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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

तिलका माँझी

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बाबा तिलका माँझी ᱵᱟᱵᱟ ᱛᱤᱞᱠᱟᱹ ᱢᱟᱡᱷᱤ ᱢᱩᱨᱢᱩ 11 फरवरी 1750 से 13 जनवरी 1785 220px जबरा पहाड़िया सुल्तानगंज, बिहार, ब्रिटिश भारत भागलपुर, बिहार, ब्रिटिश भारत माँझी/ पहाड़ियां विद्रोह (1784) भारतीय तिलका माँझी (संथाल:ᱵᱟᱵᱟ ᱛᱤᱞᱠᱟᱹ ᱢᱟᱡᱷᱤ ᱢᱩᱨᱢᱩ) (11 फ़रवरी 1750 - 13 जनवरी 1785) तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया। इनमें सबसे लोकप्रिय तिलका मांझी हैं। https://en.wikipedia.org/wiki/User:Brajesh_verma  https://web.archive.org/web/20150623065637/https://en.wikipedia.org/wiki/User:Brajesh_verma 23 जून 2015 http://www.jagran.com/bihar/bhagalpur-7672393.html संग्रहीत प्रति 12 फ़रवरी 2015 https://web.archive.org/web/20170227154839/http://www.jagran.com/bihar/bhagalpur-7672393.html 27 फ़रवरी 2017 live परिचय तिलका मुर्मू (तिलका मांझी) भारत में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले माल पहाड़ियां के वीर आदिवासी थे। सिंगारसी पहाड़, पाकुड़ के जबरा पहाड़िया http://www.jagran.com/jharkhand/sahibganj-8806138.html https://web.archive.org/web/20210423180201/https://www.jagran.com/jharkhand/sahibganj-8806138.html 23 अप्रैल 2021   उर्फ तिलका मांझी के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म 11 फ़रवरी 1750 ई. में हुआ था। 1771 से 1784 तक उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबी और कभी न समर्पण करने वाली लड़ाई लड़ी और स्थानीय महाजनों-सामंतों व अंग्रेजी शासक की नींद उड़ाए रखा। पहाड़िया लड़ाकों में सरदार रमना अहाड़ी और अमड़ापाड़ा प्रखंड (पाकुड़, संताल परगना) के आमगाछी पहाड़ निवासी करिया पुजहर और सिंगारसी पहाड़ निवासी जबरा पहाड़िया भारत के आदिविद्रोही हैं। दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है। भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय पहाड़िया आदिम आदिवासी समुदाय के लड़ाकों को जाता हैं जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिया। https://books.google.co.in/books?id=QPMSBgAAQBAJ&pg=PA27&lpg=PA27&dq=%E2%80%98%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%B2+%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A5%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E2%80%99&source=bl&ots=H7P-TVjIjO&sig=a9HKI5VtFN2U0qkXWbsXAQBFKX8&hl=en&sa=X&ei=0kTdVO3vDYiMuATa3YCACw&ved=0CEYQ6AEwBQ#v=onepage&q=%E2%80%98%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%B2%20%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A5%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E2%80%99&f=false संग्रहीत प्रति 13 फ़रवरी 2015 https://web.archive.org/web/20150213042203/https://books.google.co.in/books?id=QPMSBgAAQBAJ&pg=PA27&lpg=PA27&dq=%E2%80%98%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%B2+%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A5%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E2%80%99&source=bl&ots=H7P-TVjIjO&sig=a9HKI5VtFN2U0qkXWbsXAQBFKX8&hl=en&sa=X&ei=0kTdVO3vDYiMuATa3YCACw&ved=0CEYQ6AEwBQ#v=onepage&q=%E2%80%98%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%B2%20%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A5%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E2%80%99&f=false 13 फ़रवरी 2015 live इन पहाड़िया लड़ाकों में सबसे लोकप्रिय आदिविद्रोही जबरा या जौराह पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हैं। इन्होंने 1778 ई. में पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों को खदेड़ कर कैंप को मुक्त कराया। 