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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

हेमचन्द्राचार्य

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आचार्य हेमचन्द्र Hemachandra.gif Hemachandracharya ताड़पत्र-प्रति पर आधारित हेमचन्द्राचार्यजी की छवि जैन धर्म श्वेताम्बर आचार्य हेमचन्द्र सूरीजी चांगदेव १०८८ ई.(टिप्पणि देखें) धंधुका ११७२ ई.(टिप्पणि देखें) अन्हिलवाड़ पाटन चाचिंगा, पहिनी देवी सोमचंद्र देवचंद्रसुरी खंभात सिद्ध हेमचंद्र व्याकरण सूरीजी जैन आचार्य हेमचन्द्र (१०८८-११७२) कलिकाल सर्वज्ञ महान गुरु, समाज-सुधारक, धर्माचार्य, गणितज्ञ एवं अद्भुत प्रतिभाशाली मनीषी थे। भारतीय चिंतन, साहित्य और साधना के क्षेत्र में उनका नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है। साहित्य, दर्शन, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र, वाङ्मय के सभी अंङ्गो पर नवीन साहित्य की सृष्टि तथा नये पंथ को आलोकित किया। संस्कृत एवं प्राकृत पर उनका समान अधिकार था। संस्कृत के मध्यकालीन कोशकारों में हेमचन्द्र का नाम विशेष महत्व रखता है। वे महापण्डित थे और 'कलिकालसर्वज्ञ' कहे जाते थे। वे कवि थे, काव्यशास्त्र के आचार्य थे, योगशास्त्रमर्मज्ञ थे, जैनधर्म और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान् थे, टीकाकार थे और महान कोशकार भी थे। वे जहाँ एक ओर नानाशास्त्रपारंगत आचार्य थे वहीं दूसरी ओर नाना भाषाओं के मर्मज्ञ, उनके व्याकरणकार एवं अनेकभाषाकोशकार भी थे। आचार्य हेमचन्द्र को पाकर गुजरात अज्ञान, धार्मिक रुढियों एवं अंधविश्वासों से मुक्त हो कीर्ति का कैलास एवं धर्म का महान केन्द्र बन गया। अनुकूल परिस्थिति में कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र सर्वजनहिताय एवं सर्वापदेशाय पृथ्वी पर अवतरित हुए। १२वीं शताब्दी में पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, वल्लभी, उज्जयिनी, काशी इत्यादि समृद्धिशाली नगरों की उदात्त स्वर्णिम परम्परा में गुजरात के अणहिलपुर ने भी गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। जीवनवृत्त संस्कृत कवियों का जीवनचरित्र लिखना कठिन समस्या है। सौभाग्य की बात है कि आचार्य हेमचंद्र के विषयमें यत्र-तत्र पर्याप्त तथ्य उपलब्ध है। प्रसिद्ध राजा सिद्धराज जयसिंह एवं कुमारपाल राजा के धर्मोपदेशक होने के कारण ऐतिहासिक लेखकों ने आचार्य हेमचन्द्र के जीवनचरित पर अपना अभिमत प्रकट किया है। आचार्य हेमचंद्रका जन्म गुजरात में अहमदाबाद से १०० किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम स्थित धंधुका नगर में विक्रम संवत ११४५ के कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में हुआ था। मातापिता शिवपार्वती उपासक मोढ वंशीय वैश्य थे। पिता का नाम चाचिंग अथवा चाच और माता का नाम पाहिणी देवी था। बालक का नाम चांगदेव रखा। माता पाहिणी और मामा नेमिनाथ दोनों