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दुर्गादास (उपन्यास)

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दुर्गादास प्रेमचंद दुर्गादास भारतीय ज्ञानपीठ 2011 (यह सर्वप्रथम सन् 1915 में अज्ञान प्रकाशक द्वारा प्रकाशित हो चुका है।) हिंदी भारत साहित्य परिच्छेद उपन्यास 92 9788126320578 प्रेमचंद का ऐतिहासिक उपन्यास। दुर्गादास एक उपन्यास है जो एक वीर व्यक्ति दुर्गादास राठौड़ के जीवन पर मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित है। इसे एक वीर गाथा भी कह सकते हैं जिससे हमें कई सीख मिलती है। यह बाल साहित्य के अंतर्गत आता है तथा इसके मुख्य प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजा यशवन्तसिंह के सेवक दुर्गादास नें उसके मृत्यु के बाद राजा के पुत्र अजीतसिंह को औरंगज़ेब तथा उसके मुगल सेना से सुरक्षित किया तथा औरंगज़ेब को मारवाड़ से भगाकर अजीतसिंह को राज सौंपा। तथा किस प्रकार उसे दुष्ट अजीतसिंह से दूर भागना पड़ा।http://madansinghshekhawat2.blogspot.in/2012/09/blog-post_30.html वीर राठौड़ 27 मई 2014 https://web.archive.org/web/20140528010515/http://madansinghshekhawat2.blogspot.in/2012/09/blog-post_30.html 28 मई 2014 dead परिचय दुर्गादास महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का ऐतिहासिक उपन्यास है जो मुख्यत: उर्दू लिपि में लिखा गया और जिसका हिन्दी अनुवाद पहली बार सन् 1915 में प्रकाशित हुआ था। इसमें एक वीर की संघर्षपूर्ण गाथा है जो अपने मात्रभूमि के लिये अपना सर कटवाने तक को तैयार था। स्वयं प्रेमचंद उनका बखान करते हैं। प्रेमचंद के शब्दों में -- राजपूताना में बड़े-बड़े शूर-वीर हो गये हैं। उस मरुभूमि ने कितने ही नर-रत्नों को जन्म दिया है; पर वीर दुर्गादास अपने अनुपम आत्म-त्याग, अपनी निःस्वार्थ सेवा-भक्ति और अपने उज्जवल चरित्र के लिए कोहनूर के समान हैं। औरों में शौर्य के साथ कहीं-कहीं हिंसा और द्वेष का भाव भी पाया जाएगा, कीर्ति का मोह भी होगा, अभिमान भी होगा; पर दुर्गादास शूर होकर भी साधु पुरुष थे। इसमें प्रेमचंद ने अपनी रचनाशीलता का परिचय देते हुए महत्वपूर्ण तथ्य समाहित किये हैं। अभी इसकी पुस्तिका भारतीय ज्पीठ द्वारा प्रस्तुत है जिसका इस प्रेस से पहला संस्करण 1 जनवरी सन् 2011 में प्रकाशित हुआ। यह कथा, वीर गाथा प्रेमियों के साथ ही साहित्य और इतिहास शोधार्थियों के लिये भी उपयुक्त है। उद्देश्य दुर्गादास एक बार सन् 1915 में सचित्र प्रकाशित हुई थी, यह मुख्य रूप से बाल पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुई जिसके पीछे प्रेमचंद जी का उद्देश्य उस समय के बालकों के मन में देशप्रेम की भावना जागृत करना था, जिसमें वे पुर्णत: सफल हुए। दुर्गादास की भूमिका जिसे स्वयं प्रेमचंद नें लिखा, उन्ही के शब्दों में निम्नांकित है -- 'बालकों के लिए राष्ट्र के सपूतों के चरित्र से बढ़कर उपयोगी, साहित्य का कोई दूसरा अंग नहीं है। इसमें उनका चरित्र ही बलवान् नहीं होता, उनमें राष्ट्रप्रेम और साहस का संचार भी होता है। राजपूताना में बड़े-बड़े शूरवीर हो गये हैं। उस मरुभूमि ने कितने ही नर-रत्नों को जन्म दिया है, पर वीर दुर्गादास अपने अनुपम आत्म-त्याग, अपनी निःस्वार्थ सेवाभक्ति और अपने उज्जवल चरित्र के लिए कोहनूर के समान हैं। औरों में शौर्य के साथ कहीं-कहीं हिंसा और द्वेष का भाव भी पाया जाएगा, कीर्ति का मोह भी होगा, अभिमान भी होगा, पर दुर्गादास शूर होकर भी साधु पुरुष थे। इन्हीं कारणों से हमने वीर-रत्न दुर्गादास का चरित्र बालकों के सामने रखा है। हमने चेष्टा की है कि पुस्तक की भाषा सरल और बामुहावरा हो और उसमें बालकों की रुचि उत्पन्न हो। -प्रेमचन्दइससे उनके उद्देश्य का पता चलता है। प्रेमचंद के कथाओं तथा उपन्यासों में परिच्छेद देने की शैली तथा तारतम्यता और बिलगाव समाहित हैं, पाठक इससे परिचित हैं तथा इनकी रचनाए पाठकों की परीक्षा में उत्तीर्ण हुईं। द्विवेदी युग में वे ही एकमात्र अन्वय और व्यतिरेक के ज्ञानी थे। 'दुर्गादास' में भी इसका स्वच्छंद प्रयोग दिखता है। दुर्गादास उपन्यास एक सत्य कथा है जिसके पात्र तथा स्थान भौगोलिक तथा ऐतिहासिक रूप से दर्शाए गए हैं।http://pustak.org/home.php?bookid=7970 परिचय 27 मई 2014 https://web.archive.org/web/20140527220615/http://pustak.org/home.php?bookid=7970 27 मई 2014 dead संक्षिप्त में जोधपुर के वीर सेनापति आशकरण के पुत्र दुर्गादास तथा जसकरण थे सन् 1605 में धोखे से आशकरण की मृत्यु के बाद महाराज यशवंत सिंह नें दुर्गादास तथा अपने पुत्र पृथ्वी सिंह को लाड से पाला। औरंगजेब के कहनें पर महाराज दक्खिन की सुबेदारी पर चले गए, दुर्गादास को साथ लिया और पृथ्वीसिंह को राज्य में छोड़ दिया। दक्खिन के राजा शिवाजी से यशवंतसिंह की दोस्ती के बाद मुगल वहां सुरक्षित हो गए। फिर औरंगज़ेब ने राजा को काबुल भेजा तथा वहाँ के मुसलमानों से लड़ते हुए दो राजकुमार मारे गए। वहाँ मारवाड़ से औरंगज़ेब ने पृथ्वी सिंह को भी दिल्ली बुलाकर मार डाला। और मारवाड़ पर कब्जा कर लिया। इधर बच्चों के मरने से जसवंतसिंह का भी देहावसान हो गया। राजा नें मरने से पहले कहा था कि उनकी दो पत्नी भाटी और हाड़ी गर्भ से थीं तथा वह उन्ही के संतान को राजा बनाना चाहते थे। राजा के साँथ इन दोनों रानियों को छोड़कर सब सती हो गए।http://hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=912&pageno=1 दुर्गादास (हिंदी समय) 27 मई 2014 https://web.archive.org/web/20140527220327/http://hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=912&pageno=1 27 मई 2014 dead रानी का बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम अजीत रखा गया, दूसरे दिन हाड़ी का भी बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम दलथम्भन रखा। दिल्ली जाते जाते दलथम्भन ठण्ड से मारा गया वहाँ औरंगज़ेब नें राजकुमार अजीत को दिल्ली में रखने की बात कही। दुर्गादास नें आनंददास खेची के साथ राजकुमार को डुगबा नामक गाँव में जयदेव ब्राह्मण के घर भेज दिया।