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411 समाचार
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विशुद्धानन्द परमहंस

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विशुद्धानन्द परमहंसदेव Vishuddhananda_Paramahansa.jpg विशुद्धानन्द परमहंसदेव पद्मासन में 1853 3 14 yesbirthday ** ग्राम बण्डूल, जिला वर्धमान, भारत भोलानाथ चट्टोपाध्याय 1937 7 14 1853 3 14 yes कलकत्ता, पश्चिम बंगाल योगिराजाधिराज, परमहंस, गंध बाबा महर्षि महातपा गोपीनाथ कविराज, परमहंस सत्यानंद ब्रह्मचारी, नंदलाल गुप्त, अक्षयकुमार दत्त गुप्त, परमहंस स्वामी परमांनंद पुरी.Akshay Kumar Dutta Gupta Yogi Rajadhiraj Sri Sri Vishddhananda Paramahansa Vishwavidyalay Publications Pvt Ltd. Hinduism भारतीय योग तंत्र विशुद्धानन्द परमहंसदेव एक आदर्श योगी, ज्ञानी, भक्त तथा सत्य संकल्प महात्मा थे। परमपथ के इस प्रदर्शक ने योग तथा विज्ञान दोनों ही विषयों में परमोच्च स्थिति प्राप्त कर ली थी। इनके बचपन का नाम भोलानाथ था। इनका जन्म बंगाल के वर्धमान जिले में बण्डूल ग्राम में शुभ बंग-फाल्गुन मास के उन्तीसवें दिन हुआ था। इनके पिताजी का नाम अखिलचन्द्र चट्टोपाध्याय और माताजी का नाम राजराजेश्वरी देवी था।म. म. पं. गोपीनाथ कविराज योगिराज विशुद्धानन्द प्रसंग तथा तत्त्वकथा 2000 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 1 प्रथम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=233 आध्यात्मिक जीवन नौ वर्ष की आयु में इनका यज्ञोपवीत संस्कार किया गया था। इन्हें बण्डूल के शिवलिंग में अलौकिक दर्शन हुए थे।म. म. पं. गोपीनाथ कविराज योगिराज विशुद्धानन्द प्रसंग तथा तत्त्वकथा 2000 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 8 प्रथम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=233 चौदह वर्ष की आयु में इनको परमहंस नीमानदन्द स्वामी का सान्निध्य मिला। इन्हीं परमहंस ने कुछ वर्ष बाद इन्हें इनके गुरु महर्षि महातपा से मिला दिया था।म. म. पं. गोपीनाथ कविराज योगिराज विशुद्धानन्द प्रसंग तथा तत्त्वकथा 2000 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 9,11,16,19 प्रथम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=233 दीक्षा उपरांत उन्होंने बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन कर बड़े कठिन परिश्रम से साधना की थी। बहुत काल तक हिमालय और अनेक स्थानों में पर्यटन और अभ्यास किया था। ब्रह्मचर्य अवस्था से उत्तीर्ण होकर मठ के नियमानुसार दण्ड ग्रहण किया और "दण्ड़ी" हुए। चार वर्ष तक विधिपूर्वक दण्ड धारण कर उसका परित्याग किया और फिर अगले चार साल तक सन्यास ग्रहण किया। सन्यास आश्रम को पाक कर चुकने के बाद वर्धमान जिले के गुष्करा ग्राम में चिकित्सक बन कर रहे। तीर्थ स्वामी अवस्था के बाद गुरू ने सन्तुष्ट होकर परमहंस उपाधि से युक्त किया।म. म. पं. गोपीनाथ कविराज योगिराज विशुद्धानन्द प्रसंग तथा तत्त्वकथा 2000 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 21,24,30,51 प्रथम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=233 इनके कई शिष्य हुए। इन शिष्यों में गोपीनाथ कविराज विशेष प्रसिद्ध हुए।भगवतीप्रसाद सिंह मनीषी की लोकयात्रा 2001 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 39 सप्तम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=291 इनकी दो विशेषता रहीं 1. स्वामी विशुद्धानंद में अलौकिक योगशक्ति थी। उनमें योगविभूतियों का तो अंत ही नहीं था। पतञ्जलि योगदर्शन के विभूतिपाद में जितनी विभूतियों का वर्णन मिलता है उससे भी किसी किसी अंश में अधिक शक्तियों, विशेष करके इच्छा, ज्ञान तथा क्रियाशक्ति का स्फुरण इनमें देखा गया।भगवतीप्रसाद सिंह मनीषी की लोकयात्रा 2001 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 36 सप्तम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=291 2. स्वामीजी योग की व्याख्या योग की सोपान परंपरा के रूप में करते थे - thumb|भारत, मिरजापुर, छानबे ब्लाक, थानीपट्टी गांव, प्राइमरी स्कूल, दीवार पर योग के सोपान परंपरा, पेंटिंग "कर्म ही मन्थन है, उसी से ज्ञान होता है। चैतन्यरूप ज्ञान से भक्ति, भक्ति से प्रेम और प्रेम से साक्षात्कार।" "यही अध्यात्मसाधना की योगियों द्वारा अनुभूत परिपाटी है। सबके मूल में है कर्म - वह योग साधना का प्रथम सोपान है, मूलाधार है। प्रेम की प्राप्ति योगमार्ग से ही हो सकती है। साधारण प्रेम मनोविकार मात्र है। योगी ही सच्चा प्रेमी है।"भगवतीप्रसाद सिंह मनीषी की लोकयात्रा 2001 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 37 सप्तम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=291 तिरोधान स्वामीजी का लोकांतरण 11 जुलाई 1937 मेंं कलकत्ता में हुआ।भगवतीप्रसाद सिंह मनीषी की लोकयात्रा 2001 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 41 सप्तम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=291 सन्दर्भ श्रेणी:योगी श्रेणी:आध्यात्मिक गुरु श्रेणी:हिन्दू गुरु