ही जैन थे। आचार्य हेमचंद्र बहुत बड़े आचार्य थे अतः उनकी माताको उच्चासन मिलता था। सम्भव है, माता ने बाद में जैन धर्म की दीक्षा ले ली हो। बालक चांगदेव जब गर्भ में था तब माता ने आश्चर्यजनक स्वप्न देखे थे। इस पर आचार्य देवचंद्र गुरु ने स्वप्न का विश्लेषण करते कहा सुलक्षण सम्पन्न पुत्र होगा जो दीक्षा लेगा। जैन सिद्धान्त का सर्वत्र प्रचार प्रसार करेगा। बाल्यकाल से चांगदेव दीक्षा के लिये दृढ था। खम्भात में जैन संघ की अनुमति से उदयन मंत्री के सहयोग से नव वर्ष की आयुमें दीक्षा संस्कार विक्रम सवंत ११५४ में माघ शुक्ल चतुर्दशी शनिवार को हुआ। और उनका नाम सोमचंद्र रखा गया। अल्पायु में शास्त्रों में तथा व्यावहारिक ज्ञान में निपुण हो गये। २१ वर्ष की अवस्थामें समस्त शास्त्रोकां मंथन कर ज्ञान वृद्धि की। नागपुर (महाराष्ट्र) के पास  धनज ग्राम के एक वणिक ने विक्रम सवंत ११६६में सूरिपद प्रदान महोत्सव सम्पन्न किया। तब एक आश्चर्यजनक घटना घटी। चांगदेव जो अब सोमचन्द्र बन चुके थे  एक  मिट्टी के ढेर पर बैठे थे। आचार्य देवचन्द्रसूरी जी ने अपने ज्ञान में देखा और उदगार व्यक्त किये, "सोम जहाँ बैठेगा वहाँ हेम ही होगा" और वह मिट्टीका ढेर सोने में बदल चुका था। उस के बाद सोमचन्द्र, हेमचन्द्र नाम से जाने लगे। शरीर सुवर्ण समान तेजस्वी एवं चंद्रमा समान सुन्दर था। आचार्य ने साहित्य और समाज सेवा करना आरम्भ किया। प्रभावकचरित अनुसार माता पाहिणी देवी ने जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण की। अभयदेवसूरि के शिष्य प्रकांड गुरुश्री देवचंद्रसूरि हेमचंद्र के दीक्षागुरु, शिक्षागुरु या विद्यागुरु थे। वृद्वावस्था में हेमचंद्रसूरी को लूता रोग लग गया। अष्टांगयोगाभ्यास द्वारा उन्होंने रोग नष्ट किया। ८४ वर्ष की अवस्था में अनशनपूर्वक अन्त्याराधन क्रिया आरम्भ की। विक्रम सवंत १२२९मे महापंडितों की प्रथम पंक्ति के पंडित ने दैहिक लीला समाप्त की। समाधिस्थल शत्रुञ्जय महातीर्थ पहाड़ स्थित है। प्रभावकचरित के अनुसार राजा कुमारपाल को आचार्य का वियोग असह्य रहा और छः मास पश्चात स्वर्ग सिधार गया। हेमचन्द्र अद्वितीय विद्वान थे। साहित्य के सम्पूर्ण इतिहास में किसी दूसरे ग्रंथकार की इतनी अधिक और विविध विषयों की रचनाएं उपलब्ध नहीं है। व्याकरण शास्त्र के ईतिहास में हेमचंद्र का नाम सुवर्णाक्षरों से लिखा जाता है। संस्कृत शब्दानुशासन के अन्तिम रचयिता हैं। इनके साथ उत्तरभारत में संस्कृत के उत्कृष्ट मौलिक ग्रन्थों का रचनाकाल समाप्त हो जाता है। गुजराती कविता है, 'हेम प्रदीप प्रगटावी सरस्वतीनो सार्थक्य कीधुं निज नामनुं सिद्धराजे'। अर्थात सिद्धराज ने सरस्वती का हेम प्रदीप जलाकर (सुवर्ण दीपक अथवा हेमचंद्र) अपना 'सिद्ध'नाम सार्थक कर दिया। हेमचंद्रका कहना था स्वतंत्र आत्मा के आश्रित ज्ञान ही प्रत्यक्ष है। रचनाएँ क्लृप्तं व्याकरणं नवं विरचितं छन्दो नवं द्वयाश्रयालङ्कारौ प्रथितौ नवौ प्रकटितं श्रीयोगशास्त्र नवम् । तर्कः संजनितो नवो, जिनवरादीनां चरित्रं नवं बद्धं येन न केन केन विधिना मोहः कृतः दूरतः ॥ इससे स्पष्ट है कि हेम ने व्याकरण, छन्द, द्वयाश्रय काव्य, अलङ्कार, योगशास्त्र, स्तवन काव्य, चरित कार्य प्रभृति विषय के ग्रन्थों की रचना की है। व्याकरण ग्रन्थ व्याकरण के क्षेत्र में सिद्धहेमशब्दानुशासन, सिद्धहेमलिङ्गानुशासन एवं धातुपारायण ग्रन्थ उपलब्ध हैं। आचार्य ने समस्त व्याकरण वाङ्मय का अनुशीलन कर 'शब्दानुशासन' एवं अन्य व्याकरण ग्रंथो की रचना की। पूर्ववर्ती आचार्यों के ग्रंथो का सम्यक अध्ययन कर सर्वाङ्ग परिपूर्ण उपयोगी एवं सरल व्याकरण की ‍रचना कर संस्कृत और प्राकृत दोनों ही भाषाओं को पूर्णतया अनुशासित किया है। इनके व्याकरण ग्रन्थ की प्रशंसा करते हुए प्रबन्धचिन्तामणि में लिखा है- भ्रातः संवृणु पाणिनिप्रलपितं कातन्त्रकन्था वृथा, मा कार्षीः कटु शाकटायनवचः क्षुद्रेण चान्द्रेण किम् । किं कण्ठाभरणादिभिर्वठरयत्यात्मानमन्यैरपि, श्रूयन्ते यदि तावदर्थमधुरा श्रीसिद्धहेमोक्तयः ॥ (पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण में शाकटायन, शौनक, स्फोटायन, आपिशलि का उल्लेख किया। पाणिनी के 'अष्टाध्यायी' में शोधन कात्यायन और भाष्यकार पतंजलि किया। जिसका पुनरुद्धार भोजदेवके 'सरस्वती कंठाभरण' में हुआ।) हैम व्याकरण हेमचन्द्र ने 'सिद्धहेमशब्दानुशासनम्' नामक नूतन पञ्चाङ्ग व्याकरण तैयार किया जो ( १ ) मूलपाठ, ( २ ) धातुपाठ, (३ ) गणपाठ, ( ४ ) उणादिप्रत्यय एवं ( ५ ) लिङ्गानुशासन - इन पाँचों अंगों से परिपूर्ण है। सिद्धहेमशब्दानुशासनम् राजा सिद्धराज जयसिंह की प्रेरणा से लिखा गया है। इस ग्रन्थ में आठ अध्याय और ३५६६ सूत्र हैं। आठवाँ अध्याय प्राकृत व्याकरण है, इसमें १११९ सूत्र हैं। आचार्य हेम ने इस व्याकरण ग्रन्थ पर छः हजार श्लोक प्रमाण लघुवृत्ति और अठारह हजार श्लोक प्रमाण बृहद्वृत्ति लिखी है। बृहद्वृत्ति सात अध्याय पर ही प्राप्त होती है, आठवें अध्याय पर नहीं है। इस व्याकरण ग्रन्थ का श्वेतछत्र सुषोभित दो चामर के साथ चल समारोह हाथी पर निकाला गया। ३०० लेखकों ने ३०० प्रतियाँ 'शब्दानुशासन' की लिखकर भिन्न-भिन्न धर्माध्यक्षों को भेंट देने के अतिरिक्त देश-विदेश, ईरान, सिंहल, नेपाल भेजी गयी। २० प्रतियाँ काश्मीर के सरस्वती भाण्डार में पहुंची। ज्ञानपञ्चमी (कार्तिक सुदि पंचमी) के दिन परीक्षा ली जाती थी। आचार्य हेमचन्द्र संस्कृत के अन्तिम महावैयाकरण थे। अपभ्रंश साहित्य की प्राचीन समृद्वि के सम्बध में विद्वान उन पदों के स्तोत्र की खोज में लग गये। १८००० श्लोक प्रमाण बृहदवृत्ति पर भाष्य कतिचिद दुर्गापदख्या व्याख्या लिखी गयी। इस भाष्य की हस्तलिखित प्रति बर्लिन में है। काव्य-ग्रन्थ आचार्य हेमचन्द्र ने अनेक विषयों पर विविध प्रकार के काव्य रचे हैं। अश्वघोष के समान हेमचंद्र सोद्देश्य काव्य रचना में विश्वास रखते थे। इनका काव्य 'काव्यमानन्दाय' न होकर 'काव्यं धर्मप्रचारय' है। अश्वघोष और कालिदास के सहज एवं सरल शैली जैसी शैली नहीं थी किन्तु उनकी कविताओं में हृदय और मस्तिष्क का अपूर्व मिश्रण था। आचार्य हेमचन्द्र के काव्य में संस्कृत बृहत्त्रयी के पाण्डित्यपूर्ण चमत्कृत शैली है। भट्टि के अनुसार व्याकरण का विवेचन, अश्वघोष के अनुसार धर्मप्रचार एवं कल्हण के अनुसार इतिहास है। आचार्य हेमचंद्र का पण्डित कवियों में मूर्धन्य स्थान है। 