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राई भाषा
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अंगूठाकार|पूर्वी नेपाल के प्रांत संख्या 1 में कई राई भाषाएँ बोली जातीं हैं। इनमें बंटावा, चामलिंग, कुलुंग, थुलुंग, अठपहाड़िया, डुंगमाली, लोहोरुंग, याम्फू, मेवाहांग, सम्पांग, जेरुंग, बहिंग, तिलुंग, वाम्बुले, डुमी, पुमा, छिलिंग, फांगदुवाली, छिंतांग, नाछिरिंग और कोइयू शामिल हैं।
राई भाषा से आशय इन सभी से हैः
राई भाषाएँ या किरांती भाषाएँ, नेपाल, भारत और भूटान में राई लोग द्वारा बोली जाने वाली चीनी-तिब्बती भाषाओं का एक परिवार है।
बंटावा भाषा, नेपाल, दार्जिलिंग, सिक्किम, कलिम्पोंग और भूटान में बोली जाने वाली एक किरांती भाषा, नेपाल और दार्जिलिंग, सिक्कम, कलिम्पंग और दक्षिणी भूटान के कुछ हिस्सों में बोली जाने वाला एक किरांती भाषाव थुलुन्ग भाषा, नेपाल के कुछ हिस्सों और सिक्किम के कुछ हिस्सों, नेपाल के पूर्वी भाग में बोली जाने वाले किरांती भाषा बहिंंग भाषा, विशेष रूप से ओखालढुंगा और सलुखुंबु जिलों में बोली जानेवाली एक किरांती। खोटांग और तेरहाथुम में कुछ बहिंग समुदाय हैं। खालिंग भाषा, एक किरांती भाषा जो सोलुकुंबु जिले के उत्तरी भाग में बोली जाती है, कुलुंग भाषा, सोलुकुंबु ज़िले के उत्तर-पश्चिम भाग में बोली जाने वाली एक किरांती भाष है।
बंटावा भाषा, नेपाल, दार्जिलिंग, सिक्किम, कलिम्पोंग और भूटान में बोली जाने वाली एक किरांती भाषा है
चामलिंग भाषा, नेपाल और दार्जिलिंग, सिक्किम, कलिम्पोंग और दक्षिणी भूटान के कुछ हिस्सों में बोली जाने वाली एक किरांती भाषा है
थुलुंग भाषा, नेपाल और सिक्किम के कुछ हिस्सों में बोली जाने वाली एक किरांती भाषा
बहिंग भाषा, नेपाल के पूर्वी भाग, विशेष रूप से ओखालढुंगा और सोलुखुंबू जिलों में बोली जाने वाली एक किरांती भाषा है। खोटांग और तेरहाथुम में कुछ बहिंग समुदाय हैं।
खालिंग भाषा, एक किरांती भाषा है जो सोलुकुंबु जिले के उत्तरी भाग में बोली जाती है
कुलुंग भाषा, एक किरांती भाषा है जो सोलुकुंबु जिले के उत्तर-पश्चिम भाग में बोली जाती है।
किरात राई भाषाओं का विस्तार नेपाल के पूर्वी पहाड़ी जिलों में है। इन भाषाओं के बोलने वालों का पारंपरिक मुख्य निवास ओखलढुंगा, उदयपुर, सोलुखुम्बु, खोटाङ, भोजपुर, संखुवासभा, धनकुटा, सुनसरी, मोरङ, झापा, तेह्रथुम, इलाम, पाँचथर रहे हैं। इसी प्रकार भारत के दार्जीलिंग, सिक्किम, आसाम आदि स्थानों पर राई भाषाएं बोली जाती हैं।
भाषाई विशेषताएँ और पहचान
इन राई भाषाओं की विशेषता और पहचान को भाषाविदों ने अनुसंधान का विषय बनाया है। उनके अनुसार एक मूल जड़ से ही इन भाषाओं का विकास हुआ हो सकता है।
भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से भाषाओं की लेखन परंपरा शुरू करते समय उन भाषाओं का वर्ण निर्धारण पहला कदम होता है। किरात राई भाषाओं के अंतर्गत सन् 2010/11 में लोहोरुङ और दुङमाली भाषा के वर्ण निर्धारण 'आदिवासी जनजाति उत्थान प्रतिष्ठान' के सहयोग से भाषाविदों ने कर दिए हैं। प्रा. डा. माधवप्रसाद पोखरेल के नेतृत्व में न केवल किरात राई भाषाओं का, बल्कि नेपाल की कई भाषाओं (50 के आसपास) का वर्ण निर्धारण हुआ है। अभी भी कुछ किरात राई भाषाओं का वर्ण निर्धारण होना बाकी है। कई किरात राई भाषाओं को वर्ण निर्धारण किए बिना ही लिखना शुरू कर दिया गया है। इसके कारण उन भाषाओं में खस नेपाली भाषा का प्रभाव अधिक पड़ने की संभावना दिखाई देती है।
