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कुष्ठरोग
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हिब्रू बाइबिल शब्दावली और इसके विभिन्न अर्थों के लिये, ज़ार्थ (Tzaraath) देखें. Bla Bla.. अन्य उपयोगों के लिये कुष्ठरोग (स्पष्टीकरण) देखें.
कुष्ठरोग Leprosy.jpg कुष्ठरोग से ग्रस्त एक 24-वर्षीय पुरुष. 8478 A 30 a 30 030 246300 001347 med 1281 derm 223 neuro 187 C01.252.410.040.552.386
कुष्ठरोग (en Leprosy no) या हानसन का रोग (Hansen’s Disease) (एचडी) (HD), चिकित्सक गेरहार्ड आर्मोर हानसन (Gerhard Armauer Hansen) के नाम पर, माइकोबैक्टेरियम लेप्री (Mycobacterium leprae) और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमेटॉसिस (Mycobacterium lepromatosis) जीवाणुओं के कारण होने वाली एक दीर्घकालिक बीमारी है।Sasaki S, Takeshita F, Okuda K, Ishii N Mycobacterium leprae and leprosy: a compendium Microbiol Immunol 45 11 729–36 2001 http://www.jstage.jst.go.jp/article/mandi/45/11/729/_pdf 11791665 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20090113080230/http://www.jstage.jst.go.jp/article/mandi/45/11/729/_pdf 13 जनवरी 2009 live http://www.sciencedaily.com/releases/2008/11/081124141047.htm New Leprosy Bacterium: Scientists Use Genetic Fingerprint To Nail 'Killing Organism' ScienceDaily 2008-11-28 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20100313064458/http://www.sciencedaily.com/releases/2008/11/081124141047.htm 13 मार्च 2010 live कुष्ठरोग मुख्यतः ऊपरी श्वसन तंत्र के श्लेष्म और बाह्य नसों की एक ग्रैन्युलोमा-संबंधी (granulomatous) बीमारी है; त्वचा पर घाव इसके प्राथमिक बाह्य संकेत हैं। Ryan KJ, Ray CG Sherris Medical Microbiology https://archive.org/details/sherrismedicalmi0000unse_q1i3 4th 451–3 McGraw Hill 2004 0838585299 Kenneth J. Ryan, C. George Ray, editors. 52358530 61405904 यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाए, तो कुष्ठरोग बढ़ सकता है, जिससे त्वचा, नसों, हाथ-पैरों और आंखों में स्थायी क्षति हो सकती है। लोककथाओं के विपरीत, कुष्ठरोग के कारण शरीर के अंग अलग होकर गिरते नहीं, हालांकि इस बीमारी के कारण वे सुन्न तथा/या रोगी बन सकते हैं। Lifting the stigma of leprosy: a new vaccine offers hope against an ancient disease Time 119 19 87 1982 May 10255067 http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,925377,00.html 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20130825183350/http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,925377,00.html 25 अगस्त 2013 live Textbook of Orthopedics and Trauma 2 779 Jaypee Brothers Publishers 2008 8184482426, 9788184482423 Kulkarni GS
कुष्ठरोग ने 4,000 से भी अधिक वर्षों से मानवता को प्रभावित किया है,http://sciencenow.sciencemag.org/cgi/content/full/2009/527/1 Skeleton Pushes Back Leprosy's Origins Holden 2009 ScienceNOW 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20090922212020/http://sciencenow.sciencemag.org/cgi/content/full/2009/527/1 22 सितंबर 2009 dead और प्राचीन चीन, मिस्र और भारत की सभ्यताओं में इसे बहुत अच्छी तरह पहचाना गया है। Leprosy WHO http://www.who.int/mediacentre/factsheets/fs101/en/ 2009-08-01 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20131212084309/http://www.who.int/mediacentre/factsheets/fs101/en/ 12 दिसंबर 2013 live पुराने येरुशलम शहर के बाहर स्थित एक मकबरे में खोजे गये एक पुरुष के कफन में लिपटे शव के अवशेषों से लिया गया डीएनए (DNA) दर्शाता है कि वह पहला मनुष्य है, जिसमें कुष्ठरोग की पुष्टि हुई है।http://www.sciencedaily.com/releases/2009/12/091216103558.htm ScienceDaily DNA of Jesus-Era Shrouded Man in Jerusalem Reveals Earliest Case of Leprosy 2009-12-16 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20100530031302/http://www.sciencedaily.com/releases/2009/12/091216103558.htm 30 मई 2010 live 1995 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) (डब्ल्यूएचओ) (WHO) के अनुमान के अनुसार कुष्ठरोग के कारण स्थायी रूप से विकलांग हो चुके व्यक्तियों की संख्या 2 से 3 मिलियन के बीच थी।WHO Leprosy disabilities: magnitude of the problem Weekly Epidemiological Record 70 38 269–75 1995 7577430 पिछले 20 वर्षों में, पूरे विश्व में 15 मिलियन लोगों को कुष्ठरोग से मुक्त किया जा चुका है।http://news.bbc.co.uk/2/hi/programmes/from_our_own_correspondent/6510503.stm Walsh F The hidden suffering of India's lepers बीबीसी न्यूज़ 2007-03-31 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20070529003040/http://news.bbc.co.uk/2/hi/programmes/from_our_own_correspondent/6510503.stm 29 मई 2007 live हालांकि, जहां पर्याप्त उपचार उपलब्ध हैं, उन स्थानों में मरीजों का बलपूर्वक संगरोध या पृथक्करण करना अनावश्यक है, लेकिन इसके बावजूद अभी भी पूरे विश्व में भारत (जहां आज भी 1,000 से अधिक कुष्ठ-बस्तियां हैं), चीन,http://www.iol.co.za/index.php?set_id=1&click_id=117&art_id=qw1158139440409B243 Ignorance breeds leper colonies in China Lyn TE Independat News & Media 2006-09-13 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20100408075048/http://www.iol.co.za/index.php?set_id=1&click_id=117&art_id=qw1158139440409B243 8 अप्रैल 2010 live रोमानिया,http://news.bbc.co.uk/2/hi/europe/1639335.stm Europe's last leper colony lives on Radan S, Hutt A बीबीसी न्यूज़ 2001-11-06 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20100929040222/http://news.bbc.co.uk/2/hi/europe/1639335.stm 29 सितंबर 2010 live मिस्र, नेपाल, सोमालिया, लाइबेरिया, वियतनामhttp://english.vovnews.vn/Home/Making-Peace-With-Vietnam-to-be-screened-at-Beijing-film-festival/20092/101642.vov “Making Peace With Vietnam” to be screened at Beijing film festival Radio the Voice of Vietnam 2009-02-08 2010-01-31 https://web.archive.org/web/20090822213800/http://english.vovnews.vn/Home/Making-Peace-With-Vietnam-to-be-screened-at-Beijing-film-festival/20092/101642.vov 22 अगस्त 2009 dead और जापान1996 में जापान निरसित की अपने "कुष्ठ निवारण कानून" लेकिन पूर्व मरीज अभी भी सैनाटोरियम्स में रहते हैं। देखें कोइज़ुमी कालोनियों कोढ़ी के लिए क्षमा मांगते हैं। https://web.archive.org/web/20170909055257/http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/1350630.stm 9 सितंबर 2017 बीबीसी (BBC) समाचार. https://web.archive.org/web/20170909055257/http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/1350630.stm 9 सितंबर 2017 25 मई 2001 https://web.archive.org/web/20170909055257/http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/1350630.stm 9 सितंबर 2017 और 2007 जापान टाइम्स 7 जून एक्स-हंसेन के रोग के रोगियों अभी भी पूर्वाग्रह के साथ संघर्ष करते हैं। जैसे देशों में कुष्ठ-बस्तियां मौजूद हैं। एक समय था, जब कुष्ठरोग को अत्यधिक संक्रामक और यौन-संबंधों के द्वारा संचरित होने वाला माना जाता था और इसका उपचार पारे के द्वारा किया जाता था- जिनमें से सभी धारणाएं सिफिलिस (syphilis) पर लागू हुईं, जिसका पहली बार वर्णन 1530 में किया गया था। अब ऐसा माना जाता है कि कुष्ठरोग के शुरुआती मामलों से अनेक संभवतः सिफिलिस (syphilis) के मामले रहे होंगे.इतिहास के माध्यम से उपदंश https://web.archive.org/web/20141214035934/http://www.britannica.com/EBchecked/topic/578770/syphilis/253277/Syphilis-through-history#ref252973 14 दिसंबर 2014 ब्रिटैनिका विश्वकोष अब यह ज्ञात हो चुका है कि कुष्ठरोग न तो यौन-संपर्क के द्वारा संचरित होता है और न ही उपचार के बाद यह अत्यधिक संक्रामक है क्योंकि लगभग 95% लोग प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षित होते हैंabout leprosy: frequently asked questions http://www.leprosy.org/getinformed/aboutleprosy/leprosyfaq.php American Leprosy Missions, Inc September 19, 2009 https://web.archive.org/web/20110408123213/http://www.leprosy.org/getinformed/aboutleprosy/leprosyfaq.php 8 अप्रैल 2011 dead और इससे पीड़ित लोग भी उपचार के मात्र 2 सप्ताह बाद ही संक्रामक नहीं रह जाते.
कुष्ठरोग के उन्नत रूपों से जुड़ा सदियों पुराना सामाजिक-कलंक, दूसरे शब्दों में कुष्ठरोग का कलंक,Jopling WH Leprosy stigma Lepr Rev 62 1 1–12 1991 March 2034017 अनेक क्षेत्रों में आज भी मौजूद है और यह अभी भी स्व-सूचना और जल्द उपचार के प्रति एक बड़ी बाधा बना हुआ है। 1930 के दशक के अंत में डैप्सोन (dapsone) और इसके व्युत्पन्नों की प्रस्तुति के साथ ही कुष्ठरोग के लिये प्रभावी उपचार प्राप्त हुआ। शीघ्र ही डैप्सोन (dapsone) के प्रति प्रतिरोधी कुष्ठरोग दण्डाणु विकसित हो गया और डैप्सोन (dapsone) के अति-प्रयोग के कारण यह व्यापक रूप से फैल गया। 1980 के दशक के प्रारंभ में बहु-औषधि उपचार (मल्टीड्रग थेरपी) (एमडीटी) (MDT) के आगमन से पूर्व तक समुदाय के भीतर इस बीमारी का निदान और उपचार कर पाना संभव नहीं हो सका था।http://www.searo.who.int/en/section10/section373_11716.htm Communicable Diseases Department, Leprosy FAQ World Health Organization 2006-05-25 2010-01-31 https://archive.today/20120805122916/www.searo.who.int/en/section10/section373_11716.htm 5 अगस्त 2012 dead
बहु-दण्डाणुओं के लिये एमडीटी (MDT) 12 माह तक ली जाने वाली राइफैम्पिसिन (rifampicin), डैप्सोन (dapsone) और क्लोफैज़िमाइन (clofazimine) से मिलकर बना होता है। बच्चों और वयस्कों के लिये उपयुक्त रूप से समायोजित खुराकें सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ब्लिस्टर के पैकेटों के रूप में उपलब्ध हैं। एकल घाव वाले कुष्ठरोग के लिये एकल खुराक वाला एमडीटी (MDT) राइफैम्पिसिन (rifampicin), ऑफ्लॉक्सैसिन (ofloxacin) और माइनोसाइक्लाइन (minocycline) से मिलकर बना होता है। एकल खुराक वाली उपचार रणनीतियों की ओर बढ़ने के कारण कुछ क्षेत्रों में इस बीमारी के प्रसार में कमी आई है क्योंकि इसका प्रसार उपचार की अवधि पर निर्भर होता है।
कुष्ठरोग और इसके पीड़ितों के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिये विश्व कुष्ठरोग दिवस (वर्ल्ड लेप्रसी डे) की स्थापना की गई।
वर्गीकरण
कुष्ठरोग के वर्गीकरण के अनेक विभिन्न तरीके हैं, लेकिन वे एक दूसरे के समानांतर हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) की प्रणाली जीवाणु के प्रसरण के आधार पर “पॉसीबैसीलरी (paucibacillary)” और "मल्टिबैसीलरी (multibacillary)" के रूप में वर्गीकरण करती हैSmith DS http://emedicine.medscape.com/article/220455-overview Leprosy: Overview eMedicine Infectious Diseases 2008-08-19 2010-02-01 https://web.archive.org/web/20100218142511/http://emedicine.medscape.com/article/220455-overview 18 फ़रवरी 2010 live ("पॉसी- (pauci)-" निम्न गुणवत्ता को उल्लेखित करता है।)
शे (SHAY) मापन पांच श्रेणियां प्रदान करता है।Singh N, Manucha V, Bhattacharya SN, Arora VK, Bhatia A Pitfalls in the cytological classification of borderline leprosy in the Ridley-Jopling scale Diagn. Cytopathol. 30 6 386–8 2004 June 15176024 10.1002/dc.20012 2010-02-01 1097-0339 Ridley DS, Jopling WH Classification of leprosy according to immunity. A five-group system Int. J. Lepr. Other Mycobact. Dis. 34 3 255–73 1966 5950347 2010-02-01
आईसीडी-10 (ICD-10), हालांकि डब्ल्यूएचओ (WHO) द्वारा विकसित है, लेकिन यह डब्ल्यूएचओ (WHO) प्रणाली का नहीं, बल्कि रिडले-जॉपलिंग (Ridley-Jopling) प्रणाली का प्रयोग करता है। यह एक मध्यवर्ती (“आई”) ("I") प्रविष्टि भी जोड़ता है। फ़रवरी 2010
मेश (MeSH) में, तीन समूहीकरणों का प्रयोग किया जाता है।
पॉसीबैसीलरी (Paucibacillary) ट्युबरक्युलॉइड (“टीटी”) ("TT"), बॉर्डरलाइन ट्युबरक्युलॉइड (“बीटी”) ("BT") A30.1, A30.2 ट्युबरक्युलॉइड इसे त्वचा पर उपरंजकयुक्त (hypopigmented) एक या अधिक धब्बों व असंवेदक धब्बों के द्वारा पहचाना जाता है, जहां त्वचा की संवेदनाएं समाप्त हो जाती हैं क्योंकि मानवीय मेजबान की प्रतिरक्षी कोशिकाओं द्वारा आक्रमण किये जाने के कारण सतही नसें क्षतिग्रस्त हो गईं हैं। सकारात्मक दण्डाणु (टीएच1) (Th1) मल्टिबैसीलरी मिड-बॉर्डरलाइन या बॉर्डरलाइन (“बीबी”) ("BB") A30.3 बॉर्डरलाइन बॉर्डरलाइन कुष्ठरोग की तीव्रता मध्यम होती है और यह सबसे आम रूप है। त्वचा के धब्बे ट्युबरक्युलॉइड कुष्ठरोग के समान दिखाई देते हैं, लेकिन वे बहुत अधिक संख्या में और अनियमित होते हैं; बड़े धब्बे पूरे अंग को प्रभावित कर सकते हैं और कमजोरी तथा संवेदना में कमी के साथ सतही नसों का शामिल होना आम है। यह प्रकार अस्थिर होता है और लेप्रोमेटस (लेप्रोमेटस) कुष्ठरोग जैसा बन सकता है या इसमें एक प्रतिवर्ती प्रतिक्रिया हो सकती है, जिसके कारण यह ट्युबरक्युलॉइड रूप जैसा बन सकता है। मल्टीबैसीलरी बॉर्डरलाइन लेप्रोमेटस (“बीएल”) ("BL") और लेप्रोमेटस (“एलएल”) ("LL") A30.4, A30.5 लेप्रोमेटस यह त्वचा के सममित घावों, ग्रंथियों, प्लाक, आंतरिक त्वचा (dermis) की मोटाई बढ़ने और नाक के श्लेष्म की नियमित सहभागिता, जिसके परिणामस्वरूप नाक में रक्त का जमाव और एपिस्टैक्सिस (नाक से खून आना) की समस्या हो जाती है, से जुड़ा होता है, लेकिन विशिष्ट रूप से नसों की क्षति को पहचान पाने में देर लगती है। नकारात्मक दण्डाणु के भीतर स्थित प्लाज्मिड (टीएच2) (Th2)
