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411 समाचार
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एस.एच. रज़ा

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सैयद हैदर रज़ा जून 2025 एस.एच. रज़ा property raw P18 properties linked references P569 properties linked references linked P19 properties linked references edit linked P1477 properties linked references edit linked P2048 properties linked references edit linked P2048 properties linked references edit linked P27 properties linked references edit linked P69 properties linked references edit linked P108 properties linked references edit linked P25 properties linked references edit linked P22 properties linked references edit P570 properties linked references edit P20 properties linked references edit linked P172 properties linked references edit P102 properties references edit P1196 properties references edit P509 properties linked references edit linked P106 properties linked references edit linked P26 properties linked references edit linked P40 properties linked references edit linked P166 properties linked references edit linked P551 properties linked references edit linked P800 properties linked references edit linked P793 properties linked references edit linked P2218 properties linked references edit linked P140 property raw P109 properties linked references edit linked P856 properties linked references edit linked P7047 properties linked references edit linked P39 properties linked references edit linked P119 सैयद हैदर रज़ा उर्फ़ एस.एच. रज़ा (जन्म 22 फ़रवरी 1922)सैयद हैदर रज़ा 85 के हो गए https://web.archive.org/web/20090703081828/http://www.hindu.com/2007/02/21/stories/2007022115260200.htm 3 जुलाई 2009 द हिंदू, 21 फ़रवरी 2007. एक प्रतिष्ठित भारतीय कलाकार हैं जो 1950 के बाद से फ्रांस में रहते और काम करते हैं, लेकिन भारत के साथ मजबूती से जुड़े हुए हैं। उनके प्रमुख चित्र अधिकतर तेल या एक्रेलिक में बने परिदृश्य हैं जिनमे रंगों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है, व जो भारतीय ब्रह्माण्ड विज्ञान के साथ-साथ इसके दर्शन के चिह्नों से भी परिपूर्ण हैं।चित्रकारी साधना के जैसा है।.. नैन्दिया, 18 सितंबर 2005.serigraphstudio.com पर आर्टिस्ट विवरण https://web.archive.org/web/20090712154433/http://www.serigraphstudio.com/artists-details.asp?aid=8 12 जुलाई 2009 रज़ा. 1981 में उन्हें पद्म श्री और ललित कला अकादमी की मानद सदस्यताललित कला रत्न प्रोफाइल https://web.archive.org/web/20080105021235/http://www.lalitkala.gov.in/golden_jubilee/awards.asp 5 जनवरी 2008 lalitkala.gov.in पर पुरस्कार की आधिकारिक सूची. तथा 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।