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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

हुविष्क

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हुविष्क HuvishkaBMCoin.jpg 150 – 190 150 कुषाण सम्राट कनिष्क 130 काबुल कश्मीर लेह 190 190 वासुदेव प्रथम वासुदेव प्रथमकनिष्क द्वितीय कुषाण राजवंश कनिष्क हिन्दू धर्म हुविष्क (xbc Οοηϸκ, pgd 𐨱𐨂𐨬𐨅𐨮𐨿𐨐) कुषाण साम्राज्य का शासक थे, जो कनिष्क की मृत्यु (150 ई.) के बाद सिंहासन पर बैठे। परिचय कुषाण शासकों में हुविष्क का राज्यकाल बड़ा महत्वपूर्ण है। इसकी पुष्टि तत्कालीन कुषाण लेखों तथा सिक्कों (मुद्राओं) से होती है। लेखों के आधार पर इसने कनिष्क संवत् २८-६० तक राज्य किया। यह लेख प्राय: मथुरा के कंकली टीले तथा अन्य निकट स्थानों से खुदाई में मिले। अफगानिस्तान में वरधक नामक स्थान से इसी शासक का सं. ५२ का एक लेख मिला। विद्वानों का मत है कि यह सम्राट् कनिष्क का कनिष्ठ पुत्र था और अपने भाई वासिष्क (२४-२८) के बाद सिंहासन पर बैठा। अरा के सं. ४१ के लेख में एक अन्य कुषाण सम्राट् महाराज राजातिराज देवपुत्र कैसर कनिष्क का उल्लेख है जिसके पिता का नाम वाजेष्क था। ल्यूडर्स तथा कुछ अन्य विद्वानों के विचार में कनिष्क प्रथम की मृत्यु के बाद कुषाण साम्राज्य का विभाजन हो गया था। उत्तरी पश्चिमी भाग पर वाजिष्क तथा अरा के कनिष्क द्वितीय ने राज्य किया और उसके बाद हुविष्क का दोनों भागों पर अधिकार हो गया। यह सुझाव हुविष्क के राज्यकाल (२८-६०) में एक अन्य कुषाण सम्राट् अरा के कनिष्क की गुत्थी सुलझाने के लिए दिया गया था। विभाजन का कहीं भी संकेत नहीं मिलता है। वासिष्क के लेख क्रमश: २४ तथा २८ वर्ष के मथुरा तथा साँची में मिले। अत: उसका उत्तरी पश्चिमी भाग पर राज्य करने का लेखों से संकेत नहीं मिलता। हुविष्क ३२ वर्ष अथवा इससे भी कुछ अधिक काल तक संपूर्ण कुषाण साम्राज्य का शासक रहा और उसके बाद संवत् ६७ से ९८ तक वासुदेव ने राज्य किया। हुविष्क के राज्यकाल के सं. २८ में वकन (बदकशाँ) से एक मध्य एशियाई सरदार मथुरा आया और उसने केवल ब्राह्मणों ही के लिए ५५० पुराणों की धनराशि दो विभिन्न श्रेणियों के पास जमा कर दी। इसमें इस समय की सुदृढ़ आर्थिक व्यवस्था का पता चलता है। हुविष्क ने एक पुण्यशाला का भी निर्माण किया, जिसका इस लेख में विवरण है, तथा अपने पूर्वजों की मूर्तियाँ भी स्थापित कीं। इस सम्राट् की विभिन्न प्रकार की स्वर्णमुद्राओं से प्रतीत होता है कि इसका राज्यकाल संपन्न युग था। पूरब में इसका राज्य पटना तथा गया तक विस्तृत था, जैसा पाटलिपुत्र की खोदाई में मिले मिट्टी के बोधगया मंदिर के एक प्रतीक से पता चलता है। कल्हण की राजतरंगिणी में हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क का उल्लेख है। हुष्क द्वारा बसाए गए हुष्कपुर की समानता वर्तमान वरामुला से की जाती है। हुविष्क का शासनकाल हुविष्क के शासनकाल के सिक्के अनेक स्थानों में और बड़ी मात्रा में मिले हैं। इन पर भारतीय, ईरानी और यूनानी देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। इससे ज्ञात होता है कि कनिष्क का जीता हुआ पूरा राज्य इसके अधिकार में था और उसका विस्तार पूर्व में पाटलिपुत्र तक था। कुषाण सम्राट कनिष्क, कनिष्क द्वितीय, हुविष्क और वासुदेव का शासन काल माथुरी कला का 'स्वर्णिम काल' था। इस समय इस कला शैली ने पर्याप्त समृद्धि और पूर्णता प्राप्त की। एक और मूर्ति जो संभवत: कुषाण सम्राट 'हुविष्क' की हो सकती है, इस समय 'गोकर्णेश्वर' के नाम से मथुरा में पूजी जाती है। ऐसा लगता है कि कुषाण राजाओं को अपने और पूर्वजों के प्रतिमा मन्दिर या 'देवकुल' बनवाने की विशेष रुचि थी। प्राप्त लेख हुविष्क के समय का एक लेख क़ाबुल से तीस मील पश्चिम में ख़वत नामक स्थान पर एक स्तूप की ख़ुदाई में उपलब्ध हुआ है। जिसे 'कमगुल्मपुत्र वमग्ररेग' नामक व्यक्ति ने भगवान शाक्य मुनि के शरीर की प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में लिखवाया था। क़ाबुल के पश्चिम में बौद्ध धर्म की सत्ता और प्राकृत भाषा के प्रचलन का यह ज्वलन्त प्रमाण है। इसी युग के बहुत से लेख ख़ोतन देश से प्राप्त हुए हैं, जो कीलमुद्राओं (विशेष प्रकार की लकड़ियों की तख्तियों) पर लिखे गए हैं। ये लेख प्राकृत भाषा में हैं, और खरोष्ठी लिपि में लिखित हैं। हुविष्क ने कश्मीर में अपने नाम से एक नगर (हुविष्कपुर) भी बनाया था, जिसके अवशेष बारामूला के दर्रे के समीप उस्कूल गाँव में अब भी विद्यमान हैं। सन्दर्भ ग्रन्थ स्नेन केनो : कॉर्पस इंस्क्रिपशनम् इंडिकेरम, भाग २; शास्त्री, के। ए. नीलकंठ : कांप्रीहिस्ट्री ऑव इंडिया, भाग २; पुरी, बी. एन. : इंडिया अंडर दि कुषाण्स, बंबई १९६५ श्रेणी:महायान बौद्ध श्रेणी:कुषाण सम्राट