ट्युबरक्युलॉइड और लेप्रोमेटस रूपों के विरुद्ध प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाओं में अंतर होता है।Modlin RL Th1-Th2 paradigm: insights from leprosy J. Invest. Dermatol. 102 6 828–32 1994 June 8006444 10.1111/1523-1747.ep12381958 https://archive.org/details/sim_journal-of-investigative-dermatology_1994-06_102_6/page/828
हानसन रोग को निम्नलिखित प्रकारों में भी बांटा जा सकता है:James, William D.; Berger, Timothy G.; et al. Andrews' Diseases of the Skin: clinical Dermatology Saunders Elsevier 2006 0-7216-2921-0 344-346
प्रारंभिक और अनिश्चित कुष्ठरोग
ट्युबरक्युलॉइड कुष्ठरोग
बॉर्डरलाइन ट्युबरक्युलॉइड कुष्ठरोग
बॉर्डरलाइन कुष्ठरोग
बॉर्डरलाइन लेप्रोमेटस कुष्ठरोग
लेप्रोमेटस कुष्ठरोग
हिस्टॉइड कुष्ठरोग
ल्युसियो (Lucio) और लैटापि (Latapí) का विकीर्ण कुष्ठरोग
यह बीमारी केवल नसों की सहभागिता के साथ भी हो सकती है, जिसमें त्वचा पर कोई घाव नहीं होते.Jardim MR, Antunes SL, Santos AR, et al. Criteria for diagnosis of pure neural leprosy J. Neurol. 250 7 806–9 2003 July 12883921 10.1007/s00415-003-1081-5 Mendiratta V, Khan A, Jain A Primary neuritic leprosy: a reappraisal at a tertiary care hospital Indian J Lepr 78 3 261–7 2006 17120509 Ishida Y, Pecorini L, Guglielmelli E Three cases of pure neuritic (PN) leprosy at detection in which skin lesions became visible during their course Nihon Hansenbyo Gakkai Zasshi 69 2 101–6 2000 July 10979277 Mishra B, Mukherjee A, Girdhar A, Husain S, Malaviya GN, Girdhar BK Neuritic leprosy: further progression and significance Acta Leprol 9 4 187–94 1995 8711979 Talwar S, Jha PK, Tiwari VD Neuritic leprosy: epidemiology and therapeutic responsiveness Lepr Rev 63 3 263–8 1992 September 1406021 इस बीमारी को हानसन का रोग भी कहा जाता है।
संकेत व लक्षण
त्वचा पर घाव प्राथमिक बाह्य संकेत हैं। यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाए, तो कुष्ठरोग बढ़ सकता है, जिससे त्वचा, नसों, हाथ-पैरों और आंखों में स्थायी क्षति हो सकती है। लोककथाओं के विपरीत, कुष्ठरोग के कारण शरीर के अंग अलग होकर गिरते नहीं, हालांकि इस बीमारी के कारण वे सुन्न तथा/या रोगी बन सकते हैं। Textbook of Orthopedics and Trauma 2 779 Jaypee Brothers Publishers 2008 8184482426, 9788184482423 Kulkarni GS
कारण
माइकोबैक्टेरियम लेप्री (Mycobacterium leprae)
thumb|right|माइकोबैक्टीरियम लेप्राए, एजेंट की एक कुष्ठ रोग के कारणात्मक.एसिड के रूप में तेजी से जीवाणु, जब ज़ेहल-नील्सन का उपयोग किया जाता है एम. लेप्राए लाल दिखता है।
माइकोबैक्टेरियम लेप्री
माइकोबैक्टेरियम लेप्री (Mycobacterium leprae) और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमैटॉसिस (Mycobacterium lepromatosis) कुष्ठरोग का कारण बनने वाले एजेंट हैं। एम. लेप्रोमेटॉसिस (M. lepromatosis) पहचाना गया अपेक्षाकृत नया माइकोबैक्टेरियम है, जिसे 2008 में विकीर्ण लेप्रोमेटस कुष्ठरोग के एक जानलेवा मामले से पृथक किया गया था।
एक अंतर्कोशिकीय, अम्ल-तीव्र बैक्टेरियम, एम. लेप्री (M. leprae) वायुजीवी और दण्ड के आकार का होता है और यह माइकोबैक्टेरियम प्रजातियों की मोम-जैसी कोशिका झिल्ली आवरण विशेषता से घिरा होता है।<ref name="Baron">{{cite book | author = McMurray DN | title = Mycobacteria and Nocardia. in: Baron's Medical Microbiology (Baron S et al., eds.) | edition = 4th | publisher = Univ of Texas Medical Branch | year = 1996 | url = http://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/bv.fcgi?rid=mmed.section.1833 | isbn = 0-9631172-1-1 | oclc = 33838234 | access-date = 30 अगस्त 2010 | archive-url = https://web.archive.org/web/20090212202626/http://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/bv.fcgi?rid=mmed.section.1833 | archive-date = 12 फ़रवरी 2009 | url-status = live }}</ref>
स्वतंत्र विकास के लिये आवश्यक जीन की अत्यधिक हानि के कारण, एम. लेप्री (M. leprae) और एम. लेप्रोमेटॉसिस (M. lepromatosis) को प्रयोगशाला में निर्मित नहीं किया जा सकता, एक ऐसा कारक जो कोच की अभिधारणा की एक दृढ़ व्याख्या के अंतर्गत निर्णायक रूप से इस जीव की पहचान करने में कठिनाई उत्पन्न कर देता है।Bhattacharya S, Vijayalakshmi N, Parija SC Uncultivable bacteria: Implications and recent trends towards identification Indian journal of medical microbiology 20 4 174–7 1 अक्टूबर 2002 17657065 http://www.ijmm.org/article.asp?issn=0255-0857;year=2002;volume=20;issue=4;spage=174;epage=177;aulast=Bhattacharya 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20181022061351/http://www.ijmm.org/article.asp?issn=0255-0857;year=2002;volume=20;issue=4;spage=174;epage=177;aulast=Bhattacharya 22 अक्तूबर 2018 dead गैर-संवर्धन-आधारित तकनीकों, जैसे आण्विक आनुवांशिकी ने कारण-कार्य-संबंध की वैकल्पिक स्थापना की अनुमति दी है।
हालांकि, अभी तक इसके उत्पादक जीवों को प्रयोगशाला में संवर्धित कर पाना असंभव रहा है, लेकिन उन्हें पशुओं में विकसित कर पाना संभव हुआ है। यूनाइटेड स्टेट्स लेप्रसी पैनल (United States Leprosy Panel) के चेयरमैन, चार्ल्स शेपर्ड (Charles Shepard) ने 1960 में चूहों के पैरों के पंजों में इन जीवों को सफलतापूर्वक विकसित किया। 1970 में जोसेफ कॉल्सन (Joseph Colson) और रिचर्ड हिल्सन (Richard Hilson) ने सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल, लंदन में जन्मजात रूप से बाल्यग्रंथि-हीन चूहे (‘नग्न चूहे’) के प्रयोग द्वारा इस विधि में सुधार किया।
एक अन्य पशु मॉडल एलीनॉर स्टॉर्स (Eleanor Storrs) द्वारा गल्फ साउथ रिसर्च इंस्टीट्यूट (Gulf South Research Institute) में विकसित किया गया। डॉ॰ स्टॉर्स ने अपनी पीएचडी (PhD) के लिये नौ-धारियों वाले वर्मी (armadillos) पर कार्य किया था क्योंकि इस पशु के शरीर का तापमान मनुष्यों के शरीर के तापमान से कम था और इसलिये यह एक उपयुक्त पशु मॉडल हो सकता था। यह कार्य 1968 में वाल्डेमर किर्शीमर (Waldemar Kirchheimer) द्वारा प्रदान की गई सामग्री के साथ कारविल (Carville), लुइज़ियाना (Louisiana) में यूनाइटेड स्टेट्स पब्लिक हेल्थ लेप्रोसैरियम (United States Public Health Leprosarium) में प्रारंभ हुआ। ये प्रयोग असफल सिद्ध हुए, लेकिन लियोनार्ड’स वुड मेमोरियल (Leonard's Wood Memorial) के चिकित्सीय निदेशक चैपमैन बिनफोर्ड (Chapman Binford) द्वारा 1970 में प्रदान की गई सामग्री के साथ किया गया अतिरिक्त कार्य सफल रहा. इस मॉडल का वर्णन करने वाले शोध-पत्रों के परिणामस्वरूप प्राथमिकता पर एक विवाद छिड़ गया। जब इस बात की खोज हुई कि लुइज़ियाना में पाये जाने वाले जंगली वर्मी प्राकृतिक रूप से ही कुष्ठरोग से संक्रमित थे, तो आगे एक और विवाद का जन्म हुआ।
प्राकृतिक रूप से होने वाला संक्रमण गैर-मानवीय वानरों में भी प्राप्त हुआ है, जिनमें अफ्रीकी चिंपांज़ी (African chimpanzee), सूटी मैंगेबी (sooty mangabey) और साइनोमॉल्गस मकैक (cynomolgus macaque) शामिल हैं।
आनुवांशिकी
अनेक जीन कुष्ठरोग के प्रति संवेदनशीलता से जुड़े हुए हैं।
नाम स्थान ओएमआईएम (OMIM) जीन एलपीआरएस1 (LPRS1) 10पी13 (10p13) 609888 एलपीआरएस2 (LPRS2) 6क्यू25 (6q25) 607572 पार्क2 (PARK2), पीएसीआरजी (PACRG) एलपीआरएस3 (LPRS3) 4क्यू32 (4q32) 246300 टीएलआर2 (TLR2) एलपीआरएस4 (LPRS4) 6पी21.3 (6p21.3) 610988 एलटीए (LTA)
रोगलक्षण-शरीरक्रिया विज्ञान
thumb|300px|right|पूर्वी अफ्रीका जर्मन के बगामोज़ो में कुष्ठरोग से पीड़ित हैं।
कुष्ठरोग के संचरण की क्रियाविधि लंबा निकट संपर्क और अनुनासिक बूंदों द्वारा संचरण है। मानवों के अतिरिक्त जिस एकमात्र जीव में कुष्ठरोग होने की जानकारी मिली है, वह नौ-धारियों वाला वर्मी है।Rojas-Espinosa O, Løvik M Mycobacterium leprae and Mycobacterium lepraemurium infections in domestic and wild animals Rev. - Off. Int. Epizoot. 20 1 219–51 2001 11288514 चूहे के पैरों के पंजों में प्रविष्ट करके इस जीवाणु को प्रयोगशाला में भी विकसित किया जा सकता है।Hastings RC, Gillis TP, Krahenbuhl JL, Franzblau SG Leprosy Clin. Microbiol. Rev. 1 3 330–48 1988-07-01 3058299 http://www.pubmedcentral.nih.gov/articlerender.fcgi?tool=pubmed&pubmedid=3058299 358054 नवंबर 2024 InternetArchiveBot इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि एम. लेप्री से संक्रमित सभी लोगों में कुष्ठरोग विकसित नहीं होता और लंबे समय यह माना जाता रहा है कि इसमें आनुवांशिक कारकों की भी एक भूमिका होती है क्योंकि कुछ विशिष्ट परिवारों में कुष्ठरोग का गुच्छन देखा गया है और यह समझ पाने में सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है कि क्यों कुछ लोगों में लेप्रोमेटस कुष्ठरोग विकसित हो जाता है, जबकि अन्य लोगों में कुष्ठरोग के दूसरे प्रकार विकसित होते हैं।Alcaïs A, Mira M, Casanova JL, Schurr E, Abel L Genetic dissection of immunity in leprosy Curr. Opin. Immunol. 17 1 44–8 2005 15653309 10.1016/j.coi.2004.11.006 ऐसा अनुमान है कि आनुवांशिक कारकों के कारण केवल 5% लोगों में ही कुष्ठरोग होने का खतरा होता है।http://www.kfsm.com/Global/story.asp?S=7845322 AR Dept of Health debunks leprosy fears 2008-02-08 2008-04-08 https://web.archive.org/web/20090112112418/http://www.kfsm.com/Global/story.asp?S=7845322 12 जनवरी 2009 dead अधिकांशतः इसका कारण यह है कि शरीर इस जीवाणु के प्रति प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षी होता है और जो लोग इससे संक्रमित हो जाते हैं, वे इस बीमारी के प्रति एक तीव्र एलर्जी भरी प्रतिक्रिया का अनुभव कर रहे हैं। हालांकि इस चिकित्सीय व्याख्या के निर्धारण में आनुवांशिक कारकों की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसके अतिरिक्त, कुपोषण और संक्रमित व्यक्ति के साथ लंबे समय तक संपर्क भी इस प्रकट बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकता है।
यह विश्वास सबसे व्यापक तौर पर प्रचलित है कि यह बीमारी संक्रमित व्यक्ति और स्वस्थ व्यक्ति के बीच संपर्क के द्वारा संचरित होती है।Kaur H, Van Brakel W Dehabilitation of leprosy-affected people—a study on leprosy-affected beggars Leprosy review 73 4 346–55 2002 12549842 सामान्यतः संपर्क की निकटता संक्रमण की मात्रा पर निर्भर होती है, जो कि स्वतः ही बीमारी के होने पर निर्भर है। निकट संपर्क को प्रोत्साहित करने वाली विभिन्न स्थितियों में से घर के भीतर होने वाला संपर्क ही वह एकमात्र स्थिति है, जिसे सरलता से पहचाना जा सकता है, हालांकि संपर्कों की घटनायें और उनसे संबंधित जोखिम के बीच विभिन्न अध्ययनों में बहुत अधिक अंतर दिखाई देता है। विस्तार अध्ययनों में, लेप्रोमेटस कुष्ठरोग के संपर्कों के लिये संक्रमण की दरें सेबु, फिलीपीन्स में 6.2 प्रति 1000 प्रति वर्ष Doull JA, Guinto RA, Rodriguez RS, et al. The incidence of leprosy in Cordova and Talisay, Cebu, Philippines International Journal of Leprosy 1942 10 107–131 से लेकर दक्षिणी भारत के कुछ भागों में 55.8 प्रति 1000 प्रति वर्ष तक रही हैं।Noordeen S, Neelan P Extended studies on chemoprophylaxis against leprosy Indian J Med Res 67 515–27 1978 355134
मानव शरीर से एम. लेप्री के दो निकास मार्गों के रूप में अक्सर त्वचा व अनुनासिक श्लेष्म का वर्णन किया जाता है, हालांकि उनका सापेक्ष महत्व स्पष्ट नहीं है। लेप्रोमेटस के मामले अंतर्त्वचा में गहराई तक जीवों की बड़ी मात्रा को दर्शाते हैं, लेकिन इस बात में संदेह है कि क्या वे पर्याप्त मात्रा में त्वचा की सतह तक पहुंचते हैं। हालांकि उतरी हुई त्वचा (त्वचा की ऊपरी सतह का उतरना) में अम्ल-तीव्र दण्डाणुओं के पाये जाने की खबरें मिली हैं, लेकिन 1963 में वेडेल व अन्य (Weddell et al.) ने बताया कि मरीजों और उनके संपर्क में आने वाले लोगों से बहुत बड़ी मात्रा में लिये गये नमूनों के परीक्षण के बावजूद भी उन्हें उपकला में कोई अम्ल-तीव्र दण्डाणु प्राप्त नहीं हुए थे।Weddell G, Palmer E The pathogenesis of leprosy. An experimental approach Leprosy Review 34 57–61 1963 13999438 एक हालिया अध्ययन में, जॉब व अन्य (Job et al.) ने लेप्रोमेटस कुष्ठरोग के रोगियों की त्वचा की ऊपरी केराटिन परत में एम. लेप्री (M. leprae) पर्याप्त मात्रा प्राप्त करने की जानकारी देते हुए यह सुझाव दिया कि संभव है कि इस जीवाणु की निकासी वसामय स्रावों के साथ होती हो.Job C, Jayakumar J, Aschhoff M "Large numbers" of Mycobacterium leprae are discharged from the intact skin of lepromatous patients; a preliminary report Int J Lepr Other Mycobact Dis 67 2 164–7 1999 10472371
