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संगीत पारिजात
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संगीत पारिजात संगीत का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसकी रचना १६५० ई० के आसपास दक्षिण के एक विद्वान ब्राह्मण पण्डित अहोबल ने की थी। यह एक लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। यह ग्रंथ आधुनिक संगीत से बहुत संबंधित है ।संगीत पारिजात संगीत पारिजात में वीणा के स्वर-स्थान को निर्धारित करने की एक नई प्रक्रिया पहली बार पं. अहोबल ने प्रस्तुत की है। सन १७२४ ई० में पं० दीनानाथ ने इसका फारसी में अनुवाद किया।
संरचना
संगीत पारिजात में ८ अध्याय एवं ५०० श्लोक हैं। आठ अध्यायों के नाम हैं- स्वर, ग्राम, मूर्च्छना, स्वर-विस्तार, वर्ण, जाति, समय और राग प्रकरण ।
इस ग्रंथ में अहोबलजी ने मंगलाचरण में संगीत की परिभाषा देकर मार्ग और देशी संगीत का भेद बताकर, हृदय में स्थित बाईस नाड़ियों से नाद की उत्पत्ति, श्रुति की व्याख्या, बाईस श्रुतियों के नाम, उनकी दीप्ता, आयता, करुणा, मृदु और मध्या पांच जातियां, उनके तीव्र, तीव्रतर, तीव्रतम जैसे भेद, वादी, संवादी, अनुवादी, विवादी, की व्याख्या, स्वरों की जाति (देवकुल, दैत्यकुल वैश्य और शूद्र) तथा सातों स्वरों के रंग, स्वरों की जन्मभूमि के दीप, सातों स्वरों के दृष्टा, उनके देवता, उनके छन्द, और सातों स्वरों का नवरसों में वर्गीकरण बताया गया है। फिर तीन ग्राम, मूर्च्छनाएं तथा उनके भेदों को समझाया है।
स्वर प्रकरण के अन्तर्गत अहोबल ने बताया है कि ह्दय स्थित अनाहत चक्र में वायु और अग्रि के संयोग से आहत नाद की उत्पत्ति होती है। आगे उन्होंने बताया है कि नाद दो प्रकार के होते हैं आहत नाद और अनाहत नाद। स्वर और श्रुति में सर्प और उसकी कुण्डली सा भेंद है। परम्परा का पालन करते हुए श्रुति की संख्या और उनके नाम बताया। उसने बाईस श्रुतियों को पांच भेदों में बाटा है- दीप्ता, आयता, करूणा, मृदु और मध्या । सा म को ब्राह्मण, रे-ध को क्षत्रिय, और ग- नि वैश्य कहा। आगे उन्होंने स्वरों की जन्म भूमि, उनके रंग और रस बताया। ग्राम प्रकरण के अन्तर्गत उसने षडज, मध्यम और गंधार इन तीनों ग्रामों के स्वरूप का वर्णन किया है।
मूर्छना प्रकरण के अन्तर्गत्त मूर्च्छना की परिभाषा देते हुये उसने केवल षडज ग्राम की मूर्छनाओं का वर्णन किया है। मध्यम और गंधार ग्राम की मूर्छनाओं को बिल्कुल छोड़ दिया है। शुद्ध स्वरों से सात मूर्छनाएं बन सकती है, किन्तु उसने विकृत स्वरों से भी सम्पूर्ण जाति की मूर्छनाओं की रचना की है। इसके बाद से उसने षडज ग्राम की शुद्ध और विकृत स्वरों की मूर्छनाओं की रचना की। इन सब को मिला देने से उसने बताया की केवल षडज ग्राम से 4 लाख, 20 हजार, 1 सौ 20 मूर्छनाओं की रचना हो सकती है।
स्वर प्रस्तार प्रकरण के अन्तर्गत उसने सातों स्वर के संयोग से 4 हजार 2 सौ 20 स्वर समूह की रचना को बताया है।
वर्णलक्षणम् अध्याय के अन्तर्गत वर्ण की परिभाषा बताते हुए वर्ण के चार प्रकार बताये है- स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी । अलंकार की परिभाषा इस प्रकार दी है- क्र स्वरसंदर्भमलकारं प्रचक्षते । अलंकार के कई प्रकार बताये है जैसे- मृदु, नन्द, विस्तीर्ण, जित, सोम, बिन्दु,ग्रीव, भाल, वेणी, प्रकाशक आदि । स्थाई वर्ण के 7, आरोही वर्ण के 12, अवरोही वर्ण के भी 12, सचारी के वर्ण 25 कुल मिलाकर 56अलंकार बताये है। इनके अतिरिक्त पं० अहोबल ने 5 अलंकार और बताये है। इन सभी अलंकार के नाम, लक्षण, और उदाहरण संगीत पारिजात में दिये गए हैं। मंद्र सप्तक के लिये ऊपर बिन्दु और तार सप्तक के लिये खडी रेखा अंकित किया है।
गमक प्रकरण में 7 शुद्ध जातियां षडजा, आर्षभी, गंधारी, मध्यमा, पंचमी, धैवती और निषादी का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, कंपित, प्रत्याहत, स्फुरित, घर्षण, हुम्फित आदि गमको को समझाया गया है।
