411 REFERENCE · Wikipedia
परागज ज्वर
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
right|thumb|300px|एलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी से परागकणों के मिश्रण का फोटो (रंग कृत्रिम हैं, वास्त्विक नहीं)
एलर्जी के कारण नाक के वायुमार्गों का प्रदाह होना परागज ज्वर (Hay Fever या Allergic rhinitis) कहलाता है। नाक की श्लेष्मा कला जब पौधों के पराग के प्रति ऐलर्जी (allergy) के कारण प्रभावित होती है, जिससे व्यक्ति की नाक में खुजली होती है, आँख से पानी गिरता है और छींके आती हैं, तब यह अवस्था परागज ज्वर कहलाती है। इसे पहले 'स्वर्णदंड ज्वर' या 'गुलाब ज्वर' भी कहते थे। वैसे इस रोग में ज्वर नहीं आता तथा फूलों से भी इसका कम संबंध है, किंतु इसका नाम परागज ज्वर ही प्रचलित है।
एलर्जी पराग के का कारण हो सकती है या अन्य कई वस्तुमों के कारण भी। जब यह एलर्जी पराग के कारण होती है तो इस रोग को 'परागज ज्वर' (हे फीवर) कहते हैं।
परिचय
परागज ज्वर ऐलर्जी संबंधी एक रोग है। जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे प्रोटीन के, जो दूसरों पर काई कुप्रभाव नहीं डालता, संपर्क में आने के कारण विपरीत रूप में प्रभावित होता है, तो इस अवस्था का ऐलर्जी कहते हैं। इस प्रोटीन के शरीर में पहुँचने की रीति तथा प्रभावित अंगों पर ही रोग के लक्षण निर्भर करते हैं। परागज ज्वर में नाक पर प्रभाव पड़ता है तथा पराग हवा द्वारा साँस के तथा नाक तक पहुँचता है। इसके रोगियों को इस प्रकार की ऐलर्जी अपने पूर्वजों से या शारीरिक बनावट द्वारा प्राप्त होती है।
जब उपर्युक्त कोई प्रोटीन किसी ऐलर्जीवाले व्यक्ति की नाक के संपर्क में आता है तब एक प्रक्रिया ऐंटीजेन या प्रतिजन तथा ऐंटीबाडी या प्रतिपिंड के मध्य होती है। इससे हिस्टामीन नामक पदार्थ की उत्पत्ति होती है, जो श्लेष्माकला में सूजन पैदा करता है तथा तंतुद्रव को बाहर निकालता है।
पराग वायु में मीलों दूर तक फैलकर परागज ज्वर उत्पन्न करते हैं। परागज ज्वर विशेष प्रकार का होता है। एक रोगी एक पराग से और दूसरा दूसरे पराग से प्रभावित हो सकता है।
परागज ज्वर का निदान इसके विशिष्ट प्रकार के विवरण से ही होता है। इसकी चिकित्सा के लिए उस परागविशेष का अन्वेषण आवश्यक हो जाता है। सूई देकर दोषी पराग का पता लगाया जाता है। दोषी पराग से सूई के स्थान के चारों ओर लाली और सूजन आ जाती है।
दोषी पराग से बचना ही परागजज्वर की सर्वोत्त्म चिकित्सा है, पर ऐसा संभव न होने पर हिस्टामिनरोधी ओषधियों के व्यवहार से परागज ज्वर के लक्षणों को दूर करने में सहायता मिलती है। हार्मोन का व्यवहार भी लाभकारी सिद्ध हुआ है। एफेड्रिन सदृश ओषधियाँ श्लेष्माकला की सूजन को कम करती हैं।
रोग प्रतिरक्षण उत्पन्न करने के लिए दोषी पराग की थोड़ी मात्रा से प्रांरभ कर, मात्रा को धीरे धीरे बढ़ाते हुए, सुई देने से शरीर में इतनी निरापदता आ जाती है कि उससे फिर रोग उत्पन्न होने की संभावना नहीं रहती। प्रारंभ में रोग का उपचार न करने से उसे दमे में बदल जाने की संभावना हो सकती है।
बाहरी कड़ियाँ
श्रेणी:एलर्जी