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इल्तुतमिश
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जून 2015 ,पुस्तक- एल पी शर्मा
शम्स-उद-दीन इल्तुत्मिश दिल्ली का सुल्तानबदायुं का राज्यपालनासिर अमीर-उल-मोमिनिन 200px| इल्तुतमिश का मकबरा १२१०-३० अप्रैल, १२३६ शम्स-उद-दीन इल्तुत्मिश आराम शाह रुक्नुद्दीन फ़िरोज़ शाह तुर्कान व अन्य नसीर-उद-दीन महमूद, रूकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह, रज़िया सुल्तान, मुइज़-उद-दीन बहराम बदायुं ममलूक सल्तनत (दिल्ली) ३० अप्रैल, १२३६ दिल्ली कुतुब मीनार परिसर, महरौली, दिल्ली इस्लाम
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत में शम्सी वंंश का एक प्रमुख शासक था। तुर्की-राज्य संस्थापक कुतुब-उद-दीन ऐबक के बाद वो उन शासकों में से था जिससे दिल्ली सल्तनत की नींव मजबूत हुई। वह ऐबक का दामाद भी था। उसने 1211 इस्वी से 1236 इस्वी तक शासन किया। राज्याभिषेक समय से ही अनेक तुर्क अमीर उसका विरोध कर रहे थे। खोखरों के विरुद्ध इल्तुतमिश की कार्य कुशलता से प्रभावित होकर मुहम्मद ग़ोरी ने उसे “अमीरूल उमरा” नामक महत्त्वपूर्ण पद दिया था। अकस्मात् मृत्यु के कारण कुतुबद्दीन ऐबक अपने किसी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर सका था। अतः लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने कुतुबद्दीन ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह (जिसे इतिहासकार नहीं मानते) को लाहौर की गद्दी पर बैठाया, परन्तु दिल्ली के तुर्की सरदारों एवं नागरिकों के विरोध के फलस्वरूप कुतुबद्दीन ऐबक के दामाद इल्तुतमिश, जो उस समय बदायूँ का सूबेदार था, को दिल्ली आमंत्रित कर राज्यसिंहासन पर बैठाया गया। आरामशाह एवं इल्तुतमिश के बीच दिल्ली के निकट जूड नामक स्थान पर संघर्ष हुआ, जिसमें आरामशाह को बन्दी बनाकर बाद में उसकी हत्या कर दी गयी और इस तरह ऐबक वंश के बाद इल्बारी वंश का शासन प्रारम्भ हुआ।
प्रतिद्वंदी
इल्तुतमिश के दो प्रमुख प्रतिद्वंदी थे - ताजु्ददीन यल्दौज तथा नासिरुद्दीन कुबाचा। ये दोनों गौरी के दास थे। यल्दौज दिल्ली के राज्य को ग़ज़नी का अंग भर मानता था और उसे गज़नी में मिलाने की भरपूर कोशिश करता रहता था जबकि ऐबक तथा उसके बाद इल्तुतमिश अपने आपको स्वतंत्र मानते थे। यल्दौज के साथ तराइन के मैदान में युद्ध किया जिसमें यल्दौज पराजित हुआ। उसकी हार के बाद गजनी के किसी शासक ने दिल्ली की सत्ता पर आपना दावा पेश नहीं किया।
कुबाचा ने पंजाब तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। सन् 1217 में उसने कुबाचा के विरूद्ध कूच किया। कुबाचा बिना युद्ध किये भाग गया। इल्तुतमिश उसका पीछा करते हुए मंसूरा नामक जगह पर पहुँचा जहाँ पर उसने कुबाचा को पराजित किया और लाहौर पर उसका कब्जा हो गया। पर सिंध, मुल्तान, उच्छ तथा सिन्ध सागर दोआब पर कुबाचा का नियंत्रण बना रहा।
इसी समय मंगोलों के आक्रमण के कारण इल्तुतमिश का ध्यान कुबाचा पर से तत्काल हट गया पर बाद में कुबाचा को एक युद्ध में उसने परास्त किया जिसके फलस्वरूप कुबाचा सिंधु नदी में डूब कर मर गया। चंगेज खाँ के आक्रमण के बाद उसने पूर्व की ओर ध्यान दिया और बिहार तथा बंगाल को अपने अधीन एक बार फिर से कर लिया।
वह एक कुशल शासक होने के अलावा कला तथा विद्या का प्रेमी भी था।
कठिनाइयों से सामना
