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411 समाचार
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बागेश्वर का इतिहास

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पुरा कथाओं में भगवान शिव के बाघ रूप धारण करने वाले इस स्थान को व्याघ्रेश्वर तथा बागीश्वर से कालान्तर में बागेश्वर के रूप में जाना जाता है।बाघ और गाय बनकर इस संगम पर घूमते थे भगवान शिव और पार्वती http://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/mythological-facts-about-bagnath-temple-bageshwar 28 जून 2017 2016 अमर उजाला देहरादून https://web.archive.org/web/20171007170813/http://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/mythological-facts-about-bagnath-temple-bageshwar 7 अक्तूबर 2017 live शिव पुराण के मानस खंड के अनुसार इस नगर को शिव के गण चंडीश ने शिवजी की इच्छा के अनुसार बसाया था।शिव के गण चंडीश ने बसाया था इस नगर को, यहां है बागनाथ मंदिर http://www.livehindustan.com/news/astrology/article1-bageshwar-bagnath-temple-kumaon-713569.html?seq=2 28 जून 2017 2017 हिन्दुस्तान https://web.archive.org/web/20171007170234/http://www.livehindustan.com/news/astrology/article1-bageshwar-bagnath-temple-kumaon-713569.html?seq=2 7 अक्तूबर 2017 deadबागेश्वर में पार्वती के संग विराजते हैं भोलेनाथ http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/bageshwar-with-parvati-houses-the-bholenath 28 जून 2017 2017 अमर उजाला बागेश्वर https://web.archive.org/web/20171007170912/http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/bageshwar-with-parvati-houses-the-bholenath 7 अक्तूबर 2017 live स्कन्द पुराण के अन्तर्गत बागेश्वर माहात्म्य में सरयू के तट पर स्वयंभू शिव की इस भूमि को उत्तर में सूर्यकुण्ड, दक्षिण में अग्निकुण्ड के मध्य (नदी विशर्प जनित प्राकृतिक कुण्ड से) सीमांकित कर पापनाशक तपस्थली तथा मोक्षदा तीर्थ के रूप में धार्मिक मान्यता प्राप्त है। ऐतिहासिक रूप से कत्यूरी राजवंश काल से (७वीं सदी से ११वीं सदी तक) सम्बन्धित भूदेव का शिलालेख इस मन्दिर तथा बस्ती के अस्तित्व का प्राचीनतम गवाह है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन् १६०२ में राजा लक्ष्मी चन्द ने बागनाथ के वर्तमान मुख्य मन्दिर एवं मन्दिर समूह का पुनर्निर्माण कर इसके वर्तमान रूप को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।कत्यूर व चंद शासकों के काल में बनी ऐतिहासिक इमारतें हैं उपेक्ष‍ित http://www.jagran.com/uttarakhand/bageshwar-no-care-of-historical-buildings-at-bageshwar-16048260.html 28 जून 2017 2017 दैनिक जागरण बागेश्वर https://web.archive.org/web/20171007170413/http://www.jagran.com/uttarakhand/bageshwar-no-care-of-historical-buildings-at-bageshwar-16048260.html 7 अक्तूबर 2017 live उन्होंने बागेश्वर से पिण्डारी तक लगभग ४५ मील (७० किमी.) लम्बे अश्व मार्ग के निर्माण द्वारा दानपुर के सुदूर ग्राम्यांचल को पहुँच देने का प्रयास भी किया। स्वतंत्रता के १०० वर्ष पूर्व सन् १८४७ में इ. मडेन द्वारा बाह्य जगत को हिमालयी हिमनदों की जानकारी मिलने के बाद पिण्डारी ग्लेशियर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली और बागेश्वर विदेशी पर्यटकों एवं पर्वतारोहियों का विश्रामस्थल भी बना। १९वीं सदी के प्रारम्भ में बागेश्वर आठ-दस घरों की एक छोटी सी बस्ती थी। सन् १८६० के आसपास यह स्थान २००-३०० दुकानों एवं घरों वाले एक कस्बे का रूप धारण कर चुका था। मुख्य बस्ती मन्दिर से संलग्न थी। सरयू नदी के पार दुग बाजार और सरकारी डाक बंगले का विवरण मिलता है। एटकिन्सन के हिमालय गजेटियर में वर्ष १८८६ में इस स्थान की स्थायी आबादी ५०० बतायी गई है।