http://hindugarjan.blogspot.in/2011/04/blog-post_26.html एक वीर 27 मई 2014 https://web.archive.org/web/20140528005840/http://hindugarjan.blogspot.in/2011/04/blog-post_26.html 28 मई 2014 dead औरंगजेब नें कोतवाल भेजे और दोनों रानियों नें आत्महत्या कर ली। लड़ाई में जो बचे थे वे दुर्गादास के साँथ रानियों का शव लेकर चले और आबू की पहाड़ियों में दाह क्रिया की। सब लोग ब्राह्मण के यहाँ गए और एक दिन बाद सब कल्याणगढ़ दुर्गादास के घर चले गए वहाँ दुर्गादास की बूढ़ी माँ तथा उसका भाई जसकरण और उसका बेटा तेजकरण था। बादशाह नें जसवंतसिह के भतीजे के कहने पर यह फरमान जारी किया कि सारे राजपूतों को जिंदा या मुर्दा पकड़ के लाओ। सब राजपूत भागे, इधर दुर्गादास सोनिंगी के साथ आवागढ़ चले गए वहाँ शोनिंगी नें एक संदुकची देते हुए बोला "यह राजा का दिया हुआ है, इसे मैं सुरक्षित नही रख सकता इसे तुम ले लो तथा जोधपुर में जो युवक राजा बनें उसे दे देना, खोलना मत!" दुर्गादास उस संदुकची को लेकर चला गया। रास्ते में दो राजपूतों को मुगल सिपाही घेरे थे जिसमें से एक मर गया था और महासिंह नामक घायल था। उन्हे बचाते हुए दुर्गादास नें जोरावर को मार डाला और महासिंह को साथ ले अपने घर पहुँचा। सुबह होते ही दुर्गादास अपने बेटे तथा भाई के साथ माँ से विदा लेकर जाने लगा और वह संदुकची अपने नौकर नाथू को दे दी। उनके जाने के बाद शमशेर खाँ आया और दुर्गादास की माँ को बेरहमी से मार डाला शमशेर के एक सैनिक खुदाबक्श के संग महाँसिह माड़ो चले गए और नाथू दुर्गादास को माँ की मौत की खबर देने चला गया। दुर्गादास माता के मृत्यु की बात से आगबबूला हो सीधा जाकर शमशेर खाँ को मार डाला।http://hindisamay.com/premchand%20samagra/durgadas/durgadas%20-%201.htm जीवनी 27 मई 2014 https://web.archive.org/web/20141008021035/http://hindisamay.com/premchand%20samagra/durgadas/durgadas%20-%201.htm 8 अक्तूबर 2014 dead इसी प्रकार कई महान काम करते हुए उसने औरंगज़ेब को मारवाड़ से भगा दिया। अब दुर्गादास बूढ़ा हो चला था उसने अजीतसिंह को राजगद्दी पर बिठा दिया, अजीतसिंह घमंड में आकर दुर्गादास को मारने की कोशिश की पर आखिर उसे भी पता चल ही गया कि जिसके डर से औरंगज़ेब भाग गया उसे वो क्या कर सकेगा। वीर दुर्गादास जोधपुर से चले गए और थोड़े दिन राणा जयसिंह के यहाँ रहे और फिर उज्जैन चले गए, बचे दिनों में श्रद्धा से महाकालेश्वर की पूजा की। संवत् 1765 में उनका देहांत हो गया।http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_/_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6#.U4SWC_OXfFr दुर्गादास उपन्यास 27 मई 2014 https://web.archive.org/web/20140528010215/http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_/_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6#.U4SWC_OXfFr 28 मई 2014 dead वीर दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु तो हो गई परंतु उनकी वीरगाथा सदा के लिये अमर रहेगी। अंत में प्रेमचंद लिखते हैं जिसने यशवन्तसिंह के पुत्र की प्राण-रक्षा की और मारवाड़ देश का स्वामी बनाया, आज उसी वीर का मृत शरीर क्षिप्रा नदी की सूखी झाऊ की चिता में भस्म किया गया। विधाता! तेरी लीला अद्भुत है।''' नजर डालें वीर दुर्गादास राठौड़ प्रेमचंद श्यामा प्रतिज्ञा सेवासदन प्रेमाश्रम निर्मला रंगभूमि गबन कर्मभूमि गोदान सन्दर्भ 30em बाहरी कड़ियाँ रणभूमि के शेर! भाग औरंगज़ेब!, दुर्गादास जयंती पर छपा लेख। पुस्तक डॉट ओआरजी, दुर्गादास पुस्तिका अॉनलाइन अॉर्डर करें। प्रेमचंद के सामग्री, अॉनलाइन। दुर्गादास उपन्यास, गद्यकोश में। श्रेणी:प्रेमचंद श्रेणी:पुस्तकें