http://india.gov.in/myindia/padmabhushan_awards_list1.php पद्म भूषण से सम्मानित 7 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20090605073347/http://india.gov.in/myindia/padmabhushan_awards_list1.php 5 जून 2009 live 10 जून 2010 को वे भारत के सबसे महंगे आधुनिक कलाकार बन गए जब क्रिस्टी की नीलामी में 88 वर्षीय रज़ा का 'सौराष्ट्र' नामक एक सृजनात्मक चित्र 16.42 करोड़ रुपयों (34,86,965 डॉलर) में बिका. जीवनी प्रारंभिक जीवन और शिक्षा सैयद हैदर रज़ा का जन्म मध्य प्रदेश के मंडला जिले जीवनी https://web.archive.org/web/20080108230218/http://www.shraza.net/biography.html 8 जनवरी 2008 shraza.net, आधिकारिक वेबसाइट. में, जिले के उप वन अधिकारी सैयद मोहम्मद रज़ी और ताहिरा बेगम के घर हुआ थाकलाकार बायो https://web.archive.org/web/20080306061205/http://www.saffronart.com/Events/2007/shraza7/asps7raza/artistbio.asp 6 मार्च 2008 रज़ा सिंहावलोकन 2007, न्यूयॉर्क.प्रोफाइल https://web.archive.org/web/20090130124714/http://delhiartgallery.com/artist/profile-sh-raza.aspx 30 जनवरी 2009 delhiartgallery.com पर एस.एच. रज़ा., तथा यही वह जगह थी जहां उन्होनें अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष गुज़ारे व 12 वर्ष की आयु में चित्रकला सीखी, जिसके बाद 13 वर्ष की आयु में मध्य प्रदेश के ही दमोह चले गएमहीना का प्रोफाइल https://web.archive.org/web/20110421065818/http://www.indianartcircle.com/arteducation/sayed.shtml 21 अप्रैल 2011 indianartcircle.com पर सैयद हैदर रज़ा., जहां उन्होनें राजकीय उच्च विद्यालय, दमोह से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। कलाकार सारांशजून 2020 InternetArchiveBot artfact.com पर सैयद हैदर रज़ा. हाई स्कूल के बाद, उन्होनें नागपुर में नागपुर कला विद्यालय (1939-43), तथा उसके बाद सर जे.जे. कला विद्यालय, बम्बई (1943-47) से अपनी आगे की शिक्षा ग्रहण कीhttp://www.saffronart.com/details.asp?artistId=142 कलाकार पृष्ठभूमि 7 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20050209191241/http://www.saffronart.com/details.asp?artistId=142 9 फ़रवरी 2005 dead , जिसके बाद 1950-1953 की बीच फ़्रांस सरकार से छात्रवृति प्राप्त करने के बाद अक्टूबर 1950 में पेरिस के इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स (École nationale supérieure des Beaux-Arts (ENSB-A)) से शिक्षा ग्रहण करने के लिए फ़्रांस चले गए।कलाकार निर्देशिका https://web.archive.org/web/20080304114301/http://www.art.in/artists/s-h-raza.htm 4 मार्च 2008 art.in. पर एस.एच. रज़ा. पढ़ाई के बाद उन्होनें यूरोप भर में यात्रा की और पेरिस में रहना तथा अपने काम का प्रदर्शन जारी रखा। बाद में 1956 के दौरान उन्हें पेरिस में प्रिक्स डे ला क्रिटिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे प्राप्त करने वाले वह पहले गैर-फ़्रांसिसी कलाकार बने। प्रोफाइल https://web.archive.org/web/20120301170908/http://www.vadehraart.com/s.h.%20raza-profile.htm 1 मार्च 2012 vadehraart.com पर एस.एच. रज़ा. कला जीवन प्रारंभिक कैरियर सैयद हैदर रज़ा की पहली एकल प्रदर्शनी 1946 में बॉम्बे आर्ट सोसाइटी सैलून में प्रदर्शित हुई थी और उन्हें सोसाइटी के रजत पदक से सम्मानित किया गया था। उनके चित्र अभिव्यक्ति के चित्रण से लेकर परिदृश्य चित्रकला तक विकसित हैं। 1940 के शुरुआती दशक में अपने परिदृश्यों तथा शहर के चित्रणों के धाराप्रवाह पानी के रंगों से गुजरते हुए उनका झुकाव चित्रकला की अधिक अर्थपूर्ण भाषा, मस्तिष्क के चित्रण की ओर हो गया। 1947 उनके लिए एक बहुत महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ, क्योंकि पहले उनकी मां की मृत्यु हो गई और यही वो वर्ष था जब उन्होनें के.