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गढ़वाल रियासत
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गढ़वाल गढ़वाल राज्य गढ़वाल का साम्राज्य (688-1804 सीई)
टिहरी गढ़वाल की रियासत (1816-1947 सीई) गढ़वाल साम्राज्य एशिया ब्रिटिश भारत Indian subcontinent उत्तराखण्ड * चाँदपुरगढ़ी (888–1512 सीई)
देवलगढ़ (1512–1517 सीई)
श्रीनगर (1517-1804 सीई)
टिहरी (1816-1862 सीई)
प्रतापनगर (1862-1890 सीई)
कीर्तिनगर 1(890-1925 सीई)
नरेंद्रनगर (1925-1947 सीई) राजशाहीरजवाड़ा (1815–1949) 888 1949 स्वतंत्र शासक Union of India Flag of India.svg Flag of the Princely State of Tehri Garhwal.svg Tehri Garhwal zoomed in.jpg संयुक्त प्रान्त के मानचित्र पर गढ़वाल का स्थान गढ़वाली, संस्कृत 888 कनकपाल 1684–1716 (शिखर) फ़तेह शाह 1946–1949 (अंतिम) मानवेन्द्र शाह माहाराज उत्तराखण्ड, भारत * संप्रभु राज्य (688-1816 सीई)
रियासत (1816-1949 सीई) * पूर्ण राजशाही (688-1804 सीई)
अधिराज्य (1816-1949 सीई)
पँवार राजवंश (9वीं-20वीं शताब्दी सीई)
गढ़वाल राज्य (Garhwal Kingdom)Garhwal Kingdom 2022-05-31 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Garhwal_Kingdom&oldid=1090775200 Wikipedia en 2022-05-31 वर्तमान उत्तराखंड, भारत के विस्तार-क्षेत्र के पश्चिमी हिस्से वाले इलाके में पुराने समय में एक राज्य था यह 1358 ई. में स्थापित एक राजसी राज्य था जिस पर गोरखाओं द्वारा 1803 में कब्जा कर लिया गया था। एंग्लो नेपाली युद्ध और 1815 की सुगौली की संधि के बाद एक छोटे टिहरी गढ़वाल राज्य के गठन के साथ गढ़वाल राज्य को बहाल कर दिया गया, जोकि 1949 में भारत में सम्मिलित कर लिया गया।
इतिहास
परंपरागत रूप से इस क्षेत्र का केदारखंड के रूप में विभिन्न हिंदू ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। गढ़वाल राज्य क्षत्रियों का राज था। दूसरी शताब्दी ई.पू. के आसपास कुनिंदा राज्य भी विकसित हुआ। बाद में यह क्षेत्र कत्युरी राजाओं के अधीन रहा, जिन्होंने कत्युर घाटी, बैजनाथ, उत्तराखंड से कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में 6 वीं शताब्दी ई. से 11 वीं शताब्दी ई. तक राज किया, बाद में चंद राजाओं ने कुमाऊं में राज करना शुरू किया, उसी दौरान गढ़वाल कई छोटी रियासतों में बाँट गया, ह्वेनसांग, नामक चीनी यात्री, जिसने 629 ई. के आसपास क्षेत्र का दौरा किया था, ने इस क्षेत्र में ब्रह्मपुर नामक राज्य का उल्लेख किया है।
888 ई से पहले पूरा गढ़वाल क्षेत्र अलग अलग स्वतंत्र राजाओं द्वारा शासित छोटे छोटे गढ़ों में विभाजित था । जिनके शासकों को राणा , राय और ठाकुर कहा जाता था । ऐसा कहा जाता है कि 823 ई. में जब मालवा के राजकुमार कनकपाल श्री बदरीनाथ जी के दर्शन को आये। वहां उनकी भेंट तत्कालीन राजा भानुप्रताप से हुई । राजा भानुप्रताप ने राज कुमार कनक पाल से प्रभावित होकर अपनी एक मात्र पुत्री का विवाह उनके साथ तय कर दिया और अपना सारा राज्य उन्हें सौंप दिया । धीरे धीरे कनक पाल एवं उनके वंशजों ने सरे गढ़ों पर विजय प्राप्त कर साम्राज्य का विस्तार किया। इस प्रकार 1803 तक अर्थात 915 वर्षों तक समस्त गढ़वाल क्षेत्र इनके आधीन रहा।
