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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

वि-संस्कृतिकरण

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वि-संस्कृतिकरण अथवा तरकीब-ए-इख़राज-ए-संस्कृत (en De-Sanskritisation no) एक ऐसा शब्द है जो संस्कृतीकरण के माध्यम से प्रसारित सांस्कृतिक प्रभाव के विरोध को दर्शाता है। इस विषय को और अधिक स्पष्ट रूप से समझाने के लिए, यह मज़मून हत्ता-उल-इमकान फ़ारसी और अरबी तर्ज़-ए-तहरीर में पेश किया जाएगा ताकि अमली तौर पर इसका मुज़ाहिरा किया जा सके।https://books.google.com/books?id=FfAtAAAAMAAJ The Hidden Heritage Pandian S.K. Sterling Publishers 1987 978-81-207-0661-3 13 2024-10-05 पस-ए-मंज़र हुकूमत-ए-अंग्रेज़ से पहले पस्त ज़वात की जानिब से जो कोशिशें रिवाज-ए-तब्दीली-ए-तहज़ीबी की थीं, उनकी आला ज़वात ने सख़्त मुख़ालफ़त की। दौर-ए-हुकूमत-ए-अंग्रेज़ में उस अमल की कसरत में नुमायाँ इज़ाफ़ा वाक़ेअ हुआ।https://books.google.com/books?id=qsuqDwAAQBAJ&pg=PT144 Gender and Hindu Nationalism: Understanding Masculine Hegemony Vijayan P.K. Taylor & Francis 2019 978-1-317-23576-7 Routledge Studies in South Asian Politics 144 बक़ौल जाफ़्रेलोhttps://books.google.com/books?id=qJZp5tDuY-gC&pg=PA210 India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India Jaffrelot Christophe Columbia University Press 2003 978-0-231-12786-8 en, अंजुमन-हा-ए-ज़ात का क़ियाम हुकूमत-ए-अंग्रेज़ की मर्दुम-शुमारी में ज़ातों की गिनती का नतीजा-ए-ताबे था। हर्बर्ट होप रिस्ली, जो हुकूमत-ए-अंग्रेज़ का एक अफ़सर और मुहतमिम-ए-मर्दुम-शुमारी था, ने ज़ातों को उनके मक़ामी सियाक़ में तक़सीम करने और उन्हें मरातिब में दर्जा-बन्दी करने का फ़ैसला किया। इससे ऐसे गुरोह-हा-ए-तहरीक पैदा हुए जो उस अमल के ज़रिए अपने मुआशरती और मरातिबी मरतबे की ऊपर की जानिब हरकत चाहते थे। १९वीं सदी के आख़िर और २०वीं सदी में बहुत-से पस्त हिन्दुस्तानी ज़ाती गुरोहों ने ऊँचे मरातिब तक, जैसे रूहानी और सिपाही मरातिब तक, तरक़्क़ी के लिए वह अमल इख़्तियार किया। कुर्मी, काछी, जाटव, लोधी, कलवार और अहीर जैसी ज़ातों ने अपने आप को सिपाही-मरतबे में नए सिरे से ढालने के लिए वही अमल अपनाया।https://books.google.com/books?id=p5oBAAAAMAAJ The Politics of Untouchability: Social Mobility and Social Change in a City of India Lynch O.M. Columbia University Press 1969 978-0-231-03230-8 2024-10-05 ब-क़ौल ओवेन लिंच : https://books.google.com/books?id=p5oBAAAAMAAJ The Politics of Untouchability: Social Mobility and Social Change in a City of India Lynch O.M. Columbia University Press 1969 978-0-231-03230-8 2024-10-05 तब्दीली इस वजह से है कि अब वह अमल ज़िन्दगी के अन्दाज़ में तब्दीली और निज़ाम-ए-मुआशरा में तरक़्क़ी हासिल करने का उतना कारगर ज़रीया नहीं रहा जितना सियासी मुशारिकत है; और यह मुआशरा अब ज़ाती और तबक़ाती अन्सिर से मुरक्कब है। उस अमल का आख़िरी मक़सद ज़ाती मुआशरे के मौक़े और क़ुदरत के ढाँचों में एक जगह खोलना और उसे जायज़ ठहराना था। अब उम्मीद की जाती है कि यही मक़सद सरगर्म मगर अलग-थलग सियासी मुशारिकत के ज़रिए हासिल किए जा सकते हैं। हिन्दुस्तानी मुआशरे के क़ुदरत, मौक़े और दौलत के ढाँचों में दाख़िला अब सिर्फ़ ज़ाती मरतबे पर मबनी नहीं रहा; कम-अज़-कम सरकारी शोबे में इन ढाँचों में भर्ती का उसूल शहरियत के मरतबे पर मबनी कारकर्दगी है। आज़ादी के बाद पसमाँदा तबक़ात के साहिब-ए-नज़र अफ़राद की जानिब से उस अमल की तनक़ीद ने उसे उलट दिया और अमल-ए-मुक़ाबिल को जन्म दिया। इस अमल में पसमाँदा तबक़ात ने एक मुस्तक़िल शनाख़्त क़ायम करने की