Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

बद्रीनाथ मन्दिर

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

बद्रीनाथ मन्दिर हिन्दू धर्म Badrinath temple.jpg बद्रीनाथ मन्दिर का प्रवेश द्वार बद्रीनाथ मन्दिर का प्रवेश द्वार India Uttarakhand 250 भारत का उत्तराखण्ड राज्य हलके पीले रंग में उत्तराखण्ड में अवस्थिति 30.744695 79.491175 type:landmark_region:IN inline,title बद्रीनाथ भारत उत्तराखण्ड चमोली बद्रीनाथ बद्रीनाथ (विष्णु) ७वीं–९वीं शताब्दी आदि शंकराचार्य बदरीनाथ अथवा बदरीनारायण मन्दिर भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में अलकनन्दा नदी के तट पर स्थित एक हिन्दू मन्दिर है। 'बदरीनाथ' व्याकरण और पुराने ग्रंथों के अनुसार अधिक शुद्ध और सही शब्द है, हालांकि बोलचाल में 'बद्रीनाथ' का प्रयोग भी बहुत अधिक किया जाता है। मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर इसके नाम के लिए “बदरीनाथ” और “बद्रीनाथ” दोनों वर्तनी मिलती हैं।https://badrinath-kedarnath.gov.in/AboutUs/shri-badrinathHindi.aspx श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति-उत्तराखण्ड Shri Badarinath Kedarnath Temple Committee-UK 30 सितम्बर 2026 यह हिंदू देवता विष्णु को समर्पित मंदिर है और यह स्थान इस धर्म में वर्णित सर्वाधिक पवित्र स्थानों, चार धामों, में से एक यह एक प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण ७वीं-९वीं सदी में होने के प्रमाण मिलते हैं। मन्दिर के नाम पर ही इसके इर्द-गिर्द बसे नगर को भी बद्रीनाथ ही कहा जाता है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान हिमालय पर्वतमाला के ऊँचे शिखरों के मध्य, गढ़वाल क्षेत्र में, समुद्र तल से ३,१३३ मीटर (१०,२७९ फ़ीट) की ऊँचाई पर स्थित है। जाड़ों की ऋतु में हिमालयी क्षेत्र की रूक्ष मौसमी दशाओं के कारण मन्दिर वर्ष के छह महीनों (अप्रैल के अंत से लेकर नवम्बर की शुरुआत तक) की सीमित अवधि के लिए ही खुला रहता है। यह भारत के कुछ सबसे व्यस्त तीर्थस्थानों में से एक है; २०१२ में यहाँ लगभग १०.६ लाख तीर्थयात्रियों का आगमन दर्ज किया गया था। बदरीनाथ मन्दिर में हिंदू धर्म के देवता विष्णु के एक रूप "बदरीनारायण" की पूजा होती है। यहाँ उनकी १ मीटर (३.३ फीट) लंबी शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी में समीपस्थ नारद कुण्ड से निकालकर स्थापित किया था। इस मूर्ति को कई हिंदुओं द्वारा विष्णु के आठ स्वयं व्यक्त क्षेत्रों (स्वयं प्रकट हुई प्रतिमाओं) में से एक माना जाता है। यद्यपि, यह मन्दिर उत्तर भारत में स्थित है, "रावल" कहे जाने वाले यहाँ के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य के नम्बूदरी सम्प्रदाय के ब्राह्मण होते हैं। बद्रीनाथ मन्दिर को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार अधिनियम – ३०/१९४८ में मन्दिर अधिनियम – १६/१९३९ के तहत शामिल किया गया था, जिसे बाद में "श्री बद्रीनाथ तथा श्री केदारनाथ मन्दिर अधिनियम" के नाम से जाना जाने लगा। वर्तमान में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा नामित एक सत्रह सदस्यीय समिति दोनों, बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मन्दिरों, को प्रशासित करती है। विष्णु पुराण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण जैसे कई प्राचीन ग्रन्थों में इस मन्दिर का उल्लेख मिलता है। आठवीं शताब्दी से पहले आलवार सन्तों द्वारा रचित नालयिर दिव्य प्रबन्ध में भी इसकी महिमा का वर्णन है। बद्रीनाथ नगर, जहाँ ये मन्दिर स्थित है, हिन्दुओं के पवित्र चार धामों के अतिरिक्त छोटे चार धामों में भी गिना जाता है और यह विष्णु को समर्पित १०८ दिव्य देशों में से भी एक है। एक अन्य संकल्पना अनुसार इस मन्दिर को बद्री-विशाल के नाम से पुकारते हैं और विष्णु को ही समर्पित निकटस्थ चार अन्य मन्दिरों – योगध्यान-बद्री, भविष्य-बद्री, वृद्ध-बद्री और आदि बद्री के साथ जोड़कर पूरे समूह को "पंच-बद्री" के रूप में जाना जाता है। ऋषिकेश से यह २९४ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। मन्दिर तक आवागमन सुलभ करने के लिए वर्तमान में चार धाम महामार्ग तथा चार धाम रेलवे जैसी कई योजनाओं पर कार्य चल रहा है। नामकरण हिमालय में स्थित बद्रीनाथ क्षेत्र भिन्न-भिन्न कालों में अलग नामों से प्रचलित रहा है। स्कन्दपुराण में बद्री क्षेत्र को "मुक्तिप्रदा" के नाम से उल्लेखित किया गया है,घोष १९३४ ७२ जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सत युग में यही इस क्षेत्र का नाम था। त्रेता युग में भगवान नारायण के इस क्षेत्र को "योग सिद्ध", और फिर द्वापर युग में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के कारण इसे "मणिभद्र आश्रम" या "विशाला तीर्थ" कहा गया है।घोष १९३४ ७२ कलियुग में इस धाम को "बद्रिकाश्रम" अथवा "बद्रीनाथ" के नाम से जाना जाता है। स्थान का यह नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले बद्री (बेर) के वृक्षों के कारण पड़ा था।घोष १९३४ ७२ एडविन टी॰ एटकिंसन ने अपनी पुस्तक, "द हिमालयन गजेटियर" में इस बात का उल्लेख किया है कि इस स्थान पर पहले बद्री के घने वन पाए जाते थे, हालाँकि अब उनका कोई निशान तक नहीं बचा है। एडविन टी॰ एटकिन्सन The Himalayan gazetteer, Volume 3, Part 2 हिमालयी गजेटियर, खण्ड ३, भाग २ १९७३ काॅस्मो प्रकाशन दिल्ली https://books.google.co.in/books/about/The_Himalayan_gazetteer.html?id=GL-1AAAAIAAJ en 12 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20180812151756/https://books.google.co.in/books/about/The_Himalayan_gazetteer.html?id=GL-1AAAAIAAJ 12 अगस्त 2018 live बद्रीनाथ नाम की उत्पत्ति पर एक कथा भी प्रचलित है, जो इस प्रकार है - मुनि नारद एक बार भगवान् विष्णु के दर्शन हेतु क्षीरसागर पधारे, जहाँ उन्होंने माता लक्ष्मी को उनके पैर दबाते देखा। चकित नारद ने जब भगवान से इसके बारे में पूछा, तो अपराधबोध से ग्रसित भगवान विष्णु तपस्या करने के लिए हिमालय को चल दिए।सेनगुप्ता २००२ ३२ स्वामी २००२ १००-१०१ जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं।योगेन्द्र नाथ शर्मा तप-त्याग और भक्ति के चारधाम https://www.dainiktribuneonline.com/2018/04/%E0%A4%A4%E0%A4%AA-%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%BE/ ९ अगस्त २०१८ दैनिक ट्रिब्यून २८ अप्रैल २०१८ जुलाई 2023 InternetArchiveBot माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि "हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ-बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा।"