एच. आरा तथा ऍफ़.एन. सूज़ा (फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा)कलाकार विवरण https://web.archive.org/web/20071110042215/http://www.saffronart.com/artistdetails.asp?sourceid=142 10 नवंबर 2007 saffronart.com पर रज़ा. के साथ क्रांतिकारी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (पीएजी (PAG)) की सह-स्थापना की, जिसने भारतीय कला को यूरोपीय यथार्थवाद के प्रभावों से मुक्ति दी तथा कला में भारतीय अंतर दृष्टि (अंतर ज्ञान) का समावेश किया, समूह की पहली प्रदर्शनी 1948 में आयोजित हुई, जिस वर्ष उनके पिता की मंडला में मृत्यु हुई तथा भारत के विभाजन के बाद चार भाइयों तथा एक बहन का उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। फ्रांस में अभिव्यक्ति के चित्रण से निकल कर वृहद् परिदृश्यों के चित्रण तथा अंततः इसमें भारतीय हस्तलिपियों के तांत्रिक तत्वों को शामिल करके उन्होनें पश्चिमी आधुनिकता की धारा के साथ प्रयोग जारी रखा। भारतीय नायक https://web.archive.org/web/20110213143207/http://www.iloveindia.com/indian-heroes/sh-raza.html 13 फ़रवरी 2011 iloveindia.com पर एस.एच. रज़ा.रज़ा रुंस: विज़न ऑफ़ द सेल्फ https://web.archive.org/web/20110613170737/http://www.asianart.com/articles/vora/raza/index.html 13 जून 2011 asianart.com पर स्वप्न वोरा. जबकि उनके समकालीनों ने अधिक औपचारिक विषय चुने, रज़ा ने 1940 और 50 के दशकों के परिदृश्यों के चित्रण पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया, जो कुछ हद तक फ़्रांस में रहने से प्रेरित था। 1959 में, उन्होंने फ़्रांसिसी कलाकार जेनाइन मोंगिल्लेट से विवाह कर लिया तथा 1962 में वे बर्कले, अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अंशकालिक व्याख्याता बन गए।कलाकार जीवनी https://web.archive.org/web/20080724185434/http://www.osbornesamuel.com/pages/biography/27014.html 24 जुलाई 2008 osbornesamuel.com पर रज़ा. शुरू में रज़ा को फ्रांस के ग्रामीण इलाकों के ग्राम्य जीवन ने आकृष्ट किया। इग्लिस उन श्रृंखलाओं का हिस्सा है जो इस क्षेत्र के पर्वतमय इलाकों तथा विलक्षण ग्रामीण वास्तुकला को दर्शाता है। नीली रोशनाई से पोते गए रात्रि के आकाश से घिरे एक अनर्गल शोर वाले चर्च को दर्शाते हुए, रज़ा सांकेतिक ब्रश स्ट्रोकों तथा पेंट के भारी भरकम प्रयोग द्वारा इम्पेस्टो तकनीक, शैलीगत उपकरणों का प्रयोग करते हैं जो उनके बाद के 1970 के दशक के परिदृश्यों में दिखाई देते हैं।मार्च 2007 'बिन्दु' और इसके पार 1970 के दशक तक रज़ा अपने ही काम से नाखुश और बेचैन हो गए थे और वे अपने काम में एक नई दिशा और गहरी प्रामाणिकता पाना चाहते थे और उस चीज़ से दूर होना चाहते थे जिसे वे प्लास्टिक कला कहते थे। उनके भारत दौरे, विशेषकर अजंता व एलोरा की गुफाओं के दौरे, जिसके बाद उन्होनें बनारस, गुजरात तथा राजस्थान की यात्रा की, ने उन्हें अपनी जड़ों का एहसास कराया तथा भारतीय संस्कृति को निकटता से जानने के लिए प्रेरित किया, जिसका परिणाम 'बिंदु' के रूप में सामने आया,सिंहावलोकन 2007 https://web.archive.org/web/20080131091304/http://www.saffronart.com/Events/2007/shraza7/asps7raza/conversation.asp 31 जनवरी 2008 saffronart.com पर रज़ा के साथ बातचीत. जो एक चित्रकार के रूप में उनके पुर्न्जनम को दर्शाता था।