एडविन टी. एटकिन्सन हिमालयी गजट 1973 काॅस्मो प्रकाषक दिल्ली https://books.google.co.in/books/about/The_Himalayan_gazetteer.html?id=GL-1AAAAIAAJ en 26 अक्तूबर 2017 https://web.archive.org/web/20180812151756/https://books.google.co.in/books/about/The_Himalayan_gazetteer.html?id=GL-1AAAAIAAJ 12 अगस्त 2018 live सरयू और गोमती नदी में दो बडे़ और मजबूत लकड़ी के पुलों द्वारा नदियों के आरपार विस्तृत ग्राम्यांचल के मध्य आवागमन सुलभ था। अंग्रेज लेखक ओस्लो लिखते है कि १८७१ में आयी सरयू की बाढ़ ने नदी किनारे बसी बस्ती को ही प्रभावित नहीं किया, वरन् दोनों नदियांे के पुराने पुल भी बहा दिये। फलस्वरूप १९१३ में वर्तमान पैदल झूला पुल बना। इसमें सरयू पर बना झूला पुल आज भी प्रयोग में है। गोमती नदी का पुल ७० के दशक में जीर्ण-क्षीर्ण होने के कारण गिरा दिया गया और उसके स्थान पर नया मोटर पुल बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व, सन् १९०५ में अंग्रेजी शासकों द्वारा टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन का सर्वेक्षण किया गया, जिसके साक्ष्य आज भी यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं।योगेश कुमार Rail ministry stalls Tanakpur-Bageshwar link project रेल मंत्रालय ने टनकपुर-बागेश्वर लिंक परियोजना पर रोक लगाई http://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/Rail-ministry-stalls-Tanakpur-Bageshwar-link-project/articleshow/48365047.cms 28 जून 2017 2015 टाइम्स ऑफ इंडिया en https://web.archive.org/web/20190113064116/https://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/Rail-ministry-stalls-Tanakpur-Bageshwar-link-project/articleshow/48365047.cms 13 जनवरी 2019 live विश्व युद्ध के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई और बाद के योजनाकारों द्वारा पूरी तरह विस्मृत कर दी गयी।टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का 1902 में हुआ था आगाज! http://hindi.pradesh18.com/news/uttarakhand/champawat/tanakpur-bageshwar-railway-line-was-opened-in-1902-1372405.html 28 जून 2017 https://web.archive.org/web/20160918112601/http://hindi.pradesh18.com/news/uttarakhand/champawat/tanakpur-bageshwar-railway-line-was-opened-in-1902-1372405.html 18 सितंबर 2016 dead १९८० के दशक में श्रीमती इंदिरा गांधी के बागेश्वर आगमन पर उन्हें इस रेलवे लाईन की याद दिलाई गई। अब जाकर, क्षेत्रीय जनता द्वारा किये गये लम्बे संघर्ष के उपरान्त आखिरकार टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन के सर्वेंक्षण को राष्ट्रीय रेल परियोजना के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। वर्ष १९२१ के उत्तरायणी मेले के अवसर पर कुमाऊँ केसरी बद्री दत्त पाण्डेय, हरगोविंद पंत, श्याम लाल साह, विक्टर मोहन जोशी, राम लाल साह, मोहन सिह मेहता, ईश्वरी लाल साह आदि के नेतृत्व में सैकड़ों आन्दोलनकारियों ने कुली बेगार के रजिस्टर बहा कर इस कलंकपूर्ण प्रथा को समाप्त करने की कसम इसी सरयू तट पर ली थी।