मौली सेठ जानें कैसे पड़ा विष्‍णु जी के इस मन्दिर का नाम बद्रीनाथ https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-badrinath-a-famous-temple-of-lord-vishnu-17410091.html ९ अगस्त २०१८ दैनिक जागरण २५ जनवरी २०१८ https://web.archive.org/web/20180809122406/https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-badrinath-a-famous-temple-of-lord-vishnu-17410091.html 9 अगस्त 2018 live पौराणिक कथाएँ पौराणिक लोक कथाओं के अनुसार, बद्रीनाथ तथा इसके आस-पास का पूरा क्षेत्र किसी समय शिव भूमि (केदारखण्ड) के रूप में अवस्थित था। जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह बारह धाराओं में बँट गई,यहीं लिखी थी गई थी महाभारत, जानें बद्रीनाथ से जुड़ीं ७ बातें https://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-place-where-veda-vyasa-wrote-mahabharat-know-7-facts-about-badrinath-temple-in-h-5243706-PHO.html ९ अगस्त २०१८ दैनिक भास्कर ९ फ़रवरी २०१६ https://web.archive.org/web/20180809122517/https://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-place-where-veda-vyasa-wrote-mahabharat-know-7-facts-about-badrinath-temple-in-h-5243706-PHO.html 9 अगस्त 2018 dead तथा इस स्थान पर से होकर बहने वाली धारा अलकनन्दा के नाम से विख्यात हुई। मान्यतानुसार भगवान विष्णु जब अपने ध्यानयोग हेतु उचित स्थान खोज रहे थे, तब उन्हें अलकनन्दा के समीप यह स्थान बहुत भा गया। नीलकण्ठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतार लिया, और क्रंदन करने लगे। उनका रूदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा, और उन्होंने बालक के समीप उपस्थित होकर उसे मनाने का प्रयास किया, और बालक ने उनसे ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। यही पवित्र स्थान वर्तमान में बद्रीविशाल के नाम से सर्वविदित है।विष्णु की निवास भूमि – बद्रीनाथ https://www.jagran.com/spiritual/sadguru-vishnu-ki-nivas-bhumi-badrinath-11589571.html ९ अगस्त २०१८ दैनिक जागरण ६ सितम्बर २०१४ https://web.archive.org/web/20180809122421/https://www.jagran.com/spiritual/sadguru-vishnu-ki-nivas-bhumi-badrinath-11589571.html 9 अगस्त 2018 live विष्णु पुराण में इस क्षेत्र से संबंधित एक अन्य कथा है, जिसके अनुसार धर्म के दो पुत्र हुए- नर तथा नारायण, जिन्होंने धर्म के विस्तार हेतु कई वर्षों तक इस स्थान पर तपस्या की थी। अपना आश्रम स्थापित करने के लिए एक आदर्श स्थान की तलाश में वे वृद्ध बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री नामक चार स्थानों में घूमे। अंततः उन्हें अलकनंदा नदी के पीछे एक गर्म और एक ठंडा पानी का चश्मा मिला, जिसके पास के क्षेत्र को उन्होंने बद्री विशाल नाम दिया।स्वामी २००२ १००-१०१ यह भी माना जाता है कि व्यास जी ने महाभारत इसी जगह पर लिखी थी,प्रभापुंज मिश्रा यहां लिखा गया था ५वां वेद, हमेशा गर्म रहता है इस कुंड का पानी https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-holy-place-where-vedvyas-ji-and-lord-ganesh-were-written-mahabharat-16958796.html ९ अगस्त २०१८ दैनिक जागरण २ नवम्बर २०१७ https://web.archive.org/web/20180809122214/https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-holy-place-where-vedvyas-ji-and-lord-ganesh-were-written-mahabharat-16958796.html 9 अगस्त 2018 live और नर-नारायण ने ही क्रमशः अगले जन्म में क्रमशः अर्जुन तथा कृष्ण के रूप में जन्म लिया था।जानें, पूर्वजन्म में क्या थे महाभारत के महायोद्धा https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/photo/prebirth-of-arjun-krishna-and-other-mahabharat-character-31701/3/ ७ दिसम्बर २०१८ नवभारत टाइम्स १२ मई २०१७ hi https://web.archive.org/web/20180812115652/https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/photo/prebirth-of-arjun-krishna-and-other-mahabharat-character-31701/3/ 12 अगस्त 2018 live महाभारतकालीन एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। इसी कारण से बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं।भगवान राम, इंद्र और पांडवों ने किया था इन स्थानों पर पिंडदान https://www.bhaskarhindi.com/news/pind-daan-or-post-death-ritual-in-allahabad-badrinath-ujjain-12090 ९ अगस्त २०१८ दैनिक भास्कर १६ सितम्बर २०१७ नई दिल्ली https://web.archive.org/web/20180807220535/https://www.bhaskarhindi.com/news/pind-daan-or-post-death-ritual-in-allahabad-badrinath-ujjain-12090 7 अगस्त 2018 dead ग्रन्थों में वर्णन बद्रीनाथ मन्दिर का उल्लेख विष्णु पुराण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण समेत कई प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है।भल्ला २००६ १९० कई वैदिक ग्रंथों में (लगभग १७५०-५०० ईपू) भी मन्दिर के प्रधान देवता, बद्रीनाथ का उल्लेख मिलता है।नायर २००७ ६७–६८ स्कन्द पुराण में इस मन्दिर का वर्णन करते हुए लिखा गया है: "बहुनि सन्ति तीर्थानी दिव्य भूमि रसातले। बद्री सदृश्य तीर्थं न भूतो न भविष्यतिः॥", अर्थात स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल तीनों ही जगह अनेकों तीर्थ स्थान हैं, परन्तु फिर भी बद्रीनाथ जैसा कोई तीर्थ न कभी था, और न ही कभी होगा। मन्दिर के आसपास के क्षेत्र को पद्म पुराण में आध्यात्मिक निधियों से परिपूर्ण कहा गया है।नौटियाल १९६२ ११० भागवत पुराण के अनुसार बद्रिकाश्रम में भगवान विष्णु सभी जीवित इकाइयों के उद्धार हेतु नर तथा नारायण के रूप में अनंत काल से तपस्या में लीन हैं। महाभारत में बद्रीनाथ का उल्लेख करते हुए लिखा गया है - "अन्यत्र मरणामुक्ति: स्वधर्म विधिपूर्वकात। बदरीदर्शनादेव मुक्ति: पुंसाम करे स्थिता॥" अर्थात अन्य तीर्थों में तो स्वधर्म का विधिपूर्वक पालन करते हुए मृत्यु होने से ही मनुष्य की मुक्ति होती है, किन्तु बद्री विशाल के दर्शन मात्र से ही मुक्ति उसके हाथ में आ जाती है।भल्ला २००६ १९० इसी तरह वराहपुराण के अनुसार मनुष्य कहीं से भी बद्री आश्रम का स्मरण करता रहे तो वह पुनरावृत्तिवर्जित वैष्णव धाम को प्राप्त होता है, यथा: "श्री बदर्याश्रमं पुण्यं यत्र यत्र स्थित: स्मरेत। स याति वैष्णवम स्थानं पुनरावृत्ति वर्जित:॥" सातवीं से नौवीं शताब्दी के मध्य आलवार सन्तों द्वारा रचित नालयिर दिव्य प्रबन्ध ग्रन्थ में भी इस मन्दिर की महिमा का वर्णन है; सन्त पेरियालवार द्वारा लिखे ७ स्तोत्र, तथा तिरुमंगई आलवार द्वारा लिखे १३ स्तोत्र इसी मन्दिर को समर्पित हैं। यह मन्दिर भगवन विष्णु को समर्पित १०८ दिव्यदेशम् में से भी एक है।Sri Badrinath Perumal temple श्री बद्रीनाथ पेरुमल मन्दिर http://temple.dinamalar.com/New.php?id=1783 दिनामलार १ जनवरी २०१४ https://web.archive.org/web/20181104211139/http://temple.dinamalar.com/New.php?id=1783 4 नवंबर 2018 dead इतिहास अंगूठाकार|बायें|नर तथा नारायण।माना जाता है कि इन दोनों ने बद्रीनाथ मन्दिर में कई वर्षों तक तपस्या की थी। बद्रीनाथ मन्दिर की उत्पत्ति के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार, यह मन्दिर आठवीं शताब्दी तक एक बौद्ध मठ था, जिसे आदि शंकराचार्य ने एक हिन्दू मन्दिर में परिवर्तित कर दिया।त्यागी १९९१ ७० सदासिवन् २००० २११ इस तर्क के पीछे मन्दिर की वास्तुकला एक प्रमुख कारण है, जो किसी बौद्ध विहार (मन्दिर) के सामान है; इसका चमकीला तथा चित्रित मुख-भाग भी किसी बौद्ध मन्दिर के समान ही प्रतीत होता है।