फॉरवर्ड https://web.archive.org/web/20080304120608/http://www.saffronart.com/Events/2007/shraza7/asps7raza/foreword.asp 4 मार्च 2008 रज़ा सिंहावलोकन, 2007. बिंदु का उदय 1980 में हुआ और यह उनके काम को अधिक गहराई में, उनके द्वारा खोजे गए नए भारतीय दृष्टिकोण और भारतीय संस्कृति की ओर ले गया। उनके द्वारा वर्णित 'बिंदु' की शुरुआत के कई कारणों में से एक उनकी प्राथमिक स्कूल शिक्षक है, जिसने यह जानने के पश्चात् कि उनमें एकाग्रता की कमी है, ब्लैकबोर्ड पर एक बिंदु बना दिया तथा उन्हें इस पर ध्यान लगाने के लिए कहा.एस.एच. रज़ा रिविल्स प्लैन्स टू ओपन अ कल्चरल सेंटर https://web.archive.org/web/20110713025557/http://www.indianartcollectors.com/news-display.php?newsid=242 13 जुलाई 2011 indianartcollectors.com, 07 फ़रवरी 2008. 'बिंदु' (ऊर्जा का बिंदु या स्त्रोत) की शुरुआत के बाद, उन्होनें बाद के दशकों में अपनी विषयगत कृति में नए आयाम जोड़े जिनमें त्रिभुज के इर्द गिर्द केन्द्रित विषय थे, जो अंतरिक्ष तथा समय को भारतीय अवधारणाओं के साथ-साथ 'प्रकृति-पुरुष' (नर व मादा ऊर्जा) से जोड़ते थे, जिससे अभिव्यक्ति करने वाले व्यक्ति से ले कर चित्र तथा इसकी गहराई तक पहुंचने वाला गुरु बनने का उनका परिवर्तन पूर्ण हो गया था।कला और संस्कृति https://web.archive.org/web/20120225141432/http://www.indiaenews.com/art-culture/20080220/98853.htm 25 फ़रवरी 2012 , indiaenews.com, 20 फ़रवरी 2008. right "My work is my own inner experience and involvement with the mysteries of nature and form which is expressed in colour, line, space and light".- S. H. Raza शुरुआती चित्रों में अद्वितीय ऊर्जा युक्त रंग अब अधिक कोमल होने के साथ-साथ अधिक गतिशील हो गए हैं। रज़ा ने ज्यामितीय परिदृश्य तथा 'बिंदु' के लिए अभिव्यक्तिपूर्ण चित्रों का त्याग कर दिया। रज़ा बिंदु को अस्तित्व और रचना का केंद्र मानते हैं जो रूप व रंग के साथ-साथ ऊर्जा, ध्वनि, अंतरिक्ष तथा समय की दिशा में प्रगति कर रहा है। सन 2000 में उनके काम ने एक नई करवट ली जब उन्होनें भारतीय अध्यात्म पर अपनी बढ़ती अंतर्दृष्टि और विचारों को व्यक्त करना शुरू किया, तथा कुंडलिनी, नाग और महाभारत के विषयों पर आधारित चित्र बनाए। रज़ा की चित्रलिपि: स्वयं के दृष्टिकोण स्वप्ना वोरा द्वारा (शीर्षक के साथ पूर्ण स्क्रीन छवि के लिए छोटी छवि पर क्लिक करें। ) हेरिंगबोन त्रिकोण, नीले चांद, लौ की लपटों और भीतरी खाके के साथ सैयद हैदर रज़ा के चित्र असाधारण अनुभवों की ओर ले जाते हैं। भारत के प्यारे रज़ा का जन्म मध्य भारत हुआ था और वे जंगलों के बीच पले बड़े थे। मध्य प्रदेश समुद्र से दूर है, यहां पहाड़ हैं, लेकिन विशाल पहाड़ नहीं हैं और इनमें से अधिकांश में कबीलाई शासक और शांत वातावरण है। एक बच्चे के रूप में, रज़ा ने अवश्य ही निशाचर जंगली जानवरों को धीरे से आते जाते और गहरे रंग के पक्षियों को नम तथा शुष्क जंगलों से उड़ते हुए देखा होगा और उनके शुरुआती चित्रों में अधिकांश परिदृश्य के रूप में थे। ऐसा बहुत, बहुत अधिक समय बाद हुआ कि उनके हाथ से खींची रेखाएं, या यूं कहें कि पद चिह्न, 'बिंदु' बन गए। बिंदु एक चमकीला अत्यल्प डॉट, चिंगारी, नीला मोती है जिससे दुनिया (और रज़ा की दुनिया) शुरू होती है और जिसमें वापस सिमट जाती है। और जैसा कि हिंदू धार्मिक विचारों में कहा गया है, बिंदु से ऊर्जा और समय तथा स्थान अस्तित्व में आए, व शायद पहले प्रकाश के बाद पहली ध्वनि आई. हिन्दू