Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

दीन-ए-इलाही

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

right|200px|thumb|फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा, जिसके अंदर सीकरी में ही दीनेइलाही की स्थापना हुई दीन-ए-इलाही 1582 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर द्वारा एक समरूप धर्म था, जिसमें सभी धर्मों के मूल तत्वों को डाला, इसमे प्रमुखता हिंदू एवं इस्लाम धर्म थे। इनके अलावा पारसी, जैन एवं ईसाई धर्म के मूल विचारों को भी सम्मलित किया। हाँलाँकि इस धर्म के प्रचार के लिए उसने ज्यादा कुछ नही किया केवल अपने विश्वस्त लोगों को ही इसमें सम्मलित किया। कहा जाता हैं कि अकबर के अलावा केवल राजा बीरबल ही मृत्यु तक इस के अनुयायी थे। दबेस्तान-ए-मजहब के अनुसार अकबर के पश्चात केवल १९ लोगों ने इस धर्म को अपनायाhttp://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi दीन-ऐ-इलाही ब्रितानिका ज्ञानकोश 16 फ़रवरी 2009 https://web.archive.org/web/20080514090902/http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi 14 मई 2008 live कालांतर में अकबर ने एक नए पंचांग की रचना की जिसमें की उसने एक ईश्वरीय संवत को आरम्भ किया जो अकबर की राज्याभिषेक के दिन से प्रारम्भ होत था। उसने तत्कालीन सिक्कों के पीछे अल्लाहु-अकबर लिखवाया जो अनेकार्थी शब्द है। अकबर का शाब्दिक अर्थ है "महान" और "सबसे बड़ा"। अल्लाहु-अकबर शब्द के अर्थ है "अल्लाह (ईश्वर) महान हैं " या "अल्लाह (ईश्वर) सबसे बड़ा हैं"।http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html महान इस्लामिक साम्राज्यों का उदय (मुग़ल साम्राज्य : अकबर) 16 फ़रवरी 2009 https://web.archive.org/web/20090407041624/http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html 7 अप्रैल 2009 dead दीन-ऐ-इलाही सही मायनों में धर्म न होकर एक आचार सहिंता समान था। इसमें भोग, घमंड, निंदा करना या दोष लगाना वर्जित थे एवं इन्हें पाप कहा गया। दया, विचारशीलता और संयम इसके आधार स्तम्भ थे। धर्म की ओर झुकाव right|thumb|200px|अकबर धार्मिक चर्चा करते हुए। अकबर प्रसिद्ध तीर्थ, कुरुक्षेत्र पहुँचा। वहाँ सूर्यग्रहण पर आज भी बड़ा मेला होता है। लोग स्नान करते हैं। उस समय, कुछ साधु-वैरागी भी कुरुक्षेत्र के कुंड में स्नान करने आए थे, परंतु उनमें यह विवाद था कि कौन दल पहले स्नान करे। आज भी पहले स्नान करने पर झगड़ा होता है। अतएव जब यह विवाद तय न हो सका तो दोनों दलों ने बादशाह से फ़रियाद की। दोनों के ही अपने-अपने दावे थे, पर बादशाह को कोई भी निश्चित प्रमाण न मिल सके। जान पड़ता है, युवक अकबर को कुछ मसखरी सूझी। उसने कहा- दोनों आपस में लड़ लें, जिस दल की जीत हो जाए वही पहले स्नान करे। इस पर एक दल ने फ़रियाद की कि विपक्षियों के दल में अधिक व्यक्ति हैं। विनोदी अकबर ने कहा कि ठीक है, जिसके पास कम आदमी हों, वह उतने ही शाही सैनिक ले ले। फिर क्या था, किसी ने किसी की दाढ़ी पकड़ी, किसी ने किसी की जटा। इस घमासान का बड़ा मज़ेदार चित्रण अकबर-नामे