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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

संपूर्णानन्द

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डॉ॰ संपूर्णानन्द Sampurnanand.jpg डॉ॰ संपूर्णानंद]] 200px डॉ॰ संपूर्णानंद 1 जनवरी, 1891 वाराणसी वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत 10 जनवरी, 1969 वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत अध्यापक, लेखक, साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता भारतीय राजस्‍थान के राज्‍यपाल 16 अप्रैल 1962 16 अप्रैल 1967 गुरुमुख निहाल सिंह सरदार हुकम सिंह 2nd उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री 28 दिसम्बर 1954 7 दिसम्बर 1960 गोविन्द बल्लभ पन्त चन्द्र भानु गुप्ता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में विशेष योगदान दिया। डॉ॰ संपूर्णानन्द (1 जनवरी 1890 - 10 जनवरी 1969) कुशल तथा निर्भीक राजनेता एवं सर्वतोमुखी प्रतिभावाले साहित्यकार एवं अध्यापक थे। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वे सदा हिन्दी के पक्षधर रहे। उन्हें हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए 'समाजवाद' पुस्तक पर 'मंगलाप्रसाद पुरस्कार' भी मिला। 1940 में वे 'अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन' के सभापति निर्वाचित हुए। लम्बे समय तक वे 'नागरी प्रचारिणी सभा' के भी अध्यक्ष और फिर संरक्षक रहे। जीवनी संपूर्णानन्द का जन्म वाराणासी में 1 जनवरी सन् 1890 को एक कायस्थ परिवार में हुआ। वहीं के क्वींस कालेज से बी.एस.सी. की परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रयाग चले गए और वहाँ से एल.टी. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद आप प्रेम महाविद्यालय (वृंदावन) तथा बाद में डूंगर कालेज (बीकानेर) में प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्त हुए। देश की पुकार पर आपने यह नौकरी छोड़ दी और फिर काशी के सुख्यात देशभक्त (स्वर्गीय) बाबू शिवप्रसाद गुप्त के आमंत्रण पर ज्ञानमंडल संस्था में काम करने लगे। यहीं रहकर आपने "अंतर्राष्ट्रीय विधान" लिखी और "मर्यादा" का संपादनभार भी संभाल लिया। इसके बाद जब इस संस्था से "टुडे" नामक अंग्रेजी दैनिक भी निकालने का निश्चय किया गया तो इसका संपादन भी आपको ही सौंपा गया जिसे आपने बड़ी योग्यता के साथ संपन्न किया। thumb|200px|सम्पूर्णानन्द और जवाहरलाल नेहरू, (अप्रैल १९३६) श्री संपूर्णानंद में शुरू से ही राष्ट्रसेवा की लगन थी और आप महात्मा गांधी द्वारा संचालित स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने को आतुर रहते थे। इसी से सरकारी विद्यालयों का बहिष्कार कर आए हुए विद्यार्थियों को राष्ट्रीय शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से स्थापित काशी विद्यापीठ में सेवाकार्य के लिए जब आपको आमंत्रित किया गया तो आपने सहर्ष उसे स्वीकार कर लिया। वहाँ अध्यापन कार्य करते हुए आपने कई बार सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए। सन् 1926 में आप प्रथम बार कांग्रेस की ओर से खड़े होकर विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। सन् 1937 में कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थापना होने पर शिक्षामंत्री प्यारेलाल शर्मा के त्यागपत्र दे देने पर आप उत्तर प्रदेश के शिक्षामंत्री बने और अपनी अद्भुत कार्यक्षमता एवं कुशलता का परिचय दिया। आपने गृह, अर्थ तथा सूचना विभाग के मंत्री के रूप में भी कार्य किया। सन् 1955 में श्री गोविंदवल्लभ पंत के केंद्रीय मंत्रिमंडल में सम्मिलित हो जाने के बाद दो बार आप उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री नियुक्त हुए। सन् 1962 में आप राजस्थान के राज्यपाल बनाए गए जहाँ से सन् 1967 में आपने अवकाश ग्रहण किया। श्री सम्पूर्णानंद भारतीय संस्कृति एवं भारतीयता के अनन्य समर्थक थे। योग और दर्शन उनके प्रिय विषय थे। वे नियमित