सेनगुप्ता २००२ ३२ अन्य स्रोत बताते हैं कि इस मन्दिर को नौवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा एक तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया गया था। एक अन्य मान्यता यह भी है कि शंकराचार्य छः वर्षों तक (८१४ से ८२० तक) इसी स्थान पर रहे थे। इस स्थान में अपने निवास के दौरान वह छह महीने के लिए बद्रीनाथ में, और फिर शेष वर्ष केदारनाथ में रहते थे। हिंदू अनुयायियों का कहना है कि बद्रीनाथ की मूर्ति देवताओं ने स्थापित की थी। जब बौद्धों का पराभव हुआ, तो उन्होंने इसे अलकनन्दा में फेंक दिया। शंकराचार्य ने ही अलकनंदा नदी में से बद्रीनाथ की इस मूर्ति की खोज की, और इसे तप्त कुंड नामक गर्म चश्मे के पास स्थित एक गुफा में स्थापित किया।नौटियाल १९६२ ११० स्वामी २००४ १००–१०१ तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।बद्रीनाथ धाम में पूजा के समय रावल को बनना पड़ता है स्त्री, जानिए इसके पीछे की रोचक कहानी https://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/badrinath-dham-priest-become-women-during-puja ९ अगस्त २०१८ अमर उजाला १७ नवम्बर २०१७ देहरादून https://web.archive.org/web/20180809122150/https://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/badrinath-dham-priest-become-women-during-puja 9 अगस्त 2018 live अंगूठाकार|१८८२ के गढ़वाल क्षेत्र के मानचित्र पर बद्रीनाथ की स्थिति। एक पारंपरिक कहानी के अनुसार शंकराचार्य ने परमार शासक राजा कनक पाल की सहायता से इस क्षेत्र से सभी बौद्धों को निष्कासित कर दिया था।गुहा २००० ६४ इसके बाद कनकपाल, और उनके उत्तराधिकारियों ने ही इस मन्दिर की प्रबन्ध व्यवस्था संभाली। गढ़वाल के राजाओं ने मन्दिर प्रबन्धन के खर्चों को पूरा करने के लिए ग्रामों के एक समूह (गूंठ) की स्थापना की। इसके अतिरिक्त मन्दिर की ओर आने वाले रास्ते पर भी कई ग्राम बसाये गए, जिनसे हुई आय का उपयोग तीर्थयात्रियों के खाने और ठहरने की व्यवस्था करने के लिए किया जाता था।गुहा २००० ६४ समय के साथ-साथ, परमार शासकों ने "बोलांद बद्रीनाथ" नाम अपना लिया, जिसका अर्थ बोलते हुए बद्रीनाथ है। उनका एक अन्य नाम "श्री १०८ बद्रीश्चारायपरायण गढ़राज महिमहेन्द्र, धर्मवैभव, धर्मरक्षक शिरोमणि" भी था।गुहा २००० ६४ इस समय तक गढ़वाल राज्य के सिंहासन को "बद्रीनाथ की गद्दी" कहा जाने लगा था, और मन्दिर में जाने से पहले भक्त राजा को श्रद्धा अर्पित करते थे। यह प्रथा उन्नीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध तक जारी रही।गुहा २००० ६४ सोलहवीं शताब्दी में गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने बद्रीनाथ मूर्ति को गुफा से लाकर वर्तमान मन्दिर में स्थापित किया।नौटियाल १९६२ ११० मन्दिर के बन जाने के बाद इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई ने यहां स्वर्ण कलश छत्री चढ़ाई थी।ललित भट्‌ट देवभूमि उत्तराखंड स्थित पंचबद्री, पंचकेदार, पंचप्रयागों का जानें महात्म्य http://hindi.webdunia.com/religious-places/uttarakhand-dev-bhoomi-badrinath-devprayag-pancpryag-116091900001_1.html ९ अगस्त २०१८ वेबदुनिया ९ अगस्त २०१८ https://web.archive.org/web/20180809122503/http://hindi.webdunia.com/religious-places/uttarakhand-dev-bhoomi-badrinath-devprayag-pancpryag-116091900001_1.html 9 अगस्त 2018 dead बीसवीं शताब्दी में जब गढ़वाल राज्य को दो भागों में बांटा गया, तो बद्रीनाथ मन्दिर ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया; हालाँकि मन्दिर की प्रबंधन समिति का अध्यक्ष तब भी गढ़वाल का राजा ही होता था।गुहा २००० ६४ मन्दिर की आयु, और क्षेत्र में निरन्तर आने वाले हिमस्खलनों के कारण होने वाली क्षति के फलस्वरूप मन्दिर का कई बार नवीनीकरण हुआ है। सत्रहवीं शताब्दी में गढ़वाल के राजाओं द्वारा मन्दिर का विस्तार करवाया गया था। १८०३ में इस हिमालयी क्षेत्र में आये एक भूकम्प ने मन्दिर को भारी क्षति पहुंचाई थी, जिसके बाद यह मन्दिर जयपुर के राजा द्वारा पुनर्निर्मित करवाया गया था।सेनगुप्ता २००२ ३२ निर्माण कार्य १८७० के दशक के अंत तक चल ही रहे थे,बेन्स १८७८ हालाँकि यह मन्दिर प्रथम विश्व युद्ध के समय तक बनकर पूरी तरह से तैयार हो गया था।चिशोल्म १९११ इस समय तक मन्दिर के आस पास एक छोटा सा नगर भी बसने लगा था, जिसमें मन्दिर के कर्मचारियों के आवास के रूप में २० झोपड़ियां थी।चिशोल्म १९११ तब तीर्थयात्रियों की संख्या आमतौर पर सात से दस हजार के बीच रहती थी, हालाँकि प्रत्येक बारह वर्षों में आने वाले कुम्भ मेल्डे त्यौहार के समय इन आगंतुकों की संख्या ५०,००० तक बढ़ जाती थी।बेन्स १८७८ मन्दिर को विभिन्न राजाओं द्वारा दान दिए गए कई ग्रामों से भी राजस्व प्राप्ति होती थी। २००६ में राज्य सरकार ने अवैध अतिक्रमण पर रोक लगाने के लिए बद्रीनाथ के आसपास के क्षेत्र को नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित कर दिया।Uttaranchal declares Badrinath as no construction zone उत्तरांचल ने बद्रीनाथ को नो कंस्ट्रक्शन जोन घोषित किया http://www.highbeam.com/doc/1P3-1034737141.html हिन्दुस्तान टाइम्स बद्रीनाथ ९ मई २००६ १ जनवरी २०१४ en https://web.archive.org/web/20140611123342/http://www.highbeam.com/doc/1P3-1034737141.html 11 जून 2014 dead HighBeam अवस्थिति अंगूठाकार|बद्रीनाथ मन्दिर गढ़वाल क्षेत्र में अलकनन्दा नदी के किनारे स्थित है। बद्रीनाथ मन्दिर की भौगोलिक अवस्थिति ३०.७४° उत्तरी अक्षांश तथा ७९.४४° पूर्वी देशांतर पर है। यह स्थान, उत्तरी भारत में हिमालय की ऊँची पर्वत श्रेणियों के क्षेत्र में बसे भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में है और इस मन्दिर के नाम पर ही आसपास बसे नगर को भी बद्रीनाथ ही कहा जाता है। नगर का आधिकारिक नाम बद्रीनाथपुरी है और प्रशासनिक तौर पर यह चमोली जिले की जोशीमठ तहसील में एक नगर पंचायत है।Badrinathpuri (NP) Nagar Panchayat बद्रीनाथपुरी नगर पंचायत https://indikosh.com/city/42929/badrinathpuri इंडिकोष ४ नवम्बर २०१८ https://web.archive.org/web/20181104211220/https://indikosh.com/city/42929/badrinathpuri 4 नवंबर 2018 dead लगभग २ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस नगर की वर्ष २०११ में कुल जनसंख्या २,४3८ थी।Badrinathpuri Population Census 2011 - 2018 बद्रीनाथपुरी जनसंख्या जनगणना २०११ - २०१८ http://www.census2011.co.in/data/town/800290-badrinathpuri-uttarakhand.html सेंसस २०११ ४ नवम्बर २०१८ भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के रूप में जाना जाता है और इसी क्षेत्र की एक सुरम्य घाटी में स्थित इस स्थान की समुद्र तल से औसत ऊंचाई ३,१३३ मीटर (१०,२७९ फीट) है।About the temple मन्दिर के बारे में http://www.badarikedar.org/badrinath.aspx श्री बद्रीनाथ - श्री केदारनाथ मन्दिर समिति २००६ १ जनवरी २०१४ https://web.archive.org/web/20131214005611/http://badarikedar.org/badrinath.aspx 14 दिसंबर 2013 dead India through the ages विभिन्न कालों में भारत गोपाल मदन १९९० १७४ केएस गौतम प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार पर्वत श्रेणियों के अनुक्रम के अनुसार, यह स्थान हिमालय की उस श्रेणी पर अवस्थित है जिसे "महान हिमालय" अथवा "मध्य हिमालय" के नाम से जाना जाता है।