाले प्रथम सूत्र- 'अथातो धर्मजिज्ञासा' के बाद द्वितीय सूत्र में ही सूत्रकार ने धर्म का लक्षण बतलाया है- "चोदनालक्षणोऽर्थों धर्मः" अर्थात् प्रेरणा देने वाला अर्थ ही धर्म है। एम. एल. सैंडल (1999), मीमांसा सूत्राज ऑफ जैमिनि, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स, दिल्ली. ISBN 81-208-1129-1. आचार्य कुमारिल भट्ट ने इसे 'धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्' ('धर्म' नामक विषय के बारे में बोलना मीमांसा का उद्देश्य है) रूप में अभिव्यक्त किया है गौरव शर्मा (2020), अर्थसंग्रहः अनुसार धर्म विवेचनम् ; गौरव ब्लॉग
जैन ग्रंथ
thumb|जैन मन्दिर में अङ्कित अहिंसा परमो धर्मः
जैन समुदाय
जैन ग्रन्थ, तत्त्वार्थ सूत्र में १० धर्मों का वर्णन है। यह १० धर्म है:जैन २०११ १२८
उत्तम क्षमा
उत्तम मार्दव
उत्तम आर्जव
उत्तम शौच
उत्तम सत्य
उत्तम संयम
उत्तम तप
उत्तम त्याग
उत्तम आकिञ्चन्य
उत्तम ब्रह्मचर्य
पुराण
पुराणों के अनुसार धर्म, ब्रह्मा के एक मानस पुत्र हैं। वे उनके दाहिने वक्ष से उत्पन्न हुए हैं। धर्म का विवाह दक्ष की १३ पुत्रियों से हुआ था, जिनके नाम हैं - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।
श्रद्धा से नर और काम का जन्म हुआ; तुष्टि से सन्तोष और क्रिया का जन्म हुआ; क्रिया से दण्ड, नय और विनय का जन्म हुआ।
अहिंसा, धर्म की पत्नी (शक्ति) हैं। धर्म तथा अहिंसा से विष्णु का जन्म हुआ है। धर्म की ग्लानि होने पर उस की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए विष्णु अवतार लेते हैं।
विष्णुपुराण में 'अधर्म' का भी उल्लेख है। अधर्म की पत्नी हिंसा है जिस से अनृत नामक पुत्र और निकृति नाम की कन्या का जन्म हुआ। भय और नर्क अधर्म के नाती हैं।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
धर्म (पंथ)
धर्मो रक्षति रक्षितः
धर्मचक्र
धर्म-परिवर्तन
क्रूसयुद्ध (ईसाईयत)
धर्म और धार्मिकताअप्रैल 2026 InternetArchiveBot कड़ियाँ
धर्म-रक्षा से आत्म-रक्षा
धर्म और संप्रदाय भिन्न होते हैं।