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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

राजराजा द्वितीय

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thumb|1170 के दौरान चोल साम्राज्य राजराजा द्वितीय चोल वंश के एक प्रमुख शासक थे, जिन्होंने 1150 से 1173 तक शासन किया। सन् 1146 ई॰ में चोल साम्राज्य का उत्तराधिकारी और सह-शासक घोषित किया गया था, इसलिए उनके शिलालेखों में शासन की गणना 1146 से की गई है। उनके काल में चोल साम्राज्य की आंतरिक शक्ति में गिरावट के संकेत मिलने लगे थे, यद्यपि साम्राज्य की सीमाएँ पूर्ववत बनी रहीं। वेंगी प्रदेश अब भी चोल शासन के अधीन था। राजराजा द्वितीय ने केंद्रीय प्रशासन को सुदृढ़ रखने का प्रयास किया, परंतु साम्राज्य के बाहरी प्रदेशों पर नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। इसके बावजूद उन्होंने वेंगी, कलिंग, पांड्य और चेर जैसे क्षेत्रों पर पर्याप्त नियंत्रण बनाए रखा। तमिल साहित्य में उल्लेख है कि उन्होंने श्रीलंका पर भी आक्रमण किया था। यह उनके सैन्य साहस और विस्तारवादी नीति का प्रमाण है। राजराजा द्वितीय और उनके उत्तराधिकारी, विशेषकर कुलोथुंग तृतीय ने “त्रिभुवन चक्रवर्ती” जैसी उपाधियाँ धारण कीं, उनके शासनकाल में चोल साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी, फिर भी उन्होंने उसे एकता और प्रतिष्ठा के साथ बनाए रखा।भारतीय सभ्यता का मूल स्रोत-संग्रह। निरंजन राय ब्रजदुलाल चट्टोपाध्याय ओरिएंट ब्लैकस्वान, 2000 - इतिहास - 673 पृष्ठ 470 धार्मिक उपलब्धियाँ right|thumb|ऐरावतेश्वर मंदिर का दृश्य राजराजा द्वितीय की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक यह थी कि कमजोर राजा माने जाने के बावजूद उन्होंने अपने 26 वर्ष के शासनकाल के उत्तरार्ध में शांति और स्थिरता का युग स्थापित किया। इसी अवधि में उन्होंने कुंभकोणम के निकट दारासुरम में ऐरावतेश्वर मंदिर का निर्माण आरंभ कराया, जो आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।केंद्र यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल जीवंत चोल मंदिरों का समूह। https://whc.unesco.org/en/list/250/ 2024-09-26 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल केंद्र en इन्हें भी देखें राजेन्द्र चोल प्रथम संदर्भ श्रेणी :चोल साम्राज्य श्रेणी : मध्यकालीन भारत