left|thumb|इल्तुतमिश के अधीन दिल्ली सल्तनत का विस्तार
सुल्तान का पद प्राप्त करने के बाद इल्तुतमिश को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी प्रारम्भिक कठिनाई अनेक गद्दी के दावेदारों का होना था। जिनका बाद में ‘कुल्बी’ अर्थात् कुतुबद्दीन ऐबक के समय सरदार तथा ‘मुइज्जी’ अर्थात् मुहम्मद ग़ोरी के समय के सरदारों के विद्रोह का दमन किया। इल्तुमिश ने इन विद्रोही सरदारों पर विश्वास न करते हुए अपने 40 ग़ुलाम सरदारों का एक गुट या संगठन बनाया, जिसे ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी' का नाम दिया गया। इस संगठन को ‘चरगान’ भी कहा जाता है। इल्तुतमिश के समय में ही अवध में पिर्थू विद्रोह हुआ।
1215 से 1217 ई. के बीच इल्तुतमिश को अपने दो प्रबल प्रतिद्वन्द्धी 'एल्दौज' और 'नासिरुद्दीन क़बाचा' से संघर्ष करना पड़ा। 1215 ई. में इल्तुतमिश ने एल्दौज को पराजित किया। 1217 ई. में इल्तुतमिश ने कुबाचा से लाहौर छीन लिया तथा 1228 में उच्छ पर अधिकार कर कुबाचा से बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए कहा। अन्त में कुबाचा ने सिन्धु नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस तरह इन दोनों प्रबल विरोधियों का अन्त हुआ।
मंगोलों से बचाव
मंगोल आक्रमणकारी चंगेज़ ख़ाँ की बेटी से से जलालुद्दीन मुगबर्नी का प्रेमप्रसंग था जिसके के भय से भयभीत होकर ख्वारिज्म शाह का पुत्र 'जलालुद्दीन मुगबर्नी' वहां से भाग कर पंजाब की ओर आ गया। चंगेज़ ख़ाँ उसका पीछा करता हुए लगभग 1220-21 ई. में सिंध तक आ गया। उसने इल्तुतमिश को संदेश दिया कि वह मंगबर्नी की मदद न करें। यह संदेश लेकर चंगेज़ ख़ाँ का दूत इल्तुतमिश के दरबार में आया। इल्तुतमिश ने मंगोल जैसे शक्तिशाली आक्रमणकारी से बचने के लिए मंगबर्नी की कोई सहायता नहीं की। मंगोल आक्रमण का भय 1228 ई. में मंगबर्नी के भारत से वापस जाने पर टल गया। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद अली मर्दान ने बंगाल में अपने को स्वतन्त्र घोषित कर लिया तथा 'अलाउद्दीन' की उपाधि ग्रहण की। दो वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका पुत्र 'हिसामुद्दीन इवाज' उत्तराधिकारी बना। उसने 'ग़यासुद्दीन आजिम' की उपाधि ग्रहण की तथा अपने नाम के सिक्के चलाए और खुतबा (उपदेश या प्रशंसात्मक रचना) पढ़वाया।
विजय अभियान
1225 में इल्तुतमिश ने बंगाल में स्वतन्त्र शासक 'गियासुद्दीन इवाज़ शाह' के विरुद्ध अभियान छेड़ा। इवाज ने बिना युद्ध के ही उसकी अधीनता में शासन करना स्वीकार कर लिया, पर इल्तुतमिश के पुनः दिल्ली लौटते ही उसने फिर से विद्रोह कर दिया। इस बार इल्तुतमिश के पुत्र नसीरूद्दीन महमूद ने 1226 ई. में लगभग उसे पराजित कर लखनौती पर अधिकार कर लिया। दो वर्ष के उपरान्त नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद मलिक इख्तियारुद्दीन बल्का ख़लजी ने बंगाल की गद्दी पर अधिकार कर लिया। 1230 ई. में इल्तुतमिश ने इस विद्रोह को दबाया। संघर्ष में बल्का ख़लजी मारा गया और इस बार एक बार फिर बंगाल दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया। 1226 ई. में इल्तुतमिश ने रणथंभौर पर तथा 1227 ई. में परमरों की राजधानी मन्दौर पर अधिकार कर लिया। नागदा को लेकर इल्तुतमिश व मेवाड़ के जैत्र सिंह के बीच 1227 ई. में भूताला का युद्ध लड़ा गया,
