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क्षेमेंद्र
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क्षेमेन्द्र (जन्म लगभग 1025-1066) संस्कृत के प्रतिभासंपन्न काश्मीरी महाकवि थे। ये विद्वान ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुए थे। ये सिंधु के प्रपौत्र, निम्नाशय के पौत्र और प्रकाशेन्द्र के पुत्र थे। इन्होंने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इनके पुत्र सोमेन्द्र ने पिता की रचना बोधिसत्त्वावदानकल्पलता को एक नया पल्लव (कथा) जोड़कर पूरा किया था।
काल
इन्होंने अपने ग्रंथों के रचनाकाल का उल्लेख किया है जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय हमें मिलता है। काश्मीर नरेश अनन्त (1028-1063) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089) के राज्यकाल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ। क्षेमेन्द्र के ग्रंथ समयमातृका का रचनाकाल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ दशावतारचरित का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है। फलत: एकादश शती का मध्यकाल (लगभग 1025-1066) क्षेमेंद्र के आविर्भाव का, निश्चित रूप से, समय माना जा सकता है
रचना संसार
क्षेमेन्द्र के पूर्वपुरूष राज्य के अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। फलतः इन्होंने अपने देश की राजनीति को बड़े निकट से देखा तथा परखा। अपने युग के अशांत वातावरण से ये इतने असंतुष्ट और मर्माहत थे कि उसे सुधारने में, उसे पवित्र बनाने में तथा स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना दृढ़ करने में इन्होंने अपना जीवन लगा दिया तथा अपनी द्रुतगामिनी लेखनी को इसी की पूर्ति के निमित्त काव्य के नाना अंगों की रचना में लगाया। इनके आदर्श थे महर्षि वेदव्यास और उनके ही समान क्षेमेंद्र ने सरस, सुबोध तथा उदात्त रचनाओं से संस्कृतभारती के प्रासाद को अलंकृत किया। प्रथमत: उन्होंने प्राचीन महत्वपूर्ण महाकाव्यों के कथानकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। रामायणमञ्जरी, भारतमञ्जरी तथा बृहत्कथामंजरी - ये तीनों ही क्रमश: रामायण, महाभारत तथा बृहत्कथा के अत्यंत रोचक तथा सरस संक्षेप हैं। बोधिसत्त्वावदानकल्पलता में बुद्ध के पूर्व जन्मों से संबद्ध पारमितासूची आख्यानों का पद्यबद्ध वर्णन है। दशावतारचरित इनका उदात्त महाकाव्य है जिसमें भगवान विष्णु से दसों अवतारों का बड़ा ही रमणीय तथा प्रांजल, सरस एवं मुंजुल काव्यात्मक वर्णन किया गया है। औचित्य-विचार-चर्चा में क्षेमेन्द्र ने औचित्य को काव्य का मूलभूत तत्त्व माना है तथा उसकी प्रकृष्ट व्यापकता काव्य प्रत्येक अंग में दिखलाई है।
वात्स्यायनसूत्रसार नामक एक कामशास्त्र की भी इन्होने रचना की।
रचनाएँKshemendra 2011, pp 153-154.
प्रसिद्ध ग्रन्थों का संक्षेपण
रामायणमञ्जरी — (Sanskrit)
भारतमञ्जरी — (Sanskrit)
बृहत्कथामञ्जरी — (Sanskrit)
काव्य
औचित्यविचारचर्चा
कविकण्ठाभरण
सुवृत्ततिलक
व्यंग्य
कलाविलास
समयमात्रिका — (Sanskrit)
देशोपदेश -- इसमें आठ उपदेश हैं, दुर्जनवर्णनम्, कदर्यवर्णनम्, वेश्यावर्णनम्, कुट्टनीवर्णनम्, विटवर्णनम्, छात्रवर्णनम्, वृद्धभार्यावर्णनम्,प्रकीर्णवर्णनम्
नर्ममाला ( नर्म = परिहास / हँसी ठट्ठा / दिल्लगी ) -- इसमें तीन परिहास हैं।
प्रथम परिहास : गृहकृताधिपतिः, चाक्रिक या पुंश्चलक, परिपालक, लेखकोपाध्यायः, गञ्जदिविरः, ग्रामदिविरः ;
द्वितीय परिहास : पारदारिकः, जीवनदिविरः, श्रमणिका, दारकोपाध्यायः, मठदैशिक, सभर्तृका, वैद्यः, गणकः, ख्वासपतिः या तूणरक्षको , गुरुः, आस्थानदिविरः, अधिकरणभट्टाः या सात्रिका ;
तृतीय परिहास : गुरुभटाः, रण्डा, गुरुकृत्यमहत्तमः, वेश्या, चक्षुवैद्यः, शल्यहर्ता, वृद्धवणिक् ;
नीति काव्य
नीतिकल्पतरु
दर्पदलन
चतुर्वगसंग्रह
चारुचर्या
सेव्यसेवकोपदेश
लोकप्रकाश
स्तूपवादन
भक्ति
अवदानकल्पलता (English)
दशावतारचरित (Sanskrit)