अक्सर बिंदु का उपयोग एकाग्रता के लिए करते हैं और एक बच्चे के रूप में रज़ा को भी, उनके शिक्षक द्वारा दीवार पर एक बिंदु को देखने के लिए कहा गया था। इसने बच्चे के विचलित मन की मदद की और शायद इसलिए वह कभी इसके प्रभाव को भूल नहीं पाए. महान विचारशील मस्तिष्क और रचनात्मक प्रतिभा, चीजों के बारे में जानना चाहते हैं, वे विचारों को अनुभव करते हैं, शांत यात्राओं का आनंद लेते हैं और आत्मा को स्पर्श करते हैं। वे खुद को धीरे से कहते हैं: मैं कहां से आया था, क्या मुझे किसी दिन पता चल पायेगा कि यह सब क्या था? भारतीय अक्सर विचार करते हैं: क्या यही सब जीवन है? कोई जादू या रस-विधा को कैसे माप सकता है? कोई चिंतन या सन्नाटे के विचार कैसे बता सकता है? रज़ा ने आत्म निरीक्षण तथा ख़ुशी से शायद इसकी खोज कर ली है, क्योंकि एक नायक की खोज सदैव स्थायी आनंद के लिए होती है। उनका काम जीवन के मूल तथा प्रतीकों को प्रदर्शित करता है, जिन्हें कबीलाई चित्रकारों तथा अत्यधिक परिष्कृत भारतीय दार्शनिकों ने सदियों से तैयार किया है, इस पर विचार तथा मनन किया है। उनका काम आधुनिक तांत्रिक तन्खास की तरह है जो दर्शक में आश्चर्य, खुशी और ध्यान पैदा करता है। मेरे लिए, यह मात्र शांति नहीं है, अपितु कश्मीरी शिव दर्शन के लिए कंपन, धड़कन, स्पंदन और एक शांतिपूर्ण घर वापसी, त्रिकोणों में शिव की झलक, बिंदु तथा अनुग्रह के चढ़ाव और उतार हैं। हां, उत्पत्ति, विनाश व संरक्षण वे चमत्कार हैं, जिनके बारे में हर कोई जानता है। रज़ा के पास अन्य दो चमत्कार हैं नियंत्रण और अनुग्रह. हम सभी इस बारे में आश्वस्त हो सकते हैं कि वहां अभी भी एक छोटा बिंदु है जो शुरू होता है और समाप्त होता है, तथा फिर से शुरू होता है तथा जो 'हमारी इच्छाओं के ह्रदय द्वारा सांस लेगा, ... भूकंप, हवा तथा आग के माध्यम से बोलेगा लेकिन उसमे फिर भी शान्ति की एक छोटी सी आवाज है'. हां, सन्नाटे में उनके काम को देखने से मेरा सर झुकाने और प्रार्थना करने तथा धीरे-धीरे अन्य कंपनों, अन्य आयामों को अनुभव करने का मन करता है। गर्भगृहों की गहरी पवित्रता के साथ छोटे अनियमित मंदिरों को उनके चित्रों में पकड़ बनानी चाहिए जो धर्मों के बनने से काफी पहले से थे। शायद ये शुरूआती प्रतीक हैं: त्रिकोण, आदमी-औरत, भगवान, आदमी से भगवान से अनुग्रह और बार-बार, छह नोकों वाले तारे व विशुद्ध चक्र. रज़ा द्वारा किये गए वास्तविकता के इस चित्रण में विचारों की सजावट, आग की दीवार में सावधानीपूर्वक चित्रित नीले रंग के साथ की जरूरत है, नए और पुराने मंदिरों की जरूरत है, क्योंकि वे खुशी की शांति और अंतर्दृष्टि को प्रेरित करते हैं, जब सब कुछ ठीक होता है और कहने के लिए इससे अधिक शब्द नहीं हैं। मेरे विचार से एक अमीर घर के बजाए, एक दूर स्थित ठन्डे गलियारे में, उनका काम सबसे अच्छा होगा, एक पत्थर के मंदिर की तरह जहां हम चिंतन करते हैं और शांतिपूर्वक एक यात्रा, एक तीर्थ यात्रा से लौट आते हैं। शुरुआत में बिंदु, अनकही ध्वनि, बिना महसूस किये गए, अनदेखे कंपन थे तथा हम व भगवान बिंदु की रोशनी से उपजे तथा इस चमत्कारिक ब्रह्मांड में विकसित हुए और इसके धूल के एक कण, एक चमकीले मौन के रूप में समाप्त हो गए। एक यात्रा जो हम सब एक ताबीज के सहारे करते हैं, कभी-कभी भयभीत हो कर और कभी अकेले और कभी-कभी शांत और ध्येय के साथ. मैगी और एस.