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दिवोदास (रिपुञ्जय)
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दिवोदास एक पौराणिक पात्र हैं, जो काशी के राजा के रूप में प्रख्यात हैं। उनका पहले का नाम रिपुञ्जय था। उनके तपोबल से सन्तुष्ट ब्रह्मा जी के द्वारा उन्हें 'दिवोदास' नाम प्रदान किया गया था। उन्होंने काशी से देवताओं को बहिष्कृत कर समस्त कार्य स्वयं सम्पन्न किया था। अत्यधिक कुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ राजा के रूप में उनकी प्रसिद्धि है।
पौराणिक इतिवृत्त
रिपुञ्जय का जन्म राजर्षि मनु के वंश में हुआ था। वे वीर तो थे ही, मूर्तिमान् क्षत्रियधर्म की भाँति प्रकट हुए थे। उन्होंने अविमुक्त नामक महाक्षेत्र में मन एवं इंद्रियों को वश में करके तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये और उनसे कहा -- "महामते! तुम समुद्र, पर्वत और वनों सहित समूची पृथ्वी का पालन करो। नागराज वासुकि तुम्हें पत्नी बनाने के लिए नागकन्या अनङ्गमोहिनी को देंगे। देवता भी प्रतिक्षण तुम्हारे प्रजापालन से संतुष्ट होकर तुम्हें स्वर्गीय रत्न और पुष्प प्रदान करते रहेंगे। इसलिए 'दिवो दास्यन्ति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार तुम्हारा नाम 'दिवोदास' होगा।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, पूर्वार्द्धम्-३९-३३ से ४०. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-२८७. राजन् ! मेरे प्रभाव से तुम्हें दिव्य सामर्थ्य की प्राप्ति होगी।" इस पर राजा रिपुञ्जय ने शर्त रखी कि पितामह ! यदि मैं पृथ्वी का अधिपति होऊँ, तो देवलोक के निवासी देवगण अपने ही लोक में ठहरें, भूलोक में न आवें। जब देवता देवलोक में रहेंगे और मैं इस पृथ्वी पर निवास करूँगा, तब यहाँ अकण्टक राज्य होने से प्रजावर्ग को सुख की प्राप्ति होगी। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसके बाद राजा दिवोदास ने डंका बजवाकर राज्य में यह घोषणा करवा दी कि 'देवता लोग स्वर्ग को चले जायँ और नागगण भी यहाँ कभी न आयें, जिससे मनुष्य स्वस्थ एवं सुखी रहें। पृथ्वी पर मेरे राज्य-शासनकाल में देवता स्वर्ग में सुखी रहें और मनुष्य पृथ्वी पर स्वस्थ रहें।'स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, पूर्वार्द्धम्-३९-४८,४९. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-२८८.
दिवोदास की राजधानी काशी थी और काशी से देवताओं के बहिष्कृत हो जाने पर ब्रह्मा जी ने भगवान् शिव का निवास मन्दराचल पर बताया। मन्दराचल की तपस्या से संतुष्ट तथा ब्रह्मा जी के वचन के अनुसार शिवजी मंदराचल को चले गये। उनके जाने पर उन्हीं के साथ संपूर्ण देवता भी वहीं चले गये। भगवान् विष्णु भी भूमंडल के वैष्णव तीर्थों का परित्याग करके वहीं चले गये। इसके बाद राजा दिवोदास ने निर्द्वन्द्व राज्य किया।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, पूर्वार्द्धम्-४३-१ से ७. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-३१५. उन्होंने काशी काशीपुरी में सुदृढ़ राजधानी बनाकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए सबको उन्नतिशील बनाया। उनका अपराध नागलोग भी नहीं करते थे। दानव भी मानव की आकृति धारण करके उनकी सेवा करते थे। गुह्यक लोग सब ओर मनुष्यों में राजा के गुप्तचर बनकर रहते थे। उनके सभाभवन के आंगन में बैठे हुए विद्वानों एवं मंत्रियों को किसी ने कभी शास्त्रों द्वारा पराजित नहीं किया तथा रणांगण में डटे हुए उनके योद्धाओं को कभी किसी ने अस्त्र-शस्त्रों द्वारा परास्त नहीं किया। उनका राज्य एक आदर्श राज्य था। उनका दोष ढूँढ़ने के लिए देवताओं ने बहुत प्रयत्न किया परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद मंदराचल से महादेव जी ने चौसठ योगिनियों को राजा का दोष ढूँढ़ने के लिए काशी भेजा। वे योगिनियाँ बारह महीनों तक काशी में रहकर लगातार प्रयत्न करती रही फिर भी राजा का कोई दोष न ढूँढ़ सकीं।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, पूर्वार्द्धम्, अ॰-४५. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-३२६-३२९. उनके वापस न लौटने पर भगवान शिव ने सूर्यदेव को भेजा। उन्हें भी राजा दिवोदास के शासन में कोई दोष न मिला और वे स्वयं बारह स्वरूपों में व्यक्त होकर काशी में ही स्थित हो गये।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, पूर्वार्द्धम्-४६-४४. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-३३२.
