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भारत में जाति व्यवस्था
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नवम्बर 2023
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१९वीं शताब्दी में भारत में जाति का स्वरूप 2 135 100 Seventy-two Specimens of Castes in India (18).jpg हिन्दू संगीतकार Seventy-two Specimens of Castes in India (16).jpg मुसलमान व्यापारी Seventy-two Specimens of Castes in India (8).jpg सिख मुखिया Seventy-two Specimens of Castes in India (5).jpg अरब सैनिक ईसाई मिसनरियों के अनुसार सन १८३७ में ''सेवेन्टी-टू स्पेसिमेन्स ऑफ कास्ट्स इन इंडिया" (भारत की जातियों के ७२ नमूने)। ध्यातव्य है कि इसमें उन्होने हिन्दू मुसलमान, सिख और अरब सबको अलग-अलग जाति' के रूप में दर्शाया है।
right|thumb|300px| यह चित्र १९३३ का है जब गांधीजी मद्रास में हरिजनों के बारे में भाषण दे रहे थे।
जाति प्रथा अथवा जाति व्यवस्था हिन्दू समाज की एक प्रमुख व्यवस्था है। यह कब और कैसे शुरू हुई, इस पर अत्यन्त मतभेद है। आधुनिक भारत में धर्म और जाति की सामाजिक श्रेणियां ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान प्रचलन में थीं।https://www.thehindu.com/society/caste-tales-they-dont-tell-us/article67294100.ece Caste tales they don’t tell us इसका विकास शुरुआत में मनुस्मृति और ऋगवेद जैसे धर्मग्रंथों की मदद से किया गया था। 19वीं शताब्दी के अंत तक इन जाति श्रेणियों को जनगणना की मदद से मान्यता दी गई।अंग्रेजों ने भारत में जाति व्यवस्था का बीज कैसे बोया था? https://web.archive.org/web/20190709093712/https://www.bbc.com/hindi/india-48698193 9 जुलाई 2019 (संजय चक्रवर्ती, प्रोफेसर, टेंपल यूनिवर्सिटी, फ़िलाडेल्फ़िया, अमरीका)
पी ए सोरोकिन ने अपनी पुस्तक 'सोशल मोबिलिटी' मे लिखा है, " मानव जाति के इतिहास मे बिना किसी स्तर विभाजन के, उसमें रहने वाले सदस्यो की समानता एक कल्पना मात्र है।" तथा सी एच फूले का कथन है "वर्ग - विभेद वशानुगत होता है, तो उसे जाति कहते है "। इस विषय मे अनेक मत स्वीकार किए गए है। एक मत के अनुसार पारिवारीक व्यवसाय से जाति को उत्त्पन किया गया है। साम्प्रादायिक मत के अनुसार जब विभिन्न सम्प्रदाय संगठित होकर अपनी अलग जाति का निर्माण करते हैं, तो इसे जाति प्रथा की उत्पत्ति कहते हैं। परम्परागत मत के अनुसार यह प्रथा ब्राह्मणों द्वारा विभिन्न कार्यों की दृष्टि से निर्मित की गई है।
अंगूठाकार|बाएँ|कुम्हार, बर्तन बनाते हुए
मनु ने "मनु स्मृति" में समाज को चार श्रेणियों में विभाजित किया है, ब्राहमण , क्षत्रिय, वेश्य और शुद्र। विकास सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक विकास के कारण जाति प्रथा की उत्पत्ति हुई है। सभ्यता के लंबे और मन्द विकास के कारण जाति प्रथा मे कुछ दोष भी आते गए। इसका सबसे बङा दोष छुआछुत की भावना है। परन्तु शिक्षा के प्रसार से यह सामाजिक बुराई दूर होती जा रही है।
जाति प्रथा की कुछ विशेषताएँ भी हैं। श्रम विभाजन पर आधारित होने के कारण इससे श्रमिक वर्ग अपने कार्य मे निपुण होता गया क्योकि श्रम विभाजन का यह कम पीढियो तक चलता रहा था। इससे भविष्य - चुनाव की समस्या और बेरोजगारी की समस्या भी दूर हो गए। तथापि जाति प्रथा मुख्यत: एक बुराई ही है। इसके कारण संकीर्णना की भावना का प्रसार होता है और सामाजिक, राष्ट्रिय एकता मे बाधा आती है जो कि राष्ट्रिय और आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है। बङे पेमाने के उद्योग श्रमिको के अभाव मे लाभ प्राप्त नही कर सकते। जाति प्रथा में बेटा पिता के व्यवसाय को अपनाता है, इस व्यवस्था मे पेशे के परिवर्तन की सन्भावना बहुत कम हो जाती है। जाति प्रथा से उच्च श्रेणी के मनुष्यों में शारीरिक श्रम को निम्न समझने की भावना आ गई है। विशिष्टता की भावना उत्पन्न होने के कारण प्रगति कार्य धीमी गति से होता है। यह खुशी की बात है कि इस व्यवस्था की जङे अब ढीली होती जा रही है। वर्षो से शोषित अनुसूचित जाति के लोगो के उत्थान के लिए सरकार उच्च स्तर पर कार्य कर रही है। डॉ आंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान द्वारा उनको विशेष अधिकार दिए जा रहे है। उन्हे सरकारी पदो और शैक्षणिक संस्थानो में प्रवेश प्राप्ति में प्राथमिकता और छूट दी जाती है। आज की पीढी का प्रमुख कर्त्तव्य जाति - व्यवस्था को समाप्त करना है क्योकि इसके कारण समाज मे असमानता , एकाधिकार, विद्वेष आदि दोष उत्पन्न हो जाते है। वर्गहीन एवं गतिहीन समाज की रचना के लिए अन्तर्जातीय भोज और विवाह होने चाहिए। इससे भारत की उन्नति होगी और भारत ही समतावादी राष्ट्र के रूप मे उभर सकेगा।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
वर्ण-व्यवस्था
बाहरी कड़ियाँ
अंग्रेजों ने भारत में जाति व्यवस्था का बीज कैसे बोया था? (संजय चक्रवर्ती, प्रोफेसर, टेंपल यूनिवर्सिटी, फ़िलाडेल्फ़िया, अमरीका)
क्या शहरीकरण भारत के जातिगत मुद्दों के लिए रामबाण इलाज हो सकता है?
श्रेणी:भेदभाव
श्रेणी:जातिवाद