अनुनासिक श्लेष्म, विशेष रूप से व्रण-युक्त श्लेष्म, का महत्व शैफेर (Schäffer) द्वारा 1898 में ही पहचान लिया गया था।आर्क डरमैटो उपदंश 1898; 44:159–174 लेप्रोमेटस कुष्ठरोग में अनुनासिक श्लेष्मक घावों से दण्डाणु की मात्रा का प्रदर्शन शेपर्ड द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया था और उनकी संख्या 10,000 से 10,000,000 के बीच थी।Shepard C Acid-fast bacilli in nasal excretions in leprosy, and results of inoculation of mice Am J Hyg 71 147–57 1960 14445823 पेडले (Pedley) ने बताया कि अधिकांश लेप्रोमेटस मरीजों की बहती हुई नाक से लिये गये अनुनासिक स्रावों में कुष्ठरोग दण्डाणु प्राप्त हुए.Pedley J The nasal mucus in leprosy Lepr Rev 44 1 33–5 1973 4584261 डैवे (Davey) और रीस (Rees) ने संकेत दिया कि लेप्रोमेटस मरीजों के अनुनासिक स्राव में प्रतिदिन 10 मिलियन विकासक्षम जीव उत्पन्न हो सकते हैं।Davey T, Rees R The nasal dicharge in leprosy: clinical and bacteriological aspects Lepr Rev 45 2 121–34 1974 4608620
मानव शरीर में एम. लेप्री (M. leprae) के प्रवेश का मार्ग भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है: त्वचा और ऊपरी श्वसन तंत्र सबसे संभावित मार्ग हैं। पुराने अनुसंधान जहां त्वचा मार्ग का अध्ययन कर रहे थे, वहीं हालिया अनुसंधान द्वारा श्वसन तंत्र का समर्थन बढ़ता जा रहा है। रीस (Rees) और मैकडॉगाल (McDougall) ने प्रतिरक्षा-प्रतिबन्धित चूहों में एम. लेप्री (M. leprae) युक्त के माध्यम से कुष्ठरोग का प्रयोगात्मक संचरण कर पाने में सफलता प्राप्त की, जिससे मनुष्यों में भी इसी तरह की संभावना व्यक्त की गई।Rees R, McDougall A Airborne infection with Mycobacterium leprae in mice J Med Microbiol 10 1 63–8 1977 320339 10.1099/00222615-10-1-63 नग्न चूहों के साथ किये गये उन परीक्षणों के सफल परिणाम मिलने की जानकारी प्राप्त हुई है, जिनमें एम. लेप्री (M. leprae) को सामयिक अनुप्रयोग के द्वारा अनुनासिक छिद्र से प्रविष्ट किया गया था।Chehl S, Job C, Hastings R Transmission of leprosy in nude mice Am J Trop Med Hyg 34 6 1161–6 1985 3914846 संक्षेप में, श्वसन तंत्र के माध्यम से प्रवेश सर्वाधिक संभावित मार्ग है, हालांकि अन्य मार्ग, विशेष रूप से टूटी हुई त्वचा, की उपेक्षा नहीं की जा सकती. सीडीसी (CDC) ने इस बीमारी के संचरण के बारे में निम्नलिखित धारणा व्यक्त की है: "हालांकि हानसन के रोग के संचरण का मार्ग अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन अधिकांश शोधकर्ता मानते हैं कि सामान्यतः एम. लेप्री (M. leprae) श्वसन बूंदों के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। "hansens_tहंसेन के रोग (कुष्ठरोग)
कुष्ठरोग में, उष्मायन काल और संक्रमण के समय तथा बीमारी की शुरुआत के मापन दोनों के ही लिये सन्दर्भ बिंदु परिभाषित कर पाना कठिन है; पहला वाला पर्याप्त प्रतिरक्षात्मक उपकरणों के कारण और दूसरा बीमारी की धीमी शुरुआत के कारण. इसके बावजूद, विभिन्न शोधकर्ताओं ने कुष्ठरोग के लिये उष्मायन काल का मापन करने का प्रयास किया है। न्यूनतम उष्मायन काल कुछ सप्ताहों जितना संक्षिप्त होने की जानकारी मिली है और यह नवजात शिशुओं में कुष्ठरोग की अक्सर होने वाली घटनाओं पर आधारित है।Montestruc E, Berdonneau R 2 New cases of leprosy in infants in Martinique Bull Soc Pathol Exot Filiales 47 6 fr 781–3 1954 14378912 अधिकतम उष्मायन काल 30 वर्ष, या उससे अधिक, लंबा होने की जानकारी मिली है, जैसा कि युद्ध के उन पुराने सिपाहियों में देखा गया है, जिनके बारे में यह ज्ञात है कि वे थोड़े समय के लिये वे संक्रमण के स्थानीय क्षेत्रों के संपर्क में आये थे, लेकिन अन्यथा वे गैर-स्थानीय क्षेत्रों में रह रहे थे। सामान्यतः इस बात पर सहमति है कि औसत उष्मायन काल तीन से पांच वर्षों का होता है।
रोकथाम
वेनेज़ुएला के डॉ॰ जैसिन्टो कॉन्विट (Dr. Jacinto Convit) ने तपेदिक के टीके और माइटोकॉन्ड्रियम लैप्री (Mycobacterium leprae) से एक टीके का संश्लेषण किया, एक असाधारण कार्य, जिसके लिये उन्हें 1990 के दशक के अंत में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के लिये नामांकन प्राप्त हुआ।
हालिया परीक्षणों में, राइफैम्पिसिन (rifampicin) की एकल खुराक ने बीमारी से संपर्क के दो वर्ष बाद कुष्ठरोग विकसित होने की दर को 57% कम कर दिया; इस अवधि में राइफैम्पिसिन (rifampicin) के साथ किये गये 265 उपचारों ने कुष्ठरोग के एक मामले को रोका.Moet FJ, Pahan D, Oskam L, Richardus JH Effectiveness of single dose rifampicin in preventing leprosy in close contacts of patients with newly diagnosed leprosy: cluster randomised controlled trial BMJ 2008 10.1136/bmj.39500.885752.BE 336 761 18332051 7647 2287265 एक गैर-यादृच्छिकृत अध्ययन में पाया गया कि राइफैम्पिसिन (rifampicin) तीन वर्ष बाद कुष्ठरोग के नये मामलो की संख्या 75% घटा दी.Bakker MI, Hatta M, Kwenang A, et al. Prevention of leprosy using rifampicin as chemoprophylaxis Am J Trop Med Hyg 1 अप्रैल 2005 72 443–8 http://www.ajtmh.org/cgi/content/abstract/72/4/443?ijkey=4b15a78b876fd990dfd877ee89b22399c026501c&keytype2=tf_ipsecsha 15827283 4 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20090823002121/http://www.ajtmh.org/cgi/content/abstract/72/4/443?ijkey=4b15a78b876fd990dfd877ee89b22399c026501c&keytype2=tf_ipsecsha 23 अगस्त 2009 dead
बीसीजी (BCG) कुष्ठरोग तथा साथ ही तपेदिक के खिलाफ सुरक्षा की एक परिवर्तनीय मात्रा प्रस्तावित करती है।Fine PE, Smith PG Lepr Rev Vaccination against leprosy—the view from 1996 67 4 1996 249–52 9033195Karonga prevention trial group Randomized controlled trial of single BCG, repeated BCG, or combined BCG and killed Mycobacterium leprae vaccine for prevention of leprosy and tuberculosis in Malawi https://archive.org/details/sim_the-lancet_1996-07-06_348_9019/page/n25 Lancet 348 1996 17–24 8691924 10.1016/S0140-6736(96)02166-6 9019
इस बीमारी को मिटाने की राह में आ रही स्थायी बाधाओं से निपटने के प्रयासों में पहचान में सुधार, मरीजों और लोगों को इसके कारणों के बारे में शिक्षित करना और इस बीमारी, जिसके मरीजों को ऐतिहासिक रूप से “अस्वच्छ” या “ईश्वर द्वारा शापित” मानकर बहिष्कृत किया जाता रहा है, से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं से लड़ना शामिल है। कुष्ठरोग आनुवंशिक बीमारी नहीं है। जहां वर्जनाएं मज़बूत हैं, उन क्षेत्रों में मरीजों पर अपनी स्थिति को छिपाने (और उपचार ढूंढने से बचने) पर बाध्य किया जा सकता है, ताकि भेद-भाव से बचा जा सके. हानसन के रोग के बारे में जागरुकता के अभाव के चलते लोग यह विश्वास (गलत ढंग से) कर सकते हैं कि यह बीमारी अत्यधिक संक्रामक और असाध्य है।
इथियोपिया का अलर्ट (ALERT) अस्पताल और अनुसंधान केंद्र पूरे विश्व के चिकित्सा कर्मियों को कुष्ठरोग के उपचार का प्रशिक्षण प्रदान करता है और साथ ही अनेक स्थानीय मरीजों का उपचार भी करता है। शल्य-चिकित्सीय तकनीकें, जैसे अंगूठों की गतिविधि के नियंत्रण की पुनर्प्राप्ति के लिये, विकसित की जा चुकी हैं।
उपचार
thumb|एम्डिटी (MDT) बहुऔषध विरोधी कुष्ठरोग ड्रग्स: मानक रेगिमेंस
1993 में कुष्ठरोग की कीमोथेरपी (Chemotherapy of Leprosy) पर डब्ल्यूएचओ (WHO) के अध्ययन-दल ने दो प्रकार के मानक एमडीटी (MDT) परहेज नियमों को अपनाए जाने की अनुशंसा की. Chemotherapy of Leprosy WHO Technical Report Series 847 WHO 1994 http://www.who.int/lep/mdt/chemotherapy/en/index.html 2007-03-24 https://web.archive.org/web/20090725224110/http://www.who.int/lep/mdt/chemotherapy/en/index.html 25 जुलाई 2009 live पहला मल्टिबैसीलरी (multibacillary) (एमबी (MB) या लेप्रोमेटस) के मामलों के लिये राइफैम्पिसिन (rifampicin), क्लोफैज़िमाइन (clofazimine) और डैप्सोन (dapsone) के प्रयोग द्वारा 24-माह का एक उपचार था। दूसरा पॉसिबैसीलरी (paucibacillary) (पीबी (PB) or ट्युबरक्युलॉइड) के मामलों के लिये राइफैम्पिसिन (rifampicin) और डैप्सोन (dapsone) का प्रयोग करके छः माह का एक उपचार था। एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में कुष्ठरोग को मिटाने पर पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (First International Conference on the Elimination of Leprosy as a Public Health Problem), जो कि अगले वर्ष हनोई में आयोजित किया गया था, में वैश्विक रणनीति को प्रोत्साहन दिया गया और सभी स्थानिक देशों तक एमडीटी (MDT) का प्रबंध और आपूर्ति करने के लिये डब्ल्यूएचओ (WHO) को फंड प्रदान किया गया।
1995 और 1999 के बीच, डब्ल्यूएचओ (WHO) ने, निप्पॉन फाउंडेशन (Nippon Foundation) (चेयरमैन योहेई सासाकावा (Yōhei Sasakawa), कुष्ठरोग मिटाने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन के सद्भावना दूत (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन Goodwill Ambassador for Leprosy Elimination)) की सहायता से, सभी स्थानिक देशों में ब्लिस्टर पैक में एमडीटी (MDT) का मुफ्त वितरण किया, जिसकी वितरण व्यवस्था स्वास्थ्य मंत्रालयों के माध्यम से की गई। एमडीटी (MDT) के उत्पादक नोवार्टिस (Novartis) द्वारा दिये गये दान के बाद वर्ष 2000 में मुफ्त-वितरण के इस प्रावधान को आगे बढ़ा दिया गया और अब यह कम से कम 2010 के अंत तक जारी रहेगा. राष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) (NGOs) को सरकार के द्वारा डब्ल्यूएचओ (WHO) से प्राप्त इस एमडीटी (MDT) की आपूर्ति की जाती रहेगी.
एमडीटी (MDT) अत्यधिक प्रभावी बना हुआ है और अब पहली मासिक खुराक के बाद से ही मरीज संक्रामक नहीं रह जाते. कैलेंडर ब्लिस्टर पैक में इसकी प्रस्तुति के कारण वास्तविक स्थितियों में इसका प्रयोग करना सुरक्षित और सरल है। पुनरावर्तन की दरें निम्न बनी हुई हैं और संयोजित दवाओं के प्रति कोई प्रतिरोध ज्ञात नहीं हुआ है। कुष्ठरोग पर डब्ल्यूएचओ की सातवीं विशेषज्ञ समिति (सेवंथ डब्ल्यूएचओ एक्सपर्ट कमिटी ऑन लेप्रसी), Seventh WHO Expert Committee on Leprosy WHO Technical Report Series 874 WHO 1998 http://www.who.int/lep/resources/expert/en/index.html 2007-03-24 https://web.archive.org/web/20100929050425/http://www.who.int/lep/resources/expert/en/index.html 29 सितंबर 2010 live ने 1997 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय, ये निष्कर्ष दिया कि उपचार की एमबी (MB) अवधि—जो उस समय 24 माह थी— को “प्रभावोत्पादकता से कोई उल्लेखनीय समझौता किये बिना” सुरक्षित रूप से कम करके 12 माह किया जा सकता है।
वर्तमान सिफारिशें
पॉसी-बैसीलरी कुष्ठरोग (त्वचा पर 1-5 घाव) 6 माह तक राइफैम्पिसिन (rifampicin) और डैप्सोन (dapsone) के साथ उपचार करें
मल्टी-बैसीलरी कुष्ठरोग (त्वचा पर >5 घाव) 12 माह तक राइफैपिसिन (rifampicin), क्लॉफैज़िमाइन (clofazimine) और डैप्सोन (dapsone) से उपचार करें
ऐतिहासिक उपचार
प्राचीन ग्रीक में यह रोग श्लीपद (elephantiasis graecorum) के नाम से जाना जाता था। बाइबिल (मैथ्यू 11,5) के अनुसार कुष्ठरोग को अलौकिक साधनों और हाथों को या इससे विकसित अवशेषों को दफना देने की पद्धति के द्वारा कुष्ठरोग का उपचार किया जा सकता है। सेंट गाइल्स, सेंट मार्टिन, सेंट मैक्सिलियन और सेंट रोमन इस पद्धति से जुड़े हुए थे। अनेक शासक भी इस पद्धति से जुड़े हुए थे: इनमें इंग्लैंड के रॉबर्ट प्रथम, एलिज़ाबेथ प्रथम, हेनरी तृतीय और शार्लेमैग्ने (Charlemagne) शामिल थे।
विभिन्न कालों में रक्त को एक पेय-पदार्थ या स्नान के रूप में एक उपचार माना जाता था। कुंवारी स्रियों या बच्चों के रक्त को विशेष रूप से प्रभावी समझा जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि इस पद्धति का उदगम प्राचीन मिस्र निवासियों से हुआ, लेकिन चीन में भी इसका पालन किये जाने की जानकारी मिली है, जहां लोगों के रक्त के लिये उनकी हत्या कर दी गई थी। यह पद्धति 1790 में डी सेक्रेटिस नैचुरी (De Secretis Naturae) में कुत्ते के रक्त के प्रयोग का उल्लेख किये जाने तक जारी थी। पैरासेल्सस (Paracelsus) ने मेमने के रक्त के प्रयोग की अनुशंसा की और मृत शरीरों के रक्त का प्रयोग भी किया जाता था।
पलाइनी (Pliny), एरेशियस ऑफ कैपाडोसिया (Areteus of Capadocia) तथा थियोडोरस (Theodorus) के अनुसार सांपों का प्रयोग भी किया जाता था। गॉशर (Gaucher) ने कोबरा के ज़हर से उपचार करने की अनुशंसा की. 1913 में, बॉइनेट (Boinet) ने मधुमक्खियों के डंक की बढ़ती हुई मात्रा को बढ़ाते हुए (4000 तक) परीक्षण किया। सांपों के स्थान पर कभी-कभी बिच्छुओं और मेंढकों का प्रयोग किया जाता था। एनाबास (Anabas) (चढ़नेवाली मछली) के मल का भी परीक्षण किया गया।
वैकल्पिक उपचारों में आर्सेनिक और हेलेबोर (hellebore) सहित जलन उत्पन्न करने वाले अन्य तत्वों के प्रयोग के साथ या उनके बिना दागना शामिल था। मध्य-काल में का वंध्यकरण (Castration) का पालन भी किया जाता था।
चालमुगरा का तेल
चालमुगरा (Chaulmoogra) का तेल कुष्ठरोग का एक पूर्व-आधुनिक उपचार था। एक भारतीय दन्तकथा के अनुसार श्रीराम को कुष्ठरोग हो गया था और कलव (हाइड्नोकार्पस (Hydnocarpus) वंश की एक प्रजाति) वृक्ष के फल खिलाकर उनका उपचार किया गया। इसके बाद उसी फल से उन्होंने राजकुमारी पिया का उपचार किया और फिर इस जोड़े ने बनारस लौटकर अपनी इस खोज के बारे में दुनिया को बताया.