भगवान् शिव काशी से दूर नहीं रहना चाहते थे। इसलिए जब सूर्यदेव भी लौट कर न आये तो शिव जी ने स्वयं ब्रह्मा जी को भेजा। ब्रह्मा जी वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर राजा से मिले और काशी में यज्ञ करने की अभिलाषा व्यक्त की। राजा ने उनकी अभिलाषा पूरी की ब्राह्मण रूपधारी ब्रह्मा जी ने वहां दस अश्वमेध यज्ञ करवाये और वह स्थान दशाश्वमेध नाम से प्रख्यात हुआ। परंतु राजा में कोई दोष न पाकर ब्रह्मा जी भी लौट कर न आये तब शिवजी के काशीपुरी आगमन का उपाय ढूंढने हेतु गणेश जी मंदराचल से काशी पहुंचे और बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर स्वयं को ज्योतिषी बताते हुए वहां के सभी लोगों को प्रभावित किया। रनिवास की रानियों को भी अपनी दिव्यदृष्टि से किसी वस्तु का यथावत वर्णन सुनाकर सबका विश्वास जीत लिया और इस प्रकार राजा तक पहुंच गये। राजा ने उनसे अपने कल्याण का मार्ग पूछा। उन्होंने बताया कि आज के अठारहवें दिन उत्तर दिशा से कोई ब्राह्मण आकर तुम्हें उपदेश करेगा। तुम्हें उनके प्रत्येक वचन को मानना और उनका पालन करना चाहिए।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, उत्तरार्द्धम्-५६-७७. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-३९०. परंतु, राजा में गणेश जी को भी कोई दोष न मिला और दिवोदास के राजा बनने से पहले काशी में गणेश जी के जो भी स्थान थे उन सबको उन्होंने अनेक रूप धारण करके ग्रहण कर लिया। अंत में भगवान शिव ने भगवान विष्णु को काशी जाने हेतु कहा और आदर पूर्वक निवेदन किया कि माधव आप भी वैसा ही न कीजिएगा जैसा कि पहले के गए हुए लोगों ने किया है। भगवान विष्णु गरुड़ के साथ वहां पहुंचे। उन्होंने अपना नाम पुण्यकीर्ति और गरुड़ का नाम विनयकीर्ति रखा। उन्होंने शिष्य विनयकीर्ति को धर्म का उपदेश दिया। उन्होंने अपना निवास धर्मक्षेत्र (सारनाथ) में बनाया था। गणेश जी के कथन के अनुसार अठारहवें दिन वे राजा के पास पहुंचे। राजा उत्कंठा पूर्वक उनके पास गये और स्वयं वैराग्यभाव का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि राज्य-शासन करते समय मेरे द्वारा एक ही अपराध हुआ है। वह यह कि मैंने अपने तपोबल के अभिमान से संपूर्ण देवताओं को तिनके के समान समझा है। यद्यपि प्रजा के उपकार के लिए ही ऐसा किया है, स्वार्थसिद्धि के लिए नहीं। इसके सिवा मेरे शासन में कोई पाप नहीं मिलेगा। पुण्यकीर्ति नामधारी भगवान् विष्णु ने प्रसन्नतापूर्वक उनके कथन का अनुमोदन किया। उनकी प्रशंसा की और कहा कि मेरी समझ में तुम्हारा सबसे महान् अपराध यही है कि तुमने भगवान् विश्वनाथ को काशी से दूर कर दिया है। इसके निवारण के लिए तुम यहां शिवलिंग की स्थापना करो। ऐसा कर लेने पर आज से सातवें दिन एक दिव्य विमान तुम्हें शिवधाम में ले जाने के लिए आएगा। राजा दिवोदास ने प्रसन्नतापूर्वक इसे स्वीकार किया। उन्होंने अपने पुत्र समरञ्जय का राज्याभिषेक कर दिया और अपनी विशाल संपत्ति लगाकर गंगा के पश्चिम तट पर एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाकर शिवलिंग की स्थापना की और स्वयं शिवधाम को प्राप्त किया। इस प्रकार पुनः भगवान् शिव का काशी से संयोग हुआ। वह तीर्थ 'भूपालश्री' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, उत्तरार्द्धम्-अ॰-५८. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-३९९-४११. स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में दिवोदास की इस कथा को सभी पातकों का नाश करने वाली कहा गया है।स्कन्दपुराणम्, काशीखण्डम्, उत्तरार्द्धम्-५८-२२५. स्कन्दमहापुराणम्, खण्ड-४, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-२००३, पृष्ठ-४१२.
इन्हें भी देखें
दिवोदास
दिवोदास (ऋग्वेद)
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
श्रेणी:पौरवकुल
श्रेणी:प्राचीन पौराणिक राजवंश