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जयद्रथयामल
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जयद्रथयामल एक तन्त्र का ग्रन्थ है। सिंधुदेश के राजा जयद्रथ को भगवान महेश्वर ने प्रसन्न होकर इस ग्रंथ का उपदेश किया। भगवती कालसंकर्षिणी इस आगमग्रंथ का उपजीव्य विषय हैं। भगवती कालसंकर्षिणी के ३६० स्वरूपों के मंत्र, यंत्र, प्रयोगादि का वर्णन इस ग्रंथ में प्राप्त होता हैं। यह ग्रंथ शिव-शिवा संवादात्मक है। भगवती शिवा इस ग्रंथ की प्रश्नकर्ता तथा भगवान शिव उत्तरदाता हैं। यह ग्रंथ विशालकाय कलेवर वाला है, जो कि २४,००० श्लोकों में निबद्ध हैं। ग्रंथ की पुष्पिका में “श्रीभैरवस्रोतसि विद्यापीठे जयद्रथयामले महातन्त्रे …. षट्के चतुर्विंशतिसाहस्रे …..” लिखा प्राप्त होता है।जयद्रथयामल-एक सिंहावलोकनमई 2026 InternetArchiveBot
संरचना
इस ग्रंथ का विभाजन ४ षट्कों में किया गया हैं। प्रत्येक षट्क में ६,००० श्लोक हैं। उपलब्ध षट्कों में ६००० श्लोक प्राप्त नहीं होते। षट्कों का विभाजन पुनः पटलों में किया गया हैं। अनुमानतः पूर्ण जयद्रथ यामल में १८०-१५० पटल थे। उपलब्ध जयद्रथयामल में लगभग १३५ पटल हैं।
इस ग्रंथ के चार षट्कों की ३०-३२ पांडुलिपियां नेवारी लिपि तथा पुरानी देवनागरी लिपि में नेपाल देश में प्राप्त हुईं हैं। ये पांडुलिपियां ११-१२वीं शती में लिखी गई थीं , जिनमें कई का समय-समय पर पुनर्लेखन किया गया। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो जयद्रथयामल की रचना ८वीं-९वीं शती में कश्मीर देश में की गई । इस ग्रंथ पर कापालिकों तथा डामरकों का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। अनेकों भयावह योगों तथा अमानुषिक प्रयोगों का वर्णन इस ग्रंथ में प्राप्त होता है। साथ ही विभिन्न योगों , आसनों तथा मुद्राओं का विवरण भी प्राप्त होता है।
इसमें बाद की ९-१०वीं शती तक कई क्षेपक जोड़े गए। जयद्रथयामल के निर्माणसमय से पूर्व में प्रचलित माधवकुल, योगिनीसञ्चार, कुलगह्वर तथा कालीक्रमविधान इत्यादि स्वतंत्र प्रकरणों वा ग्रंथो का समावेश भी इस यामलग्रंथ में किया गया है। वर्तमान में यह ग्रंथ अपूर्ण अवस्था में प्राप्त होता है। कश्मीर के ग्रंथो में जयद्रथयामल के ऐसे अनेकों भाग उद्धृत किए गए हैं जो की नेपाल के हस्तलेखों में उपलब्ध नहीं होते, यथा कालीपटल, बगलामुखीपटल तथा वटुकभैरवपटल इत्यादि । प्रकटभैरव महामाहेश्वाराचार्य अभिनवगुप्त अपने तन्त्रालोक में अनेकों स्थानों पर इस ग्रन्थ को उद्धृत करते हैं।
विषयवस्तु
प्रथमषट्क
प्रथमषट्क में ५० पटल हैं। जिनमें देवी भगवती कालसंकर्षिणी के गुप्तयोग का वर्णन मिलता हैं। प्रथम पांचपटलों में विद्यापीठ के विभिन्न ग्रंथो का वर्णन प्राप्त होता है। इस भाग का अपरनाम ‘शिरच्छेद’ हैं। वामस्रोत से संबंधित चतुर्भगनियों के सहित भगवान तुम्बुरू का विशद ध्यान प्राप्त होता है। इसी भाग में नवाक्षरीविद्या का उद्धार दिया गया है। साथ ही देवी लक्ष्मी के विशिष्टयाग तथा इंद्रजाल का वर्णन प्राप्त होता है। यामलानुसारी होमविधि भी इसी भाग में लिखी गई है।
द्वितीयषट्क
द्वितीयषट्क में ४० पटल हैं। आरंभ के पटलों में इंद्रध्वज, वरुणध्वज, वायुध्वज, धनेश्वर ध्वज, ब्रह्मध्वज , विष्णुध्वज तथा रुद्रध्वज का विवरण हैं। इसी भाग में चर्चिका,यमकाली, नंदा, जंघकरा, रक्तकाली, ईशानकाली, प्रज्ञाकाली, वीर्यकाली इत्यादि भगवती कालसंकर्षिणी के स्वरूपों का विवरण प्राप्त होता है। अष्टम पटल में भगवती कालसंकर्षिणी के विशिष्ट स्वरूप गह्नेश्वरी काली का वर्णन किया गया है। भगवती काली की परम गोपनीय हृदयविद्या का उद्धार भी इसी भाग में किया गया है। विद्याविद्येश्वरी देवी का याग ३ पटलों में प्राप्त होता है। भगवती सिद्धिलक्ष्मी इस षट्क की प्रधान देवता हैं। अधिकतर पटल इसी स्वरूप को समर्पित हैं। इस भाग का अपरनाम ‘महाकालिकातंत्र’ है।
तृतीयषट्क
ऐतिहासिकदृष्टि से यह षट्क जयद्रथ यामल का सर्वप्राचीन भाग है। इस भाग पर प्राचीन पाञ्चरात्र संप्रदाय का प्रभाव जान पड़ता है। पांच पटलों में माधवकुल तथा आठपटलों में योगिनीसंचार इसी भाग में उपलब्ध होते हैं। इसी भाग में भुवनदीक्षा से लेकर निर्वाणदीक्षा पर्यन्त २४ प्रकार की दीक्षाओं का वर्णन मिलता है। अव्ययदेशकाली के याग की विधि भी इसी भाग में है। महामेलाप प्रकरण भी इसी भाग में है। उपलब्ध पाण्डुलिपियों में इस भाग के १६ पटल प्राप्त होते हैं। संभवतः यह भाग अपूर्ण है।
चतुर्थषट्क
यह भाग भी अत्यंत प्राचीन मालूम होता है। मन्त्रवीर्य की चर्चा इसी भाग में भगवान करते हैं। इस भाग में एक मुद्राकोश भी प्राप्त होता है जिसमे महामुद्रा, खेचरीमुद्रा इत्यादि पचास से अधिक मुद्राओं का वर्णन भगवान साधकों की सिद्धि के हेतु करते हैं। इसी भाग में परान्तककाली, मेघकाली, बगलामुखी, नागाशनी, पापन्तकारी, नित्याकाली, कालरात्रि, मेलपाकाली, वागीश्वरी , मोहकाली तथा संग्रामकाली इत्यादि स्वरूपों के याग की विधि प्राप्त होती हैं। इसी भाग में कालीक्रम तथा राविणीयोग का वर्णन मिलता है। कालीकुलपूजा विधि भी इसी भाग में प्राप्त होती हैं। संभवतः यह भाग भी कुछ अपूर्ण है।
इन्हें भी देखें
प्राचीन तन्त्र साहित्य
सन्दर्भ
श्रेणी:तन्त्रसाहित्य
श्रेणी:संस्कृत साहित्य