ग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय
अमृततरङ्ग : यह पूर्वदेवकृत क्षीरसागर के मन्थन पर आधृत लघुकाव्य है। इसमें से एक पद्य 'कविकण्ठाभरण' की पञ्चम सन्धि में उद्धृत है।
औचित्यविचारचर्चा : क्षेमेन्द्र का यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है। इस ग्रन्थ में कुल उनचालीस कारिकाएँ हैं। इन्होंने कारिकागत विचारों के स्पष्टीकरणार्थ कुल एक सौ छः उदाहरण रूप श्लोक उद्धृत किये हैं, जिनमें उनके निजी पैंतीस पद्य हैं। यह रससिद्ध काव्य का जीवित सर्वस्व औचित्यसिद्धान्त का प्रतिपादनपूर्वक लिखा हुआ स्वतन्त्र एवं मौलिक ग्रन्थ है।
अवसरसार : यह अनन्तराजस्तुतिपरक एक लघुकाव्य है। क्षेमेन्द्र लघुकाव्य संग्रह में इस ग्रन्थ का नाम 'अवतारसार' दिया है। वेश्या प्रमाद वश ही हो सकती है, क्योंकि इसमें का एक पद्य क्षेमेन्द्र ने अपनी औचित्यविचारचर्चा में कर्मपदौचित्यप्रकरण में 'न तु यथा ममैवावसरसारे' इस तरह दिया है।
कनकजानकी : यह भगवान् रामचन्द्र के वनवासोत्तर जीवन पर आधृत नाटक रहा होगा। इसके पाँच श्लोक कविकण्ठाभरण में उद्धृत हैं।
कलाविलास : यह कविवर क्षेमेन्द्र का उत्कृष्ट काव्य है । उपहासप्रधान यह काव्य दस सर्गों ‘दम्भाख्यान', लोभवर्णन, कामवर्णन, वेश्यावृत्त, कायस्थचरित, मदवर्णन, गायनवर्णन, सुवर्णकारोत्पत्ति, नानाधूर्तवर्णन, एवं सकलकला-निरूपण में विभक्त है। इसमें 551 श्लोक हैं। मूलदेव नामक पुरुष इस काव्य का नायक है। यह पुरुष बड़ा कुटिल और चालाक है। इस काव्य में क्षेमेन्द्र ने संन्यासी, वैद्य, गायक, स्वर्णकार, नट आदि का हास्यपूर्ण व रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है। यह काव्य प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध से भी सम्बन्धित है।
कविकण्ठाभरण : यह ग्रन्थ आचार्य क्षेमेन्द्र की परिपक्व बुद्धि की उपज है। क्षेमेन्द्र ने शिष्यों के उपदेश तथा विज्ञों की विशेष जानकारी के लिए पाँच सन्धियों में विभक्त इस ग्रन्थरत्न का अनन्तराज के काल में प्रणयन किया। ग्रन्थ में कुल 55 कारिकाएँ और बासठ उदाहरण श्लोक हैं। "कविः शिक्षा के क्षेत्र में यह एक अमूल्य ग्रन्थरत्न है।
कविकर्णिका : क्षेमेन्द्र ने औचित्यविचारचर्चा में इस ग्रन्थ का नाम निर्देश किया है। उससे यह अनुमान होता है कि इस ग्रन्थ में काव्य के गुण तथा दोषों का विचार हुआ होगा ।' लेकिन इस ग्रन्थ के बारे में कोई निश्चितता नहीं दिखालाई देती है ।
क्षेमेन्द्रप्रकाश : इस ग्रन्थ के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं होती।
चतुर्वर्गसंग्रह : यह कविवर क्षेमेन्द्र ने शिष्यों के उपदेश एवं बुद्धिमानों के सन्तोष के लिए रचा। इसमें धर्मप्रशंसा, अर्थप्रशंसा, कामप्रशंसा तथा मोक्षप्रशंसा नामक चार परिच्छेद हैं और कुल श्लोक संख्या एक सौ छः है। यह प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध से सम्बन्धित लघुकाव्य है।
चारुचर्या : इसमें सदाचरण की शिक्षा देने वाले सबोध व सुन्दर एक सौ श्लोक अनुष्टुप् छन्द में रचित हैं। सम्भवतः चारुचर्या ही एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है, जिसके आदि और अन्त के दोनों श्लोकों में भगवान् विष्णु की स्तुति है और शेष 98 श्लोकों की प्रथम पंक्ति में नीति अथवा सदाचार का सन्देश है तथा द्वितीय पंक्ति में अर्थान्तरन्यास अलंकारयुक्त लोकविश्रुत रामायण, महाभारत, हरिवंशपुराण, बृहत्कथा एवं कथासरित्सागर की अनेक कथाओं के निदर्शन हैं। प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध की विषय वस्तु से सम्बन्धित यह लघुकाव्य है।
चित्रभारत नाटक : यह महाभारत पर आधारित नाटक रहा होगा। इसके दो श्लोक कविकण्ठाभरण में और एक श्लोक औचित्यविचारचर्चा में उद्धृत हैं।
