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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

उद्दालक

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उद्दालक, उपनिषद् युग के श्रेष्ठ तत्ववेत्ताओं में मूर्धन्य चिंतक थे। ये गौतम गोत्रीय अरुणि ऋषि के पुत्र थे और इसीलिए 'आरुणि' के नाम से विशेष प्रख्यात हैं। ये महाभारत में धौम्य ऋषि के शिष्य तथा अपनी एकनिष्ठ गुरुसेवा के निमित्त आदर्श शिष्य बतलाए गए हैं। (महाभारत, आदिपर्व)। प्रायः माना जाता है कि ग्रीक सन्त थेल्स (७६ ईसापूर्व) विज्ञान के अग्रदूत थे। किन्तु प्रसिद्ध इतिहासकार देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने सिद्ध किया है कि वास्तव में थेल्स नहीं बल्कि उद्दालक प्रथम चिन्तक थे जिन्होने ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयोग की आवश्यकता का प्रतिपादन किया था। देखिये- उद्दालक आरुणि ने अपने विद्वान बेटे श्वेतकेतु से कहा – बरगद का एक फल लाओ। श्वेतकेतु फल ले आया। पिता ने उसे काटने के लिए कहा। बेटे ने काट दिया। पिता ने पूछा- तुमने क्या देखा? श्वेतकेतु ने कहा- अनेक सूक्ष्म बीजों को देख रहा हूँ। पिता ने केवल एक बीज चुन कर अलग करने के लिए कहा। जब बीज अलग कर लिया गया, तब पिता ने उस एक सूक्ष्म-से बीज को काटने के लिए कहा। जब श्वेतकेतु उसे काट चुका, तब पिता ने फिर पूछा- अब तुम क्या देख रहे हो? बेटे ने कहा- अब कुछ भी नहीं देख रहा हूँ . ''तब दार्शनिक पिता ने विद्वान बेटे से कहा- बेटे, जिसे तुम नहीं देख रहे हो, वही सत्य है। इसी सत्य से विशाल बरगद का वृक्ष उमगता है। इसी तरह ब्रह्माण्ड का मूल आत्मा है। वह सूक्ष्म और नहीं दिखने लायक है, लेकिन परम सत्य वही है। गुरुभक्त आरुणि यह कथा अरुणि के सन्दर्भ में है जबकि आरुणी उनके पुत्र उद्दालक को कहा जाता है March 2022 ऋषि धौम्य के आश्रम में कई छात्र रहते थे। वह उन्हें पूरी तत्परता से पढ़ाते, साथ ही उनकी कड़ी परीक्षा भी लेते रहते थे। इन परीक्षाओं में अलग-अलग कसौटियां तय की जातीं और देखा जाता कि विद्यार्थी सीखी गई विद्या और गुरु के प्रति कितना निष्ठावान है। एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी। गुरु ने अपने एक छात्र आरुणि से कहा, 'बेटा! खेत की मेड़ टूट जाने से पानी बाहर निकला जा रहा है, सो तुम जाकर मेड़ बांध आओ।' आरुणि तत्काल उठ खड़ा हुआ और खेत की ओर चल दिया। पानी का बहाव तेज था। आरुणि ने मिट्टी जमाने की कोशिश की पर बहाव रुका नहीं। कोई उपाय न देख आरुणि उस स्थान पर लेट गया। इस प्रकार उसने पानी को रोक दिया मगर बहाव और वर्षा के वेग से वह बेहोश हो गया। बहुत रात बीत जाने पर भी जब वह न लौटा तो धौम्य को चिंता हुई। वह खेत पर उसे ढूंढने पहुंचे। देखा तो आरुणि पानी को रोके मेड़ के पास लेटा था। देखते ही गुरुजी भावविभोर हो गए। आरुणि के विचार आरुणि के अध्यात्म विचारों का