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अलखिया सम्प्रदाय
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सितंबर 2018
अलखिया सम्प्रदाय (लालगिरी महाराज) *सुुल्खनिया* चूरू -
लालदास जी 12 वर्षो तक बीकानेर दुर्ग के सामने रहे जिसकी याद में आज भी दुर्ग के सामने लाल पत्थर लगा हुआ है।
मध्यकालीन भारत का एक जैन नागा संप्रदाय है। इसे जैन महायान शाखा का एक अवशिष्ट संप्रदाय माना जाता है। इस संप्रदाय के साधु उड़ीसा तथा उत्तरी भारत के अनेक भागों में मिलते थे। महायान शाखा के जैन के समान इस संप्रदाय में भी अन्तःकरण के पाँच भेद मन, बुद्धि, विवेक, हेतु और चैतन्य- माने जाते थे और पंच परमेष्ठी का ध्यान करते है
प्रमुख सिद्धांत
इस सम्प्रदाय के सिद्धांत 'विष्णुगर्भपुराण' नामक ग्रन्थ में उल्लिखित हैं। यह ग्रंथ उड़िया भाषा में है। प्रो. आर्तवल्लभ महन्ती ने इसका संपादन करते हुए इसे 1550 ई. के पहले रचित बताया है। इस पुस्तक में वर्णित सिद्धांत इस प्रकार हैं।
विश्व के चारों ओर 'अलख' का ही प्रकाश हो रहा है। अलख ही विष्णु है जिससे निराकार की उत्पत्ति हुई। सारी सृष्टि अलख के गर्भ में रहती है। अलख अज्ञेय है। चारों वेद उसके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते। अलख से प्रादुर्भूत निराकार तुरीयावस्था में रहता है और उसी दशा में उससे ज्योति की उत्पत्ति होती है। ओमप्रकाश सिंह (संपादक)- रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली, खंड-१, पृष्ठ ३४9 ि सृष्टि की उत्पत्ति का यह रूप महायानियों से मिलता है।
इन्हें भी देखें
संदर्भ सूची
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