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मूक फ़िल्म
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मूक फ़िल्म (अंग्रेज़ी: Silent film) ऐसी चलचित्र फ़िल्म को कहा जाता है जिसमें समकालिक ध्वनि-संयोजन, संवाद-रिकॉर्डिंग या समन्वित बोलती आवाज़ नहीं होती। इन फ़िल्मों में कहानी को मुख्यतः अभिनय, चेहरे के हाव-भाव, शारीरिक संकेत, लिखित इंटरटाइटल्स और दृश्य संरचना के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता था। मूक फ़िल्म युग सिनेमा के प्रारम्भिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
== इतिहास ==
मूक फ़िल्मों का विकास 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ। प्रारम्भिक चलचित्र तकनीक के दौर में फ़िल्मों में ध्वनि रिकॉर्ड करने और उसे चित्रों के साथ समकालिक रूप से प्रस्तुत करने की तकनीक उपलब्ध नहीं थी। इसलिए फ़िल्म प्रदर्शन के समय कई स्थानों पर पियानो, ऑर्केस्ट्रा या अन्य लाइव संगीत का सहारा लिया जाता था।
== विशेषताएँ ==
मूक फ़िल्मों की कुछ प्रमुख विशेषताएँ थीं:
संवादों के स्थान पर इंटरटाइटल्स का प्रयोग
भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अतिरंजित अभिनय
संगीत का लाइव प्रदर्शन
कहानी कहने में दृश्य संकेतों पर अधिक निर्भरता
== महत्त्व ==
मूक फ़िल्मों ने फ़िल्म-निर्माण की भाषा, संपादन तकनीक, कैमरा-प्रयोग और दृश्य कथन की शैली को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चार्ली चैपलिन, बस्टर कीटन, डगलस फेयरबैंक्स और ए.डी.एस. जैसे कलाकारों ने इस युग में अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त की।
भारत में भी मूक फ़िल्मों का एक प्रारम्भिक और महत्वपूर्ण दौर रहा, जिसमें भारतीय सिनेमा की नींव रखी गई। दादासाहेब फाल्के को भारतीय मूक सिनेमा का अग्रदूत माना जाता है।
== ध्वनि फ़िल्मों का आगमन ==
1920 के दशक के उत्तरार्ध में तकनीकी विकास के साथ समन्वित ध्वनि-प्रणाली विकसित हुई। इसके बाद ध्वनि फ़िल्में लोकप्रिय हुईं और मूक फ़िल्मों का युग समाप्त होने लगा। फिर भी मूक फ़िल्मों का कलात्मक और ऐतिहासिक महत्त्व आज भी बना हुआ है।
== संदर्भ ==