एच. रज़ा की तरह. उनके भारतीय कैनवास और शुरुआती फ़्रांसिसी चित्र प्रत्यक्ष दुनिया की ही तरह अधिक यथार्थवादी थे, जो बहुत कुछ उस तरह से दिखती थी जैसी कि आज हम देखते हैं। बाद में उन्होंने बिंदु को देखा और इसे चित्रित किया और उसके भी बाद श्वेत अवधि में प्रवेश किया। आग और समुद्र के उनके प्राथमिक रंग बाह्य अंतरिक्ष जैसे गहरे नीले रंग हैं और उन जगहों पर पीले हैं जहां प्रकाश का समावेश होता है। अधिकांश भारतीय यात्रियों की तरह, रज़ा ने आराम और सामान्य ढंग से पूरब और पश्चिम के बीच यात्रा की, जिस तरह से हम अधिकांश अन्य स्थानों को अपने घर और अपने आप के एक विस्तार के रूप में देखते हैं। रज़ा के "सिटीस्केप" (1946) और "बारामुला इन रुइन्स" (1948) चित्र हिंदुस्तान के विभाजन तथा मुंबई के दंगों में मुसलमानों के उत्पीड़न के दौरान प्रकट होने वाले उनके दुःख तथा पीड़ा को दर्शाते हैं। एक अल्पसंख्यक बनना, संवेदनशील और चौकस रहना एक ऐसा जीवन है जिसे दुनिया भर में कई लोग रोजाना जीते हैं। रज़ा के चित्र लोगों से महरूम शहरों, आबादी रहित इमारतों को दर्शाते हैं जिनमे कोई पक्षी तक नहीं हैं। निर्जन शहर, जो शायद भूतों से भरे हुए हैं, बिना किसी आवाज़ के मृत कंकालों से पूछते हैं: अब मुझे बताओ, क्या तुम अभी भी एक मुसलमान हो? क्या तुम अभी भी एक हिंदू हो? उन्होनें विभाजन के दौरान तथा इसके बाद की हमारी सामूहिक पीड़ा बारे में कहा है, "एक तरफ यह राष्ट्रीय त्रासदी थी। तो दूसरी तरफ मेरे परिवार के लिए निजी इतिहास के रूप में, 1947-1948 के यह महत्वपूर्ण वर्ष त्रासदी और जुदाई के वर्ष थे। जुलाई 1947 में मेरी मां का मुंबई में अपने घर में निधन हो गया, 1948 में अगले साल के शुरू में, मेरे पिता का मंडला में निधन हो गया। दंगों और हत्याओं और नफरत से भरी इस अवधि के साथ मेरा निजी इतिहास और नुकसान की मेरी व्यक्तिगत भावना जुड़ी है।" (रज़ा के दृष्टिकोण के अनुसार बिंदु, स्थान व समय में गीति सेन द्वारा उद्धृत). उनके द्वारा बनाए गए पेरिस के "ब्लैक सन" (1953), "हॉट डे केन्स"(1951) नामक चित्रों में घरों और कार्यस्थलों के बंद समूह दर्शाए गए हैं जो गर्म, असुविधाजनक और निर्जन हैं। फ्रांस ने उन्हें तकनीकें सिखाईं और उन्हें स्थान दिया। लेकिन उनका काम प्रत्यक्ष तौर पर भारतीय है, था तथा बना रहेगा. पिछले कुछ वर्षों से उनके नए कामों में भावनाओं का चंद्र और सौरमंडल, अनंत गोला, धब्बे, त्रिकोण व प्रेरित चिंतन, शांति व लौ की लपटें दिखती हैं। हर कोई हमेशा यह जानता है, प्रलय को याद रखता है तथा जानता है कि प्रत्येक दिन शायद फैसले का दिन है। सैयद हैदर रज़ा की कला की जड़ें बीसवीं सदी से जुड़ी हुई हैं, यह वो समय है जब हिन्दुस्तान को उपनिवेश बना दिया गया था, यह पूरी तरह से गरीब था तथा लोग स्वतंत्रता के लिए मचल रहे थे। कलाकारों को बार बार यह कहा जा रहा था कि उनके लिए विक्टोरिया के तरीके और स्लेड स्कूल ही सीखने का सही रास्ता थे। आदिवासी प्रतीकों, पेरिस के सपनों, स्वतंत्रता और रंगों के दर्शन शास्त्रों के साथ, प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप में शामिल रज़ा तथा कई अन्य लोगों ने औपनिवेशिक बंधनों को तोड़ दिया तथा आधुनिक भारतीय कला को जन्म दिया। अंग्रेजों द्वारा अपमानित प्राचीन तकनीकें और प्रतीक, एक बार पुनः भारत के कलाकारों को धरातल तथा आकार दे रहे थे। फ्रांस को तकनीक के एक शिक्षक के रूप में महत्त्व दिया गया था। एस.