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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

रतीराम डूट

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रतीराम दूत (15 मार्च 1914 – 3 मई 2008) शेखावटी क्षेत्र, झुंझुनू जिले के नवलगढ़ तहसील के बरवासी गाँव के एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक सेवक थे। उन्होंने 1934 और 1936 में सीकर प्रजा मंडल आन्दोलन में भाग लिया, भारत छोड़ो आन्दोलन में कई बार कारावास भोगा और बाद में अपने गाँव के सरपंच के रूप में दो बार सेवा निभाई। प्रारंभिक जीवन रतीराम दूत का जन्म 15 मार्च 1914 को ग्राम बरवासी, तहसील नवलगढ़ (वर्तमान में झुंझुनू जिला, राजस्थान) में श्री दौला राम दूत और श्रीमती सुन्दरी देवी के घर पर हुआ। वे पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे और केवल 12 वर्ष की आयु में उन्हें अपने दोनों माता-पिता का साथ छूट गया। छोटी उम्र से ही उन्होंने नवलगढ़ के राजा मदन सिंह के लिए काम करना शुरू कर दिया। 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह श्रीमती मोहरी देवी से हुआ, जिनसे उन्हें चार बेटियाँ और एक बेटा प्राप्त हुआ। उनकी पत्नी की मृत्यु केवल 31 वर्ष की आयु में हो गई। वे अपनी शेष जीवन यात्रा के 63 वर्ष समाज सेवा और गान्धीवादी विचारधारा को जीवित रखने में बिताए। स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी दूत पर स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गान्धी और सुभाष चन्द्र बोस के विचारों का गहरा प्रभाव था। वे जीवन भर राजनीति में सक्रिय रहे। 1934 और 1936 में उन्होंने सीकर प्रजा मंडल के आन्दोलन में भाग लिया और ब्रिटिश तथा रियासती शासन के खिलाफ कई रैलियों और विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा; अपने ही बच्चों के विवाह के समय भी वे जेल में थे। भारत छोड़ो आन्दोलन और भारत का विभाजन के कठिन दौर में भी उन्होंने अपने क्षेत्र में सभी धर्मों और जातियों को एकजुट रखा। उन्होंने खादी और स्वदेशी का इस तरह से प्रचार किया कि वे हमेशा खादी के वस्त्र ही पहनते थे। वे सामाजिक भेदभाव, जाति व्यवस्था, सामन्ती सोच, ऊँच-नीच की भावना और नशीली दवाइयों के दुरुपयोग के खिलाफ सक्रिय रहे और जीवन भर पशु-पक्षियों की सेवा में भी समर्पित रहे। सार्वजनिक सेवा और सम्मान स्वतंत्रता के बाद दूत ने अपने गाँव के सरपंच के रूप में दो बार सेवा निभाई — पहली बार निर्विरोध और दूसरी बार निर्वाचित होकर। अपने कार्यकाल में उन्होंने ग्रामीण शिक्षा, ऊर्जा और जल आपूर्ति के विकास के लिए प्रयास किए। उन्हें भारत सरकार और राजस्थान सरकार द्वारा दो बार ताम्रपत्र (कॉपर प्लेट) से सम्मानित किया गया — 15 अगस्त 1992 को राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमन्त्री भैरोंसिंह शेखावत और 14 नवम्बर 2000 को तत्कालीन मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत द्वारा। प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर झुंझुनू के जिलाधिकारी द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया जाता था। अपनी साफ-सुथरी छवि और प्यार भरे भाषण से उन्होंने सभी को प्रभावित किया और आज भी वे समाज और परिवार के लिए प्रेरणास्रोत हैं। रतीराम दूत की मृत्यु 3 मई 2008 को सुबह अचानक हृदय गति रुकने (कार्डियक अरेस्ट) के कारण हो गई। Biography in English Ratiram Doot (15 March 1914 – 3 May 2008) was an Indian freedom fighter and social worker from Barwasi village, Nawalgarh tehsil, Jhunjhunu district, Rajasthan. He participated in the Sikar Praja Mandal movement in 1934 and 1936, was jailed several times during the Quit India Movement, and later served twice as the sarpanch (village head) of his village. Born on 15 March 1914 in Barwasi village to Shri Daula Ram Doot and Smt. Sundari Devi, he was the youngest of five siblings and lost both parents at the age of 12. From a young age he worked for Madan Singh, the ruler of Nawalgarh. He was married to Smt. Mohri Devi at the age of 16; they had four daughters and one son, and his wife died at the age of 31. He devoted the remaining 63 years of his life to social service and to keeping Gandhian ideology alive. Doot was mainly influenced by the ideas of Swami Vivekananda, महात्मा गांधी and Subhas Chandra Bose, and remained active in politics throughout his life. He fought against social discrimination, the caste system, feudal thinking, the feeling of high and low, and drug abuse, and remained engaged in social service and love for animals and birds all his life. He promoted khadi and Swadeshi, always wearing khadi clothing. After independence he served twice as sarpanch of his village — first unopposed, then elected — working for rural education, energy and water supply. He was honoured with a copper plate by the Government of India and the Government of Rajasthan twice: on 15 August 1992 by Bhairon Singh Shekhawat, then Chief Minister of Rajasthan, and on 14 November 2000 by Ashok Gehlot, then Chief Minister of Rajasthan. He was also honoured every year on Independence Day and Republic Day by the District Magistrate of Jhunjhunu. Ratiram Doot died on the morning of 3 May 2008 due to a sudden cardiac arrest. सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:1914 में जन्मे व्यक्ति श्रेणी:2008 में निधन श्रेणी:राजस्थान के स्वतन्त्रता सेनानी श्रेणी:झुंझुनू जिले के लोग