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मिथिला
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अंगूठाकार|मिथिला
मिथिला प्राचीन भारत में एक राज्य था जिसमे बिहार के तिरहुत, दरभंगा, मुंगेर, कोसी, पूर्णिया और भागलपुर प्रमंडल तथा झारखंड के संथाल परगना प्रमंडलhttps://books.google.co.in/books?id=O49ZDwAAQBAJ&pg=RA1-PR20&f=false Sushasan Ke Aaine Mein Naya Bihar Pankaj Kumar Jha 2010 Prabhat Prakashan Bihar (India) 4 फ़रवरी 2019 https://web.archive.org/web/20190328031449/https://books.google.co.in/books?id=O49ZDwAAQBAJ&pg=RA1-PR20&f=false 28 मार्च 2019 live के साथ साथ नेपाल के तराई क्षेत्र के कुछ भाग भी शामिल हैं।https://books.google.co.in/books?id=A0i94Z5C8HMC&pg=PA33 Anthropology of ancient Hindu kingdoms: a study in civilizational perspective झा मखन एमडी पब्लिकेशन्स 1997 978-81-7533-034-4 प्रथम नई दिल्ली 33 en मिथिला की लोकश्रुति कई सदियों से चली आ रही है जो अपनी बौद्धिक परम्परा के लिये भारत और भारत के बाहर जानी जाती रही है। इस क्षेत्र की प्रमुख भाषा मैथिली है। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में सबसे पहले इसका संकेत शतपथ ब्राह्मण में तथा स्पष्ट उल्लेख वाल्मीकीय रामायण में मिलता है। मिथिला का उल्लेख वेदों, महाभारत, रामायण, पुराण तथा जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों में हुआ है।
नामकरण : प्राचीन उल्लेखों के सन्दर्भ में
thumb|विदेह, 500 ईशा पूर्व, कोलिय गणराज्य के पश्चिम में स्थित
पौराणिक उल्लेखों के अनुसार इस क्षेत्र का सर्वाधिक प्राचीन नाम मिथिला ही प्राप्त होता है; साथ ही विदेह नाम से भी इसे संबोधित किया गया है। तीरभुक्ति (तिरहुत) नाम प्राप्त उल्लेखों के अनुसार अपेक्षाकृत काफी बाद का सिद्ध होता है।
मिथिला एवं विदेह
विदेह और मिथिला नामकरण का सर्वाधिक प्राचीन संबंध शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित विदेघ माथव से जुड़ता है। मिथिला के बसने के आरंभिक समय का संकेत उक्त कथा में प्राप्त होता है। विदेघ माथव तथा उसके पुरोहित गौतम राहूगण सरस्वती नदी के तीर से पूर्व की ओर चले थे। उनके आगे-आगे अग्नि वैश्वानर नदियों का जल सुखाते हुए चल रहे थे। सदानीरा (गण्डकी) नदी को अग्नि सुखा नहीं सकेशतपथ ब्राह्मण (प्रथम भाग) - सं. स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती, अनुवादक- पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय; विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली; संस्करण-2010 ई. पृ०-69(1.4.1.14) और विदेघ माथव द्वारा यह पूछे जाने पर कि अब मेरा निवास कहाँ हो, अग्नि ने उत्तर दिया कि इस नदी के पूर्व की ओर तुम्हारा निवास हो।शतपथ ब्राह्मण (प्रथम भाग), पूर्ववत्-1.4.1.17, पृ०-71. शतपथ ब्राह्मण में स्पष्ट रूपेण उल्लिखित है कि पहले ब्राह्मण लोग इस नदी को पार नहीं करते थे तथा यहाँ की भूमि उपजाऊ नहीं थी। उसमें दलदल बहुत था क्योंकि अग्नि वैश्वानर ने उसका आस्वादन नहीं किया था। परंतु अब यह बहुत उपजाऊ है क्योंकि ब्राह्मणों ने यज्ञ करके उसका आस्वादन अग्नि को करा दिया है।शतपथ ब्राह्मण (प्रथम भाग), पूर्ववत्-1.4.1.15-16, पृ०-70-71. गण्डकी नदी के बारे में यह भी उल्लेख है कि गर्मी के बाद के दिनों में भी, अर्थात् काफी गर्मी के दिनों में भी, यह नदी खूब बहती है। इस विदेघ शब्द से विदेह का तथा माथव शब्द से मिथिला का संबंध प्रतीत होता है।मिथिलाक इतिहास, डाॅ० उपेन्द्र ठाकुर, मैथिली अकादमी पटना, द्वितीय संस्करण-1992ई०, पृ०-1,2.मिथिला का इतिहास, डाॅ० रामप्रकाश शर्मा, कामेश्वर सिंह संस्कृत वि.वि.दरभंगा, तृतीय संस्करण-2016, पृ०-9. शतपथ में ही गंडकी नदी के बारे में उल्लेख करते हुए स्पष्ट रूप से विदेह शब्द का भी उल्लेख हुआ है। वहाँ कहा गया है कि अब तक यह नदी कोसल और विदह देशों के बीच की सीमा है; तथा इस भूमि को माथव की संतान (माथवाः) कहा गया है।
