Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

मुनि जिनविजय

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

मुनि जिनविजय (१८८८-१९७६) भारत के एक रावणा राजपूत प्राच्यविद्याविद्, पुरातत्त्वविद्, भरतविद् थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक अमूल्य ग्रंथों का अध्ययन, संपादन तथा प्रकाशन किया। उन्होंने साहित्य तथा संस्कृति के प्रोत्साहन हेतु कई शोध संस्थानों का संस्थापन तथा संचालन किया। भारत सरकार ने आपको पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित किया। मुनि जिनविजय के अनुसन्धान से हिन्दी भाषा और साहित्य को अपने पाँवों पर खड़े होने की भूमि मिली। उनके काम से भारतीय राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के कई नए पहलू उजागर हुए। उनके अनुसंधान का क्षेत्र प्राचीन साहित्य था।उनके कार्य का अधिकांश जैन धर्म और प्राकृत-अपभ्रंश से संबंधित था। मुनि जिनविजय द्वारा अन्वेषित और सम्पादित बहुत सारा साहित्य जैनेतर भी था। आगे चलकर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मुनि जिनविजय की अन्वेषित और संपादित जैन और जैनेतर कुछ रचनाओं के हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान की पहचान की। हिन्दी! मुनि जिनविजय को जानना ज़रूरी है। भारतीय पुरातत्व डांडेकर आर एस पापुलर प्रिंटस 1971 जयपुर 01 मुनिजी के पूर्वजो ने 1857 ई के स्वात्र्युद्ध के समय अजमेर मेरवाङा जिले में अंग्रेजों के विरुद्ध आचरण किया। अतः प्रतिशोध के रूप में अंग्रेजी सरकार द्वारा इनकी जमीन, जायदाद, जागीर जब्त कर ली ग्ई और इनके परिवार के अनेक लोगों को मार भी डाला गया। इनके दादा अपनें दो पुत्रों इन्दरसिह और विरदीसिह के साथ किसी तरह बच निकले और उन्होंने लगभग सारी जिन्दगी अज्ञातवास में इधर-उधर घूमते फिरते ही व्यतीत की। वे भटकते भटकते रूपाहेली पहुंचे वहां के ठाकुर से सहानुभूति प्राप्त करके वहां अपने पुत्रो को रख गए। वृद्धिसिह सिरोही राज्य में जंगलात विभाग के अधिकारी बनें। वहीं उनका विवाह हुआ। तत्पश्चात वे रूपाहेली लौट आये। ।आरंभिक जीवन आपका जन्म भीलवाड़ा जिले (राजस्थान) के रूपाहेली नामक ग्राम में हुआ था। पिता बृद्धिसिंघ ने आपका नाम किसनसिंह रखा थाhttp://books.google.com/books?id=kUz9o-EKTpwC&pg=PA110&lpg=PA110&dq=%27muni+jinavijaya%27&source=bl&ots=SVANv4CQkt&sig=yV1TkT-_jnTIK7pEd_BbDxy3Ca0&hl=en&sa=X&ei=IUhwUrqIMOrViwLi1YBI&ved=0CEAQ6AEwBw#v=onepage&q=%27muni%20jinavijaya%27&f=false वैली, क्रिस्टी (२००४) दी ए टू ज़ी ऑफ़ जैनिज़्म पृष्ठ ११० प्रकाशक: स्केरक्रो प्रेस आई॰ एस॰ बी॰ एन॰ ९७८-०-८१०८-६८२१-२ 2 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20140101200642/http://books.google.com/books?id=kUz9o-EKTpwC&pg=PA110&lpg=PA110&dq=%27muni+jinavijaya%27&source=bl&ots=SVANv4CQkt&sig=yV1TkT-_jnTIK7pEd_BbDxy3Ca0&hl=en&sa=X&ei=IUhwUrqIMOrViwLi1YBI&ved=0CEAQ6AEwBw#v=onepage&q=%27muni%20jinavijaya%27&f=false 1 जनवरी 2014 live । १८९९ में पिता की मृत्यु के पश्चात आप स्थानकवासी साधुओं के साथ निवास करने लगे। १९०३ में आपने साधु वेश धारण किया परन्तु ज्ञान विकास अभाव के कारण आपने आपने सात वर्ष पश्चात यतिवेश त्याग दिया। १९१० में आपने श्वेताम्बर मूर्तिपूजक सम्प्रदाय से दीक्षा ग्रहण की और आपका नाम जिनविजय