1784 में जबरा ने क्लीवलैंड को मार डाला। बाद में आयरकुट के नेतृत्व में जबरा की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ जिसमें कई लड़ाके मारे गए और जबरा को गिरफ्तार कर लिया गया। कहते हैं उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया। पर मीलों घसीटे जाने के बावजूद वह पहाड़िया लड़ाका जीवित था। खून में डूबी उसकी देह तब भी गुस्सैल थी और उसकी लाल-लाल आंखें ब्रितानी राज को डरा रही थी। भय से कांपते हुए अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष पर सरेआम लटका कर उनकी जान ले ली। हजारों की भीड़ के सामने जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। तारीख थी संभवतः 13 जनवरी 1785। बाद में आजादी के हजारों लड़ाकों ने जबरा पहाड़िया का अनुसरण किया और फांसी पर चढ़ते हुए जो गीत गाए - हांसी-हांसी चढ़बो फांसी ...! - वह आज भी हमें इस आदिविद्रोही की याद दिलाते हैं। पहाड़िया समुदाय का यह गुरिल्ला लड़ाका एक ऐसी किंवदंती है जिसके बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज सिर्फ नाम भर का उल्लेख करते हैं, पूरा विवरण नहीं देते। लेकिन पहाड़िया समुदाय के पुरखा गीतों और कहानियों में इसकी छापामार जीवनी और कहानियां सदियों बाद भी उसके आदिविद्रोही होने का अकाट्य दावा पेश करती हैं। तिलका माँझी उर्फ जबरा पहाड़िया विवाद तिलका मांझी संताल थे या पहाड़िया इसे लेकर विवाद है। http://timesofindia.indiatimes.com/city/ranchi/Two-tribes-in-tiff-over-Tilka-Manjhis-legacy/articleshow/30330250.cms https://web.archive.org/web/20140217014412/http://timesofindia.indiatimes.com/city/ranchi/Two-tribes-in-tiff-over-Tilka-Manjhis-legacy/articleshow/30330250.cms 17 फ़रवरी 2014 आम तौर पर तिलका मांझी को मुर्मू टोटेल का बताते हुए अनेक लेखकों ने उन्हें संताल आदिवासी बताया है। तिलका मांझी के पिता का नाम सुंदरा मुर्मू और माता का नाम पानो मुर्मू थे। सुंदरा मुर्मू तिलकपुर गांव के ग्राम प्रधान (आतु मांझी) थे और तिलका मुर्मू के माता पानो मुर्मू गृहणी थी। उनके पिता और माता के नाम से साफ पता चलता है तिलका मांझी संथाल परिवार में जन्मे एक संथाल आदिवासी समुदाय के थे। तिलका मांझी (मुर्मू) का जन्म 11फरवरी 1750 को हुआ है। बिहार के सुल्तानगंज, भागलपुर क्षेत्र में पहाड़िया जनजाति के लोगों का भी निवास थे, तिलका मांझी संथाल और उन पहाड़िया जनजाति के बीच में रहकर पले बढ़े हैं, इसीलिए ही कुछ गैर आदिवासी इतिहासकारों को लगता है तिलका मांझी पहाड़िया जनजाति के है। संतालों का लिखित इतिहास अधिक नहीं है लेकिन फिर भी संतालों को याद है अपना गुजारा हुआ इतिहास कितना पुराना है। तिलका मांझी संतालों के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने में कभी पीछे नहीं हटे है। संताल एवं आदिवासी समुदाय में इतिहासकारों की कमी होने के कारण दूसरे जाति समुदाय के इतिहासकारों द्वारा इस संथाल समुदाय के इतिहास को तोड़ मरोड़ा जा रहा है इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया जा रहा है, इसलिए ही तिलका मांझी को पहाड़िया जनजाति के साथ कुछ इतिहासकारों द्वारा जोड़ा जा रहा है जो गलत जानकारी है। मांझी और मुर्मू सरनेम संतालों का है और तिलका, पानो और सुंदरा नाम भी अभी भी संतालों के बीच मौजूद हैं। तिलका मांझी का असली नाम तिलका मुर्मू है जबरा पहाड़िया नहीं। तिलका मांझी संतालो के बीच काफी लोकप्रिय है और उनका पुजा भी किया जाता है लेकिन पहाड़िया जनजाति के लोग तिलका मांझी का पुजा पाठ या कोई