वाल्मीकीय रामायण तथा विभिन्न पुराणों में मिथिला नाम का संबंध राजा निमि के पुत्र मिथि से जोड़ा गया है। न्यूनाधिक अंतरों के साथ इन ग्रंथों में एक कथा सर्वत्र प्राप्त है कि निमि के मृत शरीर के मंथन से मिथि का जन्म हुआ था। वाल्मीकीय रामायण में मिथि के वंशज के मैथिल कहलाने का उल्लेख हुआ हैवाल्मीकीय रामायण, गीताप्रेस गोरखपुर, द्वितीय खण्ड, संस्करण-1995ई०, उत्तरकाण्ड-57.19-20 (पृ०-739)। जबकि पौराणिक ग्रंथों में मिथि के द्वारा ही मिथिला के बसाये जाने की बात स्पष्ट रूप से कही गयी है।श्रीमद्भागवतमहापुराण (सटीक), द्वितीय खण्ड, 9.13.13, गीता प्रेस गोरखपुर, संस्करण-2001ई०, पृष्ठ-54. शब्दान्तरों से यह बात अनेक ग्रंथों में कही गयी है कि स्वतः जन्म लेने के कारण उनका नाम जनक हुआ, विदेह (देह-रहित) पिता से उत्पन्न होने के कारण वे वैदेह कहलाये तथा मंथन से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम मिथि हुआ।श्रीविष्णुपुराण (सटीक)- 4.5.22,23, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-2001ई०, पृष्ठ-253. इस प्रकार उन्हीं के नाम से उनके द्वारा शासित प्रदेश का नाम विदेह तथा मिथिला माना गया है। महाभारत में प्रदेश का नाम 'मिथिला' तथा इसके शासकों को 'विदेहवंशीय' (विदेहाः) कहा गया है।महाभारत (सटीक), प्रथम खण्ड, आदिपर्व-112.28, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996ई०, पृष्ठ-339.
तीरभुक्ति (तिरहुत)
वृहद्विष्णुपुराण के मिथिला-माहात्म्य में मिथिला एवं तीरभुक्ति दोनों नाम कहे गये हैं। मिथि के नाम से मिथिलावृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), श्लोक संख्या-47, संपादन-अनुवाद- पं० श्री धर्मनाथ शर्मा, प्रकाशन विभाग, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, संस्करण-1980, पृष्ठ-8 (भूमिकादि के पश्चात्)। तथा अनेक नदियों के तीर पर स्थित होने से तीरों में भोग (नदी तीरों से पोषित) होने से तीरभुक्ति नाम माने गये हैं।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-63, पृ०-11. इस ग्रंथ में गंगा से लेकर हिमालय के बीच स्थित मिथिला में मुख्य 15 नदियों की स्थिति मानी गयी है तथा उनके नाम भी गिनाये गये हैं।
पौराणिक माहात्म्य
मिथिला का माहात्म्य बतलाते हुए वृहद्विष्णु पुराण के मिथिला-माहात्म्य खंड में कहा गया है कि गंगा से हिमालय के बीच 15 नदियों से युक्त परम पवित्र तीरभुक्ति (तिरहुत) है।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-37, पृ०-7. यह तीरभुक्ति मिथिला सीता का निमिकानन है, ज्ञान का क्षेत्र है और कृपा का पीठ है। जानकी कि यह जन्मभूमि मिथिला निष्पापा और निरपेक्षा है। यह राम को आनंद देने वाली तथा मंगलदायिनी है।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-52,53, पृ०-9. प्रयाग आदि तीर्थ लोकों में पुण्य देने वाली है परंतु राम की प्राप्ति करवाने में समर्थ नहीं है; परंतु यह मिथिला सब प्रकार से निश्चित रूप से राम को तुष्ट करने वाली होने से विशेष है।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-55,56, पृ०-10. जैसे साकेत नगरी संसार के कारण स्वरूप है वैसे ही यह मिथिला समस्त आनंद का कारण स्वरूप है। इसलिए महर्षिगण समस्त परिग्रहों को छोड़कर राम की आराधना के लिए प्रयत्नपूर्वक यहीं निवास करते हैं।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-56से58, पृ०-10. श्रीसावित्री तथा श्रीगौरी जैसी देव-शक्तियों ने यही जन्म ग्रहण किया। स्वयं सर्वेश्वरेश्वरी श्रीसीता जी की जन्मभूमि यह मिथिला यत्नपूर्वक वास करने से समस्त सिद्धियों को देने वाली है।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-67, पृ०-12.