दशावतारचरित : इसमें भगवान् विष्णु के मत्स्य, कूर्म, वराह प्रभृति दस अवतारों की कुल 1759 श्लोकों में उपसंहार के पाँच श्लोकों को छोड़कर सरस स्तुति की गई हैं। यह उपलब्ध ग्रन्थों में कविवर की अन्तिम रचना है। इसकी रचना राजा अनन्त के उत्तराधिकारी सम्राट् कलश के राज्यकाल 1066 ई0 में हुई। इस काव्य से क्षेमेन्द्र की उत्कट विष्णु भक्ति का परिचय प्राप्त होता है । भववान् बुद्ध को भगवान् विष्णु का अवतार मानकर उनके चरितकथन का यही आदि काव्य है।
दर्पदलन : कविवर क्षेमेन्द्र की सूक्ष्म एवं व्यापक निरीक्षण शक्ति का द्योतक यह काव्य कुल, धन, विद्या, शैर्य, दान, तप एवं रूप, जो मद के सात हेतु है, इन्हीं नामों के सात अध्यायों में तथा 596 श्लोकों में निबद्ध उपदेशपरक लघुकाव्य है, जो कि प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध से सम्बन्धित है। प्रत्येक अध्याय में विभिन्न मदहेतुओं से सम्बन्धित कल्पित कथा भी दी गयी है। क्षेमेन्द्र के मंगलाचरण में विवेक' को नमस्कार किया गया है।
देशोपदेश : यह दुर्जनवर्णन, वेश्यावर्णन, कुट्टनीवर्णन, विटवर्णन, छात्रवर्णन, वृद्धभार्यावर्णन, एवं प्रकीर्ण नामक 8 उपदेशों में तथा 298 श्लोकों में (उपसंहार दो श्लोकों को छोड़कर) निबद्ध यह सामाजिक टीकात्मक लघुकाव्य है । अध्ययन से ज्ञात होता है कि लोक-सुधार के उद्देश्य से इस काव्य की रचना हुई। इसमें बैद्य, ज्योतिषी, भिक्षुक, कायस्थ एवं गौडीय छात्रों का उपहास किया गया है। इस काव्य में कविवर क्षेमेन्द्र का उद्देश्य कश्मीर के भ्रष्ट राज्य शासन की आलोचना करना रहा है। इस काव्य का भी विषय प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध से सम्बद्ध है।
नर्ममाला : यह देशोपदेश की भाँति हास्यापदेशपरक लघुकाव्य तीन परिहासो एवं 407 श्लोकों में विभक्त है। इसमें कायस्थों का कटु उपहास किया गया हैं, कायस्थों के अतिरिक्त श्रमणिका, मठदैशिक, सभर्तृका, वैद्य, गणक एवं गुरु आदि की भी कड़ी आलोचना की गयी है। नर्ममाला भी प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध से सम्बन्धित लघुकाव्य है।
नीतिकल्पतरु : डॉ० सूर्यकान्त के मतानुसार यह व्यास रचित राजनीतिपरक ग्रन्थ की व्याख्या है । औचित्यविचारचर्चा में उल्लिखित 'नीतिकल्पलता' भिन्न ग्रन्थ है अथवा अभिन्न यह कहना दुष्कर है। क्षेमेन्द्र लघुकाव्यसंग्रह में यह वर्णित है कि नीतिकल्पलता का संम्भवतः प्रथमबार सम्पादन 1956 में ही डॉ० वी०पी० महाजन द्वारा हुआ। यह 138 अध्याय जो 'सुकुम' के नाम से अभिहित है, में विभक्त है।
पद्यकादम्बरी : यह बाणभट्ट की कादम्बरी का पद्यात्मक सारांश है। इस काव्य के आठ श्लोक कविकण्ठाभरण में उद्धृत हैं।
पवन पंचाशिका : यह केवल 50 श्लोकों का वायुवर्णन संम्बन्धी लघुकाव्य है। इसके पद्य सुवृत्ततिलक में उद्धृत हैं।
बृहत्कथामञ्जरी : यह पंचम सदी के गुणाढ्य कवि द्वारा पैशाची प्राकृत भाषा में 'बृहत्कथा' नामक एक सप्तलक्षात्मक कथाग्रन्थ के आधार पर सारांश रूप में 639 पद्यों का यह 18 लम्बकों (उपसंहार और परिशिष्ट सहित ) में विभाजित सारसंग्रह है। क्षेमेन्द्र द्वारा कथा को अतिसंक्षिप्त रूप देने से इसकी शैली दुर्बोध एवं अस्पष्ट हो गयी है ऐसा डॉ० हूलर मानते हैं। अधिक्षेप (व्यङ्ग्य) के कारण अनेक जगह दुर्बोधता उत्पन्न हुई है। काव्य अनाकर्षक एवं निर्जीव है, ऐसा डॉ० कीथ तथा डॉ० सूर्यकान्त दोनों लोगों का मत है।
बौद्धावदानकल्पलता : यह ग्रन्थ 'बोधसत्त्वावदानकल्पलता' के नाम से भी जाना जाता है। यह 108 पल्लवों में विभकत बृहद् काव्य है। किन्तु अन्तिम पल्लव की रचना पिता की मृत्यु के बाद क्षेमेन्द्र के पुत्र सोमेन्द्र ने मंगलमयी संख्या की पूर्ति की दृष्टि से की। यह ग्रन्थ काव्यदृष्ट्या रसपूर्ण एवं धर्मदृष्ट्या बौद्धों का प्रिय हैं। इसमें जातक कथाओं का संग्रह है। इस ग्रन्थ की रचना में क्षेमेन्द्र ने वीर्यभद्र नामक बौद्ध आचार्य की सहायता ली है और सूर्य श्री इसके लेखक बने। इस ग्रन्थ का तिब्बती भाषा में भी अनुवाद हुआ है आज भी यह ग्रन्थ उस भाषा में समस्त रूप में उपलब्ध है। डॉ० कीथ के अनुसार इसका भी विषय की दृष्टि से ही महत्त्व है, शैली व काव्य की दृष्टि से नहीं।