1794-95 के दौरान गढ़वाल क्षेत्र गंभीर अकाल से ग्रस्त रहा तथा पुनः 1883 में यह क्षेत्र भयानक भूकंप से त्रस्त रहा। तब तक गोरखाओं ने इस क्षेत्र पर आक्रमण करना शुरू कर दिया था और इस क्षेत्र पर उनके प्रभाव की शुरुवात हुयी । सन 1803 में उन्होंने पुनः गढ़वाल क्षेत्र पर महाराजा प्रद्युम्न शाह के शासन काल में आक्रमण किया । महाराजा प्रद्युम्न शाह देहरादून में गौरखाओं से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए परन्तु उनके एक मात्र नाबालिग पुत्र सुदर्शन शाह को उनके विश्वासपात्र राजदरबारियों ने चालाकी से बचा लिया । इस लड़ाई के पश्चात गोरखाओं की विजय के साथ ही उनका अधिराज्य गढ़वाल क्षेत्र में स्थापित हुआ। इसके पश्चात उनका राज्य कांगड़ा तक फैला और उन्होंने यहाँ 12 वर्षों तक राज्य किया जब तक कि उन्हें महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा कांगड़ा से बाहर नहीं निकाल दिया गया । वहीँ दूसरी ओर सुदर्शन शाह ईस्ट इंडिया कम्पनी से मदद का प्रबंध करने लगे ताकि गोरखाओं से अपने राज्य को मुक्त करा सकें । ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कुमाउं, देहरादून एवं पूर्वी गढ़वाल का एक साथ ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया तथा पश्चिमी गढ़वाल को राजा सुदर्शन शाह को सौंप दिया जो टिहरी रियासत के नाम से जाना गया।
महाराजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी नगर में स्थापित की तथा इसके पश्चात उनके उत्तराधिकारियों प्रताप शाह, कीर्ति शाह तथा नरेन्द्र शाह ने अपनी राजधानी क्रमशः प्रताप नगर , कीर्ति नगर एवं नरेंद नगर में स्थापित की । इनके वंशजों ने इस क्षेत्र में 1815 से 1949 तक शासन किया। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय इस क्षेत्र के लोगों ने सक्रिय रूप से भारत की आजादी के लिए बढ़ चढ़ कर भाग लिया और अन्त में जब देश को 1947 में आजादी मिली टिहरी रियासत के निवासियों ने स्वतंत्र भारत में विलय के लिए आन्दोलन किया। इस आन्दोलन के कारण परिस्थियाँ महाराजा के वश में नहीं रहीं और उनके लिए शासन करना कठिन हो गया जिसके फलस्वरूप पंवार वंश के शासक महाराजा मानवेन्द्र शाह ने भारत सरकार की सम्प्रभुता स्वीकार कर ली। अन्ततः सन 1949 में टिहरी रियासत का भारत में विलय हो गया। इसके पश्चात टिहरी को उत्तर प्रदेश के एक नए जनपद का दर्जा दिया गया।
गढ़वाल के शासक
१८वीं शताब्दी के चित्रकार, कवि, राजनयिक और इतिहासकार मौला राम ने "गढ़राजवंश का इतिहास" लिखा है। गढ़वाल के शासकों के बारे में यही एकमात्र स्रोत है।
+शासक - गढ़वाली राजपूत (पँवार राजवंश)क्रमांकनामशासनकालक्रमांकनामशासनकालक्रमांकनामशासनकाल1कनक पाल688–699 21विक्रम पाल1116–1131 41विजय पाल1426–1437 2श्याम पाल699–725 22विचित्र पाल1131–1140 42सहज पाल1437–1473 3पाण्डु पाल725–756 23हंस पाल1141–1152 43बहादुर शाह1473–1498 4अभिजात पाल756–780 24सोम पाल1152–1159 44मान शाह1498–1518 5सौगत पाल781–800 25कादिल पाल1159–1164 45श्याम शाह1518–15276रत्ना पाल 800–849 26कामदेव पाल1172–1179 46महिपत शाह1527–1552 7शाली पाल850–857 27सुलक्षण देव1179–1197 47पृथ्वी शाह1552–1614 8विधि पाल858–877 28लखन देव1197–1220 48मेदिनी शाह1614–1660 9मदन पाल 788–894 29आनंद पाल II1220–1241 49फतेह शाह1660–1708 10भक्ति पाल895–919 30पूर्वा देव1241–126050उपेंद्र शाह1708–1709 11जयचंद पाल920–948 31अभय देव1260–1267 51प्रदीप शाह1709–1772 12पृथ्वी पाल949–971 32जयराम देव1267–1290 52ललित शाह1772–1780 13मेदिनीसेन पाल973–995 33असल देव1290–1299 53जयकृत शाह1780–1786 14अगस्ती पाल995–1014 34जगत पाल1299–1311 54प्रद्युम्न शाह1786–1804 15सुरती पाल1015–103635जित पाल1311–1330 55सुदर्शन शाह1815–1859 16जय पाल1037–1055 36अनंत पाल II1330–1358 56भवानी शाह1859–1871 17अनंत पाल I1056–1072 37अजय पाल1358–1389 57प्रताप शाह1871–1886 18अनंत पाल I1072–1083 38कल्याण शाह 1389–139858कीर्ति शाह 1886–191319विभोग पाल1084–1101 39सुन्दर पाल1398–1413 59नरेन्द्र शाह1913–1946 20सुवायनु पाल1102–1115 40हंसदेव पाल1413–1426 60मानवेन्द्र शाह1946–1949
इन्हें भी देखें
सन्दर्भ
श्रेणी:उत्तराखण्ड का इतिहास
श्रेणी:गढ़वाल
श्रेणी:भारत के रजवाड़े