विस्तृत विवेचन छांदोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों में बड़े रोचक ढंग से किया गया है। तत्ववेत्ताओं के इतिहास में आरुणि का पद याज्ञवल्क्य के ही समकक्ष माना जाता है जो इनके शिष्य होने के अतिरिक्त उपनिषत्कालीन दार्शनिकों में नि:संशय सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। मनोवैज्ञानिक तथ्यों के विषय में आरुणि की मान्यता है कि निद्रा का मुख्य हेतु 'श्रम' है और निद्रा की दशा में जीव आत्मा के साथ ऐक्य धारण कर लेता है (छांदोग्य ६.८.१)। मृत्युकालीन चेतना के विषय में आरुणि का कथन है कि जब मनुष्य मरता है, तब उसकी वाक्मन में अंतर्लीन हो जाती है; अनंतर मन प्राण में, प्राण तेज में तथा अंत में तेज देवता में अंतर्लीन हो जाता है (छां. ६.१५)। इस सिद्धांत को याज्ञवल्क्य ने यहीं से ग्रहण कर विस्तार से प्रतिपादित किया है। तत्वज्ञान के विषय में आरुणि के सिद्धांत को हम 'प्रत्ययवादी' अद्धैत का नाम दे सकते हैं, क्योंकि इनकी दृष्टि में अद्वैत ही एकमात्र सत् तथा तथ्य है। आरुणि के सिद्धांत का शंखनाद है तत्वमसि वाक्य जिसे इन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतु को अनेक मनोरंजक दृष्टांत के द्वारा समझाया तथा प्रमाणित किया। 'इदं सर्व तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो'-आरुणि के अद्वैतवाद का यह महनीय मंत्र है (छां. ६.११,१२)। मूल तत्त्व 'सत्' रूप है, असद्रूप नहीं, क्योंकि असत् से किसी भी प्रकार की उत्पत्ति नहीं हो सकती। यह सत् अपने में से पहले अग्नि को, पीछे जल को तथा अंत में पृथ्वी को इसी क्रम से उत्पन्न करता है। सृष्टि का यह 'त्रिवृत्करण' तत्त्व आरुणि का स्वोपज्ञ सिद्धांत है। विश्व के प्रत्येक द्रव्य में ये तीनों तत्त्व विद्यमान रहते हैं। सब पदार्थ असत् हैं। पदार्थों अपेक्षा तत्वों (पृथ्वी, जल, तेज) की सत्यता सर्वथा मान्य है और इन तत्वों की अपेक्षा सत्यतर है वह सत् जो इनका मूल कारण है (छां. ६.३-४)। यह सत् विश्व के समस्त प्रपंचों में अनुस्यूत तथा आधारस्थानीय सूक्ष्म तत्त्व है (छां ६.१२)। इसका पूर्ण ज्ञान आचार्य के द्वारा दी गई शिक्षा के द्वारा और श्रद्धा के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। 'आचार्यवान् पुरुषो वेद' =गुरु के द्वारा उपदिष्ट पुरुष ही परम तत्त्व को जानता है; आरुणि का यह उपदेश गुरुतत्व की आधारशिला है। आत्मा विश्व के प्रत्येक पदार्थ में उसी प्रकार व्याप्त रहता है, जिस प्रकार उस जल के प्रत्येक कण में लवण व्याप्त रहता है जिसमें वह डाला जाता है (छां. ६.१३)। उद्दालक आरुणि का यह अध्यात्मदर्शन आत्मा की अद्वैतता तथा व्यापकता का पूर्ण परिचायक है। सन्दर्भ ग्रन्थ आर.डी. रानाडे : कॉन्स्ट्रक्टिव सर्वे ऑव उपनिषदिक फ़िलॉसफी, पूना, १९२६; राधाकृष्णन : इंडियन फ़िलॉसफी, भाग १, लंदन बाहरी कड़ियाँ आरुणि ऋषि श्रेणी:ऋषि मुनि श्रेणी:भारतीय दार्शनिक