भारत में इस तेल का प्रयोग लंबे समय से कुष्ठरोग और त्वचा की विभिन्न अवस्थाओं के उपचार के लिये एक आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जाता रहा है। इसका प्रयोग चीन और बर्मा में भी होता रहा है और बंगाल मेडिकल कॉलेज के एक प्रोफेसर फ्रेडरिक जॉन मॉट (Frederic John Mouat) ने पश्चिमी विश्व को इससे परिचित करवाया. उन्होंने कुष्ठरोग के दो मामलों में एक मौखिक और स्थानिक एजेंट के रूप में इस तेल का प्रयोग करने का प्रयास किया और 1854 में एक शोध-पत्र में उल्लेखनीय सुधार की जानकारी दी.चिकित्सा विज्ञान के भारतीय इतिहास
इस शोध-पत्र ने थोड़ा भ्रम उत्पन्न कर दिया. मॉट (Mouat) ने सूचित किया कि यह तेल चालमुगरा ओडोराटा (Chaulmoogra odorata) वृक्ष का एक उत्पाद है, जिसका वर्णन 1815 में विलियम रॉक्सबर्ग (William Roxburgh), एक शल्य-चिकित्सक और प्रकृतिवादी, द्वारा किया गया था, जब वे कलकत्ता में ईस्ट इंडिया कम्पनी के बॉटनिकल गार्डन में वनस्पतियों का सूचीकरण कर रहे थे। इस वृक्ष को गाइनोकार्डिया ओडोराटा (Gynocardia odorata) नाम से जाना जाता है। 19वीं सदी के शेष भाग में इस वृक्ष को ही इस तेल का स्रोत माना जाता रहा. 1901 में सर डेविड प्रेन (Sir David Prain) ने कलकत्ता बाज़ार और पेरिस और लंदन के औषधिकारों के सच्चे चालमुगरा बीजों की पहचान टारक्टोजीनस कुर्ज़ी (Taraktogenos kurzii) से प्राप्त होने वाले बीजों के रूप में की, जो की बर्मा और उत्तरी भारत में पाया जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में जिस तेल का उल्लेख है वह हाइड्नोकार्पस विगिताना (Hydnocarpus wightiana) वृक्ष से प्राप्त होता है, जिसे संस्कृत में तुवकार और हिंदी व फारसी में चालमुगरा कहा जाता है।
पहला आन्त्रेतर प्रबंध मिस्र के चिकित्सक टॉर्टोलिस बे (Tortoulis Bey), सुल्तान हुसैन कामेल (Hussein Kamel) के व्यक्तिगत चिकित्सक, द्वारा दिया गया था। वे तपेदिक के लिये क्रियोसाइट के प्रत्युपयाजक इंजेक्शन का प्रयोग करते आ रहे थे और 1894 में उन्होंने मिस्र के एक 36-वर्षीय कॉप्ट, जो मौखिक उपचार को सह पाने में असमर्थ रहा था, में चालमुगरा के प्रत्युपयाजक इंजेक्शन का प्रबंध किया। 6 वर्षों और 584 इंजेक्शनों के बाद घोषित किया गया कि वह मरीज ठीक हो चुका था।
इस तेल का एक प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण 1904 में फ्रेडरिक बी. पॉवर (Frederick B. Power) द्वारा लंदन में किया गया। उन्होंने और उनके साथियों ने इन बीजों से एक नये असंतृप्त वसायुक्त-अम्ल को पृथक किया, जिसे उन्होंने ‘चालमुगरिक अम्ल (chaulmoogric acid)’ नाम दिया. उन्होंने दो निकट संबंद्ध प्रजातियों का भी परीक्षण किया: हाइड्नोकार्पस एन्थेल्मिंटिका (Hydnocarpus anthelmintica) और हाइड्नोकार्पस विग्टियाना (Hydnocarpus wightiana) . इन दो वृक्षों से उन्होंने चालमुगरिक अम्ल और एक निकट संबंद्ध यौगिक, हाइड्नोकार्पस अम्ल (hydnocarpus acid), दोनों को अलग किया। उन्होंने गाइनोकार्डिया ओडोराटा (Gynocardia odorata) का परीक्षण भी किया और पाया कि यह इनमें से कोई भी अम्ल उत्पन्न नहीं करता था। बाद में किये गये अनुसंधानों ने यह दर्शाया कि ‘टाराक्टोगेनॉस (taraktogenos)' (हाइड्नोकार्पस कुर्ज़ी (Hydnocarpus kurzii)) भी चालमुगरिक अम्ल उत्पन्न करता था।
इस तेल के प्रयोग से जुड़ी एक अन्य समस्या इसके प्रबंध को लेकर है। मुंह से लिये जाने पर यह अत्यधिक मिचली उत्पन्न करता है। वस्ति से दिये जाने पर यह गुदा-द्वार के आस-पास छाले और दरारें उत्पन्न कर सकता है। इंजेक्शन के द्वारा दिये जाने पर इस दवा ने बुखार और अन्य स्थानीय प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं. इन कठिनाइयों के बावजूद 1916 में राल्फ हॉपकिन्स (Ralph Hopkins), जो कि कारविल (Carville), लुइज़ियाना (Louisiana) स्थित लुइज़ियाना लेपर होम (Louisiana Leper Home) के उपस्थायी चिकित्सक थे, द्वारा 170 मरीजों की एक श्रृंखला का वर्णन किया गया। उन्होंने मरीजों को दो समूहों में विभाजित किया- 'आरंभिक' और 'विकसित'. विकसित मामलों में, अधिकतम एक चौथाई ने अपनी स्थिति में कोई सुधार या रोक प्रदर्शित की. आरंभिक मामलों में, उन्होंने 45% मरीजों में बीमारी की स्थिति में सुधार या स्थिरता की जानकारी दी; 4% की मृत्यु हो गई और 8% की मृत्यु हो गई। शेष मरीज होम से फरार हो गए जो कि संभवतः उन्नत स्थिति में थे।
इस एजेंट की स्पष्ट उपयोगिता को देखते हुए, इसके उन्नत सूत्रीकरण की खोज शुरु हुई. विक्टर हेज़र (Victor Heiser), मनीला में कुष्ठरोगियों के लिये बने सैन लैज़ारो अस्पताल के व्यवस्थापक चिकित्सक मनीला और एलिडोरो मर्केडोथो के लिये मुख्य संगरोध अधिकारी और स्वास्थ्य निदेशक, ने चालमुगरा और रेसॉर्सिन के नुस्खे में कपूर को शामिल करने का निर्णय लिया, जो कि जर्मनी में मर्क एन्ड कम्पनी (Merck and Company) द्वारा विशिष्ट तौर पर मौखिक रूप से दिया जाता था, जिनसे हेज़र ने संपर्क किया था। उन्होंने पाया कि यह नया यौगिक किसी भी प्रकार की मिचली, जिससे पूर्व में तैयार दवाओं को लेने में समस्या उत्पन्न हो रही थी, के बिना तुरंत अवशोषित कर लिया जाता था।
इसके बाद 1913 में हेज़र (Heiser) और मर्सेडो (Mercado) ने दो मरीजों, जो कि इस बीमारी से उबर चुके लगते थे, में इंजेक्शन के द्वारा इस तेल का निरीक्षण किया। चूंकि इस उपचार का परीक्षण अन्य पदार्थों के साथ किया गया था, अतः इसके परिणाम स्पष्ट नहीं थे। इसके बाद पुनः दो मरीजों का उपचार इसी तेल के साथ इंजेक्शन के द्वारा और किसी भी अन्य उपचार के बिना किया गया और पुनः ऐसा प्रतीत हुआ कि वे इस बीमारी से ठीक हो गए हैं। अगले वर्ष हेज़र (Heiser) ने और 12 मरीजों का निरीक्षण किया, लेकिन इसके मिश्रित परिणाम प्राप्त हुए.
इस तेल के कम विषैले रूपों की खोज भी की गई जिन्हें इंजेक्शन के द्वारा शरीर में प्रविष्ट किया जा सके. इन तेलों के रासायनिक यौगिकों का वर्णन करने वाले शोध-पत्रों की एक श्रृंखला 1920 और 1922 के बीच प्रकाशित की गई। ये एलिस बॉल (Alice Ball) के कार्य पर आधारित रहे हो सकते हैं- इस बिंदु पर रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है और 1916 में ही सुश्री बॉल की मृत्यु हो गई। 1921 में इन रासायनिक यौगिकों के परीक्षण किये गये और वे उपयोगी परिणाम देने वाले प्रतीत हुए.
इन प्रयासों के पूर्व अन्य लोगों द्वारा भी प्रयास किये गये थे। मर्क ऑफ डार्म्सटाड (Merck of Darmstadt) ने 1891 में सोडियम लवणों का एक संस्करण उत्पन्न किया था। उन्होंने इस सोडियम का नाम गाइनोकार्डेट (gynocardate) रखा, जिसका कारण यह भ्रांत धारणा थी कि इस तेल का मूल-स्रोत गाइनोकार्डिया ओडोराटा (Gynocardia odorata) था। 1908 में बेयर ने ‘एंटिलेप्रोल (Antileprol)’ नाम से इन रासायनिक यौगिकों के एक वाणिज्यिक संस्करण का विपणन किया।
इसकी आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिये एजेंट जोसेफ रॉक (Joseph Rock), कॉलेज ऑफ हवाई में सुव्यवस्थित वनस्पति-शास्र (Systematic Botany) के प्रोफेसर, ने बर्मा की यात्रा की. स्थानीय ग्रामीणों ने बीज में पेड़ों के एक झुरमुट की स्थापना की, जिसका प्रयोग करके उन्होंने 1921 और 1922 के बीच ओहाउ द्वीप, हवाई (Island of Oahu, Hawaii) में 2,980 वृक्ष लगाए.
इसके आम दुष्प्रभावों के बावजूद यह तेल 1940 के दशक में सल्फोन (sulfone) के आगमत तक लोकप्रिय बना रहा. इसकी प्रभावोत्पादकता के बारे में बहस तब तक जारी रही, जब तक कि इसका प्रयोग बंद नहीं कर दिया गया।
thumb|बहुऔषध रोगी पैक और फफोले
प्रोमिन (Promin) को पहली बार 1908 में फ्रीलबर्ग इम ब्रिस्गाउ (Freiburg im Breisgau), जर्मनी स्थित एल्बर्ट-लुडविग यूनिवर्सिटी (Albert-Ludwig University) में रसायन-शास्र के प्रोफेसर एमिल फ्रोम (Emil Fromm) द्वारा संश्लेषित किया गया। उसकी स्ट्रेप्टोकॉल-विरोधी गतिविधि की पड़ताल ग्लैडस्टोन बटल (Gladstone Buttle) द्वारा बोरो वेलकम (Burroughs Wellcome) में और अर्नेस्ट फॉर्नियु (Ernest Fourneau) द्वारा इंस्टीट्युट पास्टियुर (Institut Pasteur) में की गई थी।
1940 के दशक में प्रोमिन (promin) का विकास होने तक, कुष्ठरोग के लिये कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं था। प्रोमिन की प्रभावोत्पादकता की खोज सबसे पहले गाय हेनरी फैगेट (Guy Henry Faget) और उनके सह-कर्मियों द्वारा 1943 में कारविल, लुइज़ियाना में की गई। 1950 के दशक में, डॉ॰ आर. जी. कॉकार्न ने कारविल में डैप्सोन (dapsone) को प्रस्तुत किया। यह एम. लेप्री (M. leprae) के विरुद्ध जीवाणुओं की वृद्धि को सीमित करके संक्रमण को रोक पाने में कमजोर है और मरीजों के लिये अनिश्चित काल तक इस दवा का सेवन करते रहना आवश्यक माना गया। जब केवल डैप्सोन (dapsone) का प्रयोग किया जाता था, तो एम. लेप्री (M. leprae) की जनसंख्या ने बहुत जल्दी ही इस एंटीबायोटिक प्रतिरोध विकसित कर लिया; 1960 के दशक तक, विश्व की एक मात्र ज्ञात कुष्ठरोग-विरोधी दवा वास्तव में अनुपयोगी हो चुकी थी।
कुष्ठरोग-विरोधी अधिक प्रभावी दवाओं की खोज के परिणामस्वरूप 1960 के दशक और और 1970 के दशक में क्लोफैज़िमाइन (clofazimine) और राइफैम्पिसिन (rifampicinin) का प्रयोग शुरु हुआ। Rees RJ, Pearson JM, Waters MF Experimental and clinical studies on rifampicin in treatment of leprosy Br Med J 1970 89–92 688 1 4903972 10.1136/bmj.1.5688.89 1699176 इसके बाद, भारतीय वैज्ञानिक शांताराम यावलकर (Shantaram Yawalkar) और उनके सहयोगियों ने राइफैम्पिसिन (rifampicin) और डैप्सोन (dapsone) का प्रयोग करके एक संयुक्त उपचार का सूत्रण किया, जिसका लक्ष्य जीवाण्विक प्रतिरोध को घटाना था।Yawalkar SJ, McDougall AC, Languillon J, Ghosh S, Hajra SK, Opromolla DV, Tonello CJ Once-monthly rifampicin plus daily dapsone in initial treatment of lepromatous leprosy Lancet 1982 1199–1202 8283 1 6122970 10.1016/S0140-6736(82)92334-0 इस संयुक्त उपचार के प्रारंभिक परीक्षण 1970 के दशक में माल्टा में किये गये।
1981 में डब्ल्यूएचओ (WHO) की विशेषज्ञ समिति द्वारा पहली बार इन तीनों दवाओं के संयोजन से निर्मित बहु-औषधि उपचार (मल्टीड्रग थेरपी) (एमडीटी) (MDT) की अनुशंसा की गई। इन तीन कुष्ठरोग-विरोधी दवाओं का प्रयोग आज भी मानक (एमडीटी) (MDT) पथ्यों में किया जाता है। प्रतिरोध विकसित हो जाने के जोखिम के कारण इनमें से किसी को भी अकेले प्रयोग नहीं किया जाता.