किरात राई भाषा-भाषी समूह
१. खालिङ
अन्य किरात राईयों की तुलना में खालिङों का निवास उत्तरी और उच्च भूभाग में पाया जाता है। 'ख्याल व्रा' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले खालिङ राई सोलु जिले के जुविंग, काँकु, बासा, टाक्सिन्धु, वाकु, पावै गा.वि.स. (ग्राम विकास समिति) में मुख्य रूप से और देश के अन्य भागों में भी निवास करते हैं।
२. कुलुङ
कुलुङ-रिंग के रूप में उल्लेख की जाने वाली यह भाषा बोलने वाले कुलुङ सोलु जिले के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र- बुंग, छेस्काम, गुदेल, पावै, सोतांग गा.वि.स., संखुवासभा के उत्तर पश्चिमी भाग- बाना, माङतेवा, मकालु, मच्छेपोखरी, पावाखोला, ताम्कु, याफु गा.वि.स. में, भोजपुर जिले के उत्तरी भाग- चौकीडाँडा, दोभाने, खार्तम्छा, खाताम्मा आदि में मुख्य रूप से तथा देश के अन्य भागों में निवास करते हैं।
३. थुलुङ
'थुलुङला' अथवा 'थुलुङलो' यह भाषा बोलने वाले थुलुङ सोलु जिले के देउसा, मुक्ली, काँगेल, जुवु, नेचाबतासे, पंचन, सल्यान लोखिम, तिङला, पावै आदि गा.वि.स. में, ओखलढुंगा के दियाले, कुइभिर, रुम्जाटार, खोटांग के रिम्बदुंग, ज्यामिरे, ऐंसेलुखर्क, जाल्पा आदि में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
४. बाहिङ/बायुङ
'बाहिङ लो' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले बाहिङ सोलु जिले के नेचाबतासे, सल्यान, तिङला, ओखलढुंगा जिले के राँगादिप, अँधेरी, वर्नालु, वरुणेश्वर, बिगुटार, ज्यामिरे, माम्खा, मोली, ओखलढुंगा, रुम्जाटार, उँबु, वाक्सा, देउराली, दियाले आदि में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में भी निवास करते हैं।
५. उबु चौरासे/वाम्बुले/ओम्बुले
'उँबु चौरासे योर' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले ओम्बुले ओखलढुंगा जिले के मानेभञ्ज्याङ, मोली, थाक्ले, हिलेपानी, उँबु और वाक्सा गा.वि.स., उदयपुर जिले के हुर्देनी, लेखानी, सिरिसे और सोरूंग गा.वि.स., खोटांग जिले के डिकुवा च्यास्मीटार में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
६. नाछिरिङ
'नाछिरिङ रु' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले नाछिरिङ सोलु जिले के सोतांग, गुँदेल, पावै, खोटांग जिले के वाकाचोल, ऐंसेलुखर्क, राखा वाङदेल, धारापानी गा.वि.स. में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
७. कोयी
'कोयी वःअ' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले कोयी खोटांग जिले के उत्तरी भाग में सुंगदेल, रावादिप्सुंग में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
८. दुमी
'दुमी बोओ' अथवा 'दुमी बा' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले दुमी खोटांग जिले के बाक्सिला, सप्तेश्वर, ससर्खा, खार्मी, माक्पा, ऐसेलुखर्क गा.वि.स. में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
९. साम्पाङ
'साम्पाङ-खा' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले साम्पाङ खोटांग जिले के उत्तर-पूर्वी भाग- खार्तम्छा, पाथेका, फेदी, भोजपुर के उत्तरी भाग- खिमालुंग, खार्तम्छा, फालिसाम्पाङ गा.वि.स. में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में भी निवास करते हैं।