अन्य उनके नाम पर समारोह आयोजित नहीं देखने को मिलता है। संथालों के अनेकों लोक गीतों में उनका नाम है। और रही बात इतिहास की तो भारत देश मे सदैव उच्च जाति और पैसे वालों के आगे झुकता रहा है। शुरू में संतालों का स्थाई निवास स्थान नहीं था, स्थाई नहीं होने का कारण संतालों को दूसरे जाति समुदाय के लोगों द्वारा अनेकों स्थानों से भागाया जाता रहा है। झारखंड प्रदेश में सर्वप्रथम गिरिडीह जिला (शिर दिशोम शिखर दिशोम) क्षेत्र में प्रवेश किया। धीरे धीरे जनसंख्या बढ़ने लगे और संतालों का क्षेत्र भी बढ़ने लगे। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार संताल आदिवासी समुदाय के लोग 1770 के अकाल के कारण 1790 के बाद संताल परगना की तरफ आए और बसे। लेकिन संताल (आगील हापड़ाम कोवा काथा) इतिहास के आधार पर संताल सर्वप्रथम वर्तमान झारखंड के उत्तर पूर्व क्षेत्र तथा वर्तमान बिहार राज्य के दक्षिण क्षेत्र में निवास करते थे। अंग्रेज शासन के पहले संताल अपने को होड़ कहते थे। संतालों के लिए संताल शब्द अंग्रेजों के समय आया है। संताल का मूल शब्द है सांवता. सांवता का अर्थ होता है साथ साथ रहना। कलांतर में इनका शब्द सांवता से सांवताल, सांवतार, संताल, सांतार, सांथाल, संताड़ होने लगा। The Annals of Rural Bengal, Volume 1, 1868 By Sir William Wilson Hunter (page no 219 to 227) में साफ लिखा है कि संताल लोग बीरभूम से आज के सिंहभूम की तरफ निवास करते थे। 1790 के अकाल के समय उनका माइग्रेशन आज के संताल परगना तक हुआ। हंटर ने लिखा है, ‘1792 से संतालों नया इतिहास शुरू होता है’ (पृ. 220)। 1838 तक संताल परगना में संतालों के 40 गांवों के बसने की सूचना हंटर देते हैं जिनमें उनकी कुल आबादी 3000 थी (पृ. 223)। हंटर यह भी बताता है कि 1847 तक मि. वार्ड ने 150 गांवों में करीब एक लाख संतालों को बसाया (पृ. 224)। http://books.google.co.in/books?id=W1kOAAAAQAAJ&printsec=frontcover&source=gbs_ge_summary_r&cad=0#v=onepage&q&f=false https://web.archive.org/web/20150213034311/http://books.google.co.in/books?id=W1kOAAAAQAAJ&printsec=frontcover&source=gbs_ge_summary_r&cad=0#v=onepage&q&f=false 13 फ़रवरी 2015 1910 में प्रकाशित ‘बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना’, वोल्यूम 13 में एल.एस.एस. ओ मेली ने लिखा है कि जब मि. वार्ड 1827 में दामिने कोह की सीमा का निर्धारण कर रहा था तो उसे संतालों के 3 गांव पतसुंडा में और 27 गांव बरकोप में मिले थे। वार्ड के अनुसार, ‘ये लोग खुद को सांतार कहते हैं जो सिंहभूम और उधर के इलाके के रहने वाले हैं।’ (पृ. 97) दामिनेकोह में संतालों के बसने का प्रामाणिक विवरण बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना के पृष्ठ 97 से 99 पर उपलब्ध है। https://books.google.co.in/books?id=RdyjG9DYVLsC&printsec=frontcover&dq=bengal+district+gazetteers&hl=en&sa=X&ei=vz3dVMzmHI2vuQSL14LYBw&ved=0CBwQ6AEwAA#v=onepage&q=bengal%20district%20gazetteers&f=false https://web.archive.org/web/20150213034329/https://books.google.co.in/books?id=RdyjG9DYVLsC&printsec=frontcover&dq=bengal+district+gazetteers&hl=en&sa=X&ei=vz3dVMzmHI2vuQSL14LYBw&ved=0CBwQ6AEwAA#v=onepage&q=bengal%20district%20gazetteers&f=false 13 फ़रवरी 2015 इसके अतिरिक्त आर. कार्सटेयर्स जो 1885 से 1898 तक संताल परगना का डिप्टी कमिश्नर रहा था, उसने अपने उपन्यास ‘हाड़मा का गांव’ (Harmawak Ato) की शुरुआत ही पहाड़िया लोगों के इलाके में संतालों के बसने के तथ्य से की है। संतालों का अपना इतिहासकारों की कमी के कारण इतिहास को सही सही नहीं लिखा गया है, संताल को पहले अपने आप को होड़ से संबंधित होते थे, अंग्रेजों द्वारा संतालों को जब होड़ से संताल में परिवर्तन किया गया और अपना दस्तावेजों में लिखना प्रारम्भ किया तब के बाद से संतालों का इतिहास देखने को मिलता है।