के॰ एस॰ गुलिया Discovering Himalaya : Tourism Of Himalayan Region (2 Vols.) हिमालय की खोज: हिमालयी क्षेत्र का पर्यटन (२ खण्ड) https://books.google.com/books?id=ugFIz7ph-kEC&pg=PA65 २००७ ज्ञान पब्लिशिंग हाउस 978-81-8205-410-3 ६५-६६मलखान झा The Himalayas: An Anthropological Perspective हिमालय: एक नृवैज्ञानिक दृष्टिकोण https://books.google.com/books?id=zeg-uNBcgncC&pg=PA104 १९९६ एम डी पब्लिकेशन्स प्रा॰ लि॰ 978-81-7533-020-7 १०४–१०५ यह क्षेत्र उन कई पर्वतीय जलधाराओं का उद्गम स्थल है जो एक दूसरे में मिलकर अंततः भारत की प्रमुख नदी गंगा का रूप लेती हैं। इन्हीं पर्वतीय सरिताओं में से एक प्रमुख धारा अलकनन्दा इस घाटी से होकर बहती है जिसमें यह मन्दिर स्थित है। मन्दिर और शहर अलकनन्दा और इसकी सहायिका ऋषिगंगा नदी के पवित्र संगम पर स्थित हैं।बी के चतुर्वेदी Tourist Centers Of India भारत के पर्यटक केंद्र https://books.google.com/books?id=QrLcFkhRZPYC&pg=PA100 डायमण्ड पॉकेट बुक्स (प्रा॰) लि॰ 978-81-7182-137-2 १००– मन्दिर अलकनन्दा नदी के दाहिने तट पर, इसके पश्चिम में, स्थित है और मंदिर से कुछ ही दूर आगे दक्षिण में ऋषिगंगा नदी पश्चिम दिशा से आकर अलकनन्दा में मिलती है। जिस घाटी में यह संगम होता है, मन्दिर के ठीक सामने नर पर्वत, जबकि पीठ की ओर नीलाकण्ठ शिखर के पीछे नारायण पर्वत स्थित है।नायर २००७ ६७–६८ इसके पश्चिम में २७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित ७,१३८ मीटर ऊँचा बद्रीनाथ शिखर स्थित है। मन्दिर के ठीक नीचे तप्त कुण्ड नामक गर्म चश्मा है। सल्फर युक्त पानी के इस चश्मे को औषधीय माना जाता है; कई तीर्थयात्री मन्दिर में जाने से पहले इस चश्मे में स्नान करना आवश्यक मानते हैं। इन चश्मों में सालाना तापमान ५५ डिग्री सेल्सियस (११३ डिग्री फ़ारेनहाइट) होता है, जबकि बाहरी तापमान आमतौर पर पूरे वर्ष १७ डिग्री सेल्सियस (६३ डिग्री फ़ारेनहाइट) से भी नीचे रहता है। तप्त कुण्ड का तापमान १३० डिग्री सेल्सियस तक भी दर्ज किया जा चुका है।https://m.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-bdraivishal-darshan-means-baikunyh-darshan-12306278.html संग्रहीत प्रति 12 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20180812115657/https://m.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-bdraivishal-darshan-means-baikunyh-darshan-12306278.html 12 अगस्त 2018 live मन्दिर में पानी के दो तालाब भी हैं, जिन्हें क्रमशः नारद कुण्ड और सूर्य कुण्ड कहा जाता है।भल्ला २००६ ११० स्थापत्य शैली अंगूठाकार|बाएँ|मन्दिर का प्रवेश द्वार बद्रीनाथ मन्दिर अलकनन्दा नदी से लगभग ५० मीटर ऊंचे धरातल पर निर्मित है, और इसका प्रवेश द्वार नदी की ओर देखता हुआ है। मन्दिर में तीन संरचनाएं हैं: गर्भगृह, दर्शन मंडप, और सभा मंडप।नायर २००७ ६७–६८ त्यागी १९९१ ७० मन्दिर का मुख पत्थर से बना है, और इसमें धनुषाकार खिड़कियाँ हैं। चौड़ी सीढ़ियों के माध्यम से मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंचा जा सकता है, जिसे सिंह द्वार कहा जाता है। यह एक लंबा धनुषाकार द्वार है। इस द्वार के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश लगे हुए हैं, और छत के मध्य में एक विशाल घंटी लटकी हुई है। अंदर प्रवेश करते ही मंडप है: एक बड़ा, स्तम्भों से भरा हॉल जो गर्भगृह या मुख्य मन्दिर क्षेत्र की ओर जाता है। हॉल की दीवारों और स्तंभों को जटिल नक्काशी के साथ सजाया गया है।सेनगुप्ता २००२ ३२ इस मंडप में बैठ कर श्रद्धालु विशेष पूजाएँ तथा आरती आदि करते हैं। सभा मंडप में ही मन्दिर के धर्माधिकारी, नायब रावल एवं वेदपाठी विद्वानों के बैठने का स्थान है। गर्भगृह की छत शंकुधारी आकार की है, और लगभग १५ मीटर (४९ फीट) लंबी है। छत के शीर्ष पर एक छोटा कपोला भी है, जिस पर सोने का पानी चढ़ा हुआ है।नायर २००७ ६७–६८ नौटियाल १९६२ ११० गर्भगृह में भगवान बद्रीनारायण की १ मीटर (३.३ फीट) लम्बी शालीग्राम से निर्मित मूर्ति है,क्यों बनाए गए चार धाम? https://www.livehindustan.com/astrology/highlights/article1-why-chardham-created-718099.amp.html ९ अगस्त २०१८ हिन्दुस्तान २७ फ़रवरी २०१७ https://web.archive.org/web/20180808013352/https://www.livehindustan.com/astrology/highlights/article1-why-chardham-created-718099.amp.html 8 अगस्त 2018 dead जिसे बद्री वृक्ष के नीचे सोने की चंदवा में रखा गया है। बद्रीनारायण की इस मूर्ति को कई हिंदुओं द्वारा विष्णु के आठ स्वयं व्यक्त क्षेत्रों (स्वयं प्रकट हुई प्रतिमाओं) में से एक माना जाता है।सेनगुप्ता २००२ ३२ मूर्ति में भगवान के चार हाथ हैं - दो हाथ ऊपर उठे हुए हैं: एक में शंख, और दूसरे में चक्र है, जबकि अन्य दो हाथ योगमुद्रा (पद्मासन की मुद्रा) में भगवान की गोद में उपस्थित हैं।त्यागी १९९१ ७० शशिभूषण मैठानी बद्रीनाथ धाम में पद्मासन मुद्रा में हैं भगवान विष्णु https://aajtak.intoday.in/story/special-report-on-badrinath-dham-1-730636.html ९ अगस्त २०१८ आज तक १५ मई २०१३ बद्रीनाथ https://web.archive.org/web/20180809122458/https://aajtak.intoday.in/story/special-report-on-badrinath-dham-1-730636.html 9 अगस्त 2018 live मूर्ति के ललाट पर हीरा भी जड़ा हुआ है।सुनील शर्मा बद्रीनाथ के दर्शन से मिलता है दिव्यलोक https://www.patrika.com/pilgrimage-trips/char-dham-yatra-special-badrinath-dham-gives-liberation-from-earth-1312027/ ३१ अगस्त २०१८ www.patrika.com पत्रिका १ जून २०१६ https://web.archive.org/web/20180901003725/https://www.patrika.com/pilgrimage-trips/char-dham-yatra-special-badrinath-dham-gives-liberation-from-earth-1312027/ 1 सितंबर 2018 live गर्भगृह में धन के देवता कुबेर, देवर्षि नारद, उद्धव, नर और नारायण की मूर्तियां भी हैं।वन्दना शर्मा संध्या टण्डन बद्रीनाथ कैसे बना लक्ष्मी-नारायण का धाम जानें यह रोचक घटनाक्रम https://inextlive.jagran.com/interesting-facts-must-know-about-badrinath-dham-201806060011 ९ अगस्त २०१८ दैनिक जागरण आईनेक्सटलाइव ६ जून २०१८ बद्रीनाथ https://web.archive.org/web/20180809122453/https://inextlive.jagran.com/interesting-facts-must-know-about-badrinath-dham-201806060011 9 अगस्त 2018 dead मन्दिर के चारों ओर पंद्रह और मूर्तियों की भी पूजा की जाती हैं। इनमें लक्ष्मी (विष्णु की पत्नी), गरुड़ (नारायण का वाहन), और नवदुर्गा (नौ अलग-अलग रूपों में दुर्गा) की मूर्तियां शामिल हैं। इनके अतिरिक्त मन्दिर परिसर में गर्भगृह के बाहर लक्ष्मी-नृसिंह और संत आदि शंकराचार्य (७८८–८२० ईसा पश्चात), नर और नारायण, वेदान्त देशिक, रामानुजाचार्य और माना गाँव के एक स्थानीय लोकदेवता घण्टाकर्ण की मूर्तियां भी हैं। बद्रीनाथ मन्दिर में स्थित सभी मूर्तियां शालीग्राम से बनी हैं।सेनगुप्ता २००२ ३२ नायर २००७ ६७–६८ तीर्थाटन तीर्थयात्रियों की संख्या collapsed left off 1990 ३६२७५७ 1995 २७५९०० 2000 ७३५२०० 2005 ५६६५२४ 2010 ९२१९५० 2012 १०६०००० स्रोत:Number of pilgrims the temple मन्दिर में तीर्थयात्रियों की संख्या http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=9 श्री बद्रीनाथ - श्री केदारनाथ मन्दिर समिति २००६ १ जनवरी २०१४ dead https://web.archive.org/web/20131029195018/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=9 २९ अक्टूबर २०१३ dmy हिंदू धर्म के सभी मतों और सम्प्रदायों के अनुयायी बद्रीनाथ मन्दिर के दर्शन हेतु आते हैं।