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411 समाचार
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गणगौर

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thumb|जयपुर के नगर भवन (सिटी पैलेस) की महिला ड्योढ़ी से निकलती गणगौर की झाँँकी गणगौर राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के निमाड़गणगौर पर्व की तैयारियों को लेकर हुई ग्रामीणों की बैठक Dainik Bhaskar 18 March 2024 https://www.bhaskar.com/local/mp/khargone/dhargaon/news/villagers-meeting-regarding-preparations-for-gangaur-festival-132735662.html hi 20 March 2024,https://books.google.co.in/books?id=67AJn257sZMC&pg=PA27&dq=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0+%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC+%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A4%BE&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj2ta_s94L5AhVNCt4KHQBMAYw4ChDoAXoECAQQAw#v=onepage&q=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0%20%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%20%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A4%BE&f=false Bharat Ke Mele Verma Shyam Bahadur 2009-01-01 Prabhat Prakashan 978-81-85827-40-7 hi मालवा, बुंदेलखण्डhttps://books.google.co.in/books?id=7HvXAAAAMAAJ&dq=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0+%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1&focus=searchwithinvolume&q=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1 Dina-dina parva: Bhāratīya vrata, parva evaṃ tyohāra Siṃha Vidyā Vindu 2000 Neśanala Pabliśiṅga Hāusa hi और ब्रज क्षेत्रों का एक त्यौहार है जो चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया (तीज) को आता है। इस दिन कुँवारी लड़कियाँ एवं विवाहित महिलाएँ शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं। पूजा करते हुए दूब से पानी के छींटे देते हुए "गोर गोर गोमती" गीत गाती हैं। इस दिन पूजन के समय रेणुका की गौर बनाकर उस पर महावर, सिन्दूर और चूड़ी चढ़ाने का विशेष प्रावधान है। चन्दन, अक्षत, धूपबत्ती, दीप, नैवेद्य से पूजन करके भोग लगाया जाता है। गण (शिव) तथा गौर (पार्वती) के इस पर्व में कुँवारी लड़कियाँ मनपसन्द वर पाने की कामना करती हैं। विवाहित महिलायें चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजन तथा व्रत कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। होलिका दहन के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक, 18 दिनों तक चलने वाला त्योहार है -गणगौर। यह माना जाता है कि माता गवरजा होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं तथा अठारह दिनों के बाद ईसर (भगवान शिव ) उन्हें फिर लेने के लिए आते हैं ,चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है। गणगौर की पूजा में गाये जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा हैं। इस पर्व में गवरजा और ईसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माध्यम से पूजा होती है तथा उन गीतों के उपरांत अपने परिजनों के नाम लिए जाते हैं। राजस्थान के कई प्रदेशों में गणगौर पूजन एक आवश्यक वैवाहिक रीत के रूप में भी प्रचलित है। निमाड़ में गणगौर का पवित्र त्योहार बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है त्योहार के अंतिम दिन प्रत्येक गांव में भंडारे का आयोजन होता है तथा माता की विदाई की जाती है गणगौर पूजन में कन्याएँ और महिलाएँ अपने लिए अखण्ड सौभाग्य, अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि तथा गणगौर से प्रतिवर्ष फिर से आने का आग्रह करती हैं। गणगौर व्रत कथा एक समय की बात है, भगवान शंकर, माता पार्वती एवं नारद जी के साथ भ्रमण हेतु चल दिए। वह चलते-चलते चैत्र शुक्ल तृतीया को एक गांव में पहुंचे। उनका आना सुनकर ग्राम कि निर्धन स्त्रियां उनके