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411 समाचार
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दुखान्त नाटक

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दुःखान्त नाटक (ट्रेजेडी) ऐसे नाटकों को कहते हैं जिनमें नायक प्रतिकूल परिस्थितियों और शक्तियों से संघर्ष करता हुआ तथा संकट झेलता हुअ अन्त में विनष्ट हो जाता है। परिचय बहुतों का मत है कि टेजेडी की कथावस्तु का अन्त नायक की मृत्यु में होना चाहिए, यद्यपि प्राचीन यूनानी नाट्यसाहित्य में दो एक ऐसी कृतियाँ भी हैं जिनमें नायक की मृत्यु नहीं होती किंतु फिर भी जिनकी परिगणना ट्रेजेडी की कोटि में होती है। सामान्यतः यह भी माना जाता है कि ट्रेजेडी या दुःखान्त नाटक का नायक उदात्त गुणों से विभूषित और संभ्रान्त कुलोत्पन्न होता है, यद्यपि आधुनिक दु:खांत नाटकों में, जिनमें व्यक्ति और समाज का संघर्ष निरूपित होता है, इसके अनेक अपवाद मिलते हैं। ट्रेजेडी के नायक ही में नहीं वरन् उसके कथानक तथा उसकी काव्यशैली से भी गरिमा का आभास मिलता है। प्रत्यक्ष रूप में नायक विरोधी शक्तियों से लड़ता हुआ पराजित और विनष्ट होता है, किन्तु नैतिक दृष्टि से वह उत्कृष्ट और सफल सिद्ध होता है। गरिमा और विशालता की प्रतीति न केवल संपूर्ण रचना से, किंतु उसके प्रमुख उपकरणों से भी होती है। ट्रेजेडी के संबंध में मौलिक प्रश्न यह है कि नायक किस कारण से संकटग्रस्त तथा विनष्ट होता है। अपनी यातना और मृत्यु के लिए वह किस अंश में स्वयं जिम्मेदार है, यह समस्या दर्शकों, प्रेक्षकों और आलोचकों के मन में निरंतर उठती है और इसका निराकरण विभिन्न प्रकार से किया गया है। प्राचीन यूनानी ट्रेजेडी में नायक अधिक से अधिक दूषित दृष्टिकोण, भ्रामक भावना, अथवा क्षणिक आवेश का दोषी ठहरता है। नायक के चरित्र में घातक दुर्बलता एवं तद्जनित यातना और मृत्यु की कल्पना ईसाई धर्म के प्रभाव से १६वीं शताब्दी में प्रकट हुई। इस विश्वास का प्रभावोत्पादक निरूपण शेक्सपियार के दुःखांत नाटकों में हुआ है। शेक्सपियर के दु:खांत नाटकों में नायक मुख्यत: अपनी कमजोरियों का ही शिकार बनता है यद्यपि उसके विनाश में नियति और परिस्थितियों का हाथ भी सदैव रहता है। आधुनिक ट्रेजेडी में नायक का पतन सामाजिक शक्तियों अथवा वंशपरंपरा के फलस्वरूप होता है अत: नायक की जिम्मेदारी अल्पमात्र रह जाती है। नवीन मनोविज्ञान पर आधृत ओ'नील (O’Neill) के कतिपय दुःखान्त नाटकों में नायक दमित कामवासना के कारण आपद्ग्रस्त होता है। इतिहास ट्रेजेडी का आविर्भाव सर्वप्रथम यूनान में हुआ। इस शब्द की व्युत्पत्ति ट्रैग ओइडिया से है जिसका अर्थ होता है 'गोट साँग' अर्थात् अजागीत। प्रकृति और मदिरा के देवता डायोनिसस की पूजा में अजा का विशेष महत्त्व था तथा उक्त देवता के उपासक अपने नृत्य और गान में अजा की गतिविधि का अनुकरण करते थे। अपनी प्रारंभिक अवस्था में ट्रेजेडी ने कोरस और डिथिरैव नामक दो प्रकार के नृत्यों को