भारतमञ्जरी : यह बृहद्काव्य व्यासकृत महाभारत ग्रन्थ का 10665 श्लोक का सारांश है। इस ग्रन्थ के प्रत्येक पर्व के उपसंहार में क्षेमेन्द्र अपने को व्यास रूप महा कवि कहते हैं। महाभारत की कथा को संक्षिप्त रूप में लिखना ही इस ग्रन्थ की रचना का प्रयोजन था। 'व्यास' की उपाधि इसी ग्रन्थ की रचना के कारण ही क्षेमेन्द्र ने ग्रहण की थी। डॉ० सूर्यकान्त ने इस ग्रन्थ को रूक्ष एवं निर्जीव बताते हुए इसमें साहित्य-सौन्दर्य का अभाव कहा है। किन्तु इसकी आलोचना उचित नहीं लगती, क्योंकि इसी ग्रन्थ के कारण ही क्षेमेन्द्र को 'कवीन्द्रता' प्राप्त हुई थी।
मुक्तावलीकाव्य : यह काव्य तपस्वीवर्णपरक है। इसका एक पद्य कविकण्ठाभरण में पाया जाता है।
मुनिमत मीमांसा : इस काव्य में महर्षि व्यास के उपदेश का तात्पर्य वर्णित है। इसके 15 श्लोक औचित्यविचारचर्चा में उदाहृत है।
नृपावली या राजावली : इस ग्रन्थ का उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी में है। इसमें काश्मीरी राजाओं की वंशावली पद्यबद्ध लिखी गयी है, किन्तु यह उपलब्ध नहीं है। इस ग्रन्थ की अनुपलब्धि संस्कृत साहित्य की बहुत बड़ी हानि है, ऐसा डॉ० कीथ मानते हैं।
रामायणमञ्जरी : आदि कवि वाल्मीकिकृत कथा का यह सार सात काण्डों में विभक्त तथा 6186 पद्यों का ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की भाषा प्रवाह शालिनी एवं सुगम है, फिर भी डॉ० कीथ इसे ऐतिहासिक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण बताते हैं। वे इसे काव्य की दृष्टि से महत्त्वहीन बताते हैं। क्षेमेन्द्र ने मंगलाचरण में भगवान् विष्णु की स्तुति की है। मंगलाचरण के बाद के श्लोकों में वाल्मीकि एवं उनके रामायण की प्रशंसा की है।
ललितरत्नमाला : यह वत्सराज और रत्नावली की प्रेम कथा पर आधारित नाटक है। इसका एक पद्य 'औचित्यविचारचर्चा' में उद्धृत है।
लोकप्रकाश : लोकप्रकाश एक कोष का नाम है, जिसमें क्षेमेन्द्र कालीन हिन्दुओं की दिनचर्या, कश्मीर व्यापारियों के लेन-देन आदि की जानकारी का विवरण है। बेबर एवं कौल महोदय इस ग्रन्थ को क्षेमेन्द्र कृत नहीं मानते हैं, परन्तु डॉ० कूलर के अनुसार यही क्षेमेन्द्र की ही रचना है। यह तत्कालीन कश्मीर के अधिकारियों, कर्तव्यों तथा विभिन्न परगनों सम्बन्धी जानकारी देने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
लावण्यवती : इस ग्रन्थ में वासन्तिका नामक कोई गणिका अत्रिवसु नामक किसी श्रोत्रिय को अंकित करती हुई बतायी गयी है। इस काव्य के छः श्लोक ‘औचित्यविचारचर्चा’ में उद्धृत हैं। लावण्यवती सम्भवतः इस ग्रन्थ की नायिका है, जिसके आधार पर इस ग्रन्थ का नामकरण हुआ।
वात्स्यायनसूत्रसार : इसमें क्षेमेन्द्र ने वात्स्यायन के कामसूत्रों का सारांश प्रस्तुत किया है।
विनयवल्ली : यह 'क्षेमेन्द्रलघुकाव्यसंग्रह' में 'विनयवती' नाम से अंकित है तथा यह भी बताया गया है कि यह महाभारत की कुछ कहानियों पर आधारित है।' 'विनयवती' नाम तो प्रमादवश ही हो सकता है, क्योंकि 'विनयवल्ली' शब्द की पुष्टि औचित्यविचारचर्चा द्वारा भी होती है जिसमें 'यथा मम विनयवल्ल्याम्' इस तरह उद्धृत है।
वेतालपंचविंशति : इस ग्रन्थ के बारे में कुछ भी जानकारी प्राप्त नहीं होती है।
व्यासाष्टक : इसमें भुवनोपजीव्य व्यास की स्तुति से सम्बन्धित आठ श्लोक हैं। क्षेमेन्द्र की व्यास जी विषयक प्रगाढ़ आदरभावना का द्योतक यह अष्टक है।
शशिवंश काव्य : यह शशिवंश के राजाओं की कथाओं का वर्णन करने वाला महाकाव्य है। इसके पाँच श्लोक कविकण्ठाभरण में उदाहृत हैं।
समयमातृका : यह 1050 ई0 में दामोदरगुप्त की पद्धति का वेश्याव्यवसायविषयक 635 श्लोकों का (उपसंहारपरक श्लोक चतुष्टय अतिरिक्त) शृङ्गारविषयक उपदेशपरक काव्य है। इस ग्रन्थ के मंगलाचरण में कामदेव को नमन किया गया है। एक वणिक् पुत्र की कलावतीकृत वंचना ही इस काव्य का विषय है।