की शाही प्रति में हुआ। अकबर के साथ गए चित्रकारों ने घटना का चित्र बनाया है। चित्र को देखने से ज्ञात होता है कि दूर पर खड़ा घुड़सवार अकबर भी इस तमाशे का मज़ा ले रहा था। अकबर और जैन मुनि अकबर के दरबार में जैन भी थे, यह बदायूँनी और अबुल फजल दोनों ही कहते हैं। दो प्रमुख जैन मुनि हीर विजयजी तथा उनके शिष्य विजयसेन सूरी उसके दरबार में आए। ये दोनों श्वेतांबर जैन थे। इनमें हीर विजयजी सूरी को तो 1584 ई. में अकबर का फ़रमान प्राप्त हुआ किपर्युषण पर्व में जीव हिंसा न हो। लोग जैनों के सम्मुख हिंसा न करें और मांस न खाएँ। हीर विजयजी के प्रति अकबर की बड़ी श्रद्धा रही होगी। अबुल फजल ने लिखा है कि वे उच्चतम कोटि के धार्मिक व्यक्ति थे। इनके प्रभाव से अकबर को जीव हिंसा के प्रति अरुचि हुई और उसने कई ख़ास तिथियों पर अपने साम्राज्य में जीव हिंसा की मनाही कर दी। वह स्वयं मांस-भक्षण के विरुद्ध हो गया। उसने स्वयं प्रत्येक शुक्रवार शाकाहारी भोजन करने का व्रत ले लिया। सुलह-ए-कुल अकबर ने यह महसूस किया कि सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है। अतः उसने सर्वधर्म समन्वय अर्थात सब धर्मों की अच्छी बातें लेने का मार्ग पकड़ा। इसी को उसने 'सुलह कुल' कहा। इस तरह सब धर्मों की अच्छी बातों को लेकर उसने दीन-ए-इलाही चलाया। इसमें इस्लाम का एकेश्वरवादथा, तो पारसी धर्म के अनुसार सूर्य और अग्नि उस ईश्वर के प्रकाश और तेज के रूप में पूजनीय थे। हिन्दू और जैन धर्मों के अहिंसावाद की इस धर्म पर गहरी छाप थी। यह तर्क दिया गया है कि दीन-ए-इलैही का एक नया धर्म होने का सिद्धांत गलत धारणा है, जो कि बाद में ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा अबुल फजल के कार्यों के गलत अनुवाद के कारण पैदा हुआ था। हालांकि, यह भी स्वीकार किया जाता है कि सुलह-ए-कुल की नीति,https://scroll.in/article/855307/why-do-indians-celebrate-rulers-like-tipu-and-shivaji-but-not-the-greatest-of-them-all-akbar Tipu Jayanti debate: Akbar is the hero India should really celebrate 2 दिसंबर 2017 https://web.archive.org/web/20181231111755/https://scroll.in/article/855307/why-do-indians-celebrate-rulers-like-tipu-and-shivaji-but-not-the-greatest-of-them-all-akbar 31 दिसंबर 2018 dead जिसमें दीन-ई-इलैही का सार था, अकबर ने केवल धार्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं बल्कि सामान्य शाही प्रशासनिक नीति का एक भाग के रूप में अपनाया था। इसने अकबर की धार्मिक सहानुभूति की नीति का आधार बनाया। 1605 में अकबर की मौत के समय उनके मुस्लिम विषयों में असंतोष का कोई संकेत नहीं था, और अब्दुल हक जैसे एक धर्मशास्त्री की धारणा थी कि निकट संबंध बने रहे। धार्मिक एकता की ओर झुकाव सम्राट होने के नाते अकबर धार्मिक तत्वों की तह में जाना अपना कर्तव्य समझता। एक बार वह फतेहपुर सीकरी में प्रातःकाल एकांत में शिला पर बैठा तो उसके मन में यह भावना आई कि अपनी प्रजा में भेदभाव नहीं रखना चाहिए। इनके वाद-विवाद इतने उग्र होने लगे कि बादशाह के सामने भी वे दरबारी