एच. रज़ा भारत तथा इसके जीवन व इसके कई रूपों को पुनः जीने के लिए नियमित रूप से भारत की यात्रा करते हैं। अधिकांश भारतीयों के लिए, मुख्य धारा के हिन्दू विचार और मुस्लिम मान्यता विश्वास और सच्चाई के हर रोज के पहलू हैं, तथा कोई भी एक दूसरे के लिए अजनबी नहीं है। इसलिए रज़ा, हुसैन, गुलाम रसूल संतोष जैसे मुसलमान हिन्दू प्रतीकों का प्रयोग धाराप्रवाह और स्वाभाविक रूप से करते हैं, क्योंकि वे इन्हें हर रोज़ अनुभव करते हैं। यहां कोई अजनबी नहीं है या कोई विदेशी का मुद्दा नहीं है, यह केवल साझा ज्ञान है। रज़ा ने कैलिफोर्निया में एक ग्रीष्मकालीन अवकाश, शिक्षण करते हुए बिताया और पॉलक की जीवंत खुशी और रोथ्को के रहस्यमय कामों को देखा. हालांकि किसी प्रत्यक्ष प्रभाव के लिए यह खोज व्यर्थ है। उन्होनें मनुष्य के साहसिक सवालों पर खोज की: मैं यहां क्यों हूं, मैं कहां जा रहा हूं, क्यों, वह आश्चर्यजनक चीज़ क्या है जो जागरूकता, चेतना कहलाती है। यदि हम बने रहें, तो क्या हम किसी प्रकार यह जान पाएंगे कि यह सब क्या था? रज़ा बिंदु को जन्म तथा रचना और अस्तित्व के निर्वाहक के रूप में चित्रित करते हैं तथा आकृतियों, ज्यामिति व रंगों तथा अंतरिक्ष, ध्वनि तथा समय के द्विआयामी चित्रण के वर्णन की ओर बढ़ते जाते हैं। उद्धरण: "मेरी प्रेरणा लेखक या चित्रकारों और यहां तक कि उस्ताद जैसे संगीतकारों के विचार रहे हैं जिन्होनें कहा कि, 'अपने कानों से देखो, अपनी आंखों से सुनो.'-सैयद हैदर रज़ा "मेरा काम मेरा स्वयं का भीतरी अनुभव तथा प्रकृति के रहस्यों तथा रूप के साथ मेरी भागीदारी को दर्शाता है, जिसे रंग, रेखा, अंतरिक्ष तथा प्रकाश द्वारा व्यक्त किया गया है। "तत्व की खोज ने मुझे दीवाना कर दिया. भारतीय अवधारणाओं, प्रतिमा विज्ञान, संकेतों और प्रतीकों ने इस खोज को मज़बूत किया। कुदरत के रूप में प्रकृति, जो सर्वोच्च सृजन शक्ति है, बीज में निहित भ्रूण शक्ति, नर-मादा आधार, प्रकृति में सदैव मौजूद रहने वाली अंकुरण, गर्भावस्था तथा जन्म जैसी घटनाओं ने मेरी अवधारणा को 'देखी गयी प्रकृति' से 'प्रकृति-कल्पना' में बदल दिया". "मैं फ्रांस इसलिए गया क्योंकि इस देश ने मुझे चित्रकला की तकनीक तथा विज्ञान की शिक्षा दी. फ्रांस के सिज़ेन जैसे अमर कलाकार एक चित्र के निर्माण का रहस्य जानते थे।.. . लेकिन मेरे फ़्रांसिसी अनुभव के बावजूद, मेरे चित्रों का भाव सीधे भारत से आता है।" ध्यान दें: सूदबी ने 29 मार्च को 1,36,33,820 डॉलर मूल्य की भारतीय और दक्षिण पूर्व एशियाई कलाकृतियां बेचीं जिनमें से अधिकतर आधुनिक भारतीय कलाकृतियां थीं। सैयद हैदर रज़ा ने (जन्म 1922) की तपोवन (1972 में बनी कृति) 14,72,000 डॉलर में बिकी. दिसम्बर 1978 में, भारत की मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें विशेष और कृतज्ञ श्रद्धांजलि दी और अब भोपाल में उनकी कृतियों का एक स्थायी संग्रह है। r656 585ytuytuytutyyutrddr6 सार्वजनिक योगदान उन्होनें भारतीय युवाओं को कला में प्रोत्साहन देने के लिए भारत में रज़ा की फाउंडेशन स्थापना भी की है जो युवा कलाकारों को वार्षिक रज़ा फाउंडेशन पुरस्कार प्रदान करता है।न्यूज़मेकर https://web.archive.org/web/20110607140813/http://www.milligazette.com/Archives/2005/01-15Apr05-Print-Edition/011504200533.htm 7 जून 2011 द मिल्ली गैजेट ऑनलाइन, अप्रैल 2005. निजी जीवन‍ एस.एच. रज़ा ने पेरिस में इकोल डे ब्यू आर्ट्स की अपनी छात्र मित्र जेनाइन मोंगिल्लेट से विवाह किया जो बाद में एक प्रसिद्ध कलाकार और मूर्तिकार बन गईं। उन्होनें 1959 में शादी की और उनकी मां के फ़्रांस न छोड़ने के अनुरोध पर, रज़ा ने वहीँ रहने का फैसला किया।