चीरवा का शिलालेख (1273 ई. / विक्रम संवत 1330):
रावल समरसिंह के शासनकाल में नागदा के समीप उत्कीर्ण यह अभिलेख मेवाड़ के इतिहास की सर्वाधिक प्रामाणिक कड़ी है। यह शिलालेख इल्तुतमिश (तुर्क सेना) द्वारा नागदा पर किए गए आक्रमण, नगर के दहन तथा उसकी रक्षा में मेवाड़ी योद्धाओं के बलिदान का स्पष्ट विवरण देता है।
'हम्मीरमदमर्दन' (जयसिंह सूरि, रचनाकाल: 1220–1230 ई.):
यह संस्कृत नाटक इस युद्ध का सबसे निकटतम समकालीन साहित्यिक प्रमाण है। इसमें 'हम्मीर' (अमीर का अपभ्रंश) शब्द सुल्तान इल्तुतमिश के लिए और 'मदमर्दन' का अर्थ उसके सैन्य अहंकार के विनाश के लिए प्रयुक्त हुआ है. मदन एवं बालक का बलिदान:
चीरवा शिलालेख के अनुसार, नागदा के 'तलारक्ष' (कोतवाल/नगर रक्षक) योगराज के पुत्र मदन तथा उनके वीर पुत्र बालक (बालाक) ने तुर्क सेना के विरुद्ध नागदा के मुख्य फाटकों पर अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।
सत्ता के केंद्र का स्थानांतरण:
नागदा के समतल क्षेत्र में स्थित होने के कारण वह भविष्य के भारी घुड़सवार आक्रमणों के लिए असुरक्षित था। इसी रणनीतिक विफलता को देखते हुए रावल जैत्रसिंह ने सत्ता का केंद्र अरावली की पर्वतमाला पर स्थित सुदृढ़ दुर्ग चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) में स्थाई रूप से स्थानांतरित कर दिया। भूताला का 'गुरिल्ला ट्रैप' एवं सैन्य रणनीति नागदा के विनाश के पश्चात रावल जैत्रसिंह ने सीधे मैदानी युद्ध के स्थान पर सामरिक रूप से पीछे हटने (Feigned Retreat) का मार्ग चुना।
"सच्ची सैन्य कुशलता शत्रु को उसकी इच्छा के विपरीत प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों में खींचकर पराजित करने में निहित है।"
अरावली का दर्रा:जीत के नशे में चूर सुल्तानी सेना मेवाड़ी बलों का पीछा करते हुए नागदा और गोगुंदा के मध्य स्थित 'भूताला की संकरी घाटी' में प्रवेश कर गई।
छापामार प्रहार:
भूताला का दर्रा अत्यंत संकरा था, जहाँ तुर्कों की भारी अश्वसेना के लिए मुड़ना या युवरचना बनाना असंभव था। पहाड़ियों पर पहले से तैनात मेवाड़ी छापामार टुकड़ियों एवं स्थानीय भील धनुर्धरों ने ऊपर से पत्थरों व बाणों की भीषण बौछार की, जिससे सुल्तानी सेना में भगदड़ मच गई और वे आपस में ही कुचलकर नष्ट होने लगे।
वाघेला कूटनीति एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध 'हम्मीरमदमर्दन' के अनुसार, रावल जैत्रसिंह ने इस युद्ध में केवल सैन्य बल का प्रयोग नहीं किया, बल्कि गुजरात के वाघेला शासक वीरधवल तथा उनके चतुर मंत्रियों—वस्तुपाल एवं तेजपाल के साथ मिलकर एक कूटनीतिक चक्रव्यूह रचा। इल्तुतमिश के शिविर में यह गुप्त सूचना पहुँचाई गई कि गुजरात की चालुक्य-वाघेला सेना एक विशाल दल के साथ मेवाड़ की सहायता हेतु पीछे से आक्रमण करने आ रही है। आगे अरावली की घाटी में फँसने और पीछे से घिरने के मनोवैज्ञानिक खौफ ने तुर्क सेना के मनोबल को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
सुल्तान का पलायन एवं रसद संकट द्विपक्षीय दबाव और घाटी में हुए भीषण संहार के कारण सुल्तान इल्तुतमिश अपनी बची-कुची सेना के साथ दिल्ली की ओर भाग खड़ा हुआ। पर्वतीय क्षेत्र में रसद सामग्री ) समाप्त हो जाने के कारण, भूख से बेहाल भागती हुई सुल्तानी सेना ने अपने ही नियंत्रण वाले क्षेत्रों (आहड़ व आसपास के गांवों) में लूटपाट की.