सुवृत्ततिलक : यह क्षेमेन्द्र रचित एक असाधारण शास्त्रीय ग्रन्थ है। इस काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ से कविवर क्षेमेन्द्र का आचार्यत्व होना सिद्ध होता है। कविवर ने छन्दों का सौन्दर्य ध्यान में रखकर इस ग्रन्थ में प्रसिद्ध वृत्तों का शिष्योपदेशार्थ संग्रह किया है। इसमें सत्ताइस वृत्तों के लक्षण तथा उदाहरण हैं। ग्रन्थ 'वृत्तावचय', 'गुणदोषदर्शन' एवं 'वृत्तविनियोग' नामक तीन विन्यासों के अन्तर्गत 124 कारिकाओं में निर्मित हुआ हैं डॉ० कीथ, डॉ० डे, तथा डॉ० काणे आदि विद्वानों की दृष्टि से क्षेमेन्द्र का यह लघुकाय ग्रन्थ वैशिष्ट्यपूर्ण है। 'क्षेमेन्द्रलघुकाव्यसंग्रह' में इसे छन्दों पर लिखी गई सर्वोत्तम कृति बताया है साथ ही आज भी सर्वोत्तमत्वप्रदान किया गया है।
सेव्यसेवकोपदेश : यह कविवर क्षेमेन्द्रकृत एक विशेषता सम्पन्न 61 श्लोकों का लघुकाव्य है। सेवकों के बीच के सम्बन्ध अच्छे हो जाँय, इस सद्हेतु से इस काव्य में स्वामी एवं सेवकों के मध्य के कर्तव्य एवं उनके कर्तव्यों का बोध कराया गया है। सेव्यसेवकों के सम्बन्ध विगड़ने का कारण सेव्य का दर्प एवं सेवक का लोभ है, यह क्षेमेन्द्र की धारणा है। क्षेमेन्द्र द्वारा इस ग्रन्थ के मङ्गलाचरण में सन्तोष रूप रत्न को नमन करके औचित्य का बढ़िया प्रयोग किया गया है।
शैली
क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहासकथा (सटायर) के धनी हैं। क्षेमेन्द्र ने अपने साहित्य के माध्यम से अपने समाज के दूषित पक्षों एवं समाज का शोषण करने वाले विभिन्न वर्गों पर तीखे व्यंग्य का प्रहार किया है। व्यंग्य की दृष्टि से यदि हम क्षेमेन्द्र के योगदान की चर्चा करें तो उनके काव्य में अन्तर्निहित व्यंग्यकार सबसे पहले और अधिक तीव्रता के साथ उभरकर सामने आता है। क्षेमेन्द्र समाज के एक ऐसे चौराहे पर खड़े प्रतीत होते हैं जहाँ विभिन्न वर्गों की राहें आकर मिलती है। वे एक युग-द्रष्टा के रूप में सबको देखते हैं और उन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तथा के दूषित पक्षों पर व्यंग्य या अधिक्षेप करते हैं और अपने साहित्य को समाज के शस्त्र के रूप में प्रयुक्त करते हैं। उनका व्यंग्य रूपी बाण जिधर भी घूम जाता है उधर अति कठिन लक्ष्यों का भेदन कर डालता है। हम निःसंदेह कह सकते हैं कि संस्कृत में इनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहासकर्ता नहीं है।
इनकी सिद्ध लेखनी पाठकों पर चोट करना जानती है परन्तु उसकी चोट मीठी होती है। परिहास कथा विषयक इनकी दो अनुपम कृतियाँ हैं - नर्ममाला तथा देशोपदेश ; जिनमें उस युग का वातावरण अपने पूर्ण वैभव के साथ हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। ये विदग्धी के कवि होने के अतिरिक्त जनसाधारण के भी कवि हैं जिनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध मनोरंजन के साथ ही साथ जनता का चरित्रनिर्माण भी है। कलाविलास, चतुर्वर्गसंग्रह, चारुचर्या, समयमातृका आदि लघु काव्य इस दिशा में इनके सफल उद्योग के समर्थ प्रमाण हैं। इनकी भाषा सरस और सुबोध है, न पाण्डित्य का व्यर्थ प्रदर्शन है और न शब्द का अनावश्यक चमत्कार है। भावों की उदात्त व्यंजना में तथा भाषा के सुबोध सरस विन्यास में क्षेमेन्द्र सचमुच ही अपने उपनाम के सदृश व्यासदास हैं।
सामाजिक विसंगतियों का चित्रण
क्षेमेन्द्र की रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों का उद्घाटन अत्यन्त प्रमुखता से हुआ है। गणिकाओं के धन लूटने की तरीकों, अज्ञानी वैद्यों द्वारा झूठी औषधि प्रदान, अल्पज्ञ ज्योतिषियों, प्रभुजनों द्वारा दासों पर किये जाने वाले अत्याचार, दुर्जन एवं कदर्य (कंजूस) का चरित्र-चित्रण, सरकारी कर्मचारियों के दोषों आदि के उद्घाटन का संदर्भ क्षेमेन्द्र की अनेक रचनाओं का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। सरकारी कर्मचारियों एवं वेश्याओं के दोषों पर वह अपने पूर्ववर्ती लेखकों की तुलना में तीव्र प्रहार करता है। इतना ही नहीं विद्यार्थी भी क्षेमेन्द्र की आलोचना से बच नहीं पाये हैं। इस प्रयोजन हेतु उनने अध्ययन के लिए कश्मीर आये गौड़ीय छात्रों को चुना है, जो विद्वान होने का आडम्बर करते हैं। कश्मीर की लिपि के अक्षर को भी नहीं पहचानते परन्तु भाष्य, न्याय तथा मीमांसा के ग्रन्थों का अध्ययन शुरू कर देते हैं। उनकी रुचि बनने-संवरने, भोजन एवं दान प्राप्ति में ही अधिक थी। इस प्रकार क्षेमेन्द्र समाज की विसंगतियों, परिवर्तनों आदि को व्यापकता में प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य समाज को इनके प्रति जागरूक बनाना है। इसीलिए संस्कृत साहित्य में क्षेमेन्द्र की कुछ रचनाएं उपदेशकाव्य के अन्तर्गत रखी गयी है।
क्षेमेन्द्र की उद्भट प्रतिभा ने नर्ममाला के माध्यम से एक अदभुत “भ्रष्टाचार के मिथक” का सृजन कर डाला जो संस्कृत ही नहीं विश्वसाहित्य में प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार पर हास्य एवं व्यंग्य को लपेटे पहली रचना है। नर्ममाला की लेखनशैली जरूर पौराणिक है किन्तु विषयवस्तु 1000 साल बाद भी उतनी ही आधुनिक है।नर्ममाला : भ्रष्टाचार का पुराण-कथा के रूप में निरूपण
क्षेमेन्द्र के व्यंग्य प्रहारात्मक होते हुए भी समाज सुधार की भावना से परिपूर्ण है। क्षेमेन्द्र अपने युग के भ्रष्ट समाज से इतने असन्तुष्ट दिखलाई पड़ते है अतः इन्होनें समाज को सुधारने के लिए दुष्टता के स्थान पर शिष्टता की, तथा कुविचारों के स्थान पर सद्विचारों की स्थापना के निमित्त लोगों पर प्रहार हेतु व्यङ्ग्यप्रधान शैली का प्रयोग करते हुए तात्कालिक समाज के प्रति अन्तर्वेदना व्यक्त करते हुए कहा है-क्षेमेन्द्र के लघुकाव्यों में प्रतिपादित व्यंग्यपरक सामाजिक संचेतना (विनोद कुमार , तरुण कुमार शर्मा)]</ref>
खलेन धनमत्तेन नीचेन प्रभविष्णुना। पिशुनेन पदस्थेन हा प्रजे क्व गमिष्यसि॥देशोपदेश 1/7
क्षेमेन्द्र के व्यंग्यों के विषय में यदि विचार किया जाय तो उनके काव्यों में तत्कालीन समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार में लिप्त समाज के अनेकानेक शोषण करने वाले वर्गों पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है। यद्यपि कायस्थ वर्ग ही विशेषतया उनके काव्यों में, व्यंग्य-बाण का लक्ष्य बना है तथापि दुर्जन, वेश्या, वैद्य, छात्र, कदर्य (कंजूस) ज्योतिषी, कुट्टनी तथा संन्यासी इत्यादि पर भी तीखे व्यंग्य देखने को मिलते हैं। इनके द्वारा विभिन्न वर्गों पर किये गये व्यंग्य क्रमशः इस प्रकार हैं-
खल या दुर्जन
क्षेमेन्द्र ने समाज के शोषकों में मुख्य अंग दुर्जन पर तीखा व्यंग्य किया है। उन्होनें दुर्जन को सदा खण्डन में कुशल, बहुत से दोषों एवं व्यर्थ की बातों से भरा हुआ कहकर उसकी तुलना ओखली से करते हुए उसे व्यंग्य रूप में नमस्कार किया है-
सदा खण्डनयोग्याय तुषपूर्णाशयाय च। नमोऽस्तु बहुबीजाय खलायोलूखलाय च॥देशोपदेश 1/5
क्षेमेन्द्र का कथन है कि दुर्जन व्यक्ति मूर्ख होकर भी विद्वान होता है क्योंकि वह अपने गुणों का वर्णन करने में शेषनाग के समान तथा दूसरों की निन्दा करने में बृहस्पति के समान होता है-
अहो बत खलः पुण्यैुर्मुर्खोऽप्युरतपण्डितः। स्वगुणोदीरणे शेषः परनिन्दासु वाक्पतिः॥देशोपदेश 1/9
उन्होनें दुर्जुन को स्वभाव से ही मायामय, रागद्वेष और मद से भरा बड़े व्यक्तियों को भुलावे में डालने वाला बतला कर उस पर तीखा व्यंग्य इस प्रकार किया है-
मायामयः प्रकृत्यैव रागद्वेषमदाकुलः। महतामपि मोहाय संसार इव दुर्जनः॥देशोपदेश 1/12
इस प्रकार उनके काव्यानुशीलन से स्पष्ट है कि क्षेमेन्द्र ने अपनी व्यंग्य प्रधान शैली एवं तीक्ष्ण शब्दों के माध्यम से दुर्जनों पर व्यंग्य किया है जो वस्तुतः दुर्जनों का नग्न चित्र ही है।
वेश्याएँ