हिन्दुस्तान टाइम्स https://web.archive.org/web/20100628181334/http://epaper.hindustantimes.com/default.aspx 28 जून 2010 मास्टर स्ट्रोक, एचटी सिटी, कला, पृष्ठ.10, 23 फ़रवरी 2008. 5 अप्रैल 2002 को जेनाइन की पेरिस में मृत्यु हो गई।जैनिन मोंगिलत https://web.archive.org/web/20110607040606/http://www.hinduonnet.com/2002/04/09/stories/2002040901261500.htm 7 जून 2011 द हिंदू, 09 अप्रैल 2002. पुरस्कार 1946: रजत पदक, बॉम्बे आर्ट सोसाइटी, मुंबई 1948: स्वर्ण पदक, बॉम्बे आर्ट सोसायटी, मुंबई 1956: प्रिक्स डे ला क्रिटिक, पेरिस 1981: पद्म श्री; भारत सरकार 1983: ललित कला अकादमी की मानद सदस्यता, नई दिल्ली 1992: कालिदास सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार 2007: पद्म भूषण; भारत सरकार 2013: पद्म विभूषण; भारत सरकार प्रदर्शनियां 2010 फ्लोरा जैंसेम गैलरी, रज़ा सेरामिक्स, पैरिस 2010 आकार प्रकार आर्ट गैलरी, कोलकाता, अहमदाबाद, जयपुर 2010 में इंडिया 2008 आर्ट अलाइव गैलरी, दिल्ली, 2008 में भारत आर्ट अलाइव गैलरी पर एक्ज़िभिशन मैग्निफिसेंट सेवेन देखें https://web.archive.org/web/20181215122729/http://www.artalivegallery.com/shows.php?cat=shows&scat=&show_display=41 15 दिसंबर 2018 1997 ललित कला के रूपांकर, भारत भवन, भोपाल 1997 जहांगीर आर्ट गैलरी मुंबई 1997 आधुनिक कला के राष्ट्रीय गैलरी, नई दिल्ली. 1994 द आर्ट रेंटल कॉर्पोरेट, समूह माइकल फेरियर, एकिरोल्स, ग्रेनोबल 1992 जहांगीर निकोल्सन संग्रहालय, कला प्रदर्शन के लिए नैशनल सेंटर, मुम्बई 1992 कोर्सेस आर्ट लैलोवेस्क, फ्रांस 1991 गैलरी एटेर्सो, कांस रेट्रोसपेक्टिव: 1952-1991, पलैजो कार्नोल्स 1991 मेनटॉन के संग्रहालय, फ्रांस 1990 शेमौल्ड गैलरी, बॉम्बे 1988 शेमौल्ड गैलेरी, बॉम्बे; कोलोरिटेन गैलरी, स्टवान्गर, नॉर्वे 1987 द हेड ऑफ़ द आर्टिस्ट, ग्रेनोबल 1985 गैलेरी पियरे परत, पैरिस 1984 शेमौल्ड गैलरी, बॉम्बे 1982 गैलरी लोएब, बर्न, स्विट्जरलैंड, गैलरी जेवाइ नोब्लेट, ग्रेनोबल 1980 गैलिरियेट, ओस्लो आगे पढ़ें सैयद हैदर रज़ा कृत पैशन : लाइफ एंड आर्ट ऑफ़ रज़ा, अशोक वाजपेयी (एड.) 2005, राजकमल पुस्तकें. ISBN 81-267-1040-3. अशोक वाजपेयी कृत रज़ा : अ लाइफ इन आर्ट, 2007, आर्ट लाइव गैलरी, नई दिल्ली. ISBN 978-81-901844-4-1. गीति सेन कृत बिंदु : स्पेस एंड टाइम इन रज़ा विज़न . मीडिया ट्रांसएशिया. ISBN 962-7024-06-6. एलेन बोनफैंड कृत रज़ा https://web.archive.org/web/20110721002954/http://www.ladifference.fr/raza,1780.html?indextitre=4&titre=R#livre1780 21 जुलाई 2011 , लेस एडिशन डे ला डिफ़रेंस, पैरिस, 2008. (फ्रेंच और अंग्रेजी संस्करण. एडिशन डे ला डिफ़रेंस द्वारा लिथोग्राफ्स संपादित, पैरिस) सन्दर्भ 2 बाहरी कड़ियाँ एस.एच. रज़ा की आधिकारिक वेबसाइट ऑनलाइन काम एस.एच. रज़ा के चित्र https://web.archive.org/web/20181215121738/http://www.theartstrust.com/artistexhibhition.aspx?artistid=159&name=Raza%20S%20H 15 दिसंबर 2018 रज़ा, एस॰एच॰ फ़रवरी 22, 1922 बबरिया, मध्य प्रदेश, ब्रिटिश भारत श्रेणी:1922 में जन्मे लोग श्रेणी:२०१६ में निधन श्रेणी:भारतीय कलाकार श्रेणी:भारतीय चित्रकार श्रेणी:भारतीय मुस्लिम श्रेणी:पद्मश्री प्राप्तकर्ता श्रेणी:पद्म भूषण सम्मान प्राप्तकर्ता श्रेणी:ललित कला अकादमी के सदस्य श्रेणी:मण्डला के लोग श्रेणी:भारतीय मूल के फ्रांसीसी लोग