'त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित' एक पुराण काव्य है। संस्कृतस्तोत्र साहित्य में 'वीतरागस्तोत्र' का महत्वपूर्ण स्थान है। व्याकरण, इतिहास और काव्य का तीनों का वाहक द्ववाश्रय काव्य अपूर्व है। इस धर्माचार्य को साहित्य-सम्राट कहने में अत्युक्ति नहीं है। द्वयाश्रय काव्य 'द्वयाश्रय' नाम से ही स्पष्ट है कि उसमें दो तथ्यों को सन्निबद्ध किया गया है। इसमें चालुक्य वंश के चरित के साथ व्याकरण के सूत्रों के उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं। इसमें सन्देह नहीं कि हेमचन्द्र ने एक सर्वगुण-सम्पन्न महाकाव्य में सूत्रों का सन्दर्भ लेकर अपनी विशिष्ट प्रतिभा का परिचय दिया है। इस महाकाव्य में २० सर्ग और २८८८ श्लोक हैं। सृष्टिवर्णन, ऋतुवर्णन, रसवर्णन आदि महाकाव्य के सभी गुण वर्तमान हैं। अलङ्कार ग्रन्थ काव्यानुशासन ने उन्हें उच्चकोटि के काव्यशास्त्रकारों की श्रेणी में प्रतिष्ठित किया। पूर्वाचार्यो से बहुत कुछ लेकर परवर्ती विचारकों को चिन्तन के लिए विपुल सामग्री प्रदान की। काव्यानुशासन का - सूत्र, व्याख्या और सोदाहरण वृत्ति - ऐसे तीन प्रमुख भाग हैं। सूत्रो की व्याख्या करने वाली व्याख्या 'अलंकारचूडामणि' नाम प्रचलित है। और स्पष्ट करने के लिए 'विवेक' नामक वृति लिखी गयी। 'काव्यानुशासन' ८ अध्यायों में विभाजित २०८ सूत्रो में काव्यशास्त्र के सारे विषयों का प्रतिपादन किया गया है। 'अलंकारचूडामणि' में ८०७ उदाहरण प्रस्तुत है तथा 'विवेक'में ८२५ उदाहरण प्रस्तुत है। ५० कवियों के तथा ८१ ग्रंथो के नामोका उल्लेख है। 'काव्यानुशासन' का विवेचन काव्यानुशासन प्रायः संग्रह ग्रंथ है। राजशेखरके 'काव्यमीमांसा', मम्मटके 'काव्यप्रकाश', आनंदवर्धन के 'ध्वन्यालोक', अभिनव गुप्त के 'लोचन' से पर्याप्त मात्रा में सामग्री ग्रहण की है। मौलिकता के विषय में हेमचंद्र का अपना स्वतंत्र मत है। हेमचंद्र मत से कोई भी ग्रंथकार नयी चीज नहीं लिखता। यद्यपि मम्मट का 'काव्यप्रकाश' के साथ हेमचंद्र का 'काव्यानुशासन' का बहुत साम्य है। पर्याप्त स्थानों पर हेमचंद्राचार्य ने मम्मटका विरोध किया है। हेमचंद्राचार्य के अनुसार आनन्द, यश एव कान्तातुल्य उपदेश ही काव्य के प्रयोजन हो सकते हैं तथा अर्थलाभ, व्यवहार ज्ञान एवं अनिष्ट निवृत्ति हेमचंद्र के मतानुसार काव्य के प्रयोजन नहीं हैं। काव्यानुशासन से काव्यशास्त्र के पाठकों कों समझने में सुलभता, सुगमता होती है। मम्मट का 'काव्यप्रकाश' विस्तृत है, सुव्यवस्थित है, सुगम नहीं है। अगणित टीकाएं होने पर भी मम्मट का 'काव्यप्रकाश' दुर्गम रह जाता है। 