सीमा एवं अन्तर्वर्ती क्षेत्र : प्राचीन उल्लेखों के सन्दर्भ में
महाभारत में मगध के बाद (उत्तर) मिथिला की स्थिति मानी गयी है। श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा भीम की मगध-यात्रा का वर्णन करते हुए पहले सरयू नदी पार करके पूर्वी कौशल प्रदेश तथा फिर महाशोण, गण्डकी तथा सदानीरा को पार करके मिथिला में जाने का उल्लेख हुआ है। पुनः गंगा तथा महाशोण को पार करके मगध में जाने की बात कही गयी है।महाभारत (सटीक), प्रथम खण्ड, सभापर्व-20.27,28, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996ई०, पृष्ठ-723-724. इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उस समय मगध के उत्तर में मिथिला की ही स्थिति मानी गयी है। वज्जि प्रदेश (वैशाली राज्य) मिथिला के अंतर्गत ही समाविष्ट था।मिथिलाक इतिहास, डाॅ० उपेन्द्र ठाकुर, मैथिली अकादमी पटना, द्वितीय संस्करण-1992ई०, पृ०-5. महाभारत के इस उल्लेख में भी मिथिला के सीमा क्षेत्र के बारे में अन्यत्र उल्लिखित पश्चिम में गंडकी तथा दक्षिण में गंगा तक के क्षेत्र यथावत् संकेतित होते हैं।
वृहद्विष्णुपुराण में मिथिला की सीमा (चौहद्दी) का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा गया है कि-
कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै।
योजनानि चतुर्विंश व्यायामः परिकीर्त्तितः॥
गङ्गा प्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतम्वनम् ।
विस्तारः षोडशप्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन॥वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-42,43, पृ०-8.
अर्थात् पूर्व में कोसी से आरंभ होकर पश्चिम में गंडकी तक 24 योजन तथा दक्षिण में गंगा नदी से आरंभ होकर उत्तर में हिमालय वन (तराई प्रदेश) तक 16 योजन मिथिला का विस्तार है।
महाकवि चन्दा झा ने उपर्युक्त श्लोक का ही मैथिली रूपांतरण करते हुए मिथिला की सीमा बताते हुए लिखा है कि
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूब कौशिकी धारा।
पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमवत वन विस्तारा॥
इस प्रकार उल्लिखित सीमा के अंतर्गत वर्तमान में नेपाल के तराई प्रदेश के साथ बिहार राज्य के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, और खगड़िया जिले का प्रायः पूरा भूभाग तथा भागलपुर जिले का आंशिक भूभाग आता है।HISTORY OF MITHILA - Upendra Thakur; Mithila Institute of P.G. studies and research, Darbhanga; Second Edition-1988, p.4.
thumb|right|भारत में प्रस्तावित मिथिला राज्य (जिला सहित)
यह सीमा प्राचीन उल्लेखों के अनुसार है संभवतः कोसी की अत्यधिक प्रसिद्धि तथा अनियंत्रित फैलाव के कारण भी पूर्वी सीमा कोसी को माना गया है। बाँध बनने से पूर्व कोसी का कोई नियत मार्ग नहीं रहा है। पूर्वी बिहार के सभी क्षेत्रों से प्रायः कोशी बही है। अतः महानंदा नदी से पश्चिम अर्थात् पश्चिम बंगाल आरंभ होने से पहले का पूरा पूर्वी बिहार (अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार भी) मिथिला का ही स्वाभाविक भाग रहा है।
भौगोलिक स्वरूप
प्रमुख नदियाँ
वृहद्विष्णुपुराण में गंगा तथा हिमालय के बीच स्थित मिथिला के अंतर्गत मुख्य 15 नदियों की स्थिति बतायी गयी है। उनके नाम इस प्रकार हैंवृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-38से41, पृ०-7,8.:-
कोसी
कमला
विण्ववती (विल्ववती= बेलौंती)
यमुना (=जमुने, अधवारा समूह की नदी जो छोटी बागमती में मिलती है। यह नेपाल में जनकपुर के पास से बहती हुई बिहार में मधुबनी जिले के हरलाखी के पास से बहती है।)
गैरिका (=गेरुआ, बाद में धारा-भेद से प्रचलित अनेक नाम -फरैनी, कजला, कमतारा, गोरोभगड़, चकरदाहा, नीतिया धार आदि का प्राचीन रूप-नाम)
जलाधिका वाग्मती (बागमती)
व्याघ्रमती (छोटी बागमती, मूलत: बघोर नदी जिससे अधवारा समूह की नदियाँ मिलकर छोटी बागमती बनती है जो उत्तर से दक्षिण दरभंगा के बीच से होकर बहती है।)
विरजा
गण्डला (गण्डक/बूढ़ी गण्डक)
इक्ष्वावती (संभवतः लच्छा धार जिससे होकर करीब तीन दशक तक कोसी की मुख्यधारा भी बही थी; अथवा बैती नदी जो अब कोसी तटबंध में समा दी गयी है।)
लक्ष्मणा (लखनदेई)
गण्डकी
अकुक्षि वर्त्तिनी (भुतही बलान)
जङ्घा (संभवतः धेमुरा)मिथिलातत्त्वविमर्श - महामहोपाध्याय परमेश्वर झा, मैथिली अकादमी, पटना, द्वितीय संस्करण-2013, पृ०-38.