राव २००८ ४७४ ऐक २०१२ ३४३–३४४ यहाँ काशी मठ,Kashi Math at Badrinath बद्रीनाथ में कशी मठ http://www.kashimath.org/branches/ श्री कशी मठ संस्थानम १० सितम्बर २०१४ https://web.archive.org/web/20180808203059/https://www.kashimath.org/branches/ 8 अगस्त 2018 dead जीयर मठ (आंध्र मठ),Badari Ashtakshari Kshethriya Annadana Sakha Sangham, (BAKASS) बद्री अष्टाक्षरी क्षेत्रीय अन्नदान शाखा संघम, (बीएकेएएसएस) http://www.chinnajeeyar.org/main/content/badari-ashtakshari-kshethriya-annadana-sakha-sangham-bakass/ चिन्ना जीयर मठ १० सितम्बर २०१४ https://web.archive.org/web/20140910201610/http://www.chinnajeeyar.org/main/content/badari-ashtakshari-kshethriya-annadana-sakha-sangham-bakass/ 10 सितंबर 2014 dead उडुपी श्री कृष्ण मठUdupi Mutt at Badrinath बद्रीनाथ में उडुपी मठ http://www.vishveshavani.com/contact/ पेजवरा अधोकक्ष मठ, उडुपी १० सितम्बर २०१४ https://web.archive.org/web/20180808171742/http://www.vishveshavani.com/contact/ 8 अगस्त 2018 live और मंथ्रालयम श्री राघवेंद्र स्वामी मठRaghavendra Mutt Branches राघवेंद्र मठ की शाखाएं http://www.raghavendramutt.org/node/38 राघवेंद्र मठ १० सितम्बर २०१४ https://web.archive.org/web/20140922161955/http://www.raghavendramutt.org/node/38 22 सितंबर 2014 dead जैसे लगभग सभी प्रमुख मठवासी संस्थानों की शाखाएं और अतिथि विश्राम गृह हैं। बद्रीनाथ मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित पांच संबंधित मन्दिरों में से एक है, जिन्हें पंच बद्री के रूप में एक साथ पूजा जाता है।बंसल २००५ ३५ ये पांच मन्दिर हैं - बद्रीनाथ में स्थित बद्री-विशाल (बद्रीनाथ मन्दिर), पांडुकेश्वर में स्थित योगध्यान-बद्री, ज्योतिर्मठ से १७ किमी (१०.६ मील) दूर सुबेन में स्थित भविष्य-बद्री, ज्योतिर्मठ से ७ किमी (४.३ मील) दूर अणिमठ में स्थित वृद्ध-बद्री और कर्णप्रयाग से १७ किमी (१०.६ मील) दूर रानीखेत रोड पर स्थित आदि बद्री। इन पांच मन्दिरों के साथ जब दो अन्य मन्दिरों को भी जोड़ा जाता है, तो इन सात मन्दिरों को संयुक्त रूप से सप्त-बद्री कहा जाता है। सप्त बद्री में इन पांच मन्दिरों के अतिरिक्त कल्पेश्वर के निकट स्थित ध्यान-बद्री तथा ज्योतिर्मठ-तपोवन के समीप स्थित अर्ध-बद्री भी शामिल हैं। ज्योतिर्मठ के नृसिंह बद्री को भी कभी कभी पंच-बद्री (योगध्यान बद्री के स्थान पर) या सप्त-बद्री (अर्ध बद्री के स्थान पर) में स्थान दिया जाता है। उत्तराखण्ड में पंच बद्री, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माने जाते हैं।भारी बारिश से बद्रीनाथ यात्रा बाधित, यात्री फंसे http://www.patrika.com/news/heavy-rain-interrupts-badrinath-yatra/1020720 पत्रिका समाचार समूह ३० जुलाई २०१४ ३१ जुलाई २०१४ https://web.archive.org/web/20140803025330/http://www.patrika.com/news/heavy-rain-interrupts-badrinath-yatra/1020720 3 अगस्त 2014 live बद्रीनाथ भारत के सबसे लोकप्रिय तथा पवित्र मन्दिर माने जाने वाले चार धामों में से एक है; अन्य धाम रामेश्वरम, पुरी और द्वारका हैं।चक्रवर्ती १९९४ १४० यद्यपि इन धामों की उत्पत्ति स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, परन्तु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित हिंदू धर्म के अद्वैत सम्प्रदाय ने इनकी उत्पत्ति का श्रेय शंकराचार्य को ही दिया है। भारत के चार कोनों में स्थित इन धामों की यात्रा हिंदुओं द्वारा पवित्र मानी जाती है, और हिन्दू धर्म से सम्बन्धित प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम एक बार तो इन धामों का दौरा करने की इच्छा रखता है।ग्वेन २००९ परंपरागत रूप से, यह तीर्थयात्रा पूर्वी छोर पर स्थित पुरी से शुरू होती है, और फिर दक्षिणावर्त (घडी की दिशा में) आगे बढ़ती है।ग्वेन २००९ इन धामों के अतिरिक्त भारत के चार कोनों में चार मठ भी स्थित हैं और उनके समीप ही उनके परिचारक मन्दिर भी हैं। ये मन्दिर हैं: उत्तर में बद्रीनाथ में स्थित बद्रीनाथ मन्दिर, पूर्व में उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मन्दिर, पश्चिम में गुजरात के द्वारका में स्थित द्वारकाधीश मन्दिर, और दक्षिण में कर्नाटक के शृंगेरी में स्थित श्री शारदा पीठम शृंगेरी।चक्रवर्ती १९९४ १४० मित्तल २००४ ४८२–४८३ यद्यपि विचारधारा के आधार पर हिंदू धर्म मुख्यतः दो संप्रदायों, अर्थात् शैव (भगवान शिव के उपासक) और वैष्णवों (भगवान विष्णु के उपासक), में विभाजित हैं, परन्तु फिर भी चार धाम तीर्थयात्रा में दोनों ही सम्प्रदायों के लोग खुलकर भाग लेते हैं।ब्रॉकमैन २०११ ९४–९६ चार धाम की तर्ज पर ही उत्तराखण्ड में भी चार प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं, जिन्हें संयुक्त रूप से छोटा चार धाम कहा जाता है: बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री- ये सभी हिमालय की तलहटी में स्थित हैं।मित्तल २००४ ४८२–४८३ इनके नाम के आगे "छोटा" शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य में जोड़ा गया था, ताकि इन्हें मूल चार धामों से अलग किया जा सके। चूंकि आधुनिक समय में इन स्थलों के तीर्थयात्रियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, इसलिए अब इन्हें "हिमालय के चार धाम" भी कहा जाने लगा है।मेलटन बाउमान २०१० ५४० बद्रीनाथ में तथा इसके समीप अन्य भी कई दर्शनीय स्थल हैं। इनमें "ब्रह्म कपाल" (धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रयोग होने वाला एक समतल चबूतरा), "शेषनेत्र" (शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड), "चरणपादुका": (भगवान विष्णु के पैरों के निशान), "माता मूर्ति मन्दिर" (बद्रीनाथ भगवान की माता को समर्पित एक मन्दिर), "वेद व्यास गुफा" या "गणेश गुफा" (जहाँ वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ था) तथा पौराणिक कथाओं में उल्लिखित एक "साँपों का जोड़ा" शामिल है।सुनील नेगी भगवान नारायण सिर्फ बद्रीशपुरी ही नहीं, सात मन्दिरों में हैं विराजमान https://www.jagran.com/uttarakhand/dehradun-city-lord-narayana-has-seven-temples-in-uttarakhand-18428892.html ७ दिसम्बर २०१८ दैनिक जागरण १५ सितम्बर २०१८ hi https://web.archive.org/web/20181209124548/https://www.jagran.com/uttarakhand/dehradun-city-lord-narayana-has-seven-temples-in-uttarakhand-18428892.html 9 दिसंबर 2018 live बद्रीनाथ से ९ किलोमीटर की दूरी पर वसु धारा नामक झरना पड़ता है, जहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। मान्यता है कि इस झरने की बूंदे पापी व्यक्तियों के ऊपर नहीं गिरती हैं।