1231 ई. में इल्तुतमिश ने ग्वालियर के क़िले पर घेरा डालकर वहाँ के शासक मंगलदेव को पराजित किया। 1233 ई. में चंदेलों के विरुद्ध एवं 1234-35 ई. में उज्जैन एवं भिलसा के विरुद्ध उसका अभियान सफल रहा।
वैध सुल्तान एवं उपाधि
इल्तुतमिश के नागदा के गुहिलौतों और गुजरात चालुक्यों पर किए गए आक्रमण विफल हुए। इल्तुतमिश का अन्तिम अभियान बामियान के विरुद्ध हुआ। फ़रवरी, 1229 में बग़दाद के ख़लीफ़ा से इल्तुतमिश को सम्मान में ‘खिलअत’ एवं प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। ख़लीफ़ा ने इल्तुतमिश की पुष्टि उन सारे क्षेत्रों में कर दी, जो उसने जीते थे। साथ ही ख़लीफ़ा ने उसे 'सुल्तान-ए-आजम' (महान शासक) की उपाधि भी प्रदान की। प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बाद इल्तुतमिश वैध सुल्तान एवं दिल्ली सल्तनत एक वैध स्वतन्त्र राज्य बन गई। इस स्वीकृति से इल्तुतमिश को सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाने और दिल्ली के सिंहासन पर अपनी सन्तानों के अधिकार को सुरक्षित करने में सहायता मिली। खिलअत मिलने के बाद इल्तुतमिश ने ‘नासिर अमीर उल मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की।
सिक्कों का प्रयोग
इल्तुतमिश पहला तुर्क सुल्तान था, जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाये। उसने सल्तनत कालीन दो महत्त्वपूर्ण सिक्के 'चाँदी का टका' (लगभग 175 ग्रेन) तथा 'तांबे' का ‘जीतल’ चलवाया। इल्तुतमिश ने सिक्कों पर टकसाल के नाम अंकित करवाने की परम्परा को आरम्भ किया। सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपना उल्लेख ख़लीफ़ा के प्रतिनिधि के रूप में किया है। ग्वालियर विजय के बाद इल्तुतमिश ने अपने सिक्कों पर कुछ गौरवपूर्ण शब्दों को अंकित करवाया, जैसे “शक्तिशाली सुल्तान”, “साम्राज्य व धर्म का सूर्य”, “धर्मनिष्ठों के नायक के सहायक”। इल्तुतमिश ने ‘इक्ता व्यवस्था’ का प्रचलन किया और राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानान्तरित किया।
मृत्यु
बामियान अभियान पर आक्रमण करने के लिए जाते समय मार्ग में इल्तुतमिश बीमार हो गया। इसके बाद इल्तुतमिश की बीमारी बढती गई। अन्ततः 30 अप्रैल 1236 में उसकी मृत्यु हो गई। इल्तुतमिश प्रथम सुल्तान था, जिसने दोआब के आर्थिक महत्त्व को समझा था और उसमें सुधार किया था।
रज़िया को उत्तराधिकार
रज़िया सुल्तान इल्तुतमिश की पुत्री तथा भारत की पहली मुस्लिम शासिका थी। अपने अंतिम दिनों में इल्तुतमिश अपने उत्तराधिकार के सवाल को लेकर चिन्तित था। इल्तुतमिश के सबसे बड़े पुत्र नसीरूद्दीन महमूद की, जो अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल पर शासन कर रहा था, 1229 ई. को अप्रैल में मृत्यु हो गई। सुल्तान के शेष जीवित पुत्र शासन कार्य के किसी भी प्रकार से योग्य नहीं थे। अत: इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु शैय्या पर से अपनी पुत्री रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
निर्माण कार्य
स्थापत्य कला के अन्तर्गत इल्तुतमिश ने कुतुबुद्दीन ऐबक के निर्माण कार्य (कुतुबमीनार) को पूरा करवाया। भारत में सम्भवतः पहला मक़बरा निर्मित करवाने का श्रेय भी इल्तुतमिश को दिया जाता है। इल्तुतमिश ने बदायूँ की जामा मस्जिद एवं नागौर में अतारकिन के दरवाज़ा का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली में एक विद्यालय की स्थापना की। इल्तुतमिश का मक़बरा दिल्ली में स्थित है, जो एक कक्षीय मक़बरा है।
आराम शाह ममलूक वंश 1206–1290 रूकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह
आराम शाह दिल्ली के सुल्तान 1211–1236 रूकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह
श्रेणी:ग़ुलाम वंश
श्रेणी:१३वीं शताब्दी के भारतीय शासक