जीवापिका (जीववत्सा= जीबछ)
ये सब अपेक्षाकृत तत्कालीन बड़ी नदियों के नाम हैं; परंतु इनके अतिरिक्त भी मिथिला में अनेक छोटी-छोटी नदियाँ प्राचीन समय से आज तक अनवरत प्रवाहित हैं और मिथिला के 'तीरभुक्ति' नाम को सार्थक कर रही हैं।
प्रमुख शासक
मिथिला के राजाओं की सूची
प्रमुख तीर्थ एवं दर्शनीय स्थल
श्रीराम-सीता से संबंधित विशेष स्थान होने के अतिरिक्त मिथिला देवाधिदेव महादेव के पूजन-स्थल के रूप में विशेष प्रसिद्ध रही है। वृहद् विष्णुपुराण के अनुसार यहाँ के अंतर्वर्ती प्रमुख शिवलिङ्गों के नाम इस प्रकार हैंवृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-74से77, पृ०-13-14.:-
basua
शिलानाथ
कपिलेश्वर (पूर्व में)
कूपेश्वर (आग्नेय कोण में)
कल्याणेश्वर (दक्षिण में)
जलेश्वर (पश्चिम में)
जलाधिनाथ क्षीरेश्वर (उत्तर में)
त्रिजग महादेव
मिथिलेश्वर महादेव (ईशान कोण में)
भैरव (नैऋत्य कोण में)
उगना महादेव, भवानीपुर
मिथिला परिक्रमा के क्रम में सीमावर्ती शिवलिङ्गों का उल्लेख करते हुए सिंहेश्वर महादेव तथा कामेश्वर लिङ्ग का नाम अत्यधिक श्रद्धा पूर्वक लिया गया है। इस प्रकार यहाँ एकादश शिवलिङ्गों के नाम परिगणित किये गये हैं। पूर्व में सिंहेश्वर महादेव को प्रणाम कर परिक्रमा आरंभ करने तथा पुनः घूमकर सिंहेश्वर महादेव के पास पहुँचकर नियम-विधि पूर्ण करके ही घर जाने की बात कही गयी है।वृहद्विष्णुपुराणीय मिथिला-माहात्म्यम् (सटीक), पूर्ववत्, श्लोक संख्या-101से104, पृ०-18.
मिथिला के प्रमुख शहर
जनकपुर
मुजफ्फरपुर
मेहसी
पूर्णिया
समस्तीपुर
दरभंगा
मधुबनी
सीतामढी
जनकपुरधाम
शिवहर
सहरसा
कटिहार
मधुबनी
बेगूसराय
भागलपुर
दुमका
देवघर
किशनगंज
अररिया
झंझारपुर
सुपौल
सिमराही
इन्हें भी देखें
मिथिला के राजाओं की सूची
मिथिला चित्रकारी
मिथिलाक्षर
मैथिली
विद्यापति
मधुबनी
पंजी (मिथिला)
मखाना
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
पुराण-प्रमाणित मिथिला
मिथिला से सम्बंधित जानकारी प्राप्त करने का स्थान
मिथिला से सम्बंधित जानकारी प्राप्त करने का स्थान
ऑनलाइन मिथिला पेंटिंग
मैथिल ब्राह्मणों का वैवाहिक जालस्थल
मैथिल ब्राह्मण - ऑनलाइन जानकारी
मिथिला की कलाएँ
मधुबनी पेंटिंग - एक महिला द्वारा बनाये गये पेंटिंग के प्रदर्शन का जालस्थल
मिथिला पेंटिंग खरीदने का जालस्थल
मिथिला-मन्च
मिथिला से सम्बंधित जानकारी प्राप्त करने का स्थान
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