स्वागत के लिए थालियों में हल्दी व अक्षत लेकर पूजन हेतु तुरंत पहुंच गई । पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को समझकर सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्त कर लौटी। थोड़ी देर उपरांत धनी वर्ग की स्त्रियां अनेक प्रकार के पकवान सोने चांदी के थालो में सजाकर सोलह श्रृंगार करके शिव और पार्वती के सामने पहुंची। इन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वती से कहा तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी? पार्वती जी बोली प्राणनाथ! उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थों से निर्मित रस दिया गया है । इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा। किन्तु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग रख दूंगी, इससे वो मेरे सामान सौभाग्यवती हो जाएंगी। जब इन स्त्रियों ने शिव पार्वती पूजन समाप्त कर लिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीर कर उसके रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया जिस पर जैसे छींटे पड़े उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। पार्वती जी ने कहा तुम सब वस्त्र आभूषणों का परित्याग कर, माया मोह से रहित होओ और तन, मन, धन से पति की सेवा करो । तुम्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होगी। इसके उपरांत पार्वती जी भगवान शंकर से आज्ञा लेकर नदी में स्नान करने चली गई । स्नान करने के पश्चात बालू की शिव जी की मूर्ति बनाकर उन्होंने पूजन किया। भोग लगाया तथा प्रदक्षिणा करके दो कणों का प्रसाद ग्रहण कर मस्तक पर टीका लगाया। उसी समय उस पार्थिव लिंग से शिवजी प्रकट हुए तथा पार्वती को वरदान दिया आज के दिन जो स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेगी उसका पति चिरंजीवी रहेगा तथा मोक्ष को प्राप्त होगा। भगवान शिव यह वरदान देकर अंतर्धान हो गए । इतना सब करते-करते पार्वती जी को बहुत समय लग गया। पार्वती जी नदी के तट से चलकर उस स्थान पर आई जहां पर भगवान शंकर व नारद जी को छोड़कर गई थी। शिवजी ने विलंब से आने का कारण पूछा तो इस पर पार्वती जी बोली मेरे भाई भावज नदी किनारे मिल गए थे। उन्होंने मुझसे दूध भात खाने तथा रुकने का आग्रह किया। गणगौर नृत्य गणगौर राजस्थान एवं मध्यप्रदेश का प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इस नृत्य में कन्याएँ एक दूसरे का हाथ पकडे़ वृत्ताकर घेरे में गौरी माँ से अपने पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हुई नृत्य करती हैं। इस नृत्य के गीतों का विषय शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सावित्री तथा विष्णु-लक्ष्मी की प्रशंसा से भरा होता है। गणगौर नृत्य मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल का प्रमुख नृत्य है। thumb|right|250px|गणगौर नृत्य गौर गौर गोमती गौर गौर गोमती ईसर पूजे पार्वती पार्वती का आला-गीला , गौर का सोना का टीका टीका दे , टमका दे , बाला रानी बरत करयो करता करता आस आयो वास आयो खेरे खांडे लाडू आयो , लाडू ले बीरा ने दियो बीरो ले मने पाल दी , पाल को मै बरत करयो सन मन सोला , सात कचौला , ईशर गौरा दोन्यू जोड़ा जोड़ ज्वारा , गेंहू ग्यारा , राण्या पूजे राज ने , म्हे पूजा सुहाग ने राण्या को राज बढ़तो जाए , म्हाको सुहाग बढ़तो जाय , कीड़ी- कीड़ी , कीड़ी ले , कीड़ी थारी जात है , जात है गुजरात है , गुजरात्यां को पाणी , दे दे थाम्बा ताणी ताणी में सिंघोड़ा , बाड़ी में भिजोड़ा म्हारो भाई एम्ल्यो खेमल्यो , सेमल्यो सिंघाड़ा ल्यो लाडू ल्यो , पेड़ा ल्यो सेव ल्यो सिघाड़ा ल्यो ''झर झरती जलेबी ल्यो , हर-हरी दूब ल्यो गणगौर पूज ल्यो इस तरह सोलह बार बोल कर आखिरी में बोलें : एक-लो , दो-लो ……..सोलह-लो। बाहरी कड़ियाँ भंवर म्हानै पूजण द्यो गणगौर गणगौर व्रत गणगौर पर्व और उसका लोक जीवन में महत्त्व निमाड़ में रनु देवी की आराधना से मनाया जाता है लोक पर्व 'गणगौर' श्रेणी:संस्कृति श्रेणी:हिन्दू त्यौहार श्रेणी:राजस्थान के लोक नृत्य श्रेणी:भारत में त्यौहार