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तारीख-ए-मिर्जा
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तारीख-ए-मिर्जाتاریخ مرزا मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी ब्रिटिश राज उर्दू जीवनी, इतिहास, इस्लाम, तुलनात्मक धर्म, खंडन मतबा बरकी (अमृतसर) 1923
तारीख-ए-मिर्जा (उर्दू: تاریخ مرزا) उर्दू भाषा में लिखित एक प्रसिद्ध इस्लामी पुस्तक है, जिसके लेखक विख्यात इस्लामी विद्वान और अहल-ए-حدیث आंदोलन के नेता मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी हैं।Amritsari Sanaullah Khan Uzair Tareekh-e-Mirza: The Life and Times of Mirza Ghulam Ahmad Qadiani 2023 979-8374356120 यह पुस्तक मुख्य रूप से मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद (अहमदिया आंदोलन के संस्थापक) के जीवन, उनके दावों और उनके आंदोलन के आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए जानी जाती है।Tareekh-e-mirza https://archive.org/details/dli.ernet.435495 Matba Barqi (Amritsar) 22 December 2025 1923 हालांकि यह पुस्तक पूर्ण रूप से 1923 में प्रकाशित हुई थी, लेकिन इसके कुछ अंश 1905 के आसपास ही प्रकाशित होने लगे थे।
पृष्ठभूमि
20वीं सदी की शुरुआत में जब अविभाजित भारत के पंजाब क्षेत्र में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने स्वयं को 'मसीह' और 'नबी' घोषित किया, तब उनके और मुख्यधारा के मुस्लिम विद्वानों के बीच व्यापक विवाद शुरू हुआ। मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी उनके सबसे प्रमुख विरोधियों में से एक थे। उन्होंने मिर्ज़ा अहमद के दावों का खंडन करने के उद्देश्य से इस पुस्तक का संकलन किया।आज़मी सफीउर्रहमान फ़ितना-ए-क़ादियानियत और मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी 1979 इदारा अल-बुहूस अल-इस्लामिया 234
विषय-वस्तु
पुस्तक में मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों पर चर्चा की गई है:
भविष्यवाणियों का विश्लेषण: अमृतसरी ने तर्क दिया है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद द्वारा की गई प्रमुख भविष्यवाणियाँ (जैसे अब्दुल्ला आथम या डॉ. जॉन अलेक्जेंडर डॉवी के बारे में) वास्तविकता में सफल नहीं हुईं।
विरोधाभासी बयान: लेखक ने मिर्ज़ा अहमद की विभिन्न पुस्तकों से उद्धरण देकर उनके लेखन में मौजूद विरोधाभासों को दर्शाया है।
धार्मिक तर्क: इस्लामी शरिया के अनुसार 'खत्म-ए-नबुवत' (नबुवत की समाप्ति) की अवधारणा की व्याख्या करते हुए मिर्ज़ा अहमद के दावों को चुनौती दी गई है।
ऐतिहासिक विवरण: इसमें मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद की पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनके आंदोलन के शुरुआती चरणों का दस्तावेजीकरण किया गया है।
महत्वपूर्ण अध्याय: मुबाहला (प्रार्थना प्रतियोगिता)
पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा सनाउल्लाह और मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद के बीच हुए लंबे पत्राचार और चुनौतियों पर आधारित है। 15 अप्रैल 1907 को मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने एक विज्ञापन प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने सनाउल्लाह अमृतसरी को 'झूठा' बताते हुए अल्लाह से प्रार्थना की थी कि— "हम दोनों में से जो झूठा है, वह सच्चे व्यक्ति के जीवनकाल में ही मर जाए।" 1908 में मिर्ज़ा अहमद की मृत्यु हो गई, जबकि सनाउल्लाह अमृतसरी 1948 तक जीवित रहे। अमृतसरी के समर्थकों ने इसे उनके तर्कों की ऐतिहासिक जीत माना और इसे पुस्तक के बाद के संस्करणों में 'अंतिम फैसला' के रूप में जोड़ा गया।Aḥmad Ḵh̲ālid Shabbīr Tarikh i muhasabah yi Qadiyaniyyat 1979 Qirtis 27
प्रभाव
यह पुस्तक सुन्नी और अहल-ए-हदीस विद्वानों के बीच अहमदिया मत के खंडन के लिए एक बुनियादी स्रोत मानी जाती है। दूसरी ओर, अहमदिया समुदाय इस पुस्तक की सामग्री का विरोध करता है और दावा करता है कि इसमें दिए गए उद्धरण 'संदर्भ से बाहर' हैं।Muhammad Khawaja Khan Historical Documents: Qadiyani 2006 Urdu-Books
संदर्भ
श्रेणी:1923 की पुस्तकें
श्रेणी:उर्दू पुस्तकें
श्रेणी:सनाउल्लाह अमृतसरी की पुस्तकें
श्रेणी:इस्लामी साहित्य
श्रेणी:अहल-ए-हदीस