'काव्यानुशासन' में इस दुर्गमता को 'अलंकारचूडामणि' एवं 'विवेक' के द्वारा सुगमता में परिणत किया गया है। 'काव्यानुशासन' में स्पष्ट लिखते हैं कि वे अपना मत निर्धारण अभिनवगुप्त एवं भरत के आधार पर कर रहे हैं। सचमुच अन्य ग्रंथो-ग्रंथकारों के उद्वरण प्रस्तुत करते हेमचन्द्र अपना स्वयं का स्वतंत्र मत, शैली, दष्टिकोण से मौलिक है। ग्रंथ एवं ग्रंथकारों के नाम से संस्कृत-साहित्य, इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। सभी स्तर के पाठक के लिए सर्वोत्कृष्ठ पाठ्यपुस्तक है। विशेष ज्ञानवृद्वि का अवसर दिया है। अतः आचार्य हेमचंद्र के 'काव्यानुशासन' का अध्ययन करने के पश्चात फिर दूसरा ग्रंथ पढ़ने की जरुरत नहीं रहती। सम्पूर्ण काव्य-शास्त्र पर सुव्यवस्थित तथा सुरचित प्रबन्ध है। कोशग्रन्थ आचार्य हेम ने संस्कृत में अनेक कोशों की रचना के साथ साथ प्राकृत—अपभ्रंश—कोश भी (देशीनाममाला) उन्होंने सम्पादित किया। उन्होने चार कोशों की रचना की- अभिधानचिन्तामणीमाला, अनेकार्थसङ्ग्रह, निघण्टुशेष और देशीनाममाला। अभिधानचिन्तामणि (या 'अभिधानचिन्तामणिनाममाला') इनका प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश है। छह काण्डों के इस कोश का प्रथम काण्ड केवल जैन देवों और जैनमतीय या धार्मिक शब्दों से सम्बद्ध है। देव, मर्त्य, भूमि या तिर्यक, नारक और सामान्य—शेष पाँच काण्ड हैं। 'अभिधानचिन्तामणि' पर उनकी स्वविरचित 'यशोविजय' टीका है—जिसके अतिरिक्त, व्युत्पत्तिरत्नाकर' (देवसागकरणि) और 'सारोद्धार' (वल्लभगणि) प्रसिद्ध टीकाएँ है। इसमें नाना छन्दों में १५४२ श्लोक है। निघण्टुशेष अभिधानचिन्तामणि का पूरक कोश है जिसमें वनस्पतियों से सम्बन्धित शब्दों का संग्रह है। यह कोश छः काण्डों में बद्ध है। दूसरा कोश 'अनेकार्थसंग्रह' (श्लोक संख्या १८२९) है जो छह काण्डों में है। एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षर आदि के क्रम से काण्डयोजन है। अन्त में परिशिष्टत काण्ड अव्ययों से सम्बद्ध है। प्रत्येक काण्ड में दो प्रकार की शब्दक्रमयोजनाएँ हैं—(१) प्रथमाक्षरानुसारी और (२) अन्तिमाक्षरानुसारी। 'देशीनाममाला' प्राकृत का (और अंशतः अपभ्रंश का भी) शब्दकोश है जिसका आधार 'पाइयलच्छी' नाममाला है। दार्शनिक एवं धार्मिक ग्रन्थ प्रमाणमीमांसा सामान्यतः जैन और हिन्दु धर्म में कोई विशेष अन्तर नहीं है। जैन धर्म वैदिक कर्म-काण्ड के प्रतिबन्ध एवं उस के हिंसा सम्बन्धी विधानों कों स्वीकार नहीं करता। आचार्य हेमचन्द्र के दर्शन ग्रन्थ 'प्रमाणमीमांसा' का विशिष्ट स्थान है। हेमचन्द्र के अन्तिम अपूर्ण ग्रन्थ प्रमाणमीमांसा का प्रज्ञाचक्षु पण्डित सुखलालजी द्वारा सम्पादन हुआ। सूत्र शैली का ग्रन्थ कणाद या अक्षपाद के समान है। दुर्भाग्य से इस समय तक १०० सूत्र ही उपलब्ध हैं। संभवतः वृद्वावस्था में इस ग्रन्थ को पूर्ण नहीं कर सके अथवा शेष भाग काल कवलित