यह उपचार काफी महंगा था और अधिकांश स्थानिक देशों में इसे शीघ्र नहीं अपनाया गया। 1985 में, कुष्ठरोग को अभी भी 122 देशों में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या माना जाता था। 1991 में जेनेवा (Geneva) में आयोजित 44वीं विश्व स्वास्थ्य सभा (वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली) (डब्ल्यूएचए) (WHA) ने वर्ष 2000 तक एक सार्वजनिक-स्वास्थ्य समस्या के रूप में कुष्ठरोग को मिटाने का एक प्रस्ताव पारित किया-जिसे इस बीमारी के वैश्विक प्रसार को 1 मामला प्रति 10,000 से भी कम मात्रा तक घटाने के रूप में परिभाषित किया गया था। इस सभा में, इसके सदस्य राज्यों द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) (डब्ल्यूएचओ) (WHO) को एक निर्मूलन रणनीति विकसित करने का जनादेश दिया गया, जो कि एमडीटी (MDT) की भौगोलिक कार्यक्षेत्र-व्याप्ति बढ़ाने और मरीजों तक उपचार की अभिगम्यता को बढ़ाने पर आधारित था।
महामारी विज्ञान
thumb|कुष्ठरोग के विश्व वितरण, 2003.
thumb|2002 में विकलांगता से समायोजित जीवन के लिए सालभर का कुष्ठरोग 100.000 निवासी.[130][131][132][133][134][135][136][137][138][139][140][141][142][143]
ऐसा अनुमान है कि कुष्ठरोग के कारण वैश्विक स्तर पर दो से तीन मिलियन लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गए हैं। भारत में इसके मामलों की संख्या सबसे ज्यादा है, जिसके बाद ब्राज़ील दूसरे और बर्मा तीसरे स्थान पर है।
ऐसा अनुमान है कि 1999 में पूरे विश्व में हानसन के रोग की घटनाओं की संख्या 640,000 थी। वर्ष 2000 में, 738,284 मामलों की पहचान हुई.लेपेर कॉलोनी का एक अंतिम दिन. https://web.archive.org/web/20101003090806/http://www.cbsnews.com/stories/2003/03/22/health/main545392.shtml 3 अक्तूबर 2010 सीबीसी (CBC) समाचार. 22 मार्च 2003. वर्ष 2000 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) (डब्ल्यूएचओ) (WHO) ने 91 ऐसे देशों को सूचीबद्ध किया, जिनमें हानसन का रोग स्थानिक है। कुल मामलों में से 70% भारत, म्यांमार और नेपाल से थे। विश्व-भर से मिलने वाले कुष्ठरोग के मामलों में 50% से अधिक केवल भारत में प्राप्त होते हैं।भारत में कुष्ठरोग पीड़ित के लिए अनुदान सर्जरी. https://web.archive.org/web/20120229102232/http://southasia.oneworld.net/todaysheadlines/surgery-grants-for-leprosy-sufferers-in-india 29 फ़रवरी 2012 टाइम्स ऑफ इंडिया. 2 फ़रवरी 2009. वर्ष 2002 में, वैश्विक स्तर पर 763,917 नए मामलों की पहचान हुई और उसी वर्ष डब्ल्यूएचओ (WHO) ने ब्राज़ील, मेडागास्कर, मोज़ाम्बिक, तंज़ानिया और नेपाल को हानसन के कुल मामलों में से 90% मामलों की उपस्थिति वाले देशों के रूप में सूचीबद्ध किया।
डब्ल्यूएचओ (WHO) से प्राप्त हालिया आंकड़ों के अनुसार, 2003 से 2004 तक पूरे विश्व में पहचाने गए मामलों की संख्या में लगभग 107,000 मामलों (या 21%) की कमी आई है। गिरावट की ओर यह झुकाव पिछले तीन वर्षों से लगातार जारी रहा है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक स्तर पर एचडी (HD) का पंजीकृत प्रसार 286,063 मामलों पर था; 2004 के दौरान 407,791 नए मामलों की पहचान हुई.
संयुक्त राज्य अमरीका में, हानसन के रोग का निरीक्षण सेंटर्स फॉर डिसीज़ कण्ट्रोल एण्ड प्रिवेंशन (Centers for Disease Control and Prevention) (सीडीसी) (CDC) द्वारा किया जाता है, जिसने वर्ष 2002 में कुल 92 मामले प्राप्त होने की जानकारी दी.सीडीसी (CDC) कुष्ठरोग तथ्य पत्रक https://web.archive.org/web/20090831095632/http://www.cdc.gov/nczved/dfbmd/disease_listing/leprosy_ti.html 31 अगस्त 2009 . हालांकि वैश्विक स्तर पर मामलों की संख्या में गिरावट जारी है, लेकिन कुछ विशेष क्षेत्रों जैसे ब्राज़ील, दक्षिण एशिया (भारत, नेपाल), अफ्रीका के कुछ भागों (तंज़ानिया, मेडागास्कर, मोज़ाम्बिक) और पश्चिमी प्रशांत में उच्च प्रसार बना हुआ है।
जोखिम समूह
अपर्याप्त बिस्तरों, दूषित जल और अपर्याप्त भोजन, जैसी बुरी स्थितियों या प्रतिरोधी कार्य को घटाने वाली अन्य बीमारियों (जैसे एचआईवी (HIV)) वाले स्थानिक क्षेत्रों में जी रहे लोगों के लिये जोखिम सबसे ज्यादा होता है। हालिया शोधों का सुझाव है कि कोशिका की मध्यस्थता से प्राप्त होने वाले प्रतिरोध में एक कमी है, जिसकी वजह से इस बीमारी के प्रति अतिसंवेदनशीलता उत्पन्न होती है। विश्व की कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से भी कम लोग ही इस बीमारी को ग्रहण कर पाने में सक्षम हैं।कुष्ठरोग क्या है? https://web.archive.org/web/20101215045130/http://www.leprosy.ca/Page.aspx?pid=245 15 दिसंबर 2010 , कुष्ठरोग मिशन कनाडा डीएनए (DNA) का जो क्षेत्र इस परिवर्तनीयता के लिये ज़िम्मेदार है, वही पार्किंसन्स रोग में भी शामिल होता है,July 2008 जिससे इस वर्तमान अनुमान को बल मिलता है कि जैव-रासायनिक स्तर पर ये दो विकार किसी न किसी प्रकार आपस में जुड़े हुए हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, पुरुषों में कुष्ठरोग होने की संभावना महिलाओं की तुलना में दोगुनी होती है। जनवरी 2009 द लेप्रसी मिशन, कनाडा (The Leprosy Mission Canada) के अनुसार अधिकांश लोग –लगभग 95% जनसंख्या –प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षित होते हैं।
बीमारी का बोझ
यद्यपि संचरण के एक मापन के रूप में वार्षिक विस्तार—प्रतिवर्ष मिलने वाले कुष्ठरोग के नए मामलों की संख्या—महत्वपूर्ण है, लेकिन कुष्ठरोग के लंबे उष्मायन काल, बीमारी की शुरुआत के बाद इसके निदान में होने वाली देर और बहुत शुरुआती चरणों में कुष्ठरोग की पहचान कर पाने के लिये प्रयोगशाला उपकरणों की कमी के कारण कुष्ठरोग का मापन कर पाना कठिन है। इसके बजाय, पंजीकृत प्रसार का प्रयोग किया जाता है। पंजीकृत प्रसार इस बीमारी के बोझ का एक उपयोगी प्रतिनिधि सूचक है क्योंकि यह समय के किसी भी बिंदु पर इस बीमारी के साथ निदान किये गये और एमडीटी (MDT) का उपचार प्राप्त कर रहे कुष्ठरोग के सक्रिय मामलों की संख्या दर्शाता है। पुनः प्रसार की दर को समय के किसी भी बिंदु पर जिस जनसंख्या में मामले प्राप्त हुए हों, उसमें एमडीटी (MDT) के लिये पंजीकृत मामलों की संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है। World Health Organization. Epidemiology of leprosy in relation to control. Report of a WHO Study Group World Health Organ Tech Rep Ser 716 1–60 1985 3925646 9241207167 World Health Organization Geneva 12095109
नए मामलो की पहचान इस बीमारी का एक अन्य सूचक है, जिसकी जानकारी देशों द्वारा सामान्यतः एक वार्षिक आधार पर दी जाती है। उस वर्ष बीमारी की शुरुआत के रूप में निदान किये गये मामलों की संख्या (वास्तविक विस्तार) और पिछले वर्ष शुरु हुए मामलों का एक बड़ा अनुपात (जिसे पहचाने न गए मामलों का संचित प्रसार कहा जाता है) इसमें शामिल होता है।
स्थानिक देश भी पहचान के समय स्थापित विकलांगता के नए मामलों की संख्या की जानकारी देते हैं, जो कि संचित प्रसार का एक सूचक है। इस बीमारी की शुरुआत के समय का निर्धारण कर पाना सामान्यतः अविश्वसनीय होता है, बहुत श्रम-साध्य होता है और शायद ही कभी इन आंकड़ों की रिकॉर्डिंग में किया जाता है।
वैश्विक स्थिति
+ सारणी 1: 2006 के प्रारंभ में प्रसार और नए मामलों की पहचान का झुकाव 2001-2005, यूरोप के अतिरिक्तक्षेत्र पंजीकृत प्रसार (दर/10,000 जन.)वर्ष के दौरान नए मामलों की पहचान 2006 का प्रारंभ 2001 2002 2003 2004 2005 अफ्रीका 40,830 (0.56) 39,612 48,248 47,006 46,918 42,814 अमरीका 32,904 (0.39) 42,830 39,939 52,435 52,662 41,780 दक्षिण-पूर्वी एशिया 133,422 (0.81) 668,658 520,632 405,147 298,603 201,635 पूर्वी भूमध्यसागरीय 4,024 (0.09) 4,758 4,665 3,940 3,392 3,133 पश्चिमी प्रशांत 8,646 (0.05) 7,404 7,154 6,190 6,216 7,137 कुल 219,826 763,262 620,638 514,718 407,791 296,499
+ सारणी 2: प्रसार और पहचान, वे देश जिन्हें अभी भी निर्मूलन तक पहुंचना हैदेशपंजीकृत प्रसार (दर/10,000 जन.)नए मामलों की पहचान (दर/100,000 जन.) 2004 का प्रारंभ 2005 का प्रारंभ 2006 का प्रारंभ 2003 के दौरान 2004 के दौरान 2005 के दौरान 79,908 (4.6) 30,693 (1.7) 27,313 (1.5) 49,206 (28.6) 49,384 (26.9) 38,410 (20.6) 6,810 (3.4) 4,692 (2.4) 4,889 (2.5) 5,907 (29.4) 4,266 (22.0) 5,371 (27.1) 7,549 (3.1) 4,699 (1.8) 4,921 (1.8) 8,046 (32.9) 6,958 (26.2) 6,150 (22.7) तंज़ानिया 5,420 (1.6) 4,777 (1.3) 4,190 (1.1) 5,279 (15.4) 5,190 (13.8) 4,237 (11.1) कुल एनए (NA) एनए (NA) एनए (NA) एनए (NA) एनए (NA) एनए (NA)
2006 में 115 देशों और क्षेत्रों द्वारा डब्ल्यूएचओ (WHO) को दी गई जानकारी और वीकली एपिडेमियोलॉजिकल रिकार्ड (Weekly Epidemiological Record) में प्रकाशित खबर के अनुसार उस वर्ष के प्रारंभ में कुष्ठरोग का वैश्विक पंजीकृत प्रसार 219,826 मामलों पर था। Global leprosy situation, 2006 Weekly Epidemiological Record 2006 81 32 309–16 August 16903018 http://www.who.int/lep/resources/wer8132.pdf PDF 32 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20110809045851/http://www.who.int/lep/resources/wer8132.pdf 9 अगस्त 2011 live पिछले वर्ष (2005- वह अंतिम वर्ष, जिसके लिये देशों की पूरी जानकारी उपलब्ध थी) के दौरान पहचाने गए नए मामलों की संख्या 296,499 थी। इस वार्षिक पहचान की संख्या उस वर्ष के अंत में इसके प्रसार से अधिक होने का कारण इस तथ्य के द्वारा समझाया जा सकता है कि नए मामलों के एक भाग ने एक वर्ष के भीतर अपना उपचार पूरा कर लिया और अतः वे अब रजिस्टर में नहीं रहे. वैश्विक स्तर पर पहचाने जाने वाले नए मामलों की संख्या में गिरावट जारी है और 2005 में इसमें पिछले वर्ष की तुलना में 110,000 मामलों (27%) की कमी आई.
सारणी 1 दर्शाती है कि 2001 से वैश्विक वार्षिक पहचान दर में गिरावट जारी है। अफ्रीका क्षेत्र में 2004 की तुलना में नए मामलों की संख्या में 8.7% की गिरावट देखी गई। अमरीकियों के लिये तुलनीय आंकड़े 20.1%, दक्षिण-पूर्व एशिया के लिये 32% और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र के लिये 7.6% थे। हालांकि, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र ने इसी अवधि में 14.8% की वृद्धि दर्शाई.
सारणी 2 उन चार प्रमुख देशों में कुष्ठरोग की स्थिति दर्शाती है, जो अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर निर्मूलन लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके हैं। इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिये कि: क) निर्मूलन को प्रति 10,000 जनसंख्या में 1 से कम मामलों के प्रसार के रूप में परिभाषित किया जाता है; ख) मेडागास्कर ने सितंबर 2006 में राष्ट्रीय स्तर पर निर्मूलन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया; ग) नेपाल में पहचाने गए मामलों की संख्या मध्य-नवंबर 2004 से मध्य-नवंबर 2005 की जानकारी पर आधारित है; और घ) डी. आर. कांगो (D.R. Congo) ने 2008 में आधिकारिक रूप से डब्ल्यूएचओ (WHO) को यह जानकारी दी कि राष्ट्रीय स्तर पर उसने 2007 के अंत में निर्मूलन का लक्ष्य हासिल कर लिया था।
चीन के जनवादी गणतंत्र में वर्तमान स्थिति
March 2010
चीन के जनवादी गणतंत्र (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना) में कुष्ठरोग से उबर चुके ऐसे अनेक मरीज हैं, जिन्हें शेष समाज से पृथक कर दिया गया था। 1950 के दशक में चीन की साम्यवादी सरकार ने इस बीमारी से उबर चुके लोगों के लिये दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में "उबर चुके ग्रामों (रिकवर्ड विलेज्स)" की स्थापना की. हालांकि बहु-औषधि उपचार के आगमन साथ ही अब कुष्ठरोग का इलाज संभव है, लेकिन ये ग्रामीण वहीं बसे हुए हैं क्योंकि बाहरी विश्व द्वारा उन पर इस बीमारी का कलंक लगा दिया गया है। चीन में जॉय इन एक्शन (Joy in Action) जैसे स्वास्थ्य एनजीओ (NGO) उभरे हैं, जो विशेष रूप से इन “उबर चुके ग्रामों” की स्थिति सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
इतिहास
शब्द व्युत्पत्ति
कुष्ठरोग के लिये अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त लेप्रसी (Leprosy) शब्द प्राचीन ग्रीक भाषा के शब्द λέπρα [léprā], "एक बीमारी, जो त्वचा को छिलकेदार बना देती है”, से निर्मित है, जो कि स्वयं λέπω [lépō], "छीलना, निकालना " का एक संज्ञात्मक व्युत्पन्न है। यह शब्द लैटिन और प्राचीन फ्रेंच भाषा से होता हुआ अंग्रेजी भाषा में आया। अंग्रेजी में इसका पहला प्रमाणित प्रयोग एन्क्रीन विसे (Ancrene Wisse), 13वीं सदी में ननों के लिये बनी एक नियमपुस्तिका में है ("मॉयसेसेस हॉन्ड..बिसेम्डे ओ पे स्पाइटेल ऊएल एंड लेप्रुस” (("Moyseses hond..bisemde o þe spitel uuel & þuhte lepruse"). द मिडिल इंग्लिश डिक्शनरी, एस.वी., “लेप्रस” (The Middle English Dictionary, s.v., "leprous"). एक मोटे तौर पर समकालीन प्रयोग सेंट ग्रेगरी के वार्तालाप (Dialogues of Saint Gregory) एंग्लो-नॉर्मन में साक्ष्यांकित है, "एस्मॉन्डेज़ आई सॉन्ट लि लीप्रस (Esmondez i sont li lieprous)" (एंग्लो-नॉर्मन शब्दकोश, एस.वी., “लेप्रस”) (Anglo-Norman Dictionary, s.v., "leprus").