कोशिश की, जिस तरह मज़लूम तबक़ों ने आज़ादी से पहले किया था। जगपाल सिंह लिखते हैं :https://books.google.com/books?id=vfn1DwAAQBAJ Caste, State and Society: Degrees of Democracy in North India Singh J. Taylor & Francis 2020 978-1-000-19606-1 2024-10-05 इस अमल में उन्होंने आला ज़ात के लक़ब की जगह अपनी अंजुमनों और अपने लक़बों के नाम रखे, अपने तालीमी और दीगर ज़ाती इदारों का नाम अपने ज़ाती पेशवाओं के नाम पर रखा, और मुतबादिल तहज़ीबी रिवायात व पेशवा पैदा किए या दरयाफ़्त किए। हालाँकि, कई मुआशरों में अमल-ए-मुक़ाबिल की कोशिशें देखी गईं ताकि हुकूमत-ए-हिन्दुस्तान की जानिब से मुक़र्ररा तबक़ात को दिए जाने वाले फ़ायदे हासिल किए जा सकें।https://books.google.com/books?id=hNALAAAAIAAJ Feminism in a Traditional Society: Women of the Manipur Valley Chaki-Sircar M. Shakti Books 1984 978-0-7069-1967-7 Vikas Library of Modern Indian Writing 9 आमियत इन्सान-शनास धीरेन्द्रनाथ मजूमदार ने पाया कि अमल-ए-मुक़ाबिल उस पहले अमल से ज़्यादा आम है। उन्होंने यह भी नोट किया कि पस्त ज़वात ऊँची जानिब नहीं बढ़ रहीं, बल्कि ऊँची ज़वात अपने रिवाजी तरीक़ा-ए-ज़िन्दगी को तर्क कर रही हैं।https://books.google.com/books?id=jBOh24IJ9t8C&pg=PA343 Indian Society, Institutions and Change Sharma R.K. Atlantic 2004 978-81-7156-665-5 343 2024-10-05 बहरहाल, पहले आर्य समाज के पैरोकार बनने के बाद, बाज़ मज़लूम तबक़ों ने आर्य समाज और उस पहले अमल के दावे पर सवाल उठाकर अमल-ए-मुक़ाबिल शुरू किया। आज़ादी के बाद के दौर में यह अमल मज़लूम तबक़ों में एक अहम पहलू बन गया, जो मुतबादिल तहज़ीबी शनाख़्त के तलबगार थे। राजस्थान और मग़रिबी उत्तर प्रदेश में पसमाँदा तबक़ात के साहिब-ए-नज़र अफ़राद ने अपनी पसमाँदगी का इल्ज़ाम पहले के क़ियादत पर डाला, जो आर्य समाज के असर में उस पहले अमल से अलग ही नहीं हो सकी थी और आला ज़वात से अलग एक मुनफ़रिद शनाख़्त भी ज़ाहिर नहीं कर सकी थी।https://books.google.com/books?id=vfn1DwAAQBAJ Caste, State and Society: Degrees of Democracy in North India Singh J. Taylor & Francis 2020 978-1-000-19606-1 2024-10-05 तहरीक-ए-सनामाही लाइनिंघल नाओरिया फुलो की वफ़ात के बाद तहज़ीब-ए-मीतई के अमल-ए-मुक़ाबिल और उसके विरसे के एह्या की हिमायत के लिए बरपा हुई। इस तहरीक ने हिन्द-आर्याई विरसे से हर ताल्लुक़ की मुख़ालफ़त की।https://books.google.com/books?id=-CzSQKVmveUC&pg=PA194 Manipur, Past and Present: The Heritage and Ordeals of a Civilization Sanajaoba N. Mittal Publications 1988 978-81-7099-853-2 Manipur, Past and Present 194 2024-10-05 v. 4 लिसानियात तामिल का अमल-ए-मुक़ाबिल १९५० के बाद के अरसे में द्रविड़ी तसव्वुर के आम होने के बाद शुरू हुआ।https://books.google.com/books?id=6DOuEAAAQBAJ&pg=PA92 The Sabarimalai Pilgrimage and Ayyappan Cultus Sekar R. Motilal Banarsidass Publishers 1992 978-81-208-1056-3 92 2024-10-05 चुनाँचे, “अमल-ए-मुक़ाबिल” की इन कोशिशों ने ज़बान को इस तरह बदलते देखा कि उसमें से बहुत-से अलफ़ाज़-ए-मुस्तआर हटा दिए गए।https://books.google.com/books?id=qmoKAAAAIAAJ The Indian Journal of Political Science Indian Political Science Association Indian Political Science Association 1971 The Indian journal of political science 39 2024-10-05 v. 32 तहरीक-ए-हेला हवुला ने ज़बान-ए-सिंहली के अमल-ए-मुक़ाबिल की वकालत की।https://books.google.com/books?id=vz2HEAAAQBAJ&pg=PA17 Ravana's Kingdom: The Ramayana and Sri Lankan History from Below Henry J.W. Oxford University Press 2022 978-0-19-763630-5 17 2024-10-06 हवालाजात श्रेणी:सामाजिक परिवर्तन