रखा गयादलसुख मालवाणिया (१९७१) जिनविजय मुनि अभिनन्दन ग्रन्थ, प्रकाशक: श्री मुनि जिनविजय सम्मान समिति, जयपुर पृष्ठ १-५http://www.apnimaati.com/2012/10/blog-post_353.html अपनी माटी (अक्टूबर २०१०) नटवर त्रिपाठी-जीवनी:पीछे मुड़कर देखा तो मुनि जिनविजय याद आये 2 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20131104062446/http://www.apnimaati.com/2012/10/blog-post_353.html 4 नवंबर 2013 dead । मेहसाना तथा पुणे निवास मेहसाना में मुनिजी का आचार्य कान्तिविजय तथा उनको शिष्यों चतुर्विजय और पुण्यविजय से संपर्क हुआ। मुनिजी ने आचार्य कान्तिविजय इतिहासमाला का आरम्भ किया जिसमे कई गाढ़ ग्रंथों का प्रकाशन हुआवैली, क्रिस्टी । इसी समय मुनिजी का पुणे निविष्ट भांडारकर प्राच्य शोध संस्थान के संस्थापकों से परिचय हुआ। पुणे जाकर मुनिजी प्राच्यविद्या प्रतिष्टान को देखकर अति प्रसन्न हुए। पुणे में आपने जैन साहित्य संशोदक नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यहीं पर आपका लोकमान्य तिलक, रामकृष्ण भांडारकर तथा महात्मा गांधी से सम्पर्क हुआ। मुनिजी लोकमान्य तिलक की विचारधारा से बड़े प्रभावित हुए, १९२० में गांधीजी के निमंत्रण के कारण आप बम्बई (वर्त्तमान मुम्बई) गए। राष्ट्रीय (गुजरात) विद्यापीठ गांधीजी से पुनः संपर्क स्थापित करने के पश्चात आपने महात्माजी के साथ अहमदाबाद के लिए प्रस्थान किया। अहमदाबाद में गांधीजी से निवेदन करके आप गुजरात विद्यापीठ के सदस्य बने तथा साधु वेश को त्याग दिया। गुजरात विद्यापीठ में मुनिजी ने गुजरात पुरातत्व मंदिर की स्थापना की तथा पुरातत्व मंदिर ग्रंथावली का प्रकाशन प्रारम्भ किया। विद्यापीठ में मुनिजी का जर्मनी से आए हुए कुछ विद्वानों से संपर्क हुआ। विद्वानों के निमंत्रण स्वीकार करके मुनिजी ने जर्मनी के लिए प्रस्थान किया। जर्मनी में मुनिजी का बॉन, हैम्बर्ग तथा लैपज़िग विश्वविद्यालयों के प्राच्यविद्या विद्वानों से परिचय हुआ। लाहौर कांग्रेस अधिवेशन तथा दांडी यात्रा जर्मनी से १९२९ दिसम्बर में लौटकर मुनिजी ने कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में भाग लिया। लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव स्वीकृत किया गया। १९३० में मुनिजी बहादुर सिंह सिंघी के निमंत्रण पर कलकत्ता (वर्त्तमान कोलकाता) गए और वहाँ से शांतिनिकेतन गए। शांतिनिकेतन से लौटकर श्री सिंघी के निवेदन अनुसार सिंघी जैन विद्यापीठ तथा सिंघी जैन ग्रंथमाला की योजना बनायीं। मार्च १९३० में मुनिजी ने गांधीजी के दांडी कूच नमक सत्याग्रह में भाग लिया और नासिक जेल में भेजे गए। नासिक जेल में मुनिजी का कन्हैयालाल मुंशी से संपर्क हुआ। जेल से छुटकर मुन्शीजी की प्रेरणा से मुनिजी दिसंबर १९३० में शांतिनिकेतन गए और सिंघी जैन विद्यापीठ तथा सिंघी जैन ग्रंथमाला का कार्य प्रारम्भ किया। ग्रन्थमाला का प्रथम प्रबंध चिंतामणि प्रकाशित किया गयाजिनविजय मुनि अभिनन्दन ग्रन्थ पृष्ठ १०-११। भारतीय विद्या भवन की स्थापना भारतीय विद्या भवन १९३८ में मुनिजी ने कन्हैयालाल मुंशी के आग्रह पर भारतीय विद्या भवन की योजना बनाई तथा इसके संचालन कार्य में संलग्न हो गए। सिंघी जैन ग्रंथमाला का सम्पादन कार्य निर्विघ्न रूप से मुनिजी के निर्देशन में ही रहा। आपके मार्गदर्शन में कई अध्येताओं ने पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त कीनटवर त्रिपाठी-जीवनी। सर्वोदय साधना आश्रम भारत की स्वतंत्रता के पश्चात बढ़ती हुई खाद्य समस्या से मुनिजी में स्वावलंबन की धारणा उत्पन्न हुई। इसी लक्ष्य से आपने १९५० में चित्तौड़गढ़ के समीप चंदेरिया ग्राम में ज़मीन लेकर आश्रम स्थापित किया। मुनिजी ने इस भूखंड में खेती बाड़ी प्रारम्भ कर दी। विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन का जब चंदेरिया में आगमन हुआ तो मुनिजी ने अपनी भूमि विनोबाजी को समर्पित कर दी।