ऐतिहासिक रूप से, हानसन के रोग से ग्रस्त लोगों के कुष्ठरोगी (lepers) कहा जाता रहा है; हालांकि, कुष्ठरोग के मरीजों की घट रही संख्या और इस शब्दावली के निन्दात्मक संकेतार्थ के कारण यह शब्दावली प्रयोग से बाहर होती जा रही है।May 2010 मरीजों पर लगने वाले कलंक के कारण, कुछ लोग “कुष्ठरोग (leprosy)” शब्द के प्रयोग को वरीयता नहीं देते, हालांकि यू. एस. सेंटर्स फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (U.S. Centers for Disease Control and Prevention) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) द्वारा इसी शब्द का प्रयोग किया जाता है।May 2010
ऐतिहासिक रूप से, हिब्रू बाइबिल से मिली ज़ार्थ (Tzaraath) शब्दावली का अनुवाद, गलती से, आमतौर पर लेप्रसी (leprosy) के रूप में किया जाता था, हालांकि ज़ार्थ (Tzaraath) के लक्षण कुष्ठरोग के साथ पूरी तरह संगत नहीं थे और इसके बजाय इसका प्रयोग अनेक प्रकार के विकारों का उल्लेख करने के लिये किया जाता था, जो कि हानसन के रोग से अलग थे।आर्टस्क्रोल तनाख, 6
लेप्रसी (leprosy) शब्द के उल्लेख का पहला रिकॉर्ड लेविटिकस 13:2 (Leviticus 13:2) में मिलता है - "जब किसी पुरुष के मांस की त्वचा में, कोई उभार, कोई पपड़ी, या कोई चमकीला दाग़ होगा और मांस की त्वचा में यह कुष्ठरोग (leprosy) की महामारी के समान होगा; तो उसे पुजारी आरोन (Aaron the priest) के पास या उनके पुजारी पुत्रों में से किसी एक के पास तक लाया जाएगा." बाइबिल में भी सीरियाई नामन (Naaman) की एक प्रसिद्ध कथा है, “सीरिया के राजा का कप्तान (कैप्टन ऑफ़ द होस्ट ऑफ़ द किंग ऑफ़ सीरिया)" (2 किंग्ज़ 5:1) (2 Kings 5:1), जो त्वचा की यह और भीषण बीमारी से ग्रस्त था।
विशिष्ट रूप से, डर्मेटोफाइट (dermatophyte) कवक ट्राइकोफिटॉन वायोलीसम (Trichophyton violaceum) के कारण टीनिया कैपिटिस (tinea capitis) (सिर की त्वचा का कवकीय संक्रमण) और शरीर के अन्य भागों में होने वाले संबंधित संक्रमण वर्तमान में पूरे मध्य-पूर्व में और उत्तरी अफ्रीका में अत्यधिक हैं और शायद वे बाइबिल के समय भी बहुत आम रहे होंगे. इसी प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि कुरूप बना देने वाला त्वचा-रोग फेवस (favus), ट्राइकोफिटॉन स्कोएन्लेनी (Trichophyton schoenleinii), आधुनिक दवाओं के आगम से पूर्व पूरे यूरेशिया और अफ्रीका में आम था। तीव्र फेवस (favus) और इसी प्रकार की अन्य कवकीय बीमारियों से ग्रस्त (और संभवतः वे भी, जो तीव्र सोरियासिस (psoriasis) और अन्य बीमारियों, जो सूक्ष्मजीवों के कारण नहीं होतीं, से ग्रस्त थे) लोगों को यूरोप में 17वीं शताब्दी तक कुष्ठरोग से ग्रस्त के रूप में ही वर्गीकृत किया जाता था। Kane J, Summerbell RC, Sigler L, Krajden S, Land G Laboratory Handbook of Dermatophytes: A clinical guide and laboratory manual of dermatophytes and other filamentous fungi from skin, hair and nails Star Publishers (Belmont, CA) 1997 0898631572 37116438 यह 1667 में जैन डी ब्रे (Jan de Bray) द्वारा हार्लेम में द रेजेंट्स ऑफ द लेपर हॉस्पिटल (The Regents of the Leper Hospital) में प्रदर्शित एक चित्र में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है (फ़्रांस हाल्स संग्रहालय, हार्लेम, नीदरलैंड्स) (Frans Hals Museum, Haarlem, the Netherlands), जहां एक स्पष्ट रूप से सिर की त्वचा में हुए संक्रमण, जो कि लगभग निश्चित रूप से कवक के कारण हुआ है, से ग्रस्त एक युवा डच पुरुष का उपचार भी कुष्ठरोग से ग्रस्त लोगों के लिये बने एक धर्मार्थ चिकित्सालय के तीन अधिकारियों द्वारा ही किया जा रहा है। जनवरी 2009 19वीं सदी के मध्य काल, जब चिकित्सीय निदान के लिये त्वचा के सूक्ष्मदर्शीय परीक्षण का पहली बार विकास हुआ, से पूर्व तक, “लेप्रसी (leprosy)" शब्द के प्रयोग को शायद ही हानसन के रोग के साथ उतने विश्वसनीय रूप से जोड़ा जा सकता है, जैसा कि इसे हम आज समझते हैं। जनवरी 2009
कारणात्मक जीव की पहचान
thumb|जी.एच.ए. हंसेन, एम्. लेप्राए का आविष्कारक
17वीं सदी की समाप्ति के बाद, पश्चिमी यूरोप में केवल नॉर्वे और आइसलैंड ही ऐसे देश थे, जिनमें कुष्ठरोग के गंभीर समस्या थी। 1830 के दशक के दौरान, नॉर्वे में कुष्ठरोगियों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई, जिससे इस स्थिति के संबंध में चिकित्सीय शोध भी बढ़ा और यह बीमारी एक राजनैतिक मुद्दा बन गई। 1854 में नॉर्वे ने कुष्ठरोग के लिये एक चिकित्सीय अधीक्षक की नियुक्ति की और 1856 में कुष्ठरोगियों के लिये एक राष्ट्रीय रजिस्टर की स्थापना की, जो कि पूरे विश्व में मरीजों का पहला राष्ट्रीय रजिस्टर था।The Leprosy Archives in Bergen, Norway http://digitalarkivet.uib.no/lepra-eng/intro.htm 2009-05-30 https://web.archive.org/web/20090823061111/http://digitalarkivet.uib.no/lepra-eng/intro.htm 23 अगस्त 2009 live
1873 में, जी. एच. आर्मर हानसन (G. H. Armauer Hansen) द्वारा नॉर्वे में कुष्ठरोग के कारणात्मक एजेंट, माइकोबैक्टेरियम लेप्री (Mycobacterium leprae), की खोज की गई, जिससे यह मनुष्यों में इस बीमारी का कारण बनने वाला पहला ज्ञात जीवाणु बन गया। Hansen GHA Undersøgelser Angående Spedalskhedens Årsager (Investigations concerning the etiology of leprosy) Norsk Mag. Laegervidenskaben 1874 4 1–88 no Irgens L The discovery of the leprosy bacillus Tidsskr nor Laegeforen 122 7 708–9 2002 11998735
हानसन ने दाग़रहित ऊतकों वाले अनेक क्षेत्रों से अनेक छोटे गैर-अपवर्तक दण्डाणुओं का अवलोकन किया। ये दण्डाणु पोटेशियम के जल में घुलनशील नहीं थे और वे अम्ल तथा अल्कोहल के प्रति तीव्र थे। 1879 में वे ज़िएल की विधि के द्वारा इन जीवों को चिह्नित करने में सक्षम हुए और कोच के दण्डाणु (माइटोबैक्टेरियम ट्युबरक्युलॉसिस) (Mycobacterium tuberculosis) के साथ इसकी समानता का उल्लेख भी किया गया। इन जीवों में तीन उल्लेखनीय अंतर थे: (1) कुष्ठरोग के घावों में उपस्थित दण्डाणुओं की संख्या अत्यधिक थी (2) उन्होंने अंतर्कोशिकीय संग्रहणों (ग्लॉबी) की रचना की, जो कि उनकी एक विशेषता है और (3) इन दण्डाणुओं में शाखाओं और सूजन के साथ अनेक प्रकार के आकार थे। इन अंतरों ने यह सुझाव दिया कि कुष्ठरोग किसी ऐसे जीव के कारण उत्पन्न होता था, जो माइकोबैक्टेरियम ट्युबरक्युलॉसिस (Mycobacterium tuberculosis) से संबंधित तो था, लेकिन उससे भिन्न था।
उन्होंने बर्गेन (Bergen) में सेंट जॉर्जेन्स अस्पताल (St. Jørgens Hospital) मे कार्य किया, जिसकी स्थापना पंद्रहवीं सदी के प्रारंभ में हुई थी। आज सेंट जॉर्जेन एक संग्रहालय, लेप्राम्युसीट (Lepramuseet) है, जो संभवतः उत्तरी यूरोप में सर्वश्रेष्ठ रूप से संरक्षित कुष्ठरोग चिकित्सालय है।http://www.bymuseet.no/?vis=80 बाइमुसेट आई बर्गन 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20110210134430/http://www.bymuseet.no/?vis=80 10 फ़रवरी 2011 live
देशों के अनुसार कुष्ठरोग
रोम
पश्चिम में, कुष्ठरोग का सबसे प्राचीन ज्ञात विवरण रोमन विश्वकोश के रचयिता ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस (Aulus Cornelius Celsus) (25 ईसा पूर्व से – 37 ईस्वी) ने अपनी डी मेडिसिना (De Medicina) में दिया; उन्होंने कुष्ठरोग को “श्लीपद (elephantiasis) ” कहा. रोमन लेखक प्लाइनी द एल्डर (Pliny the Elder) (23–79 ईस्वी) ने भी इसी बीमारी का उल्लेख किया। हालांकि, 5वीं सदी ईस्वी के वल्गेट (Vulgate) में लेविटिकस के “सारा’ट ” ("sara't " of Leviticus) (पुराना करार) का अनुवाद “लेप्रा (lepra) ” के रूप में किया गया है, लेकिन सारा’ट (sara’t) का लेवाइटिकस (Leviticus) में मिलने वाला मूल रूप सेल्सस (Celsus) व प्लाइनी (Pliny) द्वारा वर्णित श्लीपद (elephantiasis) नहीं था; वस्तुतः सारा’ट (sara't) का प्रयोग एक ऐसी बीमारी का वर्णन करने के लिये किया जाता था, जो घरों और वस्रों को प्रभावित कर सकती थी। कैटरीना सी. डी. मैक्लॉयड (Katrina C. D. McLeod) और रॉबिन डी. एस. येट्स (Robin D. S. Yates) के अनुसार सारा’ट (sara't) "रस्मी अशुद्धि की एक स्थिति या त्वचा के रोग के एक अस्थायी रूप का द्योतक है।"
मुस्लिम विश्व
मुस्लिम विश्व में, फारसी बहुश्रुत एविसेना (Avicenna) (सी. (c.) 980–1037) कुष्ठरोग से ग्रस्त लोगों में अनुनासिक पट के विनाश का वर्णन करने वाला चीन के बाहर का पहला ग्रंथ था।
मध्य-युग
मध्य-युग में विभिन्न लेप्रोसारिया (leprosaria), या कुष्ठरोग चिकित्सालय, उभर आए; मैथ्यू पेरिस (Matthew Paris), एक बेनेडिक्ट-अनुयायी संन्यासी (Benedictine Monk), का आकलन है कि तेरहवीं सदी के प्रारंभिक काल में पूरे यूरोप में इनकी संख्या 19,000 थी।Leprosy पहली दर्ज की गई कुष्ठरोग कॉलोनी हार्ब्लेडाउन (Harbledown) में थी। ये संस्थाएं आश्रमों की तर्ज पर चलाई जातीं थीं और हालांकि कुष्ठरोगियों को इन आश्रम-जैसे स्थानों पर रहने के लिये प्रोत्साहित किया जाता था, लेकिन ऐसा उनके स्वयं के स्वास्थ्य व संगरोध के लिये था। वस्तुतः कुछ मध्ययुगीन स्रोत इस विश्वास की ओर संकेत करते हैं कि जो लोग कुष्ठरोग से ग्रस्त थे, उनके बारे में यह माना जाता था कि वे इस धरती पर ही पापशोधन की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे और इसी कारण उनके कष्टों को सामान्य व्यक्ति के कष्टों से अधिक पवित्र माना जाता था। अधिक आमतौर पर, कुष्ठरोगियों को जीवन और मृत्यु के बीच के एक स्थान पर निवास करने वालों के रूप में देखा जाता था: वे अभी भी जीवित थे, लेकिन फिर भी उनमें से अधिकांश ने सांसारिक अस्तित्व से या तो स्वयं ही खुद को रस्मी रूप से अलग कर लिया था या फिर उन्हें ऐसा करने पर बाध्य किया गया था।ब्रॉडी, सॉल नाथेनिय्ल (1974). आत्मा की रोग: मध्यकालीन साहित्य में कुष्ठरोग इथाका: कॉर्नेल प्रेस. सेंट लाज़ारस (Saint Lazarus) की परंपरा एक सन्यासियों की एक अस्पताल संचालित करने वाली और सैन्य संचालन वाली परंपरा थी, जिसकी शुरुआत बारहवीं सदी में येरुशलम में हुई और अपने पूरे इतिहास के दौरान यह कुष्ठरोग से जुड़ी रही. इस परंपरा के पहले संन्यासी कुष्ठरोग के योद्धा थे और मूल रूप से उनमें कुष्ठरोग के महागुरू (grand masters) हुआ करते थे, हालांकि सदियां बीतने के साथ-साथ इस परंपरा के ये पहलू परिवर्तित हो गए।
रैडगुंड (Radegund) को कुष्ठरोगियों के पैर धोने के लिये जाना जाता है। ऑर्डरिक वाइटेलिस (Orderic Vitalis) ने एक सन्यासी, राल्फ (Ralf) के बारे में लिखा है, जो कुष्ठरोगियों के कष्टों को देखकर इतने द्रवित हो गए कि उन्होंने कुष्ठरोग पाने की प्रार्थना की (जो कि अंततः उन्होंने प्राप्त भी किया). अपने आगमन की सूचना देने के लिये कुष्ठरोगी अपने साथ एक टुनटुना और घंटी रखा करता था और इसके उद्देश्य लोगों को दान देने के लिये आकर्षित करने के साथ ही इस बात की चेतावनी देना भी था कि एक रोगी व्यक्ति आस-पास ही है।
भारत द ऑक्सफोर्ड इलस्ट्रेटेड कम्पेनियन टू मेडिसिन (The Oxford Illustrated Companion to Medicine) का मत है कि कुष्ठरोग का उल्लेख और साथ ही इसका उपचार, हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक अथर्व-वेद में पहले से ही वर्णित है।लॉक एट अल; पृष्ठ 420 एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका 2008 (Encyclopedia Britannica 2008) में लिखते हुए, कीर्न्स (Kearns) व नैश (Nash) कहते हैं कि कुष्ठरोग का प्रथम उल्लेख भारतीय चिकित्सा पुस्तक सुश्रुत संहिता (6वीं सदी ईसा पूर्व) में मिलता है।कार्नस और नैश (2008) द कैम्ब्रिज एन्साइक्लोपीडिया ऑफ ह्युमन पैलियोपैथोलॉजी (The Cambridge Encyclopedia of Human Paleopathology) (1998) के अनुसार: "भारत की सुश्रुत संहिता 600 सदी ईसा पूर्व से ही इस स्थिति का काफी अच्छी तरह वर्णन करती है और यहां तक कि इसके लिये उपचारात्मक सुझाव भी प्रदान करती है".ऑफडरहाइड, ए.सी.; रोड्रिगुएज़-मार्टिन, सी. एण्ड लैंग्सजोएन, ओ. (1998) द कैम्ब्रीज इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ ह्युमन पेलेयोपैथोलॉजी. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस ISBN 0-521-55203-6, पृष्ठ 148. शल्य-चिकित्सक सुश्रुत 6वीं सदी ईसा पूर्व में भारत के नगर काशी में निवास करते थे,द्विवेदी एंड द्विवेदी (2007) और चिकित्सीय पुस्तक सुश्रुत संहिता —उन्हें समर्पित—ने ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी के दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज की. सुश्रुत के कार्य का उत्खनन में प्राप्त सबसे प्राचीन सुरक्षित लिखित सामग्री बोवर पाण्डुलिपी —चौथी सदी ईस्वी में लिखित, है, जो कि मूल रचना के लगभग एक सहस्राब्दी बाद लिखी गई।कुटुंबियन, पृष्ठ (2005) प्राचीन भारतीय चिकित्सा. ओरिएंट लाँगमैन ISBN 81-250-1521-3; पीपी. XXXII-XXXIII इन प्राचीन कार्यों की उपस्थिति के बावजूद इस बीमारी का पहला सामान्यतः अचूक माना जाने वाला वर्णन 150 ईस्वी में गैलेन ऑफ पेरागमम (Galen of Pergamum) का था।
