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ऋषि
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ऋषि अर्थात् "दृष्टा" भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। वे व्यक्ति विशिष्ट जिन्होंने अपनी विलक्षण एकाग्रता के बल पर गहन ध्यान में विलक्षण शब्दों के दर्शन किये उनके गूढ़ अर्थों को जाना व मानव अथवा प्राणी मात्र के कल्याण के लिये ध्यान में देखे गए शब्दों को लिखकर प्रकट किया। इसीलिये कहा गया - ऋषयो मन्त्र द्रष्टारः न तु कर्तारः। अर्थात् ऋषि तो मंत्र के देखनेवाले हैं नकि बनानेवाले। अर्थात् बनानेवाला तो केवल एक परमात्मा ही है। इसीलिये किसी भी मंत्र के जप से पूर्व उसका विनियोग अवश्य बोला जाता है। उदाहरणार्थ अस्य श्री 'ऊँ'कार स्वरूप परमात्मा गायत्री छंदः परमात्मा ऋषिः अन्तर्यामी देवता अन्तर्यामी प्रीत्यर्थे आत्मज्ञान प्राप्त्यार्थे जपे विनियोगः। ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति 'ऋष' है जिसका अर्थ 'देखना' या 'दर्शन शक्ति' होता है। ऋषि के प्रकाशित कृतियों को आर्ष कहते हैं जो इसी मूल से बना है, इसके अतिरिक्त दृष्टि (नज़र) जैसे शब्द भी इसी मूल से हैं। सप्तर्षि आकाश में हैं और हमारे कपाल में भी।
ऋषि आकाश, अन्तरिक्ष और शरीर तीनों में होते हैं।
महर्षि भारद्वाज ऋग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा कहे गये हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का अति उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं।
सप्त ऋषि
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ॥
(कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भारद्वाज - ये सात ऋषि हैं।)
कुछ विख्यात ऋषि
कश्यप
अत्रि
वशिष्ट
विश्वामित्र
गौतम
जमदग्नि
भारद्वाज
कण्व
कपिल
शौनक
याज्ञवल्क्य
वाल्मिकी
इन्हें भी देखें
वेद
बाहरी कड़ियाँ
ऋषि हरते हैं लोगों के संताप
ऋषि के बारे में सामान्य जानकारी
श्रेणी:हिन्दू धर्म
श्रेणी:ऋषि मुनि