जिनविजय मुनि अभिनन्दन ग्रन्थ पृष्ठ १२-१३ राजस्थान पुरातत्व मंदिर १९५० में ही राजस्थान के प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों के संग्रह तथा प्रकाशन हेतु राजस्थान पुरातत्व मंदिर (राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान) की स्थापना की गयी। मुनिजी को इस संस्था का सम्मान्य (ऑनरेरी) निर्देशक नियुक्त किया गया। प्रतिष्टान में मुनिजी ने हज़ारों प्राचीन ग्रंथों का संग्रह किया तथा अनेक ग्रंथों का संपादन और प्रकाशन किया। १९६७ में आपने संस्था निर्देशक का पद त्याग दिया। हरिभद्र सूरि स्मृति तथा भामाशाह भारती भवन चित्तौड़ दुर्ग के सम्मुख मुनिजी ने सुप्रसिद्ध जैनाचार्य हरिभद्र सूरि स्मारक मंदिर की स्थापना की। मंदिर की समीप भामाशाह की स्मृति में मुनिजी द्वारा स्थापित भामाशाह भारती भवन है। सम्पादित ग्रन्थ मुनि जिनविजय द्वारा सम्पादित ग्रंथों की सूची विशाल है। सिंघी जैन ग्रंथमाला के कुछ प्रकाशन हैं: जैन पुस्तक प्रशस्ति संग्रह, पुरातन प्रबंध संग्रह, प्रबंध चितामणि, विविध तीर्थ कल्प (जिनप्रभ सूरि कृत), कुवलयमाला, धर्मोपदेशमाला, खरतरगच्छपट्टावलि (जिनपाल कृत) तथा खरतरगच्छबृहदगुर्वावलि। १९३५ में डॉ॰ दशरथ शर्मा ने पट्टावलियों के ऐतिहासिक महत्व का विवेचन किया थाश्रीवास्तव, विजय शंकर (१९८१)कल्चरल कोंटूर्स ऑफ़ इंडिया पृष्ट ३६, प्रकाशक: अभिनव प्रकाशन दिल्ली ISBN ९७८-०-३९१-०२३५८-१। जिनविजय मुनि अभिनन्दन ग्रन्थ के अनुसार मुनिजी ने राजस्थान पुरातत्व मंदिर के निर्देशक रूप में ८६ ग्रन्थ प्रकाशित किये थे। मुनिजी ने स्वयं जिन ग्रंथों का संपादन किया उनकी सूची निम्नलिखित हैजिनविजय मुनि अभिनन्दन ग्रन्थ पृष्ठ २१: त्रिपुराभारतीलघुस्तव (लघ्वाचार्य प्रणीत, सोमतिलक सूरि कृत) कर्णामृतप्रपा (सोमेश्वर भट रचित) बालशिक्षा व्याकरण (ठाकुर संग्रामसिंह विरचित) प्राकृतानन्द (रघुनाथकविकृत) उक्तिरत्नाकर (साधुसुन्दर गणी विरचित) पदार्थरत्नमंजूषा (श्रीकृष्णमिश्र प्रणीत) हम्मीर-महाकाव्य (नयचंद सूरि कृत) शकुन-प्रदीप गोरा-बादल चरित्र (कवि हेमरतन रचित) मधुमालती सचित्र कथा ए कैटलॉग ऑफ़ संस्कृत एंड प्राकृत मैनुस्क्रिप्ट्स (३ जिल्दों में) सदस्यता तथा सम्मान १९५२ में जर्मन ओरिएंटल सोसाइटी के सम्मानीय सदस्य चुने गएवैली, क्रिस्टी १९६१ में भारत सरकार ने आपको पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित किया १९६५ में राजस्थान साहित्य अकादमी ने आपको साहित्य मनीषी सम्मान प्रदान कियाhttp://rsaudr.org/history.html राजस्थान साहित्य अकादमी 2 नवंबर 2013 https://web.archive.org/web/20131028025853/http://rsaudr.org/history.html 28 अक्तूबर 2013 dead बाहरी कड़ियाँ यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो पुस्तकालय संग्रह में मुनि जिनविजय सम्पादित पुस्तकों की सूची सन्दर्भ श्रेणी:संस्कृत विद्वान श्रेणी:राजस्थान के लोग