आत्मसात् करके प्रगति की। फिर नृत्य के साथ अभिनय और संवाद का समावेश हुआ। इस प्रकार ट्रेजेडी का विकास द्रुत गति से होता गया और ईसा पूर्व पाँचवी शती में एजकिलस, सौफ़ोक्लीस, तथा युरूपिदिज ने ऐसे उत्कृष्ट दु:खांत नाटकों की रचना की जो विश्वसाहित्य की अमर विभूति हैं। उपलब्ध दु:खांत नाटकों के गंभीर अध्ययन के उपरांत ईसा पूर्व चौथी शती में अरस्तू ने ट्रेजेडी की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। उसके मतानुसार ट्रेजेडी ऐसी मानवक्रिया का अनुकरण है जो गंभीरता पूर्ण, तथा सम्यक्, आकारयुक्त है। अभिप्राय यह है कि ट्रेजेडी में हास्य और विनोद के लिए कोई स्थान नहीं रहता, उसमें प्रारंभ, मध्य और अंत की सम्यक् नियोजना रहती है तथा नाट्यवस्तु का आकार यथासंभव दीर्घ होता है। अरस्तू ने कथावस्तु, चरित्र, विचार, शैली, संगीत, तथा दृश्यविधान को ट्रेजेडी के आवश्यक उपकरण माना है और उसका यह मत थोडे से अंतर के साथ आज भी मान्यता रखता है। ट्रेजेडी के प्रभाव की व्याख्या अरस्तू ने रेचन सिद्धांत के आधार पर की है। ट्रेजेडी के प्रेक्षण और अध्ययन से मन में करुण और भय का आवेग नियंत्रित होता है तथा उन दुःखद भावनाओं का परिष्कार होता है। लैटिन में सेनेका ने ऐसे दु:खांत नाटकों की रचना की जिनमें ओजपूर्ण शैली में हिंसा और प्रतिशोध की अभिव्यक्ति हुई है। मध्ययुग में ट्रेजेडी की विशेषताएँ कथासाहित्य और तत्पश्चात् नवोदित आधुनिक यूरोपीय नाट्यसाहित्य में प्रकट होने लगीं। नवजागरण के काल में ट्रेजेडी ने प्राचीन और नवीन प्रभावों को एक ही साथ ग्रहण किया और उनके सम्मिश्रण से १६वीं शती ईसवी में यूरोप के अनेक देशों में उच्च कोटि के दु:खांत नाटकों का आविर्भाव हुआ। इस संबंध में मार्लो, शेक्सपियर, काल्डरान आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। १६वीं शती के उत्तरार्ध में कार्नील, रासीन प्रभृति फ्रांसीसी नाटककारों ने शास्त्रीय परिपाटी पर लिखे हुए दु:खांत नाटकों की रचना में विशेष सफलता प्राप्त की। ये नाटक शेक्सपियर तथा अन्य स्वच्छंदतावादी नाटककारों की कृतियों से नितांत भिन्न थे क्योंकि उनमें उन नियमों का पालन किया गया था जिनकी अवहेलना शेक्सपियर आदि ने की थी। उदाहरणार्थ कार्नील और रासीन आदि ने नाट्य अन्वितियों के उस नियम को मान्यता प्रदान की जिसका परित्याग करके स्वच्छंदतावादियों ने अपनी रचना की थी। १८वीं शताब्दी में गार्हस्थ्य जीवन तथा सामान्य मध्यवर्ग से संबंधित दु:खांत नाटक यूरोप के कई देशों में लिखे गए। किंतु यह बात विवादग्रस्त है कि हम उन्हें ट्रेजेडी कह सकते हैं अथवा नहीं। ऐसे नाटकों के लिए 'सीरियस ड्रामा' नाम प्रयुक्त हुआ है जो आधुनिक शताब्दी की अनेक नाट्य रचनाओं के लिए भी उपयुक्त है। ट्रेजेडी और सीरियस ड्रामा के अंतर की ओर सर्वप्रथम लेसिंग ने संकेत किया था। १९वीं शताब्दी में स्वछंदतावाद के नवोत्थान के काल में शेक्सपियर तथा उनके समसामयिक नाटककारों का आदर्श अधिकाधिक स्वीकार