होने का कलंक शिष्यों को लगा। हेमचन्द्र के अनुसार प्रमाण दो ही है, प्रत्यक्ष ओर परोक्ष। दोनों एक-दूसरे से बिलकुल अलग हैं। स्वतन्त्र आत्मा के आश्रित ज्ञान ही प्रत्यक्ष है। आचार्य के ये विचार तत्वचिन्तन में मौलिक है। हेमचन्द्र ने तर्कशास्त्र में कथा का एक वादात्मक रूप ही स्थिर किया जिसमें छल आदि किसी भी कपट-व्यवहार का प्रयोग वर्ज्य है। हेमचन्द्र के अनुसार इंद्रियजन्म, मतिज्ञान और परमार्थिक केवलज्ञान में सत्य की मात्रा में अन्तर है, योग्यता अथवा गुण में नहीं। प्रमाणमीमांसा से सम्पूर्ण भारतीय दर्शन शास्त्र के गौरव में वृद्वि हुई। योगशास्त्र इसकी शैली पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार ही है किन्तु विषय और वर्णन क्रम में मौलिकता एवं भिन्नता है। योगशास्त्र नीति विषयक उपदेशात्मक काव्य की कोटि में आता है। योगशास्त्र जैन संप्रदाय का धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथ है। वह अध्यात्मोपनिषद् है। इसके अंतर्गत मदिरा दोष, मांस दोष, नवनीत भक्षण दोष, मधु दोष, उदुम्बर दोष, रात्रि भोजन दोष का वर्णन है। अंतिम १२ वें प्रकाश के प्रारम्भ में श्रुत समुद्र और गुरु के मुखसे जो कुछ मैं ने जाना है उसका वर्णन कर चुका हूँ, अब निर्मल अनुभव सिद्व तत्व को प्रकाशित करता हूँ। ऐसा निदेश कर के विक्षिप्त, यातायात, इन चित-भेंदो के स्वरुप का कथन करते बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा का स्वरुप कहा गया है। सदाचार ही ईश्वर प्रणिधान नियम है। निर्मल चित ही मनुष्य का धर्म है। संवेदन ही मोक्ष है जिसके सामने सुख कुछ नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। संवेदन के लिये पातञ्जल योगसूत्र तथा हेमचन्द्र योगशास्त्र में पर्याप्त साम्य है। योग से शरीर और मन शुद्ध होता है। योग का अर्थ है, 'चित्रवृति का निरोध'। मन को सबल बनाने के लिये शरीर सबल बनाना अत्यावश्यक है। योगसूत्र और योगशास्त्र में अत्यन्त सात्विक आहार की उपादेयता बतलाकर अभक्ष्य भक्षण का निषेध किया गया है। आचार्य हेमचन्द्र सब से प्रथम 'नमो अरिहन्ताणं' से राग-द्वेषादि आन्तरिक शत्रुओं का नाश करने वाले को नमस्कार कहा है। योगसूत्र तथा योगशास्त्र पास-पास है। संसार के सभी वाद, संप्रदाय, मत, दृष्टिराग के परिणाम है। द्दष्टिराग के कारण अशान्ति और दुःख है। अतः विश्वशान्ति के लिये, दृष्टिराग उच्छेदन के लिये हेमचन्द्र का योगशास्त्र आज भी अत्यन्त उपादेय ग्रन्थ है। साहित्य में आचार्य हेमचन्द्र के योगशास्त्र का स्थान हेमचंद्र ने अपने योगशास्त्र से सभी को गृहस्थ जीवन में आत्मसाधना की प्रेरणा दी। पुरुषार्थ से दूर रहने वाले को पुरुषार्थ की प्रेरणा दी। इनका मूल मंत्र स्वावलंबन है। वीर और दृढ चित पुरुषों के लिये उनका धर्म है। हेमचंद्राचार्य के ग्रंथो ने संस्कृत एवं धार्मिक साहित्य में भक्ति के साथ श्रवण धर्म तथा साधना युक्त आचार धर्म का प्रचार किया। समाज में से निद्रालस्य