१०. चाम्लिङ
'चाम्लिङ ला' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले खोटांग जिले के 76 गा.वि.स. में से 45 में, उदयपुर जिले के 47 गा.वि.स. में से 36 में मुख्य रूप से और उससे जुड़े अन्य जिलों तथा देश के विभिन्न भागों में निवास करते हैं।
११. पुमा
पुमाला कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले पुमा खोटांग जिले के दिपलुंग, मौवाबोटे, देवीस्थान, पौवासेरा और चिसापानी गा.वि.स. में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
१२. बान्तवा
वान्तवा यङ कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले बान्तवा भोजपुर जिले के मध्य तथा दक्षिणी भाग, खोटांग जिले के दक्षिण-पूर्वी सीमावर्ती भाग और उदयपुर जिले के पूर्वी भाग में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में निवास करते हैं।
१३. मेवाहाङ
'मेवाहाङ्-खानावा' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले मेवाहाङ संखुवासभा जिले के वाला, याम्दांग, सिसुवा, ताम्कु, माङतेवा और याफु रा, भोजपुर जिले के मझुवा, चौकीडाँडा, दोभाने, नेपालेडाँडा में मुख्य रूप से और देश के अन्य भूभागों में भी निवास करते हैं।
१४. याम्फू
'याम्फुखा' अथवा 'याम्फेखा' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले याम्फु संखुवासभा जिले के ऊपरी अरुण के दोनों तरफ के मार्ग अर्थात् मकालु, पावाखोला, पाथीभरा, नुम गा.वि.स. में मुख्य रूप से तथा धनकुटा, ताप्लेजुंग, तेह्रथुम, इलाम में कुछ छिटपुट रूप में निवास करते हैं।
१५. लोहरूङ
'लोहरूङ खाप्' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले लोहरुङ राई संखुवासभा के मध्य और दक्षिणी भाग में सघन रूप से और धनकुटा, ताप्लेजुंग, पाँचथर, तेह्रथुम, इलाम, झापा, मोरंग, सुनसरी में कुछ छिटपुट रूप में निवास करते हैं।
१६. आठपरिया
'आठाप्रेरिङ' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले आठपरिया राई धनकुटा जिले के मध्य भाग में- धनकुटा नगरपालिका, भिरगाउँ और उसके समीप सघन रूप से तथा सुनसरी, मोरंग, झापा, इलाम, पाँचथर, तेह्रथुम आदि में कहीं-कहीं निवास करते हैं।
१७. बेलरिया
'बेलरिया रिंग' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले बेलरिया धनकुटा जिले के बेलहारा में और उसके दक्षिणी भागों में निवास करते हैं।
१८. बुङ्ला
बुंगला भाषी राई किरात भोजपुर जिले के उत्तरी भाग में नेपालेडाँडा गा.वि.स. और आसपास के क्षेत्रों में निवास करते हैं।
१९. लाम्बिछोङ
'छाम्बिछोङ रिंग' कही जाने वाली इस भाषा के उपयोगकर्ता लाम्बिछोङ राई किरात धनकुटा जिले के मुगा और पाख्रिवास गा.वि.स. तथा उनके आसपास निवास करते हैं।
२०. छिन्ताङ
'छिन्ताङ रूङ' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले छिन्ताङ राई किरात छिन्ताङ गा.वि.स. के तमोर, अरुण और सुनकोशी के संगम स्थल के पास और आँखीसल्ला गा.वि.स. में मुख्य रूप से और सुनसरी, मोरंग, झापा आदि में निवास करते हैं।
२१. छिलिङ
'छिलिङ-रूङ' कही जाने वाली इस भाषा के उपयोगकर्ता छिलिङ राई धनकुटा जिले के आँखीसल्ला गा.वि.स. और उसके आसपास मुख्य रूप से तथा सुनसरी, मोरंग, तेह्रथुम में छिटपुट निवास करते हैं।
२२. तिलुङ
'तिलङ-ब्लामा' कही जाने वाली इस भाषा के वक्ता तिलु खोटांग जिले के च्यास्मिटार और उदयपुर जिले के कुछ भागों में निवास करते हैं।
२३. जेरूङ