तहजीब का ध्यान न रखते। इस सबसे अकबर के मन में सच्चाई की खोज की प्रवृत्ति और अधिक बढ़ी। अकबर-नामा में अबुल फजल लिखता है कि इसके बाद दरबार में सभी धर्मों और संप्रदायों के विद्वान भर गए। सभी की धार्मिक मान्यताओं पर विचार होता। यदि उनमें कोई कमजोरी होती तो उसे प्रकट किया जाता। धार्मिक सहिष्णुता बरती जाती, इससे उलटी बुद्धि वाले और दुष्टों को जलन होती। कट्टरपंथियों का विरोध अकबर जब आंतरिक झगड़ों से मुक्त हुआ तो उसका धर्म-सुधार की ओर ध्यान गया। उसने एक नए धर्म की स्थापना की। इसमें उसने पवित्र कुरान, ब्राह्मणों के धर्मशास्त्र और ईसा मसीह के उपदेशों का समन्वय किया। इस हेतु उसने एक सभा की। इसमें सभी धर्मों के आचार्यों को बुलाया, साथ ही अपने मनसबदारों को भी बुलाया। ध्यान देने की बात है कि सभी धर्मों के कट्टरपंथी अनुयायियों ने अकबर के उदारतापूर्ण दृष्टिकोण का विरोध किया। इस पर अकबर ने कहा- 'किसी भी साम्राज्य के अंतर्गत यह अनुचित है कि जनता अनेक धर्मों में विभाजित हो। इससे आपस में मतभेद उत्पन्न होता है। जितने धर्म उतने ही दल हैं। उनमें आपस में शत्रुता होती है अतएव सभी धर्मों में समन्वय अपेक्षित है। परंतु इसे ऐसे ढंग से करना चाहिए कि एक होते हुए भी उनकी विशेषता बनी रहे। इससे सभी धर्मों की अच्छाइयाँ बनी रहेंगी और दूसरे धर्मों की विशेषताएँ भी आ जाएँगी। इससे ईश्वर क प्रति आदर बढ़ेगा, लोगों में शांति होगी और साम्राज्य की सुरक्षा भी बढ़ेगी।' जज़िया बंद यूरोपीय यात्रियों का कथन है कि अकबर की आँखें इस प्रकार दपती रहतीं मानो सागर पर सूर्य झिलमिला रहा हो। उसकी आवाज ऊँची थी, उसमें एक अनुगूँज होती थी। कोई भी उसे देखता तो जान जाता कि यही बादशाह है। जहाँगीर का कथन है कि लोग उसमें साक्षात ईश्वर का तेज पाते थे। वह अट्टहास करता था और उस समय उसका चेहरा हँसी के मारे थोड़ा विकृत हो जाता। उसे क्रोध बहुत ही कम आता। वह अत्यंत धीर था। यूरोपीय यात्री हैरान थे कि उसके मन की बात चेहरे के भाव से प्रकट ही न होती, पर क्रोध में उसकी आकृति असह्य हो जाती थी। उसके मूँछ के बाल खड़े हो जाते। संयोगवश अकबर शिकार खेलने मथुरा गया था। वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि मथुरा आने पर हिन्दुओं को कर देना पड़ता है। उसने यात्री कर उठा दिया। अकबर ने कहा- यह कहाँ का न्याय है कि ईश्वर की आराधना पर कर लिया जाए! अगले ही वर्ष, अपने राज्याभिषेक की नौवीं वर्षगाँठ पर उसने मुस्लिम कानून के अनुसार गैर-मुस्लिमों पर लगने वाले कर- जजिया को भी उठा लिया। यह एक अनोखी घटना थी। फिर तो दोनों पीढ़ियों तक जजिया कर नहीं लगा- औरंगजेब ने 1679 में जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जजिया कर पुनः लगाया। जजिया से प्रतिवर्ष साम्राज्य को लाखों की आय होती। फिर भी अकबर ने इसे अनुचित माना। देखें हिन्दू धर्मइस्लाम सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ दीन-ए-इलाही के मुख्य सिद्धांत श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:पाकिस्तान का इतिहास श्रेणी:मुग़ल साम्राज्य श्रेणी:भारत के धर्म श्रेणी:अकबर