वेश्याएँ जो समाज के धन सम्पन्न लोगों एवं युवा वर्ग के लोगों को अपने प्रणय-पाश में फंसाकर उनकी धन सम्पत्ति का हरण करती है। क्षेमेन्द्र ने व्यंग्य करते हुए उनके दुर्गुणों को बतलाकर उन पर तीखा व्यंग्य किया है तथा उन्होंने वेश्याओं के प्रच्छन्न प्रयोजन को समाज के सामने नग्न रूप में चित्रित करते हुए तात्कालिक समय में उनके छल-कपट कला-प्रियता तथा लूट-खसोट इत्यादि सभी पक्षों पर करारा व्यंग्य किया है। उन्होनें वेश्याओं को नीचों की सम्पत्ति का भोग करने वाली, सदाचार से विरत, दुर्जन की दुःख देने वाली लक्ष्मी कर तरह चंचल एवं व्यसनकारिणी बताया है-
नीचापभोग्यविभवा, सदाचारपराङ्मुखी। दुर्जनश्रीरिव चला, वेश्या व्यसनकारिणी॥देशोपदेश 3/3
क्षेमेन्द्र ने सौ वर्ष तक साथ रहने पर भी वेश्या के प्रेम को बनावटी बताया है तथा साथ छूटते ही शुक (तोते) की तरह शीघ्र भाग जाने वाली बताया है-
अति वर्षशतं स्थित्वा सदा कृत्रिमरागिणी। वेश्या शुकीव निःश्वासा निःसंगेभ्यः पलायते॥देशोपदेश 3/9
वेश्याओं द्वारा दिखाये गये हाव-भाव, प्रेम-व्यवहार व स्नेह आदि सभी कृत्रिम हुआ करते है ऐसा कहकर क्षेमेन्द्र ने व्यंग्य किया है-
कृत्रिमं दृश्यते सर्वं चित्तसद्भाववर्जिता। सूत्रप्रोतेव चपला नर्तकी यन्त्रपुत्रिका॥देशोपदेश 3/11
वेश्याएँ तात्कालिक समाज में बहुत से लोगों को अपने कपटपूर्ण प्रेम-जाल में फंसाकर उनके तन-धन का शोषण करती थीं। इसीलिए कविवर क्षेमेन्द्र ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में वेश्याओं पर व्यंग्य के माध्यम से उनके कपटपूर्ण आचरण व व्यवहार को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है।
विद्यार्थी
क्षेमेन्द्र ने तात्कालिक दम्भी छात्रों पर भी व्यंग्य के माध्यम से प्रहार किया है। उन्होनें भारत के अनेक भागों से आये ऐसे छात्र धर्मशास्त्र के अध्ययन के लिए कश्मीर आते हैं जो ज्ञान की अपेक्षा भोजन में अधिक रुचि लेने लगते हैं और धर्मशास्त्र के अध्ययन के बावजूद भी देवताओं की अपेक्षा गणिकाओं (वेश्याओं) में आसक्ति विकसित करने लगते हैं, पर व्यंग्य बाणों की बौछार कर उनके दूषित पक्ष का पर्दाफाश किया है।
सर्वप्रथम क्षेमेन्द्र ने विद्यालय में सदा बायीं ओर स्त्री को बैठाने वाले, क्रोधी, विषैले, उग्रविष भोगी तथा तीखा त्रिशूल धारण करने वाले छात्रों को व्यंग्य रूप में नमस्कार किया है-
नमश्छात्राय सततं सत्रे वामार्धहारिणे। उग्राय विषभक्षाय शिवाय निशि शूलिने॥देशोपदेश 6/1
क्षेमेन्द्र ने ऐसे छात्र जो वेश्यासक्त हैं और जुआ (द्यूत) आदि कर्मों में लिप्त रहकर चारों आश्रमों में से एक भी आश्रम का पालन नहीं करते थे तथा न करने योग्य भोजन करते थे, पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है-
न ब्रह्मचारी न गृही न वानस्थो न वा यतिः। पञ्चमः पञ्चभद्राख्यश्छात्राणामयमाश्रमः॥देशोपदेश 6/32
इस प्रकार कविवर क्षेमेन्द्र ने तात्कालिक छात्रों के दूषित पक्ष को उनके सामने रखकर उनके सुधार हेतु प्रयास किया है जो इनके साहसिक कार्य का प्रतीत कहा जा सकता है।
संन्यासी
क्षेमेन्द्र ने संन्यासियों पर भी तीखा व्यंग्य करते हुए उनके कपटपूर्ण बाह्य मिथ्या वेशों को निरर्थक बताया है। इनके सम्बन्ध में विचार कर क्षेमेन्द्र पाते हैं कि उन्हां ने जिस वस्तु का त्याग किया है वह केवल उनके मुड़े हुए सिरों के केशमात्र ही हैं वासना का त्याग नहीं। ये धूल के रंग के पीले परिधान धारण करते हैं जो क्षेमेन्द्र को इनके हृदय के कालुष्य का प्रतीक प्रतीत होते हैं-
सरागकाषायकषायचित्तं शीलांशुकत्यागदिगम्बरं वा। लौ ल्योभ्दवभ्दस्मभरप्रहासं व्रतं न वेषोभ्दटतुल्यवृत्तम्॥नर्ममाला 7/13
ज्योतिषी
ज्योतिषी जो स्वभाव से सरल विभिन्न व्यक्तियों को मनोनुकूल विचारों को कहते हुए तथा उन्हें विभिन्न प्रकार से विश्वस्त करता हुआ धनार्जन करता है। वह साधारण एवं कपटपूर्ण ज्ञान से युक्त होकर ज्योतिष की गणना करता हुआ मूर्ख लोगों को ठगता है। ऐसे ज्योतिषों पर क्षेमेन्द्र ने कटु व्यंग्य किया है जो मिथ्या मन्त्र बतलाकर निदान की बात करता है। सर्वप्रथम कविवर क्षेमेन्द्र ने ज्योतिषशास्त्र को जानने वाले वर्षा और सूखा के विषय में मछुआरे से पूछने वाले ज्योतिषी को व्यंग्य रूप में नमस्कार किया है।