रूप से पूजापाठ और संध्या करते थे तथा माथे पर तिलक लगाते थे। राजनीति में वे समाजवाद के अनुयायी थे किंतु उनका समाजवाद उसके विदेशी प्रतिरूप से भिन्न भारत की परिस्थितियों एवं भारतीय विचारपरंपरा के अनुरूप था। हिंदी तथा संस्कृत से उन्हें विशेष प्रेम था पर वे अंग्रेजी के अतिरिक्त उर्दू, फारसी के भी अच्छे ज्ञाता तथा भौतिकी, ज्योतिष और दर्शन शास्त्र के भी पंडित थे। विभिन्न विषयों की प्रभूत पुस्तकें वे निरंतर पढ़ते रहते थे और अपनी मानस मंजूषा में जिन अमूल्य ज्ञानरत्नों का संग्रह किया करते थे, लोकहित के लिए उनके द्वारा उनका दान और उत्सर्ग भी होता रहता था। हिंदी में वैज्ञानिक उपन्यास उन्होंने ही सर्वप्रथम लिखा। इस प्रकार उन्होंने अध्ययन, मनन से जो कुछ भी इकट्ठा किया उसका बहुलांश "आदानं हि विसगार्थ सतां वारिमुचामिव" इस उक्ति के अनुसार अपनी प्रौढ़ लेखनी द्वारा जनता में पुनः वितरित कर दिया। आपकी कुछ प्रमुख हिंदी रचनाएँ ये हैं : अंताराष्ट्रिय विधान, समाजवाद, चिद्विलास, गणेश, ज्योतिर्विनोद, कुछ स्मृतियाँ, कुछ स्फुट विचार, हिंदू देव परिवार का विकास, ग्रहनक्षत्र। इनके अतिरिक्त सामयिक पत्रों में आपने जो बहुसंख्यक लेख लिखे वे भी हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इनके कुछ संग्रह प्रकाशित भी हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में उन्मुक्त कारागार का अद्भुत प्रयोग आपने प्रारंभ किया जो यथेष्ट रूप से सफल हुआ। नैनीताल में वेधशाला स्थापित कराने का श्रेय भी आपको ही है। वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय और उत्तर प्रदेश सरकर द्वारा संचालित हिंद समिति की स्थापना में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये दोनों संस्थाएँ आपकी उत्कृष्ट संस्कृतनिष्ठा एवं हिंद प्रेम के अद्वितीय स्मारक हैं। कला के क्षेत्र में लखनऊ के मैरिस म्यूजिक कॉलेज को आपने विश्वविद्यालय स्तर का बना दिया। कलाकारों और साहित्यकारों को शासकीय अनुदान देने का आरंभ देश में प्रथम बार आपने ही किया। वृद्धावस्था की पेंशन भी आपने आरंभ की। आपको देश के अनेक विश्वविद्यालयों ने "डॉक्टर" की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया था। हिंदी साहित्य सम्मेलन की सर्वोच्च उपाधि "साहित्यवाचस्पति" भी आपको मिली थी तथा हिंदी साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार "मंगलाप्रसाद पुरस्कार" भी आप प्राप्त कर चुके थे। आपका निधन 10 जनवरी 1969 को वाराणसी में हुआ। कृतियाँ समाजवाद आर्यों का आदि देश चिद्विलास गणेश जीवन और दर्शन अंतरराष्ट्रीय विधान पुरुष सूक्त व्रात्य कांड पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल भारतीय सृष्टि क्रम विचार हिंदू देव परिवार का विकास वेदार्थ प्रवेशिका चीन की राज्यक्रांति भाषा की शक्ति तथा अन्य निबंध अंतरिक्ष यात्रा स्फुट विचार ब्राम्हण सावधान ज्योतिर्विनोद अधूरी क्रांति भारत के देशी राज्य, आदि इन्हें भी देखें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भारत के राज्यो के मुख्यमंत्रियों की सूची राजस्‍थान के राज्‍यपाल बाहरी कड़ियाँ सम्पूर्णानन्द डा0 सम्पूर्णानन्द जी का शिक्षा दर्शन तथा भारतीय सन्दर्भ में उसकी उपयोगिता https://web.archive.org/web/20080313065141/http://www.library.utoronto.ca/mediacommons/microtext/collection/pages/sampurnd.html https://web.archive.org/web/20070929095652/http://www.ncra.tifr.res.in/~basi/06March/0634065.PDF https://web.archive.org/web/20070417230735/http://infochangeindia.org/HumanIstory.jsp?recordno=2861&section_idv=13 https://web.archive.org/web/20110608082440/http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/202904.cms श्रेणी:1891 में जन्मे लोग श्रेणी:१९६९ में निधन श्रेणी:उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्रेणी:राजस्थान के राज्यपाल श्रेणी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