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प्रोटोप्लेनेट
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प्रोटोप्लेनेट (Protoplanet), जिसे हिंदी में 'आद्य-ग्रह' या 'ग्रहीय भ्रूण' भी कहा जाता है, अंतरिक्ष में मौजूद एक विशाल खगोलीय पिंड है जो ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान बनता है। यह मूल रूप से किसी युवा तारे के चारों ओर मौजूद 'प्रोटोप्लेनेटरी डिस्क' के भीतर छोटे-छोटे ग्रहाणुओं के आपस में टकराने और गुरुत्वाकर्षण द्वारा जुड़ने से बनता है। एक प्रोटोप्लेनेट का आकार आमतौर पर चंद्रमा के आकार से लेकर मंगल ग्रह तक हो सकता है, और यह पूर्ण विकसित ग्रह बनने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होता है।Lissauer Jack J. Planet Formation Annual Review of Astronomy and Astrophysics 1993 31 129-174"Protoplanet collisions: Statistical properties of ejecta"
निर्माण और 'अभिवृद्धि'
प्रोटोप्लेनेट का निर्माण अभिवृद्धि नामक एक क्रमिक प्रक्रिया के माध्यम से होता है।
जब कोई नया तारा (जैसे हमारा आदिम सूर्य) बनता है, तो उसके चारों ओर गैस और धूल की एक घूमती हुई चपटी डिस्क बच जाती है। लाखों वर्षों में, इस डिस्क के भीतर की धूल आपस में चिपक कर कुछ किलोमीटर आकार के चट्टानी या बर्फीले पिंड बनाती है, जिन्हें 'ग्रहाणु' कहते हैं। "Impact Erosion of Terrestrial Planetary Atmospheres"अगस्त 2026 InternetArchiveBot
जब इन ग्रहाणुओं का द्रव्यमान पर्याप्त हो जाता है, तो उनका गुरुत्वाकर्षण अपने आसपास के अन्य छोटे ग्रहाणुओं को तेज़ी से अपनी ओर खींचने लगता है। इस अनियंत्रित गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण कुछ ही बड़े पिंड तेज़ी से अपने कक्षीय मार्ग का सारा मलबा सोख लेते हैं और विशाल प्रोटोप्लेनेट में बदल जाते हैं।Kokubo Eiichiro Ida Shigeru Oligarchic Growth of Protoplanets Icarus 131 1 1998 171-178 10.1006/icar.1997.5840
एक प्रोटोप्लेनेट और एक सामान्य क्षुद्रग्रह के बीच सबसे बड़ा वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक अंतर आंतरिक विभेदन का होता है।
जब अभिवृद्धि के दौरान प्रोटोप्लेनेट का आकार बहुत बड़ा (सैकड़ों किलोमीटर) हो जाता है, तो लगातार उल्कापिंडों के भयंकर टकराव और इसके भीतर मौजूद अल्पकालिक रेडियोधर्मी तत्वों (जैसे एल्युमिनियम-26) के रेडियोधर्मी क्षय के कारण अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा के कारण प्रोटोप्लेनेट का आंतरिक भाग पूरी तरह से पिघल जाता है। इस पिघली हुई अवस्था में, भारी धात्विक तत्व (जैसे लोहा और निकल) गुरुत्वाकर्षण के कारण डूबकर केंद्र में चले जाते हैं और एक धात्विक 'कोर' बनाते हैं, जबकि हल्के सिलिकेट तत्व ऊपर तैरकर 'मेंटल' और चट्टानी 'क्रस्ट' का निर्माण करते हैं। हमारी पृथ्वी ने भी अपने शुरुआती दौर में इसी प्रक्रिया का अनुभव किया था।Chambers John E. Planetary accretion in the inner Solar System https://archive.org/details/earth-and-planetary-science-letters_2004-07-15_223_3-4/page/241 Earth and Planetary Science Letters 223 3-4 2004 241-252"NASA Selects Investigations for Future Key Planetary Mission"अगस्त 2026 InternetArchiveBot
सौर मंडल के शुरुआती इतिहास में, सैकड़ों छोटे-बड़े प्रोटोप्लेनेट मौजूद थे। लेकिन उनकी कक्षाएं स्थिर नहीं थीं। जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उनका गुरुत्वाकर्षण एक-दूसरे को प्रभावित करने लगा, जिसके परिणामस्वरूप इन ग्रहीय भ्रूणों के बीच भयंकर विशाल टकराव हुए।
इन्हीं विनाशकारी टकरावों और विलय के कारण आज के पूर्ण विकसित स्थलीय ग्रह (पृथ्वी, शुक्र, मंगल आदि) बने। इसका सबसे प्रसिद्ध खगोलीय उदाहरण थिया नामक एक मंगल के आकार का काल्पनिक प्रोटोप्लेनेट है। खगोलविदों की 'विशाल टकराव परिकल्पना' के अनुसार, लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व थिया प्रोटोप्लेनेट प्रारंभिक पृथ्वी से टकरा गया था। इसी टकराव के अंतरिक्ष में छिटके मलबे से हमारे चंद्रमा का निर्माण हुआ था।Canup Robin M. Simulations of a late lunar-forming impact Icarus 168 2 2004 433-456 10.1016/j.icarus.2003.11.002
सौर मंडल में जीवित अवशेष
हमारे सौर मंडल में अधिकांश प्रोटोप्लेनेट या तो एक-दूसरे से टकराकर बड़े ग्रहों में समा गए, या बृहस्पति ग्रह के विशाल गुरुत्वाकर्षण द्वारा सौर मंडल से बाहर धकेल दिए गए।
हालाँकि, मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट में पिंड ऐसे हैं जिन्हें आज भी 'अछूता प्रोटोप्लेनेट' माना जाता है, क्योंकि उन्होंने विभेदन की प्रक्रिया का अनुभव किया था लेकिन वे कभी किसी बड़े ग्रह में विलीन नहीं हुए। इनमें सबसे प्रमुख सेरेस और वेस्टा हैं। 2011-2015 के बीच नासा के 'डॉन' अंतरिक्ष मिशन ने वेस्टा और सेरेस का करीब से अध्ययन करके उनके 'प्रोटोप्लेनेट' होने की भूवैज्ञानिक पुष्टि की थी।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
नासा (NASA) - सौर मंडल की उत्पत्ति और अन्वेषण
श्रेणी:क्षुद्रग्रह
श्रेणी:खगोल विज्ञान