ज्योतिः शास्त्रविदे तस्मै नमोऽस्तु ज्ञानचक्षुषे। वर्षं पृच्छत्यवर्षं वा धीवरान् यो विनष्टधीः॥नर्ममाला 2/82
क्षेमेन्द्र ने ऐसे ज्योतिषियों पर भी व्यंग्य किया है जो स्त्रियों को भूत-पिशाचादि से ग्रस्त बतलाकर उन्हें नग्नादि अवस्था में करके पिशाच मुक्त करने का उपाय बताता है-
दुर्निवारश्च नारीणां पिशाचो रतिरागकृत्। पुनः शून्यगृहे स्नाता गुह्यकेन निरम्बरा॥नर्ममाला 2/91
छद्मरूपधारी ज्योतिषियों द्वारा समाज के रूढ़िग्रस्त, भयभीत भोले-भाले स्त्री पुरुषों का किस तरह शोषण किया जाता है और किस तरह स्त्रियों को अपने शील तक का शोषण कराने के लिए विवश होना पड़ता है इसका यथार्थ चित्रण कवि ने किया है।
कायस्थ
क्षेमेन्द्र ने तात्कालिक समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार में लिप्त तथा कलम (लेखनी) की नोंक से लोगों के धन का शोषण करने वाले तथा अपनी माया से समस्त संसार को मोह लेने वाले अजित कायस्थ को व्यंग्य रूप में परमेश्वर कहा है-
येनेदं स्वेच्छया सर्वं मायया मोहितं जगत्। स जयत्यजितः श्रीमान् कायस्थः परमेश्वरः॥नर्ममाला 1/1
एक स्थल पर क्षेमेन्द्र ने कायस्थ को सेवा काल में विभिन्न बातों के द्वारा लोगों को लुभाने तथा ठगने में बहुरूपों वाला बतलाते हुए इस प्रकार कहा है-
सेवाकाले बहुमुखैर्लुब्धकैर्बहुबाहुभिः। वञ्चने बहुमायैश्च बहुरूपैः सुरारिभिः॥नर्ममाला 1/23
इस प्रकार, कायस्थों की ठगने की विभिन्न विधाओं को कला की संज्ञा देते हुए क्षेमेन्द्र ने उनकी ठगी का चरमोत्कर्ष रूप में पर्दाफाश किया है तथा उनको अपने व्यंग्य बाण का लक्ष्य बनाया है।
इनके अतिरिक्त भी क्षेमेन्द्र ने समाज के अन्य वर्गों व जातियों में विद्यमान दोषों पर भी तीखा व्यंग्य किया है। उन्होनें स्वर्णकाल, कुट्टनी, कुलवधू, गुरु, वणिक, कवि, धातुवादी, निर्गुट, पण्डित, जटाधर तथा लेखक आदि लोगों के दूषित पक्षों पर भी तीखा व्यंग्य किया है जो उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म निरीक्षण का प्रतिफल हो सकता है।
क्षेमेन्द्र द्वारा समाज के शोषकों व दूषित पक्षों पर किये गये व्यंग्यपूर्ण वर्णन उनके लघुकाव्यों में पद-पद पर मिलते हैं। तात्कालिक समाज में दूषित पक्ष दबने की अपेक्षा उग्र रूप धारण किया हुआ था। क्षेमेन्द्र के द्वारा किये गये व्यंग्य बहुत ही तीखे एवं हृदय को भेदने वाले हैं फिर भी इनकी भावना मुख्यतः समाज सुधारक के रूप में हमारे सामने आती है। क्षेमेन्द्र ने समाज में व्याप्त दूषित लोगों, तरीकों, प्रथाओं व व्यवसायों पर गृध्र-दृष्टि से अवलोकन कर उन पर तीखा व्यंग्य किया है तथा जिसके माध्यम से तात्कालिक समाज के दूषित पक्षों का पूर्णतः पर्दाफाश किया है, उनके नग्न चित्र लोगों के सामने उपस्थित किये हैं, जो उनका तात्कालिक समाज को सुधारने का सफल प्रयास ही है। उनके सामाजिक व्यंग्यों में यथार्थता, स्पष्टता एवं मौलिकता पूर्णतः विद्यमान है। परिणामतः व्यंग्य की दृष्टि से इनके काव्य सहृदय के हृदय को बरबस आकृष्ट करते हैं।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
औचित्यवाद
समयमातृका
कामशास्त्र
चारुचर्या
बाहरी कड़ियाँ
क्षेमेन्द्र
समयमातृका (संस्कृत विकिस्रोत)
देशोपदेशः (संस्कृत विकिस्रोत)
नर्ममाला (संस्कृत विकिस्रोत)
कलाविलासः (संस्कृत विकिस्रोत)
क्षेमेन्द्रकृत दर्पदलनम् (संस्कृत विकिस्रोत)
भारतमंजरी (संस्कृत विकिस्रोत)
क्षेमेन्द्रकृत औचित्यालंकार (आनलाइन पढ़िये या डाउनलोड करिये)
Ksemendra : The Peoples' Poet by Prof. K. N. Dhar
KSEMENDRA - A PEOPLE'S POET - Pradeep Kaul (Khodballi)
Three satires By Nīlakaṇṭha, Kṣemendra, and Bhallaṭa
कुट्टनीमतम् (अत्रिदेव विद्यालंकार द्वारा हिन्दी में अनूदित)
कविवर क्षेमेन्द्र के लघु काव्यों का परिशीलन (शोध पत्र)
देशोपदेश तथा नर्ममाला
श्रेणी:संस्कृत साहित्यकार
श्रेणी:संस्कृत
श्रेणी:कश्मीर के लोग