समय प्रकरण के अन्तर्गत वीणा पर स्वरों की स्थापना बताई गई है। 5 प्रकार गीतिया मानी है और उनके लक्षण दिये गये है। आगे 1 सौ 25 रागों का गायन समय और परिचय बताया गया है। अहोबल ने आगे स्पष्ट रूप से लिखा है राग तो बहुत से माने गये है किन्तु 125 उपयोगी रागों का वर्णन किया गया है। संगीत पारिजात में कुल 500 श्लोक है।
पं० अहोबलजी ने इस ग्रंथ में अलंकारों के कई प्रकार बताए हैं जैसे-मृदु, नन्द, विस्तीर्ण, सोम, बिन्दु, वेदि, प्रकाशक आदि। स्थाई वर्ण के 7 अलंकार, अवरोही वर्ण के भी १२ तथा संचारी वर्ण के २५ अलंकार। इस प्रकार कुल ५६ अलंकारों का उल्लेख किया है। वर्ण लक्षणम् के अध्याय में स्थायी, आरोही, अवरोही, संचारी वर्णों को समझाकर अलंकारों का निरूपण किया है। जाति निरूपणम् के अध्याय में जातियों के लक्षण तथा कुछ गमकों के भेदों को समझाया है। इसके उपरान्त वीणा के तार पर शुद्ध तथा विकृत स्वरों के स्थान बताए हैं। आगे मेल (थाट) की परिभाषा देने के उपरान्त शुद्धा, भिन्ना, गौड़ी, बेसरा और साधारणी गीतियों को समझाने के बाद अनेक रागों का गायन समय बताया है। गमक प्रकरण में सात शुद्ध जातियों जैसे पाढजी, आर्यभी, गान्धारी, मध्यमा, पंचमी, धैवती, निषादी का संक्षिप्त परिचय दिया गया है और कम्पित, स्फुरित, तिरिप, घर्षण, हुम्फित आदि गमक प्रकारों को समझाया गया है।
राग प्रकरण के अन्तर्गत सैन्धव, सम्पूर्ण धनाश्री, षाडव धनाश्री, औडव धनाश्री, मेघमल्लार, नीलाम्बरी, मालव श्री, रक्तहंस, गौरी, मल्लारी, पंचम, बसन्त, देशाख्य, देशकारी, मध्यमादि, बंगाली, नारायणी, विभास, कानडी, मेघनाद तोड़ी, छाया तोड़ी, मार्ग तोड़ी, घण्टा राग, वराटी, शुद्ध वराटी, तोड़ी वराटी, प्रताप वराटी, कल्याण, वराली, खम्भावती, अभीरिका, कल्याण, रामकरी, सारंग, मालव, गुणक्रिया, शंकराभरण, बड़हंस, बिलावली, केदारी, काम्बोधी, दीपक, ललिता, बहुला, गौल, केदारगौल, छायानट, रीतिगौल, नारायण गौल, मालवगौल, देशी, हिन्दोल, ढक्कः, नाट, कामोद-नाट, आभीरीनाट, कल्याणनाट, केदारनाट, वैराटीनाट, तैलंग औरभीमपलासी के स्वर, स्वर-विस्तार और कुछ के स्वरूपों का भी वर्णन है। अंत में यह बताया है कि इन रागों में जो स्वर प्रयुक्त हुए हैं उनमें शुद्ध स्वर से दो श्रुति कम वाले रयर को 'पूर्व-कोमल' और एक श्रुति कम होने पर 'कोमल' कहते हैं। इसी प्रकार शुद्ध स्वर से एक श्रुति अधिक होने पर 'तीव्र' दो श्रुतियां चढ़ जाने पर 'तीव्रतर' और तीन श्रुतियां चढ़ जाने पर 'तीव्रतम' स्वर कहा जाता है। इस प्रकार इन्होंने पूर्व ऋषभ, कोमल ऋषभ, पूर्व गान्धार, कोमल गान्धार, पूर्व धैवत, कोमल धैवत, पूर्व निषाद, कोमल निषाद जैसे आठ कोमल स्वर और ऋपभ, धैवत को तीव्र तथा तीव्रतर, गान्धार, मध्यम व निषाद को तीव्र, तीव्रतर और तीव्रतम और अतितीव्रतम गान्धार जैसे चौदह तीव्र विकृत स्वर माने हैं।
आधुनिक हिन्दुस्तानी संगीत पर प्रभाव
आधुनिक हिन्दुस्तानी संगीत को आकार देने में संगीत पारिजात ने निम्न रूप से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है-संगीत पारिजात में निहित विषय सामग्री
अनावश्यक स्वरों का त्याग - इस ग्रन्थ में मूलतः २९ स्वरों का उल्लेख किया गया है। चूँकि कई स्वरों का स्थान एक ही है परन्तु नाम अलग हैं, अतः मूल सात शुद्ध व बाईस विकृत स्वरों के स्थान पर उन्होंने रागों के वर्णन में केवल सात शुद्ध व पाँच विकृत स्वरों का प्रयोग किया है।
वीणा के तार पर स्वरों की स्थापना - यद्यपि विस्तारपूर्वक नहीं, फिर भी उन्होंने वीणा के तार के माध्यम से स्वरों के स्थान को प्रदर्शित किया है।
स्वरों की कम्पन संख्या के परिकलन हेतु वैज्ञानिक परिमाण प्रस्तुत करना - स्वरों के मध्य दूरी को प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित करने से स्वरों की कंपन संख्या के परिकलन हेतु परिमाण प्रस्तुत हो पाये।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
अहोबल
पारिजात वृक्ष
बाहरी कड़ियाँ
संगीतपारिजातः (देवनागरी में ; रावजी श्रीधर गोंधलेकर द्वारा सम्पादित)
संगीत पारिजात (बांग्ला में) (लेखक - शचीन्द्रनाथ मित्र)
सङ्गीतपारिजात
संगीत पारिजात में निहित सामग्री का संक्षिप्त अध्ययन
Sangeet Parijat, translated in Hindi by Kalind Ji, published by SANGEET KARALAYA-HATHRAS
श्रेणी:पुस्तकें
श्रेणी:संगीत