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411 समाचार
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हिरण्यकशिपु

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मई 2024 अंगूठाकार|हिरण्यकशिपु का वध करते हुए नरसिंह रूपी भगवान विष्णु और हाथ जोड़े खड़ा प्रह्लाद हिरण्यकशिपु (Hiranyakashipu) एक दैत्य था जिसकी कथा कई पुराणों में आती है। उसका वध विष्णु अवतारी भगवान नृसिंह द्वारा किया गया। यह "हिरण्यक शिपु" नामक एक राजा था৷ हिरण्याक्ष उसका छोटा भाई था जिसका वध वाराह रूपी भगवान विष्णु ने किया था। हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे जिनके नाम हैं प्रह्लाद , संह्लाद, अनुह्लाद और ह्लाद, जिनमें प्रह्लाद सबसे बड़ा और हलाद सबसे छोटा था। उसकी पत्नी का नाम कयाधु और उसकी छोटी बहन का नाम होलिका था। हिरण्यकशिपु के अग्रजों के नाम वज्रांग , अरुण और हयग्रीव थे। हयग्रीवासुर का वध मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने और अरुण का वध भ्रामरी रूपी माता पार्वती ने किया था। परिचय विष्णुपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार सतयुग के अन्त में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। दिति के बड़े पुत्र हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया।हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे उनके नाम थे प्रह्लाद, संह्लाद, अनुह्लाद और ह्लाद। हिरण्यकशिपु का सबसे बड़ा पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ पर होलिका जलकर राख हो गई। अंतिम प्रयास में हिरण्यकशिपु ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए। वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तथा हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज़ नाखूनों से जो न अस्त्र थे न शस्त्र और उसका पेट चीर कर उसे मार डाला। http://210.212.78.56/50cities/jyotimath/hindi/profile_mythology.asp पौराणिक 4 मार्च 2008 एएसपी जोशीमठजून 2020 InternetArchiveBot इस प्रकार हिरण्यकशिपु अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ। फिल्म उल्लेख महावतार नरसिंह फिल्म के निर्माताओं ने कथानक को आकार देने हेतु विभिन्न ऐतिहासिक और शास्त्रीय सन्दर्भों को सम्मिलित किया है—विशेषतः प्रह्लादपुरी मंदिर के खंडहर, हम्पी में स्थित पुनःस्थापित जली हुई धर्मस्थली, और अहोबिला नव नरसिंह स्वामी मंदिरोंhttps://www.youtube.com/shorts/Q83ZSgrPktM जैसे पुरातात्विक स्थलों के अतिरिक्त विष्णु पुराण, नरसिंह पुराण, वराह पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों से प्रेरणा ली गई है। फिल्म की सफलता और दर्शकों से इसका गहरा जुड़ाव लेखक की पवित्र ग्रंथों के प्रति उसकी अटूट निष्ठा का प्रतिफल है। नाम पर मतभेद हिरण्यकश्यप के नाम के विषय में मतभेद है। कुछ स्थानों पर उसे हिरण्यकश कहा गया है और कुछ स्थानों पर हिरण्यकशिपु, श्रीम्दभागवत पुराण के अनुसार शुद्ध हिरण्यकशिपु है जहां "हिरण्य" का अर्थ "सोना" या "धन" है और "कशिपु" का अर्थ "नरम बिस्तर" या "आराम". ऐसा माना जाता है कि सम्भवतः जन्म के समय उसका नाम हिरण्यकश्यप रखा गया किन्तु सबको प्रताड़ित करने के कारण (संस्कृत में कषि का अर्थ है हानिकारक, अनिष्टकर, पीड़ाकारक) उसको बाद में हिरण्यकशिपु से जाना गया। नाम पर जो भी मतभेद हों, उसकी मौत उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में हुई थी। इसका प्रमाण अभी भी यहाँ है और प्रतिवर्ष लाखो लोग यहाँ होलिका दहन में भाग लेते हैं। पूर्व जन्म की कथा ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के द्वारपाल दो भाई थे उनके नाम हैं जय और विजय । एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के प्रथम अवतार चार कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करने बैकुण्ठ आए। जय और विजय ने उन्हें रोक दिया जिससे क्रोधित होकर चार कुमारों ने उन्हें श्राप दिया कि "हे मूर्खों भगवान विष्णु के साथ रहने का तुम में अभिमान हो गया है हम तुम्हें श्राप देते हैं कि तुम भगवान विष्णु से सदा के लिए दूर हो जाओगे। शोर सुनने पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी बैकुण्ठ से बाहर आए। भगवान विष्णु सब जानते थे और जय विजय से बोले कि चार कुमार ही तुम्हारे श्राप को कम कर सकते हैं क्योंकि दिया हुआ श्राप और वरदान कभी वापिस नहीं लिए जा सकते। जय विजय ने चार कुमारों से श्राप को कम करने का आग्रह किया। जिसके पश्चचात् चार कुमारों ने उन्हें दो विकल्प दिए। उन्होंने कहा कि "जय और विजय तुम या तो सात जन्म भगवान विष्णु के महान भक्त बनकर रहो जिनका नाम सदैव आदर सहित लिया जाएगा अथवा तीन जन्म भगवान विष्णु के घोर शत्रु। उन्होंने तीन जन्म भगवान विष्णु के शत्रु बनने का विकल्प चुना और कहा कि "हे चार कुमारों हम प्रभु के शत्रु बनकर तीन जन्म लेंगे ताकि हमें प्रभु से अधिक दूर ना रहना पड़े तब भगवान विष्णु ने सनकादि ऋषियों से कहा कि "ये तीन जन्म असुर जाति में रहेगे और मुझसे वैर रखते हुए भी मेरे ध्यान में लीन रहेगे मेरे द्वारा इनका सन्हार होने पर ये दोनों इस धाम में पुनः आ जाएंगे।‌ इस श्राप के फल स्वरूप जय विजय सतयुग , त्रेता युग और द्वापर युग में असुर जाति में जन्मे। सतयुग सतयुग में जय हिरण्यकशिपु और विजय हिरण्याक्ष के रूप में धरती पर पैदा हुए। उस जन्म में इनके पिता महर्षि कश्यप और माता दिति थे। हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु ने वराह के रूप में और हिरण्यकशिपु का वध नरसिंह रूप में किया। त्रेतायुग त्रेतायुग में जय रावण और विजय कुंभकर्ण के रूप में धरती पर पैदा हुए। उस जन्म में इनके पिता महर्षि विश्रवा और माता कैकसी थे। उस जन्म में इन दोनों का वध भगवान विष्णु ने राम रूप में किया था। द्वापरयुग द्वापर युग में जय का जन्म शिशुपाल के रूप में और विजय का जन्म दंतवक्र के रूप में हुआ था। उस जन्म में जय और विजय दोनों भगवान विष्णु के फुफरे भाइयों के रूप में पैदा हुआ। जय के उस जन्म के पिता राजा दंभघोष और माता सुतसुभा थे और विजय की माता का नाम श्रुतदेवी और पिता का नाम वृद्धशर्मा था। उस जन्म में इन दोनों का वध भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में किया था। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ हिरण्यकशिपु एवं प्रह्लाद की कथा द्वारा मन - बुद्धि में विद्यमान देहभाव के आत्मभाव में रूपान्तरण का चित्रण - राधा गुप्ता श्रेणी:होली श्रेणी:असुर