पापियों के तन पर नहीं पड़ती बद्रीनाथ धाम में मौजूद इस जल की पवित्र धारा https://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/vasudhara-waterfall-uttarakhand? ७ दिसम्बर २०१८ अमर उजाला १० सितम्बर २०१६ देहरादून https://web.archive.org/web/20181209134606/https://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/vasudhara-waterfall-uttarakhand 9 दिसंबर 2018 live इसके अतितिक्त निकट ही स्थित सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) नमक स्थान के बारे में कहा जाता है कि यहीं से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।प्रीति झा सशरीर स्वर्ग जाने के लिए यहां गए थे पांडव, यही सीढ़ियां जाती हैं स्वर्ग की ओर https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-pandavas-were-here-to-go-to-heaven-in-the-flesh-the-stairs-to-heaven-15282443.html ७ दिसम्बर २०१८ दैनिक जागरण २९ दिसम्बर २०१६ hi https://web.archive.org/web/20181209124336/https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-pandavas-were-here-to-go-to-heaven-in-the-flesh-the-stairs-to-heaven-15282443.html 9 दिसंबर 2018 live पर्व तथा धार्मिक परम्पराएं बद्रीनाथ मन्दिर में आयोजित सबसे प्रमुख पर्व माता मूर्ति का मेला है, जो मां पृथ्वी पर गंगा नदी के आगमन की ख़ुशी में मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान बद्रीनाथ की माता की पूजा की जाती है, जिन्होंने, माना जाता है कि, पृथ्वी के प्राणियों के कल्याण के लिए नदी को बारह धाराओं में विभाजित कर दिया था। जिस स्थान पर यह नदी तब बही थी, वही आज बद्रीनाथ की पवित्र भूमि बन गई है। बद्री केदार यहाँ का एक अन्य प्रसिद्ध त्यौहार है, जो जून के महीने में बद्रीनाथ और केदारनाथ, दोनों मन्दिरों में मनाया जाता है। यह त्यौहार आठ दिनों तक चलता है, और इसमें आयोजित समारोह के दौरान देश-भर से आये कलाकार यहाँ प्रदर्शन करते हैं।Festivals celebrated in the temple मन्दिर में मनाए जाने वाले त्यौहार http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=11 श्री बद्रीनाथ - श्री केदारनाथ मन्दिर समिति २००६ १ जनवरी २०१४ dead https://web.archive.org/web/20120217172228/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=11 १७ फ़रवरी २०१२ dmy thumb|रात्रिकाल में बद्रीनाथ मन्दिर|alt=रात्रिकाल के समय हरी रौशनी से सजे मन्दिर का चित्र मन्दिर में प्रातःकाल होने वाली प्रमुख धार्मिक गतिविधियों में महाअभिषेक, अभिषेक, गीतापाठ और भागवत पूजा शामिल हैं, जबकि शाम को पूजा में गीत गोविन्द और आरती होती है। सभी अनुष्ठानों के दौरान अष्टोत्रम और सहस्रनाम जैसे वैदिक ग्रन्थों का उच्चारण किया जाता है। आरती के बाद, बद्रीनाथ की मूर्ति से सजावट हटा दी जाती है, और पूरी मूर्ति पर चन्दन का लेप लगाया जाता है। मूर्ति पर लगा ये चन्दन अगले दिन भक्तों को निर्मल्य दर्शन के दौरान प्रसाद के रूप में दिया जाता है। मन्दिर के लगभग सभी धार्मिक अनुष्ठान भक्तों के सामने ही किए जाते हैं, कुछ अन्य हिन्दू मन्दिरों के विपरीत, जहां ऐसे कुछ अभ्यास गुप्त रखे जाते हैं।नायर २००७ ६७–६८ भक्त मन्दिर में बद्रीनाथ की मूर्ति के सामने पूजा करने के साथ-साथ अलकनंदा नदी के एक कुण्ड में भी डुबकी लगाते हैं। प्रचलित धारणा यह है कि इस कुण्ड में डुबकी लगाने से व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है।डैविडसन गिटलिट्ज़ २००२ ४८ यहाँ वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। भक्तों को आम तौर पर प्रसाद में चीनी की गेंदें तथा शुष्क पत्तियां प्रदान की जाती हैं। मई २००६ से पंचमृत भी प्रसाद के रूप में दिया जाने लगा है। यह पंचामृत स्थानीय रूप से तैयार किया जाता है, और बांस की टोकरी में रखकर दिया जाता है। मन्दिर के कपाट भ्रातृ द्वितीया के दिन (या उसके बाद) अक्टूबर-नवंबर के आसपास सर्दियों के दौरान बन्द रहते हैं। जिस दिन मन्दिर के कपाट बन्द होते हैं, उस दिन एक दीपक में छह महीने के लिए पर्याप्त घी भरकर अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती है।भल्ला २००६ २५८ तीर्थयात्रियों और मन्दिर के अधिकारियों की उपस्थिति में मुख्य पुजारी द्वारा उस दिन विशेष पूजा भी की जाती है।Badrinath shrine closes marking end of Chardham Yatra http://zeenews.india.com/news/uttarakhand/badrinath-shrine-closes-marking-end-of-chardham-yatra_742346.html चार धाम यात्रा के अंत को चिह्नित करते हुए बद्रीनाथ मन्दिर बंद देहरादून ज़ी न्यूज़ १७ नवंबर २०११ २८ अप्रैल २०१४ https://web.archive.org/web/20180808073212/http://zeenews.india.com/news/uttarakhand/badrinath-shrine-closes-marking-end-of-chardham-yatra_742346.html 8 अगस्त 2018 live इसके बाद बद्रीनाथ की मूर्ति को मन्दिर से ४० मील (६४ किमी) दूर स्थित ज्योतिर्मठ के नरसिंह मंदिर में स्थानांतरित कर दिया जाता है। लगभग छह महीनों तक बन्द रहने के बाद मन्दिर के कपाट अक्षय तृतीया के अवसर पर अप्रैल-मई के आसपास फिर से खोल दिये जाते हैं।Badrinath shrine closed for winter बद्रीनाथ मन्दिर सर्दियों के लिए बंद http://timesofindia.indiatimes.com/india/Badrinath-shrine-closed-for-winter/articleshow/3724410.cms टीएनएन द टाइम्स ऑफ इंडिया देहरादून १८ नवम्बर २००८ २८ अप्रैल २०१४ https://web.archive.org/web/20180903051837/https://timesofindia.indiatimes.com/india/Badrinath-shrine-closed-for-winter/articleshow/3724410.cms 3 सितंबर 2018 live कपाट खुलने के दिन बड़ी संख्या में तीर्थयात्री अखण्ड ज्योति को देखने के लिए इकट्ठा होते हैं।भल्ला २००६ २५८ आरती मिश्रा बद्रीनाथ धाम: जल रही है अखंड ज्‍योति, दर्शन दे रहे हैं भगवान बद्री https://aajtak.intoday.in/story/badrinath-temple-opens-and-char-dham-yatra-begins-1-927603.html २० अगस्त २०१८ आज तक ६ मई २०१७ नई दिल्ली https://web.archive.org/web/20180820140934/https://aajtak.intoday.in/story/badrinath-temple-opens-and-char-dham-yatra-begins-1-927603.html 20 अगस्त 2018 live बद्रीनाथ मन्दिर भारत के उन कुछ पवित्र स्थलों में से एक है, जहां हिंदू लोग पुजारियों की सहायता से अपने पूर्वजों के लिए बलि चढ़ाते हैं।स्वामी २००४ १०२ प्रबन्धन left|thumb|200px|बद्रीनाथ में अलकनन्दा नदी|alt=अलकनन्दा नदी, और उस पर बने एक झूला पुल का दृश्य बद्रीनाथ मन्दिर को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार अधिनियम संख्या ३०/१९४८ में मन्दिर अधिनियम संख्या १६/१९३९तो रावल के 'कारनामे' के बाद बद्रीनाथ में लागू होगा एक्ट https://www.amarujala.com/dehradun/temple-act-1939-on-badrinath-temple ८ अगस्त २०१८ अमर उजाला ९ फ़रवरी २०१४ कर्णप्रयाग https://web.archive.org/web/20180808135816/https://www.amarujala.com/dehradun/temple-act-1939-on-badrinath-temple 8 अगस्त 2018 live के तहत शामिल किया गया था, जिसे बाद में "श्री बद्रीनाथ तथा श्री केदारनाथ मन्दिर अधिनियम" के नाम से जाना जाने लगा। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार राज्य सरकार द्वारा नामित एक समिति दोनों मन्दिरों का प्रबन्धन करती है। समिति के सदस्यों में बढ़ोतरी करने हेतु इस अधिनियम को २००२ में संशोधित किया गया, जिसके बाद कई सरकारी अधिकारियों और एक उपाध्यक्ष की नियुक्ति की जाने लगी। वर्तमान में परिषद् में सत्रह सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन उत्तराखण्ड विधानसभा द्वारा चुने जाते हैं, दस सदस्य राज्य सरकार द्वारा नामित होते हैं, और चार सदस्य गढ़वाल, टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी की जिला परिषदों द्वारा (सब में से एक-एक) नामित होते हैं।