किया गया। अत: निश्चित शास्त्रीय नियमों का महत्त्व बहुत न्यून रह गया। दूसरी स्मरणीय बात यह है कि दार्शनिक हेगेल ने अपने द्वंद्वात्मक दर्शन के आधार पर ट्रेजेडी की एक नवीन एवं चमत्कारपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की। हेगेल का मत है कि ट्रेजेडी के लिए विरोधी शक्तियों का संघर्ष अथवा द्वंद्व बाह्य प्रभावों का अथवा आंतरिक मनोवृत्तियों का हो सकता है। इसी नवी धारण के आधार पर प्राचीन नाट्यसाहित्य का अनुशीलन किया गया तथा ट्रेजेडी के नवीन रूप प्रकट हुए। १९वीं और २०वीं शताब्दी में व्यक्ति और सामाजिक शक्तियों के प्रबल संघर्ष पर आधृत जो अनेक दुःखान्त नाटक लिखे गए हैं उनका उत्स हेगेल की नवीन स्थापना में ही मिलता है। ट्रेजेडी के अनेक अद्यतन रूप उपलब्ध हैं। हाउप्टमन, इब्सन प्रभृति के दुःखान्त-नाटकों में नायक वंशपरंपरा से उत्पन्न घातक प्रभावों का शिकार बनता है। समस्यामूलक नाटकों में ट्रेजेडी का जो रूप मिलता है उसे सीरियस ड्रामा कहना अधिक उपयुक्त होगा। वर्तमानकाल में ट्रेजेडी का सर्वोत्तम रूप काव्यात्मक नाटकों में मिलता है और अब यह धारणा अधिकाधिक दृढ़ होती जा रही है कि विशुद्ध ट्रेजेडी काव्यनाट्य के क्षेत्र में ही संभव है। भेद ट्रेजेडी के दो मुख्य भेद हैं शास्त्रोक्त एवं स्वच्छन्दतावादी। शास्त्रीय ट्रेजेडी में अन्विति, औचित्य आदि से संबंधित नियमों का कठोर आग्रह स्वीकार किया गया है। स्वच्छंदतावादी ट्रेजेडी में प्रभाव ऐक्य का ध्यान रखा जाता है किंतु निश्चित नियमों की प्राय: संपूर्ण अवहेलना होती है। इन दो प्रमुख कोटियों के अतिरिक्त आधुनिक काल में ट्रेजेडी के अनेक अन्य प्रकार विकसित हुए हैं जैसे सामाजिक ट्रेजेडी, मनोवैज्ञानिक ट्रेजेडी आदि। ट्रेजेडी का नवीनतम रूप प्राचीन यूनानी ट्रेजेडी से कुछ भिन्न होने पर भी अत्यंत वैविध्यपूर्ण और रोचक है। ट्रेजेडी के लिए केवल यही आवश्यक नहीं है कि उसके नायक की अंत में मृत्यु हो जाए। यदि किसी दुर्घटना में किसी की अचानक मृत्यु हो जाती है, वह ट्रेजेडी का विषय नहीं होगा। आवश्यक यह है कि नायक दीर्घ यातना एवं विरोधी शक्तियों से साहसपूर्ण संघर्ष के उपरांत विनष्ट हो जिससे उसके प्रति हमारे मन में आकर्षण और सम्मान उत्पन्न हो। केवल ऐसे उदात्त और साहसपूर्ण नायक के प्रति हमारे मन में सम्मान और करुणा का संचार हो सकता है, जो यह जानता हुआ कि उसकी विरोधी शक्तियाँ अत्यत प्रबल हैं, उनके द्वारा पराजय स्वीकार नहीं करता वरन् लड़ता हुआ मृत्यु को प्राप्त होता है। ट्रेजेडी के नायक में प्रबल इच्छाशक्ति का होना अनिवार्य रूप से वांछित है। ट्रेजेडी के ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें नियतिवादी स्वर प्रमुख है। ऐसे नाटकों में निराशा और अवसाद की प्रतीति होती है किंतु नायक का कार्य और प्रभाव नितान्त नगण्य नहीं सिद्ध होता। इन्हें भी देखें दु:ख सन्दर्भ श्रेणी:प्राचीन यूनानी रंगमंच श्रेणी:रंगमंच का इतिहस श्रेणी:नाटक