2009 में, भारत में 4000-वर्षों पुराना एक नर-कंकाल मिला, जिस पर कुष्ठरोग के चिह्न दिखाई दे रहे थे।रॉबिंस जी, त्रिपाठी वीएम्, मिश्रा वीएन, मोहंती आरके, शिंदे वीएस, एट अल. (2009). प्राचीन भारत में कुष्ठ रोग के लिए स्केलेटल साक्ष्य (2000 ई.पू.) https://web.archive.org/web/20101012155828/http://www.plosone.org/article/info:doi/10.1371/journal.pone.0005669 12 अक्तूबर 2010 PLoS ONE 4(5): e5669. 10.1371/journal.pone.0005669 यह खोज बालाथाल (Balathal) नामक स्थान पर हुई, जो कि वर्तमान में राजस्थान का एक भाग है और ऐसा माना जाता है जनवरी 2010 कि यह इस बीमारी का अभी तक प्राप्त सबसे पुराना मामला है।Skeleton shows earliest evidence of leprosy एसोसिएटेड प्रेस 2009-05-27 http://www.google.com/hostednews/ap/article/ALeqM5idNIe5ytThacobusirf-k5Bfwl_gD98E87F80 2009-05-29 अगस्त 2021 InternetArchiveBot इससे इस बीमारी के पिछले सबसे प्राचीन ज्ञात मामले की तिथि, जो कि छठी-सदी के मिस्र की थी, 1,500 वर्ष पीछे चली गई।Skeleton Pushes Back Leprosy's Origins Science Now 2009-05-27 http://sciencenow.sciencemag.org/cgi/content/full/2009/527/1?rss=1 2009-05-29 https://web.archive.org/web/20090823003529/http://sciencenow.sciencemag.org/cgi/content/full/2009/527/1?rss=1 23 अगस्त 2009 dead ऐसा विश्वास है कि खुदाई में मिला नर-कंकाल किसी पुरुष का है, जो अपनी आयु के तीसरे दशक में था और अहार कैल्कोलिथिक (Ahar Chalcolithic) संस्कृति का सदस्य था।Leprosy belonged to Ahar Chalcolithic era: Expert द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया 2009-05-29 http://timesofindia.indiatimes.com/Pune/Leprosy-belonged-to-Ahar-Chalcolithic-era-Expert/articleshow/4590778.cms 2009-05-29 https://web.archive.org/web/20100301113814/http://timesofindia.indiatimes.com/Pune/Leprosy-belonged-to-Ahar-Chalcolithic-era-Expert/articleshow/4590778.cms 1 मार्च 2010 live पुरातत्वविदों का कथन है कि यह नर-कंकाल न केवल कुष्ठरोग का अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन मामला है, बल्कि यह इस प्रकार का पहला उदाहरण भी है, जो कि प्रागैतिहासिक भारत तक पीछे जाता है।‘Oldest evidence of leprosy found in India’ द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया 2009-05-27 http://timesofindia.indiatimes.com/Health--Science/Oldest-proof-of-leprosy-found-in-India/articleshow/4585654.cms 2009-05-29 https://web.archive.org/web/20090530141523/http://timesofindia.indiatimes.com/Health--Science/Oldest-proof-of-leprosy-found-in-India/articleshow/4585654.cms 30 मई 2009 live यह खोज इस बीमारी के उदगम से संबंधित एक सिद्धांत का समर्थन करती है, जिसका मानना है कि सिकंदर महान की सेनाओं के माध्यम से यूरोप में फैलने से पूर्व इसका उदगम भारत या अफ्रीका में हुआ।
1881 में, भारत में कुष्ठरोग के लगभग 120,000 मरीज थे। केंद्र सरकार ने 1898 का लेपर्स एक्ट (Lepers Act of 1898) पारित किया, जिसने भारत में कुष्ठरोग से ग्रस्त व्यक्तियों के बलपूर्वक परिरोध के लिये कानूनी प्रावधान प्रदान किया।कुष्ठरोग - ब्रिटिश भारत की चिकित्सा का इतिहास https://web.archive.org/web/20070910150758/http://www.nls.uk/indiapapers/leprosy.html 10 सितंबर 2007 , स्कॉटलैंड के राष्ट्रीय पुस्तकालय
चीन
चीन में कुष्ठरोग
प्राचीन चीन के सन्दर्भ में, कैटरीना सी. डी. मैक्लॉइड (Katrina C. D. McLeod) और रॉबिन डी. एस. येट्स (Robin D. S. Yates) ने निम्न-प्रतिरोध वाले कुष्ठरोग के लक्षणों के सबसे प्राचीन ज्ञात स्पष्ट वर्णन प्रदान करने वाले के रूप में, 266-246 ईसा पूर्व के स्टेट ऑफ क्विन’स फेंग ज़ेन शी (State of Qin's Feng zhen shi 封診式) (सीलबंदी और पड़ताल के मॉडलों) की पहचान की, हालांकि इसे लि (li 癘), त्वचा के विकार के लिये एक सामान्य चीनी शब्द, के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया था।McLeod, Katrina C. D. and Robin D. S. Yates Forms of Ch'in Law: An Annotated Translation of The Feng-chen shih http://jstor.org/stable/2719003 Harvard Journal of Asiatic Studies 41 1 111–63. Pages 152–3 & footnote 147 1981 10.2307/2719003 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20160307044336/http://www.jstor.org/stable/2719003 7 मार्च 2016 dead एंजेला लेयौंग्स चीन में कुष्ठरोग: एक इतिहास (न्यूयॉर्क: कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस, 2009) चीन पर कोढ़ में आधिकारिक स्रोत है। 1975 में हुबेई क्षेत्र के शुइहुदी, युनमेंग की खुदाई में प्राप्त बांस की पट्टी पर लिखा तीसरी सदी ईसा पूर्व का यह चीनी अवतरण न केवल “नाक के स्तंभ” के नष्ट होने का, बल्कि “भौहों में सूजन, बालों के झड़ना, अनुनासिक उपास्थि के अवशोषण, घुटनों और कोहनियों में पीड़ा, कठिनाईपूर्ण और बेसुरे श्वसन तथा साथ ही असंवेदनता” का भी वर्णन करती है।
जापान
जापान में कुष्ठरोग
जापान में कुष्ठरोग की रोकथाम के लिये 1907, 1931 और 1953 में बनाए गए नियमों के आधार पर आरोग्य-निवास में मरीजों के पृथक्करण का एक अद्वितीय इतिहास रहा है और इस कारण इसने कुष्ठरोग के कलंक को और गहरा कर दिया है। 1953 के कानून को 1996 में निरस्त कर दिया गया। 2008 तक प्राप्ति जानकारी के अनुसार अभी भी 13 राष्ट्रीय आरोग्य-निवासों और 2 निजी चिकित्सालयों में 2717 पूर्व-मरीज रह रहे हैं। वर्ष 833 में लिखित एक दस्तावेज में, कुष्ठरोग का वर्णन इस प्रकार किया गया है: “शरीर के पांच अंगों को खा लेने वाले एक परजीवी के कारण होने वाली एक बीमारी. इसमें भौहें और पलकें निकलकर अलग हो जाती हैं और नाक का आकार विकृत हो जाता है। यह बीमारी स्वर में कर्कशता उत्पन्न करती है और आवश्यक रूप से इसमें अंगुलियों और पंजों के शामिल होते हैं। इसके मरीजों के साथ न सोएं क्योंकि यह बीमारी आस-पास के लोगों तक भी फैल सकती है।" यह संक्रामकता के प्रति चिंता व्यक्त करनेवाला पहला दस्तावेज था।जापान में हंसेन के रोग: एक संक्षिप्त इतिहास किकुची आई इंट जे डर्मटोल 1997:36:629-633.
पुर्तगाल
1947 में, पुर्तगाल में हॉस्पिटल-कॉलोनिया रोविस्को पैस (Hospital-Colónia Rovisco Pais) (रोविस्को पैस अस्पताल-कॉलोनी) की स्थापना कुष्ठरोग के उपचार के लिये एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में की गई। 2007 में इसका नाम बदलकर सेंट्रो डी मेडिसिना डी रिएबिलिटाकाओ डा रेजिआओ सेंट्रो-रोविस्को पैस (Centro de Medicina de Reabilitação da Região Centro-Rovisco Pais) कर दिया गया। यह अभी भी एक कुष्ठरोग सेवा प्रदान करता है, जिसमें 25 पूर्व-मरीज रहते हैं। 1988 और 2003 के बीच पुर्तगाल में कुष्ठरोग के 102 मरीजों का उपचार किया गया।मेडिरोस एस, काटोर्ज़े एमजी, वीरा एमआर (2009) पुर्तगाल में हंसेन के रोग: 2003 और 1988 के बीच बहुदण्डाणुयुक्त रोगियों के इलाज. जे. यूर. एकैड. डर्मटोल. वेनेरोल. 23(1):29-35
स्पेन
स्पेन में द सैनेटोरियो डी फॉन्टिलेस (The Sanatorio de Fontilles) (फॉन्टिलेस आरोग्य-निवास) की स्थापना 1902 में की गई और 1909 में इसमें पहला मरीज भर्ती हुआ। 2002 में इस सैनेटोरियो (Sanatorio) में आरोग्य निवास में 68 निवासी मरीज थे और 150 अधिक बाहरी मरीज उपचार प्राप्त कर रहे थे। बहुत थोड़ी संख्या में अभी भी मामलों की जानकारी मिलती रहती है।पर्डल-फर्नान्डीज जेएम, रोड्रिगुएज़-वज़कुएज़ एम, फर्नांडीस-आरागॉन जी, इनीगुएज़-डे ओंज़ोनो एल, गार्सिया-मुनोज़गुरें एस. (2007) कुष्ठरोग और दो देशी स्पनिअर्ड्स में गंभीर न्युरोपटी. रेव नयूरोल. 45(12):734-738
ग्रीस
2009 में ग्रीस से दो देशज मामलों की जानकारी मिली थी।नेयोनाकिस आईके, गिट्टी जेड, कोंटोस एफ, बरिटाकि एस, ज़ेर्वा एल, क्रामबोविटिस ई, स्पंदिडोस डिए (2009) एक देश यूरोपियो से कुष्ठरोग के 2 स्वदेशी मामलों की रिपोर्ट: विश्लेषण बहुरूपता उपयोग पॉलीमारसे श्रृंखला प्रतिक्रिया-प्रतिबंध टुकड़ा लंबाई जीन की hsp65 माइकोबैक्टीरियम लेप्रे के लिए पहचान सीधे नमूना से एक नैदानिक. डिअग्न. माइक्रोबायो. संक्रमित. डिस. |;64(3):331-333
फ्रांस
2009 में फ्रांस से एक मामले की जानकारी मिली थी।एज्ज़ेडाइन के, मालवी डी, बेय्लोट सी, लोंगी-बौर्सिएर एम (2009) महानगरीय फ्रांस में ऑटोच्ठोनस कुष्ठरोग ज्वर का चेहरा और पेश करने के साथ एक विसरित घुसपैठ. इंट. जे डर्मटल. 48(1):69-72
जर्मनी
सन 1700 तक यूरोप के अधिकांश भाग से कुष्ठरोग को लगभग मिटा दिया गया था, लेकिन सन 1850 के कुछ समय बाद रूसी साम्राज्य से आने वाले लिथुआनियाई आप्रवासियों कर्मियों के माध्यम से पूर्वी प्रुशिया में कुष्ठरोग का पुनः आगमन हुआ। 1800 में मेमेल (Memel) (अब लिथुआनिया (Lithuania) में क्लाइपेडा (Klaipėda) में पहले कुष्ठरोग आरोग्य-निवास (leprosarium) की स्थापना की गई। 1900 और 1904 में ऐसे विधेयक पारित किये गये, जिन्होंने मरीजों का पृथक्करण करना और उन्हें दूसरों के साथ कार्य करने की अनुमति न देना आवश्यक बना दिया.
ग्रेट ब्रिटेन
ग्रेट ब्रिटेन में अंतिम ज्ञात मामला 1901 में शेटलैंड द्वीप (Shetland Islands) में मिला था।
माल्टा
माल्टा में कुष्ठरोग (अर्गा कॉर्पोर मॉर्बी लेप्री) (erga corpore morbi leprae) का पहला लेखबद्ध मामला 1492 में एक गोज़िटन महिला (गैरिता ज़ेज्बैस (Garita Xejbais)) का था, लेकिन यह निश्चित है कि यह बीमारी इस समय से पूर्व भी इस द्वीप पर मौजूद थी।बाटीगिएग जीजी, सवोना-वेंचुरा सी, स्टाफ्रेस किलोमीटर (2008) माल्टा में कुष्ठ रोग का इतिहास. माल्टा मेड जे 4:34-38 अगला दर्ज मामला 1630 में डोमिनिक के एक तपस्वी का था। वर्ष 1687 की एक रिपोर्ट में पांच मामले दर्ज थे। इसके बाद 1808 में तीन मामलों की जानकारी मिली. 1839 और 1858 के बीच सात अतिरिक्त मामले दर्ज किये गए। 1890 में एक जनसंख्या सर्वेक्षण में कुल 69 मामले दर्ज हुए. 1957 में एक सर्वेक्षण के बाद 151 कुष्ठ रोग से संक्रमित लोगों की पहचान की.
जून 1972 में, एक निर्मूलन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। यह परियोजना हैम्बर्ग स्थित बॉर्सल इंस्टीट्यूट (Borsal Institute) के निदेशक एनो फ्रीर्कसेन (Enno Freerksen) के कार्य पर आधारित थी। डॉ फ्रीर्कसेन द्वारा इससे पूर्व किये गये परीक्षणों में राइफैपिसिन (rifampacin), आइज़ोनियाज़िड (izoniazid), डैप्सोन (dapsone) और प्रोथियोनामाइड (prothionamide) का प्रयोग किया गया था। माल्टा परियोजना में राइफैम्पिसिन (rifampacin), डैप्सोन (dapsone) और क्लोफैमाज़ाइन (clofamazine) का प्रयोग हुआ। लगभग 300 मरीजों के उपचार के बाद 1999 में यह परियोजना आधिकारिक रूप से बंद कर दी गई।
रोमानिया
यूरोप में कुष्ठरोग की अंतिम कॉलोनी रोमानिया के टिचिलेस्टी (Tichileşti) में थी। 1991 तक, मरीजों को कॉलोनी छोड़ने की अनुमति नहीं दी जाती थी। इस कॉलोनी में मरीजों को भोजन, सोने के लिये एक स्थान, कपड़े और चिकित्सीय सुविधाएं मिलती हैं। कुछ मरीज लंबे मंडपों में और शेष सब्जियों व फलों के उद्यानों से युक्त घरों में रहते हैं। इस कॉलोनी में दो चर्च – ऑर्थोडॉक्स (Orthodox) तथा बैप्टिस्ट (Baptist) – एवं एक खेत है, जहाँ कॉलोनी स्वयं के लिये मक्के का उत्पादन करती है।
कनाडा
19वीं सदी के अंत में अटलांटिक कनाडा में कुष्ठरोग के मामले मिले थे। इसके मरीजों को पहले मिरामिची नदी में शेल्ड्रेक द्वीप पर रखा गया था और बाद में इनको स्थानांतरित कर दिया गया।Tracadie कैथलिक साध्वियां (Catholic nuns) (रिलीजियुसेस हॉस्पिटलीयरेस डी सेन्ट-जोसेफ (religieuses hospitalières de Saint-Joseph), आरएचएसजे (RHSJ)) रोगियों की देखभाल के लिये आईं. उन्होंने न्यू-ब्रुन्सविक (New-Brunswick) में फ्रांसीसी भाषा का पहला अस्पताल (French-language hospital) खोला और इसके बाद अनेक अन्य अस्पताल खुले. आरएचएसजे (RHSJ) की साध्वियों द्वारा खोले गए अस्पतालों में से अनेक का प्रयोग आज भी किया जाता है। ट्रैकेडि (Tracadie) में कुष्ठरोगों को रखने वाला अंतिम अस्पताल 19991 में तोड़ दिया गया। इसका कुष्ठरोग व संक्रामक रोगों के रोगियों के लिये निर्मित भाग (lazaretto section) 1965 से ही बंद कर दिया गया था। अपने अस्तित्व की एक सदी की अवधि में इसने न केवल बीमारी के एकाडियन (Acadian) पीड़ितों को बल्कि पूरे कनाडा से आने वाले लोगों तथा साथ ही आइसलैंड, रूस और चीन सहित अन्य देशों से आने वाले बीमार आप्रवासियों को भी शरण दी.http://personal.nbnet.nb.ca/rhsjnda/Page20.html संग्रहीत प्रति 30 अगस्त 2010 https://web.archive.org/web/20090116041402/http://personal.nbnet.nb.ca/rhsjnda/Page20.html 16 जनवरी 2009 dead
संयुक्त राज्य अमरीका
प्रतिवर्ष 150-200 के बीच नए मामलों का निदान होता है। 1999 में 108 मामलों की जानकारी प्राप्त हुई. कुष्ठरोग सबसे ज्यादा मात्रा में टेक्सास और लुइज़ियाना में मिलता है, जिसका कारण शायद इन राज्यों में नौ धारियों वाले वर्मी की उपस्थिति है।
हवाई द्वीप-समूह
इस द्वीप पर कुष्ठरोग की शुरुआत की तिथि को लेकर विवाद है। सबसे आम तौर पर माना जाने वाला दृष्टिकोण यह है कि इसका आगमन 1850 के दशक के मध्य में आए चीनी आप्रवासियों के द्वारा हुआ, लेकिन कुछ ऐतिहासिक रिकॉर्ड सुझाव देते हैं कि यह बीमारी उससे भी पूर्व समुद्री-नाविकों के माध्यम से आई होगी.