Committee members of the temple मन्दिर के कमेटी सदस्य http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=3 श्री बद्रीनाथ - श्री केदारनाथ मन्दिर समिति २००६ १ जनवरी २०१४ dead https://web.archive.org/web/20131029184513/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=3 २९ अक्टूबर २०१३ dmy जैसा कि मन्दिर के अभिलेखों में दर्ज है, मन्दिर के पारम्परिक पुजारी शिव की तपस्या करने वाले होते थे, जिन्हें दण्डी सन्यासी कहा जाता था। ये आधुनिक केरल में एक धार्मिक समूह नंबुदिरी समुदाय से संबंधित थे। जब १७७६ ईस्वी में इस समुदाय के आखिरी सदस्य की बिना किसी के उत्तराधिकारी के ही मृत्यु हो गई, तो गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने केरल से नंबूदिरि समाज के ही गैर-सन्यासी ब्राह्मणों को पूजा करने के लिए आमंत्रित किया- एक अभ्यास जो आधुनिक समय में भी जारी है। १९३९ तक, भक्तों द्वारा मन्दिर में चढ़ाए गए सभी चढ़ावे रावल (मुख्य पुजारी) को ही दिए जाते थे, परन्तु १९३९ के बाद उनका अधिकार क्षेत्र केवल धार्मिक मामलों तक ही सीमित कर दिया गया। मन्दिर की प्रशासनिक संरचना में शीर्ष पर एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है, जो राज्य सरकार आदेश निष्पादित करता है। उसके अतिरिक्त मन्दिर में एक उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी, दो ओएसडी, एक कार्यकारी अधिकारी, खाता अधिकारी, एक मन्दिर अधिकारी और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की सहायता के लिए एक प्रचार अधिकारी भी होता है। thumb|200px|गर्मियों में मन्दिर का दृश्य|alt=image showing Badrinath temple with mountain in the background हालांकि बद्रीनाथ उत्तर भारत में स्थित है, परन्तु फिर भी मन्दिर के रावल या मुख्य पुजारी परंपरागत रूप से दक्षिण भारतीय राज्य केरल से चुने गए नंबुदिरी ब्राह्मण ही होते हैं।शालिनी जोशी बद्रीनाथ मन्दिर में दक्षिण के पुजारी https://www.bbc.com/hindi/regionalnews/story/2005/05/050524_badrinath_priest.shtml ९ अगस्त २०१८ बीबीसी २४ मई २००५ https://web.archive.org/web/20180808081614/https://www.bbc.com/hindi/regionalnews/story/2005/05/050524_badrinath_priest.shtml 8 अगस्त 2018 live माना जाता है कि यह परंपरा आदि शंकराचार्य द्वारा शुरू की गई थी, जो दक्षिण भारतीय दार्शनिक थे। उत्तराखण्ड सरकार (राज्य के गठन से पहले उत्तर प्रदेश सरकार) द्वारा केरल सरकार के पास रावल (मुख्य पुजारी) के लिए अनुरोध किया जाता है। उम्मीदवार के लिए कई आवश्यक अहर्ताएं होती हैं: वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला होना चाहिए, उसके पास संस्कृत में आचार्य की डिग्री होनी चाहिए, वह मंत्रोच्चारण और पवित्र ग्रंथों को पढ़ने आदि में प्रवीण होना चाहिए, और साथ ही, वह हिंदू धर्म के वैष्णव पंथ से भी होना चाहिए। इसके बाद बद्रीनाथ के रक्षक के तौर पर गढ़वाल नरेश केरल सरकार द्वारा भेजे गए उम्मीदवार को मंजूरी देते हैं। उम्मीदवार को रावल की पदवी देने के लिए एक तिलक समारोह आयोजित किया जाता है, और अप्रैल से नवंबर तक जब मन्दिर खुला रहता है तो उसे वहां नियुक्त किया जाता है। रावल को गढ़वाल राइफल्स और उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों द्वारा हाई होलीनेस (सबसे पवित्र) की उपाधि प्रदान की जाती है। उन्हें नेपाल के राजघराने में भी काफी उच्च सम्मान प्राप्त होता है। अप्रैल से नवंबर तक रावल मन्दिर के पुजारी के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करता है, और इसके बाद वह या तो ज्योतिर्मठ में रहता है, या वापस केरल में अपने मूल गांव को लौट जाता है। रावल की दिनचर्या अभिषेक के साथ ही प्रत्येक दिन प्रातःकाल ४ बजे से शुरू हो जाती है। वे वामन द्वादशी तक अलकनन्दा नदी पार नहीं कर सकते, और उन्हें पूरे समय ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। रावल की सहायता के लिए ग्राम दीमर से संबंधित गढ़वाली दीमरी पंडित, नायब रावल, धर्मदीकरी, वेदपति, पुजारियों का समूह, पंडा समाधनी, भंडारी, रसोइये, भजन गायक, देवाश्रम का एक लिपिक, जल भरिया (जलापूर्ति सुनिश्चित करने वाला) और मन्दिर के चौकीदारों की तैनाती की जाती है। बद्रीनाथ उत्तर भारत के उन कुछ मन्दिरों में से एक है, जो मुख्यतः दक्षिण में प्रचलित श्रौतसूत्र परंपरा की प्राचीन तंत्र-विधि का पालन करता है।स्वामी २००४ १०२ आउटलुक ट्रैवलर http://traveller.outlookindia.com/fulltravelogue.aspx?id=216 Badrinath बद्रीनाथ Traveller.outlookindia.com १ जनवरी २०१४ dead https://web.archive.org/web/20131029201558/http://traveller.outlookindia.com/fulltravelogue.aspx?id=216 २९ अक्टूबर २०१३ dmy http://www.hinduonnet.com/thehindu/fr/2008/07/18/stories/2008071851520400.htm द हिन्दू Badrinath Temple बद्रीनाथ मन्दिर १८ जुलाई २००५ १ जनवरी २०१४ 11 नवंबर 2012 https://archive.today/20121111030256/http://www.hinduonnet.com/thehindu/fr/2008/07/18/stories/2008071851520400.htm dead आवागमन बद्रीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते कर्णप्रयाग में मिल जाते है। राष्ट्रीय राजमार्ग ७ बद्रीनाथ से होकर गुजरता है। यह राजमार्ग पंजाब के फाजिल्का नगर से शुरू होकर भटिण्डा और पटियाला से होता हुआ हरियाणा के पंचकुला, हिमाचल प्रदेश के पाओंटा साहिब और उत्तराखण्ड के देहरादून, ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली तथा जोशीमठ इत्यादि नगरों से होते हुए बद्रीनाथ पहुँचता है, और यहां से आगे बढ़ते हुए भारत-चीन सीमा पर स्थित ग्राम माणा में पहुंचकर समाप्त हो जाता है।http://dorth.gov.in/writereaddata/sublinkimages/finaldoc6143316640.pdf Rationalisation of Numbering Systems of National Highways राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या प्रणाली का युक्तिकरण सड़क परिवहन और राजमार्ग मन्त्रालय, भारत सरकार ३ अप्रैल २०१२ नई दिल्ली https://web.archive.org/web/20160201124738/http://dorth.gov.in/writereaddata/sublinkimages/finaldoc6143316640.pdf 1 फ़रवरी 2016 dead केदारनाथ की ओर से भी गौरीकुंड से गुप्तकाशी, चोक्ता (चोटवा), गोपेश्वर और जोशीमठ होते हुए सड़क मार्ग को लगभग २२१ किमी की दूरी तय कर बद्रीनाथ मन्दिर तक पहुंचा जा सकता है।