कुली बेगार उन्मूलन का माध्यम बना उत्तरायणी मेला http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/Bageshwar-70475-114 28 जून 2017 2014 अमर उजाला बागेश्वर https://web.archive.org/web/20170906074828/http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/Bageshwar-70475-114 6 सितंबर 2017 live पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों का राष्ट्रीय आन्दोलन में यह योगदान था, जिससे प्रभावित हो कर सन् १९२९ में महात्मा गांधी स्वयं बागेश्वर पहुँचे।सुरेश पांडेय http://www.jagran.com/uttarakhand/bageshwar-13438992.html रक्तहीन क्रांति का मूक गवाह है सरयू बगड़ 28 जून 2017 2016 दैनिक जागरण बागेश्वर तभी विक्टर मोहन जोशी द्वारा उनके कर कमलों से स्वराज मंदिर का शिलान्यास भी करवाया गया। बींसवी सदी के प्रारम्भ में यहाँ औषधालय(१९०६) तथा डाकघर(१९०९) की तो यहाँ स्थापना हो गयी, तथापि शिक्षा का प्रसार यहाँ विलम्बित रहा। १९२६ में एक सरकारी स्कूल प्रारम्भ हुआ, जो १९३३ में जूनियर हाईस्कूल बना। आजादी के बाद १९४९ में स्थानीय निवासियों के प्रयास से विक्टर मोहन जोशी की स्मृति में एक प्राइवेट हाइस्कूल खुला, जो कि १९६७ में जा कर इण्टर कालेज बन सका। महिलाओं के लिए पृथक प्राथमिक पाठशाला ५० के दशक में खुली और पृथक महिला सरकारी हाईस्कूल १९७५ में। १९७४ में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा द्वारा राजकीय डिग्री कालेज का उद्घाटन किया गया।भगवान भूतनाथ की नगरी बागेश्वर: समय का कैलीडियोस्कोप http://www.nainitalsamachar.com/baba-bhutnath-ki-nagri-bageshwar/ 19 जून 2018 नैनीताल समाचार 7 फरवरी 2015 https://web.archive.org/web/20180613031113/http://www.nainitalsamachar.com/baba-bhutnath-ki-nagri-bageshwar/ 13 जून 2018 dead बालीघाट में स्थापित २५ किलोवाट क्षमता वाले जल विद्युत संयंत्र से उत्पादित बिजली से १९५१ में बागेश्वर पहली बार जगमगाया। वर्षा काल में नदियों में नदियों के गंदले पानी से निजात पाने के लिए टाउन एरिया गठन के उपरान्त राजकीय अनुदान तथा स्थानीय लोगों के श्रमदान से नगर में शुद्ध सार्वजनिक पेयजल प्रणाली का शुभारम्भ हुआ।Perspective Plan of Bageshwar District-2021 http://tcpomud.gov.in/divisions/erp/Bageshwar%20Report/introduction.pdf उत्तराखण्ड सरकार 28 जून 2017 en https://web.archive.org/web/20160911032826/http://tcpomud.gov.in/divisions/erp/Bageshwar%20Report/introduction.pdf 11 सितंबर 2016 dead १९५२ में अल्मोडा से वाया गरुड़ मोटर रोड बागेश्वर पहुँची। क्षेत्रीय निवासियों के श्रमदान से निर्मित बागेश्वर-कपकोट मोटर मार्ग में बस सेवा का संचालन १९५५-५६ के बाद प्रारम्भ हो पाया। १९६२ में चीन युद्ध के बाद सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बागेश्वर-पिथौरागढ़ सड़क १९६५ में बनकर तैयार हो गई। सत्तर के दशक में बागेश्वर से अल्मोड़ा के लिये वाया ताकुला एक वैकल्पिक रोड बनी तो अस्सी के दशक में बागेश्वर- चैंरा- दोफाड़ रोड पर आवागमन शुरू हुआ। तहसील मुख्यालय बनने के बाद तो आसपास गाँवों के लिये अनेक मोटर मार्गो का निर्माण प्रारम्भ हुआ। जनपद मुख्यालय बनने के उपरान्त तो नगर के समीपवर्ती भागों में स्थापित कार्यालयों, न्यायालय आदि के लिए भी सम्पर्क मार्ग बनने लगे। सन्दर्भ श्रेणी:उत्तराखण्ड का इतिहास