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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

क्षुल्लक श्री अतुल्यसागर

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विलक्षण प्रतिभा ने बनाया चक्रेश को अतुल्य सागर। प्रेम, करूणा, दया, साहस, सेवा - भाव व ज्ञान सभी गुण एक व्यक्ति में पाये जाएं तो निश्चित रूप से वह विशिष्ट व्यक्तितत्व ही होगा। इतनी विशिष्टताओं के साथ वैरागय भी जुड जाये तो यह विशिष्टता विलक्षण हो जाती हैं। पहले सेवा फिर समाज सेवा व उसके बाद जीव मात्र की सेवा ने एक छोटे से गांव के चक्रेश को अतुल्य सागर बना दिया। जैसा नाम मिला वैसे ही कार्य भी समय के साथ मूर्त रूप लेते जा रहे हैं। महज छः महीनों में चक्रेश से अतुल्य सागर बने व्यक्तित्व ने ज्ञान रूपी सागर का विराट रूप ले लिया हैं। मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के एक छोटे से गांव पीपलगोन में विमला देवी तथा सोमचन्द्र जी के घर इस विशिष्ट प्रतिभा ने 3 जुलाई 1980 को जन्म लिया। बचपन से ही कुशाग्र, पढने-लिखने तथा आध्यात्म में चक्रेश की गहरी रूचि रही। समय के साथ इस रूचि ने विविध रूप धारण किए। किशोरावस्था तक पहुंचते हुए चक्रेश को अपनी वय से बडी उम्र के साथियों ने पत्रकार नाम दे दिया। दीन-हीन व समाज सेवा के भाव ने सत्रह वर्ष की आयु में ही चक्रेश की ख्याति दूर-दूर तक फैला दी। हर समाज तथा विभाग में उनकी अपनी पहचान बनी। लोगों का प्रेम-भाव भी उनसे बढता ही चला गया। ख्याति तथा सेवा-भाव के कारण चक्रेश को तहसील पत्रकार मण्डल के महामंत्री, मित्र मिलन वाचनालय के संस्थापक, युवा चेतना मंच के संचालक, नगर मण्डल के प्रचार मंत्री और भी कई संस्थओं के विशिष्ट पदों पर रहने के अवसर मिले। श्रेष्ट मूल्यों को कायम रखते हुए वे मानव मात्र की सेवा में जुटे रहे। इस बीच मन में मानव की नहीं जीव तथ पूरे संसार की सेवा की भावनाएं ह्रदय में बलवती होने लगी। मानव सेवा के साथ ईश्वर सेवा ने चक्रेश को आध्यात्मिकता की तरफ उन्मुख किया। उम्र बढने के साथ परमात्मा से आसक्ति अधिक होने लगी। धीरे-धीरे वैरागय का भाव भी मन में हिचाकेले लेने लगा। परमात्मा के प्रति अगाध आस्था उसे 1 फ़रवरी 1998 को बिजोलया ले गई। वहाँ पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज ससंघ विराजमान थे। वहाँ पर आर्यिका श्री वर्धित मति माताजी की प्रेरणा से 10 फ़रवरी को 3 वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत आचार्य श्री से लिया। वहाँ पर पंचकल्याणक भी चल रहा था। यह दिन था तप कल्याणक का। यहीं से चक्रेश ने आध्यात्म की सीढियों पर कदम रखना शुरू किया। उसके बाद 1998 मे अजमेर में आर्यिका श्री वर्धितमति माताजी की प्रेरणा से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। आचार्य महाराज ने चक्रेश की आध्यात्म रूचि देखकर उसे संघस्थ आर्यिका श्री वर्धित माति माताजी को चक्रेश की धार्मिक शिक्षा की जिम्मेदारी सौंप दी। संघ में रहकर सेवा, अध्ययन करने लगा। इसके बाद चक्रश आध्यात्म जगत में रम गए। यहां सपर्मण के साथ उनके ज्ञान व सेवा-भाव में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही। अपनी प्रतिभा व प्रवृत्तियों से चक्रश कुछ ही दिनों में समाज, विद्वानों और आचार्यगणों में वाल्सल्य के पात्र बन गए। लेखन में निपुण होने के कारण आचार्यों ने धर्म के प्रचार-प्रसार का दायित्व चक्रेश को सौंप दिया। यहां से एक नया सफर शुरू हुआ। धर्म के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने कई जगहों की यात्रा कर अनेकों अनुभव लिए। अनुभव व नित नए आध्यात्मिक ज्ञान के आदान-प्रदान ने चक्रेश की ख्याति को बढाया। चार वर्ष तक आचार्य वर्धमानसागर महाराज जी की पावन निश्रा में रहने के बाद उनकी आज्ञा से वे भट्टारक श्री चारूकीर्ति स्वामीजी के पास गए। स्वामीजी के निर्देशन में चक्रेश ने 16 नवम्बर वर्ष 2006 में आध्यात्मिक मासिक पत्रिका श्रीफल के संपादन का कार्य शुरू किया। पत्रिका के माध्यम से धर्म को नई उंचाईयां मिली। दूर - दूर से संत - महात्माओं के उपदेश लोगों तक पहुंचने लगे। थोडे ही समय में पत्रिका की लोकप्रियता बढती गई। इस सबके बाबजूद चक्रेश के मन में कुछ नया करने की तमन्ना उन्हें उद्वेलित करती रहती थी। पूर्व में तय किए अपने लक्ष्य को लेकर वह चिंतित रहते थे। ...और ले ली क्षुल्लक दीक्षा इसी बीच एक दिन चक्रेश के मन में दीक्षा का भाव जागृत हो गया व उन्होंने दीक्षा लेने का मानस बना लिया। मन में गुरू के आशीर्वाद को लेकर संशय था। लेकिन, कहते हैं कि सृष्टि के उद्धारक को कोई रोक नहीं सकता। चक्रेश धर्म की खोज में राजस्थान के डूंगरपुर जिले मे आंतरी गांव में चल रहे आचार्य अभिनन्दन सागर जी महाराज जी के भव्य कार्यक्रम के एक दिन बाद 19 अप्रैल को जा पहुंचे। बस फिर क्या था जीव से जीव मिल और गुरू से शिष्य। चक्रेश ने आचार्य श्री अभिनन्दन सागर जी महाराज से दीक्षा के लिए निवेदन किया। उन्होंने 23 अप्रैल 2008 को डेंचा में क्षुल्लक दीक्षा दे दी। आचार्य ने चक्रेश के अतुल्य साहस को देख उनका नाम अतुल्यसागर रख दिया। उस दिन से चक्रेश क्षुल्लक श्री 105 अतुल्य सागर महाराज के नाम से पहचाने जाने लगे। आचार्य अभिनन्दन सागर जी महाराज के सान्निध्य में अतुल्य सागर परहित में लगे हुए हैं। अतुल्य सागर का पावन सान्निध्य चातुर्मास के दौरान डूंगरपुर नगरवासियों को मिला। यहां धर्म की अविरल रसधारा में धर्मावलंबीयों ने गोते लगाएं। मात्र 72 घंटे मे ंदीक्षा का श्रीफल, घर त्याग, बिनौई, श्रीफल परिवार भार और किसी को देना, दीक्षा निमित्त विधान, 24 घण्टे की यात्रा, उसके बाद दीक्षा लेना यह सब का साहस करना इतना आसान नहीं था पर चक्रेश ने कर दिखाया। डूँगरपुर चातुर्मास के बाद विहार कर जयपुर, दिल्ली, कलकत्ता, शिखरजी, गुवहाटी, सिलचर, विहार कर के वागड में डूँगरपुर, आंतरी, ओबरी, सागवाडा, सागवाडा कालोनी, में विहार कर धर्म व आध्यात्म का प्रचार प्रसार किया।