नायर २००७ ६७–६८ नियति भण्डारी चारधाम यात्रा पर जाने वालों के लिए खास जानकारी https://www.punjabkesari.in/dharm/news/char-dham-yatra-792601 ९ अगस्त २०१८ पंजाब केसरी २७ अप्रैल २०१८ https://web.archive.org/web/20180809122933/https://www.punjabkesari.in/dharm/news/char-dham-yatra-792601 9 अगस्त 2018 dead कभी हरिद्वार से इस यात्रा में महीनों लग जाते थे, परन्तु अब बेहतर सड़क मार्ग बन जाने के कारण हफ्ते-भर से भी कम समय में ही यह यात्रा हो जाती है। जोशीमठ से बद्रीनाथ की दूरी लगभग ५० किलोमीटर है। यहाँ से १२ किलोमीटर की दूरी पर विष्णुप्रयाग है, जहाँ अलकनंदा और धौलीगंगा नदियों का संगम होता है। विष्णुप्रयाग से लगभग १० किमी दूर गोविन्दघाट है, जहाँ से एक रास्ता सीधा बद्रीनाथ को जाता है, और दूसरा घांघरिया होते हुए फूलों की घाटी एवं हेमकुंट साहिब को जाता है। गोविन्दघाट से मात्र ३ किमी की दूरी पर पांडुकेश्वर है। पांडुकेश्वर से १० किमी आगे हनुमानचट्टी, और वहां से ११ किमी की दूरी पर स्थित है बद्रीनाथ। बद्रीनाथ जाने के लिये परमिट की जरुरत पडती है, जो कि जोशीमठ के एसडीएम द्वारा बनाया जाता है। इसे जोशीमठ से बद्रीनाथ के बीच में ट्रैफिक कंट्रोल के लिए लागू किया जाता है। रास्ते में ट्रैफिक बहुत होने के कारण से बेरियर लगाए जाते है और इस परमिट के माध्यम से ही पुलिस ट्रैफिक कंट्रोल करती है। २०१२ में, मन्दिर प्रशासन ने मन्दिर के आगंतुकों के लिए एक टोकन प्रणाली की शुरुआत की। टोकन स्टैंड में लगे तीन स्टालों से यात्रा के समय को इंगित करने वाले टोकन प्रदान किए जाते हैं। प्रत्येक भक्त को गर्भगृह का दौरा करने के लिए १०-२० सेकंड आवंटित किया जाता है। मन्दिर में प्रवेश करने के लिए पहचान का प्रमाण साथ होना अनिवार्य है।News about the temple मन्दिर के बारे में समाचार http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=29 श्री बद्रीनाथ - श्री केदारनाथ मन्दिर समिति २००६ १ जनवरी २०१४ dead https://web.archive.org/web/20131029195444/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=29 २९ अक्टूबर २०१३ dmy सन्दर्भ उद्धरण 3 आधार ग्रन्थ बंसल सुनीता पन्त जून २००५ Hindu Gods and Goddesses https://archive.org/details/hindugodsgoddess0000bans हिन्दू देवता तथा देवियां एसपीबी इंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड 978-81-87967-72-9 en harv Badrinath 3 229 harv भल्ला प्रेम पी २००६ Hindu Rites, Rituals, Customs and Traditions: A to Z on the Hindu Way of Life हिंदू संस्कार, अनुष्ठान, रिवाज और परंपराएं: हिंदू जीवन यापन के तरीके पर ए टू जेड https://books.google.com/books?id=H31CPCsH-egC १९० पुस्तक महल 978-81-223-0902-7 en harv 8 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20140924161237/http://books.google.com/books?id=H31CPCsH-egC 24 सितंबर 2014 live ब्रॉकमैन नॉर्बर्ट सी २०११ Encyclopedia of Sacred Places पवित्र स्थलों का विश्वकोश एबीसी-सीएलाइओ, एलएलसी कैलिफ़ोर्निया 978-1-59884-655-3 https://books.google.com/books?id=ZNZ15Oow8XcC en harv चक्रवर्ती महादेव १९९४ The Concept of Rudra-Śiva Through The Ages युगों में रुद्र-शिव की अवधारणा दिल्ली मोतीलाल बनारसीदास द्वितीय रिवाइज्ड 81-208-0053-2 en harv Badrinath 3 190 harv डेविडसन लिण्डा के गिटलिट्ज़ डेविड मार्टिन २००२ Pilgrimage: From the Ganges to Graceland : an Encyclopedia तीर्थयात्रा: गंगा से ग्रेसलैंड तक: एक विश्वकोष 1 https://books.google.com/books?id=YVYkrNhPMQkC एबीसी-सीएलाइओ 978-1-57607-004-8 en harv 8 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20140101142605/http://books.google.com/books?id=YVYkrNhPMQkC 1 जनवरी 2014 live ऐक डायना एल २०१२ India: A Sacred Geography भारत: एक पवित्र भूगोल https://books.google.com/books?id=rNlJOSf__xYC क्राउन पब्लिशिंग ग्रुप 9780385531917 en harv गुहा रामचन्द्र २००० The Unquiet Woods: Ecological Change and Peasant Resistance in the Himalaya अशांत वन: हिमालय में पारिस्थितिक परिवर्तन और किसानों का प्रतिरोध https://books.google.com/books?id=UHfJLK6g_a8C ६४–६६ यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस 978-0-520-22235-9 en harv ग्वेन पॉल २००९ World Religions in Practice: A Comparative Introduction विश्व के धर्मों के तौर तरीके: एक तुलनात्मक परिचय ब्लैकवेल पब्लिकेशन ऑक्सफ़ोर्ड 978-1-4051-6702-4 https://books.google.com/books?id=tdsRKc_knZoC en harv लोचतेफेल्ड जेम्स जी २००२ The Illustrated Encyclopedia of Hinduism: A-M हिंदू धर्म का सचित्र विश्वकोष: ए-एम https://books.google.com/books?id=5kl0DYIjUPgC द रोज़न पब्लिशिंग ग्रुप 978-0-8239-3179-8 en harv 8 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20161228001754/https://books.google.com/books?id=5kl0DYIjUPgC 28 दिसंबर 2016 live मेलटन जे गॉर्डन बाउमान मार्टिन २०१० Religions of the World, Second Edition: A Comprehensive Encyclopedia of Beliefs and Practices https://books.google.com/books?id=v2yiyLLOj88C 978-1-59884-204-3 एबीसी-सीएलाइओ en harv 8 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20160530001305/https://books.google.com/books?id=v2yiyLLOj88C 30 मई 2016 live मित्तल सुशील २००४ The Hindu World हिन्दू विश्व रॉटलेज न्यू यॉर्क 0-203-64470-0 en harv नायर शान्ता एन २००७ The Holy Himalayas: An Abode of Hindu Gods : a Journey Through the Mighty Himalayas पवित्र हिमालय: हिंदू देवताओं का एक निवास-क्षेत्र: विशाल हिमालय से होकर एक यात्रा पुस्तक महल https://books.google.com/books?id=gx7Q9HULxUwC New Delhi 978-81-223-0967-6 en harv सदसिवन् एस एन २००० A Social History of India भारत का सामाजिक इतिहास https://books.google.com/books?id=Be3PCvzf-BYC एपीएच पब्लिशिंग 978-81-7648-170-0 en harv 8 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20161227045417/https://books.google.com/books?id=Be3PCvzf-BYC 27 दिसंबर 2016 live स्वामी परमेश्वरानन्द २००४ Encyclopaedia of the Śaivism शैववाद का विश्वकोष स्वरूप & सन्स https://books.google.com/books?id=HQvbJDacNDMC नाइ दिल्ली 81-7625-427-4 en harv 8 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20170312131220/https://books.google.com/books?id=HQvbJDacNDMC 12 मार्च 2017 live त्यागी नूतन १९९१ Hill Resorts of U.P. Himalaya,: A Geographical Study यूपी हिमालय के हिल रिसॉर्ट्स,: एक भौगोलिक अध्ययन https://books.google.com/books?id=fcrieQdY3Y0C इण्डस पब्लिशिंग 978-81-85182-62-9 en harv विस्तृत पठन डैरियन स्टीवन जी॰ The Ganges in Myth and History - History and Culture Series मिथकों तथा इतिहास में गंगा - इतिहास और संस्कृति श्रृंखला https://books.google.com/books?id=0obUy_W9NREC 81-208-1757-5 मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशक २००१ en 9 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20160630105639/https://books.google.com/books?id=0obUy_W9NREC 30 जून 2016 live सेन गुप्ता सुभद्रा २००२ Badrinath and Kedarnath - The Dhaams in the Himalayas बद्रीनाथ और केदारनाथ - हिमालय के धाम 81-7167-617-0 रूपा & कम्पनी en harv नौटियाल गोविन्द प्रसाद १९६२ Call of Badrinath बद्रीनाथ का आह्वान श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति en harv बाहरी कड़ियाँ Category:Badrinath Temple, Uttarakhand बद्रीनाथ मन्दिर आधिकारिक जालस्थल बद्रीनाथ मन्दिर अधिनियम Badrinth Temple Travel Guide and Mythology बद्रीनाथ मन्दिर background:#FFC569; श्रेणी:हिन्दू तीर्थ स्थल श्रेणी:भारत के तीर्थ