http://www.dli.gov.in/cgi-bin/metainfo.cgi?&title1=Harmawak%27%20Ato&author1=Carstairs%2C%20R.&subject1=Literature&year=1946%20&language1=english&pages=488&barcode=4990010015831&author2=&identifier1=VB%20Librarian&publisher1=The%20Printing%20House%2CCalcutta&contributor1=&vendor1=NONE&scanningcentre1=C-DAC%2C%20Kolkata&slocation1=NONE&sourcelib1=CENTRAL%20LIBRARY%2C%20VISVA-BHARATI&scannerno1=0&digitalrepublisher1=Digital%20Library%20Of%20India&digitalpublicationdate1=2010-08-23&numberedpages1=&unnumberedpages1=&rights1=In%20Public%20Domain&copyrightowner1=&copyrightexpirydate1=&format1=Tagged%20Image%20File%20Format%20&url=%2Fdata8%2Fupload%2F0212%2F123 संग्रहीत प्रति 14 जून 2020 https://web.archive.org/web/20150923215417/http://www.dli.gov.in/cgi-bin/metainfo.cgi?&title1=Harmawak%27%20Ato&author1=Carstairs%2C%20R.&subject1=Literature&year=1946%20&language1=english&pages=488&barcode=4990010015831&author2=&identifier1=VB%20Librarian&publisher1=The%20Printing%20House%2CCalcutta&contributor1=&vendor1=NONE&scanningcentre1=C-DAC%2C%20Kolkata&slocation1=NONE&sourcelib1=CENTRAL%20LIBRARY%2C%20VISVA-BHARATI&scannerno1=0&digitalrepublisher1=Digital%20Library%20Of%20India&digitalpublicationdate1=2010-08-23&numberedpages1=&unnumberedpages1=&rights1=In%20Public%20Domain&copyrightowner1=&copyrightexpirydate1=&format1=Tagged%20Image%20File%20Format%20&url=%2Fdata8%2Fupload%2F0212%2F123 23 सितंबर 2015 dead साहित्य में जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास 'शालगिरर डाके' की रचना की है। अपने इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी को मुर्मू गोत्र का संताल आदिवासी बताया है। यह उपन्यास हिंदी में 'शालगिरह की पुकार पर' नाम से अनुवादित और प्रकाशित हुआ है। https://books.google.co.in/books?id=ckreepb_i5AC&printsec=frontcover&dq=Mahasweta+Devi+google+books&hl=en&sa=X&ei=vkndVPOXOojiuQSCj4LACw&ved=0CCIQ6AEwATgK#v=onepage&q&f=false https://web.archive.org/web/20150213041331/https://books.google.co.in/books?id=ckreepb_i5AC&printsec=frontcover&dq=Mahasweta+Devi+google+books&hl=en&sa=X&ei=vkndVPOXOojiuQSCj4LACw&ved=0CCIQ6AEwATgK#v=onepage&q&f=false 13 फ़रवरी 2015 हिंदी के उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने जबकि अपने उपन्यास ‘हूल पहाड़िया’ में तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है। ‘हूल पहाड़िया’ उपन्यास 2012 में प्रकाशित हुआ है। हुल पहाड़िया (उपन्यास) / लेखक – राकेश कुमार सिंह / सामयिक बुक्स, नई दिल्ली तिलका मांझी के नाम पर भागलपुर में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय नाम से एक शिक्षा का केंद्र स्थापित किया गया है। हिंदी के उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास हूल पहाड़िया मैं तिलका मांझी को जाबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है। इन्हें भी देखें झारखंड झारखंड आंदोलन सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ संथाल परगना में पहाड़िया राज का इतिहास नेपथ्य का नायक – तिलका मांझी, राकेश बिहारी जंगलतरी में तिलका मांझी का विद्रोह (1783-84)जून 2020 InternetArchiveBot तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय श्रेणी:आदिवासी श्रेणी:भारतीय (आदिवासी) श्रेणी:झारखंड श्रेणी:भागलपुर