समाज और संस्कृति
कुष्ठरोग से ग्रस्त प्रसिद्ध हस्तियां
बाल्डविन चतुर्थ (Baldwin IV), जो कि लैटिन येरुशलम के एक राजा थे और जिनका चित्रण फिल्म किंगडम ऑफ हेवन (Kingdom of Heaven) के एक पात्र के रूप में किया गया थाHamilton, Bernard The leper king and his heirs: Baldwin IV and the Crusader Kingdom of Jerusalem https://archive.org/details/isbn_0052164187 Cambridge University Press Cambridge, UK 2000 0-521-64187-X
सेंट डैमियन, एक रोमन कैथलिक मिशनरी-पादरी, को मोलोकाई (Molokai) स्थित कुष्ठरोगियों की कॉलोनी में सेवा देते समय कुष्ठरोग का संक्रमण हो गया था, लेकिन उन्होंने तब तक कुष्ठरोगियों की सेवा जारी रखी, जब तक कि इस बीमारी के कारण उनकी स्वयं की मृत्यु नहीं हो गई। 11 अक्टूबर 2009 को वैटिकन में आयोजित एक समारोह में उन्हें संत की उपाधि से विभूषित किया गया और इसकी अध्यक्षता बेनेडिक्ट सोलहवें (Benedict XVI) ने की
वियतनामी कवि हैन मैक टु (Han Mac Tu) Contemporary Vietnamese Writing Cung giu Nguyên Books Abroad 29 1 1955 19–25 University of Oklahoma http://www.jstor.org/stable/40093803 2010-02-28 https://web.archive.org/web/20160327000359/http://www.jstor.org/stable/40093803 27 मार्च 2016 live
संभवतः रॉबर्ट द ब्रुस (Robert the Bruce) नहीं, हालांकि एक अंग्रेज स्रोत के अनुसार वे इस बीमारी से ग्रसित थे। Robert the Bruce and Leprosy Kaufman MH, MacLennan WJ History of Dentistry Research Newsletter 2001-04-01 2010-02-28 http://www.rcpsg.ac.uk/hdrg/April015.htm https://web.archive.org/web/20120309233821/http://www.rcpsg.ac.uk/hdrg/April015.htm 9 मार्च 2012 dead 1995 में मेल गिब्सन (Mel Gibson) की फिल्म ब्रेवहार्ट (Braveheart) में, रॉबर्ट द ब्रुस (Robert the Bruce) के पिता – रॉबर्ट डी ब्रुस (Robert de Brus), एनांडेल के छठे लॉर्ड (6th Lord of Annandale) – को कुष्ठरोग से ग्रस्त दर्शाया गया है।
एक जापानी डैम्यो (daimyo) ओटानी योशित्सुगु (Otani Yoshitsugu)Bryant A Sekigahara 1600: The Final Struggle for Power (Campaign Series, 40) Osprey Publishing (UK) 1995 1-85532-395-8 2010-02-28 http://books.google.com/?id=UzhzhxfmncsC&pg=PA24&dq=Otani+Yoshitsugu+leprosy&q=Otani%20Yoshitsugu%20leprosy सितंबर 2021 InternetArchiveBot
बाइबिल-संबंधी लेखनों में ऐसे अनेक सन्दर्भ उपस्थित हैं, जैसे मूसा की बहन (), मूसा (), सीरिया की सेना का सेनापति नामन सीरियाई (Naaman the Syrian) और बाद में पैगंबर एलिशा (Elisha) का सेवक बना गेहाज़ी (Gehazi) ([javascript:void(0); ]) और ईसा द्वारा उपचारित अनेक अन्य लोग ([javascript:void(0); ], ), हालांकि इनमें उल्लेखित पीड़ाओं और वर्णित लक्षणों को अब हानसन के रोग के लक्षण या केवल इसी रोग के लक्षण नहीं माना जाता (इससे संबंधित चर्चा को ‘ज़ार्थ (Tzaraath)’ में देखें)
काल्पनिक कुष्ठरोगी
April 2010
द क्रोनिकल्स ऑफ थॉमस कोवेनन्ट (The Chronicles of Thomas Covenant) का नायक, अनबिलिवर (Unbeliever), कुष्ठरोग से पीड़ित था, जो कि इस पूरी श्रृंखला का केंद्रीय बिंदु है।
शेक्सपीयर (Shakespeare) के हैम्लेट में, प्राचीन राजा हैम्लेट, राजकुमार हैम्लेट के पिता, का भूत, एक ‘लेप्रस डिस्टिलमेंट (leprous distilment)’ के द्वारा ज़हर दिये जाने का दावा करता है क्योंकि उसमें निर्विवाद उबाल जैसे कुष्ठरोग के लक्षणों में से अनेक लक्षण दिखाई देते हैं।
ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स (Gregory David Roberts) द्वारा लिखित उपन्यास शांताराम (Shantaram) में, मुख्य पात्र, लिन (Lin), का सामना मुंबई की एक झुग्गी-बस्ती में रहने के दौरान अक्सर कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी के सदस्यों से होता है।
मूल पुस्तक बेन हर (Ben Hur) (तथा इस पुस्तक पर आधारित फिल्मों में), जुडाह बेन-हर (Judah Ben-Hur), नायक, की मां और बहन जेल में रहने के दौरान कुष्ठरोग से संक्रमित हो जाती हैं।
द आइलैंड (The Island) विक्टोरिया हिस्लॉप (Victoria Hislop) द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जो अधिकांशतः भूमध्यसागर में स्थित स्पिनालोंगा (Spinalonga) द्वीप की एक कुष्ठरोग कॉलोनी पर आधारित है
स्टीव थेयर (Steve Thayer) द्वारा लिखित पुस्तक द लेपर (The Leper) का नायक एक अमरीकी सैनिक है, जो प्रथम विश्व-युद्ध (World War I) के दौरान संक्रमित हो जाता है और इस बीमारी को ग्रहण कर लेता है
1973 की फिल्म पैपिलोन (Papillon) में, स्टीव मैकक्वीन (Steve McQueen) डेविल्स आइलैंड (Devil's Island) के एक कैदी का किरदार निभाते हैं, जिसका फरार होने के प्रयास में कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी से सामना होता है।
द सिम्पसन्स (The Simpsons) के भाग “लिटिल बिग मॉम (Little Big Mom)" में, लिसा (Lisa) बार्ट (Bart) और होमर (Homer) को यह विश्वास दिलाकर मूर्ख बनाती है कि उन्हें कुष्ठरोग है। नेड फ्लैंडर्स (Ned Flanders) उन्हें उपचार के लिये मोलोकाई (Molokai) द्वीप भेज देते हैं।
शेरलॉक होम्स (Sherlock Holmes) की लघु कथा "द एडवेंचर ऑफ द ब्लैंचेड सोल्जर (The Adventure of the Blanched Soldier)" एक सैनिक से संबंधित है, जिसे कुष्ठरोग से ग्रस्त माना जाता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वास्तविक समस्या इचथायॉसिस (ichthyosis) है।
"मॉन्टी पायथन (Monty Python)" रेखाचित्र "कॉन्क्विस्टेडर कॉफी कैम्पेन (Conquistador Coffee Campaign)" में, एक कॉफी कम्पनी के विज्ञापन-दाता से उसके बॉस द्वारा इंस्टेंट कॉफी (instant coffee) के लिये बने एक विज्ञापन को उसके द्वारा "इंस्टेंट लेप्रसी (instant leprosy)" में, तथा साथ ही कुछ अन्य अनाकर्षक विज्ञापनों में बदलने के बारे में पूछा जाता है।
फिल्म "प्रिंसेज़ मोनोनोक (Princess Mononoke)" में, मुख्य पात्रों में से एक, लेडी एबोशी ऑफ आयरन टाउन (Lady Eboshi of Iron Town) कुछ कुष्ठरोगियों की देखभाल करती है, जिन्होंने उसके लिये हथियार बनाए थे।
तमिल फिल्म राथा कन्नीर (Ratha Kanneer) (ரத்தகண்ணீர்) में, पात्र मोहन (Mohan) (एम. आर. राधा) (M. R. Radha) कुष्ठरोगी हो जाता है, जिसे इस बीमारी के माध्यम से जीवन की अच्छाई और मूल्यों का पता चलता है
शुसाकु एंडो (Shusaku Endo) की वताशी गा सुतेता ओना (Watashi ga suteta onna) (वह लड़की जिसे मैंने पीछे छोड़ दिया) (1963) में, एक युवा पुरुष और एक मासूम युवा महिला के साथ उसके बेमेलपन की कहानी है, जिसे गलती से कुष्ठरोग से ग्रस्त बता दिया जाता है, लेकिन फिर भी वह कुष्ठरोग आरोग्य-निवास में मरीजों की सहायता के लिये बने रहने और कार्य करने का विकल्प चुनती है
बोडी (Bodie) और ब्रोक थोएने (Brock Thoene) की पुस्तक सेकंड टच (Second Touch) की कथा नाज़रथ के येशुआ (Yeshua of Nazareth) के काल के दौरान मैक’ऑब की घाटी (Valley of Mak’ob) में बसी कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी पर आधारित है।
बोडी (Bodie) और ब्रोक थोएने (Brock Thoene) द्वारा लिखित एक अन्य पुस्तक, इलेवन्थ गेस्ट (Eleventh Guest), नाज़रथ के येशुआ (Yeshua of Nazareth) से उपचार प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले कुष्ठरोगियों के जीवन पर केंद्रित है।
गेल त्सुकियामा (Gail Tsukiyama) द्वारा लिखित द समुराई’स गार्डन (The Samurai's Garden) में, साची (Sachi) का पात्र कुष्ठरोग से ग्रस्त है और कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी में रहता है।
2006 में बीबीसी (BBC) के रॉबिन हुड (Robin Hood) संस्करण में, मुख्य-स्थायी खलनायकों गाय (Guy) और इसाबेला (Isabella) के पिता, रॉजर ऑफ गिस्बॉर्न (Roger of Gisborne) का चरित्र, कुष्ठरोग से ग्रस्त हो जाता है और इस प्रकार इस बीमारी से ग्रस्त होने के कारण उसे रस्मी रूप से मृत, फिर निर्वासित, करार दे दिया जाता है।
कुष्ठरोग के बारे में एक मज़ेदार लेकिन शिक्षाप्रद कार्यक्रम 2006 में प्रदर्शित भाग मि. मॉन्क एंड द लेपर (Mr. Monk and the Leper) में दर्शाया गया है।
ग्राहम ग्रीन (Graham Greene) का उपन्यास अ बर्न्ट-आउट केस (A Burnt-Out Case) एक अफ्रीकी कुष्ठरोग कॉलोनी पर आधारित है।
इन्हें भी देखें
प्रत्युपयाजक शर्तों की सूची
आगे पढ़ें
1877: Leprosy In India Lewis T. R. D. D. Cunningham 1877 Office Of The Superintendent Of Government Printing Calcutta http://books.google.com/?id=wHMIAAAAQAAJ 2009-08-07
1895: Pre-Columbian Leprosy Ashmead Albert S. 1895 American Medical Association Press Chicago http://books.google.com/?id=imSHLN5DvgYC 2009-08-07
1895: Prize Essays On Leprosy 1895 The New Sydenham Society London http://books.google.com/?id=qUEJAAAAIAAJ 2009-08-07
1896: A Handbook On Leprosy Impey S. P. 1896 P. Blakiston, Son & Co. Philadelphia http://books.google.com/?id=wHMIAAAAQAAJ 2009-08-07
1916: Page, Walter Hines 1916 Page, Arthur Wilson January Fighting Leprosy In The Philippines The World's Work: A History of Our Time XXXI 310–320 http://books.google.com/?id=09_Sr9emceQC&pg=PA310 2009-08-04
1991: विलियम जॉपलिंग. कुष्ठरोग कलंक. लेप्र पुनरावृत्त 1991, 62, 1-12.
बाहरी कड़ियाँ
Leprosy
कुष्ठ रोग के बारे में दस्तावेजी फिल्म
Health/Conditions_and_Diseases/Infectious_Diseases/Mycobacterial/Hansen's_Disease/
राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ एव अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग सस्थान
राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम
देश को फिर से लगा कुष्ठ रोगजून 2020 InternetArchiveBot
Hansen's Disease (Leprosy)
World Health Organization (WHO) leprosy website
The Global Campaign to Eliminate Leprosy article from PLoS Medicine''
इतिहास
History of Leprosy, Urban Environment and French Colonization in West Africa http://halshs.archives-ouvertes.fr/docs/00/25/89/20/PDF/Environnmement_africain_et_maladie-Barges1993.pdf 6 दिसंबर 2017 https://web.archive.org/web/20130522123800/http://halshs.archives-ouvertes.fr/docs/00/25/89/20/PDF/Environnmement_africain_et_maladie-Barges1993.pdf 22 मई 2013 dead
Anthropology and History of leprosy http://halshs.archives-ouvertes.fr/docs/00/25/67/25/PDF/HA.pdf Histoire & Anthropologie, 15 (1995) 115-122 6 दिसंबर 2017 https://web.archive.org/web/20120618233605/http://halshs.archives-ouvertes.fr/docs/00/25/67/25/PDF/HA.pdf 18 जून 2012 dead
ILA Global Project on the History of Leprosy
National Hansen's Disease Museum
बीबीसी न्यूज़: Slave trade key to leprosy spread
शोध
Pathology Images of Leprosy and Other Granulomatous diseases Yale Rosen, M.D.
INFOLEP Leprosy Information Services
Leprosy Review
Medical anthropology, Leprosy and Health Care in French speaking West-Africa http://halshs.archives-ouvertes.fr/docs/00/25/67/18/PDF/Publication_ALLF_Barges_pour_SHS_.pdf 6 दिसंबर 2017 https://web.archive.org/web/20120618222741/http://halshs.archives-ouvertes.fr/docs/00/25/67/18/PDF/Publication_ALLF_Barges_pour_SHS_.pdf 18 जून 2012 dead
Anthropologie, lèpre et santé publique http://laredoute-occasion.priceminister.com/offer/buy/62340027/Barges-Anne-Lepre-Et-Anthropologie-De-La-Maladie-Au-Mali-Livre.html जून 2020 InternetArchiveBot
सन्दर्भ
2
श्रेणी:कुष्ठरोग
श्रेणी:जीवाणु से संबंधित प्रत्युपयाजक शर्तें
श्रेणी:बैक्टीरियल बीमारियां
श्रेणी:उष्णकटिबंधीय बीमारियां
श्रेणी:उपेक्षित बीमारियां
श्रेणी:रोग