को भगाकर जागृति उत्पन्न की। सात्विक जीवन से दीर्घायु पाने के उपाय बताये। सदाचार से आदर्श नागरिक निर्माण कर समाज को सुव्यवस्थित करने में आचर्य ने अपूर्व योगदान किया। आचार्य हेमचंद्र ने तर्कशुद्ध, तर्कसिद्ध एवं भक्तियुक्त सरस वाणी के द्वारा ज्ञान चेतना का विकास किया और परमोच्च चोटी पर पहुंचा दिया। पुरानी जड़ता को जड़मूल से उखाड़ फेंक दिया। आत्मविश्वास का संचार किया। आचार्य के ग्रंथो के कारण जैन धर्म गुजरात में दृढमूल हुआ। भारत में सर्वत्र, विशेषतः मध्य प्रदेश में, जैन धर्म के प्रचार एवं प्रसार में उन के ग्रंथों ने अभूतपूर्व योगदान किया। इस दृष्टि से जैन धर्म के साहित्य में आचार्य हेमचन्द्र के ग्रन्थों का स्थान अमूल्य है। अन्य साहित्य संस्कृत में उमास्वाति का 'तत्वार्थाधिगमसूत्र', सिद्धसेन दिवाकर का 'न्यायावतार', नेमिचंद्र का 'द्रव्यसंग्रह', मल्लिसेन की 'स्याद्धादमंजरी', प्रभाचंद्र का 'प्रमेय कमलमातंड', आदि प्रसिद्ध दार्शनिक ग्रंथ है। उमास्वाति से जैन देह में दर्शानात्मा ने प्रवेश किया। कुछ ज्ञान की चेतना प्रस्फुटित हुई जो आगे कुंदकुंद, सिद्धसेन, अकलंक, विद्यानंद, हरिभद्र, यशोविजय, आदि रूप में विकसित होती गयी। कृतियों की सूची काव्यानुशासन छन्दानुशासन सिद्धहैमशब्दानुशासन (प्राकृत और अपभ्रंश का ग्रन्थ) उणादिसूत्रवृत्ति अनेकार्थ कोश देशीनाममाला अभिधानचिन्तामणि द्वाश्रय महाकाव्य काव्यानुप्रकाश त्रिषष्ठिशलाकापुरुषचरित परिशिष्ट-पर्वन अलङ्कारचूडामणि प्रमाणमीमांसा वीतरागस्तोत्र हेम प्रशस्ति सदा हृदि वहेम श्री हेमसूरेः सरस्वतीम्। ''सुवत्या शब्दरत्नानि ताम्रपर्णा जितायया ॥ ज्ञान के अगाध सागर कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र को पार पाना अत्यन्त दुष्कर है। जिज्ञासु को कार्य करने में थोड़ी सी प्रेरणा मिलने पर सब अपने आपको कृतार्थ समझेंगें। (सोमेश्वर भट्ट की 'कीर्ति कौमिदी' में) हेमचंद्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि थे। राजाकुमारपाल के सामने किसी मत्सरी ने कहा 'जैन प्रत्यक्ष देव सूर्य को नहीं मानते', इस पर हेमचन्द्र ने उत्तर दिया- "जैन साधु ही सूर्यनारायण को अपने हृदय में रखते हैं। सुर्यास्त होते ही जैन साधु अन्नजल त्याग देते हैं। और ऐसा कौन करता है?" इन्हें भी देखें हेमचन्द्र श्रेणी भारतीय गणितज्ञ सूची अभिधानचिन्तामणि प्रभावकचरित जयसिंह सिद्धराज कुमारपाल हेमचन्द्राचार्य उत्तर गुजरात विश्वविद्यालय बाहरी कड़ियाँ आचार्य हेमचंद्र (हेमचंद्राचार्य) प्रमाणमीमांसाजून 2020 InternetArchiveBot (प्रमाणमीमांसा) काव्यप्रकाश (काव्यप्रकाश) सिद्धहेम-व्याकरण में वाक्य-विन्यास-पद्धति का विश्लेषण (डॉ वसन्त भट्ट) Acharya Hemchandra by Madhya Pradesh Hindi Granth Academy The Rhythm of Poetry The Golden Mean and the Physics of Aesthetics अनेकार्थसङ्ग्रह अभिधानचिन्तामणि श्रेणी:संस्कृत आचार्य श्रेणी:भारतीय गणितज्ञ श्रेणी:वैयाकरण