'जेरो माल' कही जाने वाली यह भाषा बोलने वाले जेरूङ ओखलढुंगा जिले के माधवपुर, बल्खु और सिस्नेरी गा.वि.स. में, सिन्धुली जिले के रत्नावती गा.वि.स. में मुख्य रूप से और उससे दक्षिण एवं पूर्व में छिटपुट निवास करते हैं। उपरोक्त भाषाओं के साथ-साथ चुक्वापोहिङ, साम आदि के बारे में संक्षिप्त उल्लेख मिलता है, लेकिन स्पष्ट जानकारी प्राप्त होना अभी बाकी है।
इसके अनुसार किरात राईयों द्वारा बोली जाने वाली लगभग 25 राई किरात भाषाओं को विभिन्न स्तर के शैक्षिक निकायों में पठन-पाठन की व्यवस्था मिलाना मुख्य रूप से सरकार का दायित्व है। लेकिन देश में अतीत से लेकर अब तक गठित विभिन्न व्यक्तियों या पार्टियों के नेतृत्व वाली सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। विभिन्न किरात राई भाषाओं में पठन-पाठन कराने की बात तो दूर, विलुप्त होने वाली भाषाओं को बचाने के लिए शब्द संग्रह और शब्दकोश निर्माण की दिशा में भी ठोस कदम उठाया हुआ नहीं दिखता।
एक-दो किरात राई भाषाओं में प्राथमिक स्तर (5 कक्षा तक) की कुछ पुस्तकें प्रकाशित करके किरात राई भाषाओं का विकास कराने का शोर मचाया गया है, लेकिन कुल मिलाकर किरात राई भाषाओं के प्रति दमनकारी व्यवहार करते हुए उन भाषाओं को समाप्त करने की लगभग ढाई शताब्दी से चली आ रही सरकारी नीति ही आज तक लागू होती दिखती है।
देश के किसी भी भाग में किसी के भी द्वारा मातृभाषा के रूप में प्रयोग न की जाने वाली संस्कृत भाषा के लिए विभिन्न पीठ, पाठशाला आदि खोलकर ही नहीं, बल्कि संस्कृत विश्वविद्यालय तक खोलकर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किए गए हैं। उसी प्रकार सत्ताधारियों द्वारा नेपाली बनाई गई या कही गई खस भाषा के एकाधिकार को बढ़ावा देने के लिए अरबों रुपये खर्च किए जा चुके हैं और किए जा रहे हैं, लेकिन देश के मौलिक निवासी किरात राईयों की लगभग 25 मातृभाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए सरकारी क्षेत्र से 25 (पच्चीस) करोड़ तक की राशि आवंटित नहीं की गई है।
विभिन्न भाषाओं, संस्कृति, धर्म, जाति और क्षेत्र के प्रति समावेशी दृष्टिकोण रखने वाली और प्रगतिशील कही जाने वाली वर्तमान सरकार भी आंशिक रूप से कुछ भिन्नता दिखाने के बावजूद किरात राई भाषाओं के प्रति पिछली सरकारों द्वारा अपनाई गई भेदभावपूर्ण और दमनकारी नीति का ही अनुसरण करती दिख रही है।
देश में समावेशी नीति वास्तव में लागू करने की कोशिश की जा रही है, अथवा भाषाई समावेशी नीति लागू होने की बात व्यवहार से ही प्रमाणित करनी है, तो अपनी मातृभाषा में प्राथमिक से उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के किरात राईयों के अधिकार को कार्यान्वयन करने की दिशा में संबंधित जिम्मेदार पक्ष द्वारा अविलंब ठोस कदम उठाया जाना आवश्यक है। http://kiratraikorea.blogspot.com/2012/02/blog-post_20.html?m=1 किरात राई भाषाहरु र साहित्यको वर्तमान अवस्था
हाँ, भाषा सभी किरात जातियों की है, लेकिन बिना जाति के भाषा और बिना भाषा के जाति नहीं होती, यह बात राई के ठेकेदारों ने भुला दी है। किरात जातियों की भाषा को "भाषाभाषी" कहकर अपमानित करने वाले यायोक्खा के पुजारी इसकी व्याख्या करके सभी किरात जातियों को बताएं।
यह भी देखें
नेपाल की भाषाएँ
बाहरी कड़ियाँ
हिन्दी-राई अध्येता कोश
सन्दर्भ
श्रेणी:नेपाल की भाषाएँ
श्रेणी:भारत की भाषाएँ